दुनिया को "कोयला मुक्त" बनाने के सपने को साकार करने की तरफ पहला कदम

दुनिया भर में ऊर्जा की आवश्‍यकता के 28 प्रतिशत हिस्‍से की पूर्ति कोयले के माध्‍यम से उत्‍पादित बिजली से होती है। इससे विश्‍व में बनने वाली कुल बिजली के 41 प्रतिशत हिस्‍से का उत्‍पादन होता है...

अतिथि लेखक
दुनिया को "कोयला मुक्त" बनाने के सपने को साकार करने की तरफ पहला कदम

डा. सीमा जावेद

ऐसे में जब जर्मनी दुनिया को "कोयला मुक्त" बनाने के सपने को साकार करने की तरफ पहला कदम बढ़ाते हुए अपने बिजली उत्पादन में से कोयले को पूरी तरह से समाप्त करने की समय सीमा तय करने जा रहा है, तब टिकाऊ विकास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर अनुसन्धान में रत फ्रांसीसी थिंक टैंक इंस्टीट्यूट आईडीडीआरआई और ब्रिटेन स्थित जलवायु रणनीती अनुसंधान नेटवर्क ने अपनी संयुक्त “कोल् ट्रांजीशन इनिशिएटिव रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि प्रमुख कोयला उपयोग करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में "कोयले मुक्त" होने के विश्वसनीय विकल्प हैं।

इस रिपोर्ट के भारतीय परिपेक्ष्य के आंकलन के तहत- प्रोफेसर अमित गर्ग की अगुवाई वाली आईआईएम-अहमदाबाद की एक टीम ने छह सितम्‍बर को जारी हुई ‘कोल ट्रां‍जीशन इन इंडिया : असेसिंग इंडियाज एनर्जी ट्रांजीशन ऑप्‍शंस’ (लेखक- सरिता विश्‍वनाथन, अमित गर्ग एवं विनीत तिवारी) शीर्षक वाली अपनी सारांश रिपोर्ट में-कोयले के भविष्‍य के बारे में कुछ प्रमुख अंतर्राष्‍ट्रीय तथा राष्‍ट्रीय बहस में उभरे बिंदुओं का उत्‍तर तलाशने की कोशिश की है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में ऊर्जा की आवश्‍यकता के 28 प्रतिशत हिस्‍से की पूर्ति कोयले के माध्‍यम से उत्‍पादित बिजली से होती है। इससे विश्‍व में बनने वाली कुल बिजली के 41 प्रतिशत हिस्‍से का उत्‍पादन होता है और इससे वैश्विक स्‍तर पर निकलने वाली कुल कार्बन डाई ऑक्‍साइड का 46 प्रतिशत हिस्‍सा उत्‍सर्जित होता है।

इसके बरक्‍स, भारत में ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा कोयले के इर्द-गिर्द ही घूमता है। देश में उत्‍पादित होने वाली कुल बिजली का करीब 70 प्रतिशत हिस्‍सा कोयले से चलने वाले संयंत्रों से प्राप्‍त होता है। परिणामस्‍वरूप राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उत्‍सर्जित कार्बन डाई ऑक्‍साइड में इन संयंत्रों का योगदान 65 प्रतिशत है। भारत इस वक्‍त कोयले से बिजली उत्‍पादन के मामले में दुनिया में तीसरे स्‍थान पर है। वहीं, ऐसी बिजली का वह तीसरा सबसे बड़ा आयातक भी है।

हालांकि अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के हिसाब से भारत की आबादी का आधुनिक ऊर्जा के उपभोग के मामले में स्‍तर निम्‍न (880 किलोवाट प्रति घंटा/प्रतिव्‍यक्ति/प्रतिवर्ष) है। फिर भी, इस वक्‍त 8 प्रतिशत के हिसाब से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जीडीपी विकास दर रखने वाले देशों में शुमार किया जाने वाला भारत पेरिस समझौते के तहत प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी लाने के लक्ष्‍य को न सिर्फ पूरा करने बल्कि वर्ष 2005-2030 के दौरान ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन में 33-35 प्रतिशत कटौती करने के अपने संकल्‍प से भी ज्‍यादा कटौती करने के मार्ग पर अच्‍छी तरह आगे बढ़ (लक्ष्‍य का करीब 25 प्रतिशत वर्ष 2005-2014 के दौरान हासिल कर लिया गया) रहा है।

