दस दिन जब दुनिया हिल उठी देखकर मंदसौर में किसानों पर हुए गोलीकांड की याद हुई ताज़ा

शोषण मुक्त समाज सिर्फ़ समाजवाद में ही संभव... किसी चीज़ का नाकाम होना इस बात का आधार नहीं होता कि उसकी ज़रूरत नहीं है ...

हाइलाइट्स

शोषण मुक्त समाज सिर्फ़ समाजवाद में ही संभवः डॉ. जया मेहता

किसी चीज़ का नाकाम होना इस बात का आधार नहीं होता कि उसकी ज़रूरत नहीं है।

रूसी क्रांति के सौ बरस पर मंदसौर में आयोजन

मंदसौर (मध्य प्रदेश) देश में क्रांतिकारियों के इतिहास को भुलाने और विकृत करने का प्रयास अब पहले से भी तेज़ गति से जारी है। सौ वर्ष पूर्व हुई रूसी क्रांति मेहनतकषों के सदियों के संघर्ष का नतीजा थी, जिसने दो बातें स्थापित की थीं जो तब तक सोची भी नहीं जाती थीं। पहली ये कि शोषणविहीन समाज बनाया जा सकता है। शोषण न तो ईश्वरीय नियम है और न ही कुदरती नियम। और दूसरी ये कि वंचित वर्गो के साथ समाजवादी समाज व्यवस्था ही न्याय करती है। सौ वर्ष बाद भी रूस की क्रांति की ये दोनों महान उपलब्धियाँ सारी दुनिया के मज़दूर-मेहनतकश तबके के साथ हर उस व्यक्ति को उम्मीद दिलाती हैं जो शोषण मुक्त समाज बनाने का सपना देखता है। समानता पर आधारित व्यवस्था कायम करने के लिए समाजवाद की पक्षधर ताकतों को पुनः एकजुट होने की और सुचिंतित रणनीति बनाकर पूँजीवाद को समूल उखाड़ फेंकने की जरूरत है।

ये विचार सोवियत क्रांति के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य मे प्रगतिशील लेखक संघ व भारतीय जन नाट्य संघ द्वारा 15 फरवरी, 2018 को आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किये गये।

विद्वान जन अर्थषास्त्री डॉ. जया मेहता ने अपने संबोधन में कहा कि साम्राज्यवाद का हिंसक स्वरूप इराक, अफगानिस्तान, लीबिया से लेकर उत्तर कोरिया तक दिखाई दे रहा है। रूस में समाजवादी व्यवस्था ढह जाने के बाद भी मानवता के लिये वैकल्पिक राज्य व्यवस्था समाजवाद ही है। किसी चीज़ का नाकाम होना इस बात का आधार नहीं होता कि उसकी ज़रूरत नहीं है।

प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने आयोजन में रूसी क्रांति पर आधारित अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड की किताब पर उसी नाम से बनाई गई डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी‘‘ की निर्माण प्रक्रिया, फिल्म के महत्त्व तथा हिंदी में डबिंग की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने सोवियत क्रांति मे लेनिन की भूमिका एवं क्रांति के वैश्विक प्रभावों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सोवियत संघ की मौजूदगी से न केवल दूसरे विश्वयुद्ध में मानवता पर आया ख़तरा टल सका, बल्कि उस विश्वयुद्ध में सोवियत संघ के 80 फ़ीसदी उद्योग समाप्त हो गए थे, जिन्हें वहाँ की समाजवादी सरकार के नेतृत्व में वहाँ के लोगों ने इतनी तेजी से फिर से पहले से बेहतर बना लिया कि सारी दुनिया में उसकी मिसाल नहीं।

अतिथियों का परिचय एवं आयोजन के बारे में प्रलेस मंदसौर के वरिष्ठ सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार हरनामसिंह ने कहा कि रूसी सोवियत क्रांति से भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी प्रभावित रहा। नेहरू से लेकर भगतसिंह तक ने देश मे समाजवादी व्यवस्था कायम करने की बात रूसी क्रांति से प्रभावित होकर ही की थी। समाजवादी रूस का भारत के विकास में योगदान सर्वविदित है। कार्यक्रम का संचालन प्रलेसं इकाई के सचिव कैलाश जोशी ने किया। प्रलेसं अध्यक्ष कमल जैन और इप्टा अध्यक्ष प्रदीप शर्मा मंचासीन थे।

