हवा केवल दिल्ली की खराब नहीं सरकार जी ! आज धुन्ध बहुत है मेरे शहर में

प्रदूषण में व्यापार कैसे चमकाया जाए, यह भारतीयों से दुनिया को सीखना चाहिए।...

हाइलाइट्स

प्रदूषण में व्यापार कैसे चमकाया जाए, यह भारतीयों से दुनिया को सीखना चाहिए। बाकी जहां तक दुनिया से सीख लेने का सवाल है तो भारत को यह देखना चाहिए कि चीन, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी ऐसे कई देशों में जब Air_Pollution का संकट आया तो निजी वाहन कम करके, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देकर, निर्माण कार्य रोककर, बड़े पैमाने पर सचमुच का स्वच्छता अभियान चलाकर, कारखानों में ईमानदारी से प्रदूषण नियंत्रण के उपाय कर हवा को साफ किया गया।

हवा केवल दिल्ली की खराब नहीं सरकार जी ! आज धुन्ध बहुत है मेरे शहर में

राजीव रंजन श्रीवास्तव

देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास का इलाका यानी NCR एक बार फिर गैस चैंबर बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स का स्तर अगर सौ है, तो यह सामान्य है, यानी सांस लेने लायक है। लेकिन पिछले कई सालों से दिल्ली का AQI आमतौर पर 300 से 400 के बीच रहता है। अब सांस लिए बिना इंसान तो रह नहीं सकता, सो इस खराब हवा में भी सांसों की आवाजाही चल रही है। लेकिन अब तो दिल्ली की हवा इतनी खराब हो चुकी है कि खुले में सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। मंगलवार को यह एयर क्वालिटी इंडेक्स 440 के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था और तब से अब तक दिल्ली-एनसीआर, उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा के कई इलाकों में जहरीली धुंध छाने से गैस चैंबर जैसी स्थिति बन गई है।

सरकार धूम्रपान निषेध का खूब विज्ञापन करती है। खुले में सिगरेट पीना गैरकानूनी है। लेकिन इस वक्त दिल्ली की हवा में सांस लेने का मतलब है करीब 50 सिगरेट रोज पीने जितना धुआं अपने शरीर में लेना। बीमारों के लिए यह स्थिति जानलेवा हो ही रही है जबकि अच्छे-खासे तंदरूस्त लोगों को भी मौत के मुंह में धकेल रही है।

अभी कुछ दिन पहले एक रिसर्च से यह बात सामने आई थी कि दिल्ली के प्रदूषण में इंसान की जान 6 साल कम हो रही है। 

सवाल देश की राजधानी की हवा का है, तो इस पर राष्ट्रीय स्तर पर चिंतन और चिंता हो रही है। लेकिन हवा केवल दिल्ली की खराब नहीं है, देश के गिने-चुने इलाकों को छोड़ दें तो हर जगह प्रदूषण का जहर तेजी से फैलता जा रहा है। अभी सांस लेने में दिक्कत हो रही है, तो वायु प्रदूषण की बात हो रही है। जब गर्मियों में पानी की किल्लत होती है और खराब गुणवत्ता का पानी मिलता है, तो जल प्रदूषण पर बात हो जाती है, और दिवाली के आसपास ध्वनि प्रदूषण पर चर्चा कर ली जाती है या फिर अज़ान के शोर जैसे बे-सिरपैर के बयानों के बहाने बात होती है। हम इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि जब तक खुद की जान पर न बन आए, जब तक खुद परेशानियों से न घिरें, हमें प्रदूषण जैसी बातें वक्त की बर्बादी लगती हैं। दिन-रात एसी में रहने वालों को जब धुंध और धुएं का सामना करना पड़ा तो वायु प्रदूषण याद आया। लेकिन समाज में उन लोगों के बारे में कितनी चिंता की जाती है, जो दिन-रात धूल, धुएं और गंदगी के बीच ही रहने को मजबूर हैं। झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले साक्षात नरक में ही जीवन जीते हैं।

गांवों में पीने के साफ पानी की मारामारी आम बात हो चुकी है। कई गांवों में प्रदूषित पानी के कारण लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। वाहनों के धुएं और शोर से इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के प्राण भी संकट में पड़े हैं। लेकिन आमतौर पर समाज में इन सारी बातों पर चिंता का माहौल ही नहीं है। स्वार्थ में पूरी तरह लिप्त इंसान यह मानकर चलता है कि इस धरती का काम उसका बोझ ढोना और उसे जरूरत की सारी चीजें मुहैया कराना है। बदले में धरती को भी साज-संभाल चाहिए, यह फिक्र उसे नहीं है। प्राणवायु आक्सीजन, पानी, भोजन, लकड़ी, ईंधन, रत्न-जवाहरात सब उपलब्ध कराने वाली धरती को जब इंसान नहीं बख्शता है, तो अपने साथी मनुष्यों की चिंता वह क्या खाक करेगा। अभी भी जब दिल्ली में सेहत का आपातकाल लागू हो गया तो अमीरों के पास एयरप्यूरीफायर और मास्क खरीदने का विकल्प हो गया। इनकी उपयोगिता कितनी है, यह तो बाद की बात है, लेकिन फिलहाल संपन्न लोग यह सोचकर ही सांस ले सकते हैं कि वे एयरप्यूरीफायर के सुरक्षा घेरे में हैं। इन वस्तुओं का बाजार इस वक्त खूब मुनाफा काट रहा है।

प्रदूषण में व्यापार कैसे चमकाया जाए, यह भारतीयों से दुनिया को सीखना चाहिए। बाकी जहां तक दुनिया से सीख लेने का सवाल है तो भारत को यह देखना चाहिए कि चीन, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी ऐसे कई देशों में जब Air_Pollution का संकट आया तो निजी वाहन कम करके, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देकर, निर्माण कार्य रोककर, बड़े पैमाने पर सचमुच का स्वच्छता अभियान चलाकर, कारखानों में ईमानदारी से प्रदूषण नियंत्रण के उपाय कर हवा को साफ किया गया। अभी अमरीकी राष्ट्रपति चीन में थे और वहां भी इसी तरह की धुंध थी तो चीन ने गाडिय़ों और निर्माण कार्य को प्रतिबंधित किया, साथ ही स्टील, सीमेंट और कोयला कंपनियों के प्रोडक्शन पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी। इन उपायों से करीब 25 फीसदी प्रदूषण कम करने का दावा किया गया। लेकिन ब्रिटिश राजकुमार चार्ल्स दिल्ली आए तो उनका स्वागत धुंध भरे माहौल में ही किया गया। शायर ने सच ही कहा है- आज धुन्ध बहुत है मेरे शहर में, अपने दिखते नहीं और जो दिखते हैं वो अपने नहीं। तो,कैसे छंटेगी यह धुंध और किसकी जिम्मेदारी है इसे दूर करने की, यह सोचने का वक्त अब आ गया है।

RajeevRanjanSrivastava

https://twitter.com/rajeevrsri

https://www.facebook.com/rajeevrsri

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।