संसद पर तीन दिन रहा मजदूरों का महापड़ाव, पर मीडिया में नहीं बनी सुर्खियां

महापड़ाव में देशभर के मजदूरों ने आकर केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का विरोध किया। आजादी के बाद पहली बार यह मजदूर संगठनों ने इस तरह का आंदोलन किया...

संसद पर तीन दिन रहा मजदूरों का महापड़ाव, पर मीडिया में नहीं बनी सुर्खियां

Rally in Delhi on November 17

देशभर के मजदूरों का राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर चल रहा महापड़ाव आज खत्म हो गया। इस महापड़ाव में देशभर के मजदूरों ने आकर केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का विरोध किया। इस महापड़ाव में देश के 10 बड़े मजदूर संगठनों की हिस्सेदारी रही। आजादी के बाद पहली बार यह मजदूर संगठनों ने इस तरह का आंदोलन किया, अन्यथा अभी तक ये संगठन आम हड़ताल या स्थानीय स्तर पर धरने प्रदर्शन जैसे आंदोलन ही करते थे। यह आंदोलन इसलिए भी खास था, क्योंकि लंबे समय बाद मजदूरों के संयुक्त आंदोलन से संघ से जुड़े संगठन भारतीय मजदूर संघ को अलग रखा गया। मजदूर संघ 17 नवम्बर को अलग से दिल्ली में रैली करेगा। लेकिन तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में यह ख़बर सुर्खियांन बटोर पाई।

तीन दिन तक चले इस महापड़ाव में अलग-अलग दिन अलग-अलग वर्गों से मजदूरों ने हिस्सा लिया, इसमें बैंक,बीमा जैसे संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों से लेकर कारखानों और खदानों जैसे संगठित क्षेत्र के मजदूरों, आशा, ऊषा, आंगनवाड़ी सहित संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों ने भी हिस्सा लिया। महापड़ाव में बड़ी संख्या में असंगठित क्षेत्र व ठेके पर काम करने वाले मजदूरों ने भी हिस्सा लिया। मजदूर संगठनों की मुख्य मांग सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किए जा रहे कानूनों में बदलाव को रद्द करना, सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण रोकना, ठेका मजदूरों श्रम कानूनों का लाभ देने, संविदा कर्मचारियों को नियमित करने जैसी 12 मांगें शामिल थी। यह पहली बार हुआ जब मजदूर संगठनों के आंदोलन में किसानों की मांग को शामिल किया गया और तमाम किसान संगठनों ने मजदूरों के इस महापड़ाव को अपना समर्थन दिया।

आज महापडाव के तीसरे दिन देश भर के स्कीम मजदूरों जैसे, आशा वर्कर, आंगनवाडी, मध्यान्ह भोजन वर्कर बड़ी तादाद में संसद मार्ग में अपनी मांगों के समर्थन में एकत्रित हुए। 40,000 से ज्यादा मजदूर सरकार से एक ही आवाज़ मांग करने आये कि उन्हें कम से कम 18,000 न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए।

आशा मजदूर, आंगनवाडी व मध्यान्ह भोजन मजदूर को ज्यादातर राज्यों में हज़ार से डेढ़ हज़ार तक का वेतन मिलता है। यह वेतन उन्हें करीब 6 घंटे काम के एवज़ में मिलता है। विभिन्न राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण राज्यों से आये मजदूरों ने कहा कि उन्हें इतनी मेहनत करने के बावजूद भी जीने लायक वेतन नहीं मिलता है।

उन्होंने यह भी बताया कि इतने कम वेतन पर भी दिवाली की 15 दिन कि छुट्टियों का पैसा काट लिया जाता है।

छत्तीसगढ़ से आये मजदूर एकता यूनियन के नेता झरना साहू और समीर कुरैशी ने बताया कि मजदूरों का शोषण सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा बदस्तूर जारी है. वे लगातार आन्दोलन कर रहे हैं। पूरे देश में महिला मजदूरों के आन्दोलन चल रहे हैं। कई राज्यों में सरकार को हमारी मांगों के आगे झुकना भी पड़ा है। इन्ही आन्दोलनों के चलते हरियाणा में 2500, तमिलनाडु में 5600 और पोंडिचेरी में वेतन 14,000 रूपए हो गया है।

महिला मजदूरों ने कहा अगर हमारी मांगे नहीं मानी गयी तो आने वाले समय में हम अखिल भारतीय आन्दोला छेड़ेंगे और तब शांत नहीं बैठेंगे जब तक हमारा वेतन 18,000 रूपर प्रति माह नहीं हो जाता।

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