नूतन स्कूल सभागार में प्रदर्षित फि़ल्म को प्रबुद्धजनों ने देखा और सराहा। फि़ल्म के बाद युवाओं के सवाल भी हुए जिनका विस्तृत जवाब डॉ. जया मेहता और विनीत तिवारी ने दिया। आभार इप्टा सचिव डॉ. स्वपनिल ओझा ने माना।

फिल्म प्रदर्शन ‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी‘‘

रूस की समाजवादी क्रांति पर बनी यह फि़ल्म नौजवान अमेरिकी लेखक और पत्रकार जॉन रीड की प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी‘‘ पर आधारित है। जॉन रीड रूसी क्रांति के प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे। उसी पुस्तक को आधार बनाकर ग्रिगोरी अलेक्सांद्रोव ने इस फिल्म का निर्माण किया।

ग्रिगोरी अलेक्सांद्रोव दुनिया के महान फिल्मकार सर्जेई आइजेंस्टाइन के सहायक थे। यह फि़ल्म रूस की क्रांति के 50 वर्ष पूरे होने पर बनी थी। डॉ. जया मेहता ने पहलकदमी करके इस फि़ल्म की हिन्दी डबिंग की तथा बाद के हिस्से में मौजूदा समय के बारे में एक राजनीतिक वक्तव्य भी जोड़ा कि आज जब सोवियत संघ नहीं है, तब और क्या है जो इंसानियत और समाजवाद के लिए उम्मीद की वजह है तथा समाजवाद ढह जाने के बाद भी रूसी क्रांति के दुनियाभर के परिवर्तनकामी क्रांतिकारी साथियों के लिए क्या मायने हैं।

फि़ल्म में एक मार्मिक दृश्य आता है जब रूस के अकाल पीड़ित किसान और ग्रामीण अपने राजा ज़ार के पास पहुँचे और करमाफी की प्रार्थना के साथ ही ज़ार की लंबी उम्र की कामना की। उन निहत्थों पर ज़ार के सैनिकों ने गोलियाँ बरसाईं और हज़ारों निरपराध लोग मारे गए। उस दृश्य से मंदसौर के लोगों को एक वर्ष पहले मंदसौर में किसानों पर हुए ऐसे ही गोलीकांड की याद ताज़ा कर दी, जब यहाँ के किसान अपनी उपज की वाजिब कीमत माँग रहे थे तो उन पर भी गोलियाँ चलाई गईं जिसमें 6 किसान मारे गए थे।

सत्तर मिनिट की इस फिल्म मंे ज़ार कालीन रूस, वहाँ का तत्कालीन जनजीवन, मजदूर वर्ग का प्रतिरोध, 1905 की पहली क्रांति और उसकी विफलता से लेकर वर्ष 1917 की निर्णायक क्रांति के नायक व्लादीमिर इल्यिच लेनिन के सूझबूझ भरे नेतृत्व को दिखाया गया है। एक प्रमुख मुद्दा, जो भारत जैसे तीसरी दुनिया के देषों के लिए विषेष महत्त्व का है, वो है एक असमान समाज में क्रांतिकारी ताक़तों ने रूस में कृषि से औद्योगिक विकास में किस तरह संक्रमण किया। वैष्वीकरण के वर्तमान समय में जब झूठ आधारित प्रचार सामग्री वंचित वर्गों को शोषण की व्यवस्था स्वीकार करने, उसे उनकी नियति बताने का जोर-शोर से प्रचारित कर रही है, यह फिल्म विवेकवान दर्षकों में वर्गीय चेतना जागृत करने की कोषिष करती है। और 100 वर्ष पुराने अपने क्रांतिकारी पुरखों की याद के बहाने ये भरोसा हममें भरती है कि अन्याय आधारित इस व्यवस्था को बदला गया था और अभी भी बदला जा सकता है। दुनिया विकल्पहीन नहीं है।

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