असहज और अस्वाभाविक जीवन से जातियों में बढ़ रहा है परस्पर संघर्ष : स्वामी रामनरेशाचार्य

ईश्वर के लिए समर्पित होकर कर्म करना सारी समस्याओं का हल है। इससे ऐसे समाज की रचना होती है, जो न समाजवाद कर सकता और न ही राजनैतिक पार्टियां ऐसा कभी कर सकती है।...

एजेंसी
असहज और अस्वाभाविक जीवन से जातियों में बढ़ रहा है परस्पर संघर्ष : स्वामी रामनरेशाचार्य

जयपुर। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्य ने कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना तथा सैन भक्त के माध्यम से आध्यात्मिक लोकतंत्र की भावभूमि खड़ी की। काशी का श्रीमठ शताब्दियों से निर्गंण तथा सगुण रामभक्ति परंपरा के मुख्यालय के रूप में छुआछूत तथा सामाजिक भेदभाव के उन्मूलन में खास काम कर रहा है। बुधवार को हनुमान नगर स्थित रामालय में रामानंद सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी रामनरेशाचार्य ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि कहा कि ईश्वर के लिए समर्पित होकर कर्म करना सारी समस्याओं का हल है। इससे ऐसे समाज की रचना होती है, जो न समाजवाद कर सकता और न ही राजनैतिक पार्टियां ऐसा कभी कर सकती है।

महत्त्वाकांक्षा की दौड़ से वर्ग तथा जातियों में परस्पर संघर्ष बढ़ रहा है। यह राष्ट्र तथा समाज के लिए हितकारी नहीं है। इसके मूल में असहज और अस्वाभाविक जीवन है, जिसे हमें छोड़ना होगा। यदि हम समाज में समरसता के भाव का विकास चाहते हैं तो हमें अहंकार और महत्त्वाकांक्षा से दूर रहना होगा। किसी को पछाड़ने की वृत्ति को त्यागकर मानव मात्र को आगे बढ़ाने की नैतिकता पर जोर देना होगा। स्वामी रामानंद ने भक्ति के आधार पर बिना भेदभाव के महात्मा कबीर और रैदास को शिष्य बनाया था। उन्हें दिव्य आध्यात्मिक जीवन प्रदान किया। यह धार्मिक एकता भारत को जोड़े रखने के लिए जरूरी है। हमारी संस्कृति की प्राणवायु यही एकता है, जिसे राजनीति छिन्न-भिन्न नहीं कर सकती। यह वह देश है, जहां ’मरा-मरा’ का जप करने वाले वाल्मीकि मानव इतिहास के सबसे मर्यादित राम चरित के रचयिता हो गए। जूते गांठने वाले संत रैदास ने मीरा जैसी अलौकिक विभूति को प्रकट कर दिया। अनेक उदाहरण हैं जहां भक्ति के आधार पर बिना आरक्षण के लोकोत्तर व्यक्तित्व वाली संत-भक्त विभूतियां प्रकट हो गई। न कोई जात, न रंगभेद और न लिंगभेद। वस्तुतः धर्म ही मानव को महामानव बनाने का सामर्थ्य रखता है।

वेदों ने जिन कर्मों को करने को कहा, वे धर्म हैं। जैसे वेदों ने कहा, सत्य बोलिए। कोई बताए कि यह वेद वाक्य किस धर्म तथा किस राष्ट्र के व्यक्ति के लिए है? यह सभी के लिए है। ठीक ऐसे ही राम और कृष्ण सभी के लिए हैं। जो वेद-पुराणों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि वे धर्म को साथ लेकर ही सही रीति से आगे बढ़ सकते हैं। जरा सोचिए, रामायण से दूर जाकर जिस समाज की स्थापना होगी, वह अयोध्या नहीं बल्कि लंका के वातावरण का निर्माण करेगा। इसका लक्ष्य मात्र भोजन, विलास और मादकता होगी। अतः हमें देश, समाज तथा मानव मात्र को ऊंचाई पर ले जाने के लिए रामायण और गीता को आधार बनाना पडेगा। स्वामी रामानंद और कबीर-रैदास के दिखाए पंथ पर चलना होगा, तभी हमारा संपूर्ण विकास हो सकेगा।

स्वामी रामनरेशाचार्य ने जोधपुर के सैनाचार्य अचलानंदाचार्य का विशिष्ट अभिनन्दन किया। इस अवसर पर नरपत सिंह राजवी-विधायक, पुरोहिताचार्य उमाशंकर शास्त्री, संस्कृत विद्वान् शास्त्री कोसलेन्द्रदास, महेंद्र चौधरी तथा हरीश शर्मा समेत अनेक विद्वान उपस्थित थे। समिति अध्यक्ष गजानंद अग्रवाल ने बताया कि रामनरेशाचार्य गुरुवार को प्रातः वृन्दावन के लिए प्रस्थान करेंगे।

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