इसके अलावा वह वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्‍म ईंधन से बिजली उत्‍पादन करने क्षमता में 40 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी प्राप्‍त करने की दिशा में भी बढ़ रहा है (वर्ष 2017 तक करीब 30 प्रतिशत लक्ष्‍य प्राप्‍त किया जा चुका है)। हालांकि ऐसा अनुमान है कि भारत के ऊर्जा तंत्र में कम से कम 2030 तक कोयला ही बिजली उत्‍पादन का मुख्‍य आधार बना रहेगा।

रिपोर्ट के अनुसार चीन अपने ऊर्जा तंत्र से कोयले को सक्रिय रूप से चरणबद्ध तरीके से हटा रहा है, और वर्ष 2025 के आसपास वोह ऊर्जा से संबंधित कार्बन उत्सर्जन कम करने की शुरुआती पीक को प्राप्त कर सकता है। चीन में थर्मल कोयले के घरेलू उपयोग में 5-10% की गिरावट अकेले कोयले के वैश्विक बाजार के तीसरे हिस्से तक

खत्म हो सकती है, इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत भारी गिरावट ला सकती है। प्रमुख कोयले का उपयोग करने वाली अर्थव्यवस्थाएं उपभोक्ताओं के लिए

बिजली की कीमतों में वृद्धि किए बिना कोयले से लगभग दूर जा सकती हैं, जबकि नए उद्योगों इस बदलाव से सामाजिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ भारत अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने के नेशनली इनटेनडेड टारगेट्स “एनडीसी” लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ट्रैक पर है। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए, भारत को अपने पुराने कोयले के बिजली संयंत्रों को समाप्त करने और अन्य का नवीनीकरण करने सहित ऊर्जा प्रणालियों में दक्षता बढ़ाने जैसे कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत है। भारत में 2030 तक कोयला मुख्य आधार बने रहेगा और केवल 2 डिग्री सेल्सियस स्थिरता परिदृश्य में यह 2050 के करीब घट जाएगा।

भारत में कोयले से इतर किसी अन्‍य ऊर्जा स्रोत पर निर्भरता बढ़ाने की दिशा में पहला कदम उठाने से पहले इससे जुड़े डेढ़ करोड़ से ज्‍यादा लोगों की श्रमशक्ति और उनके परिवार पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रभावों के बारे में सोचना होगा।”इसीलिये कोयले को तिलांजलि देना भारत के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह रिपोर्ट भारत में कोयले के वर्ष 2050 तक के भविष्‍य को रेखांकित करती है। इसके उजागर किये गये तथ्‍यों में यह भी शामिल है कि दुनिया भर में प्रदूषणकारी तत्‍वों में कमी लाने के लक्ष्‍यों का भारत के ऊर्जा तंत्र पर गहरा असर पड़ेगा, वर्ष 2020 तक राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोयले का उपयोग 90 करोड़ के स्‍तर को छुएगा और यह स्थिति वर्ष 2030 तक बनी रहेगी, 25 साल से ज्‍यादा पुराने बिजली संयंत्रों को वर्ष 2040 तक बंद कर दिया जाएगा, कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों का पीएलएफ करीब 50 प्रतिशत के निम्‍न स्‍तर तक बना रहेगा लेकिन वर्ष 2030 तक गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों का पीएलएफ करीब 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा, वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा क्षमता 200 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। इसके अलावा वर्ष 2035 तक थर्मल पॉवर प्‍लांट्स के लिये कोयले का सालाना आयात 5 से 10 करोड़ टन तक जारी रह सकता है।

 (लेखिका डॉ. सीमा जावेद पर्यावरणविद, संचार रणनीतिकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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