झारखण्ड: पत्थलगड़ी पर सरकार और आदिवासी समाज आमने-सामने... सरकार की नींद हराम

बौखलाई सरकार ने पत्थलगड़ी का वर्षगांठ मनाने वालों के खिलाफ करवाया एफआईआर...

अतिथि लेखक

पत्थलगड़ी के भूत ने की सरकार प्रशासन   की नींद हराम

 आदिवासी समाज के अगुवा की नकेल कसने की  तैयारी में लगी सरकार

आदिवासी समाज में एक नए विद्रोह का आगाज

  • विशद कुमार

वैसे तो जब से झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ है समाचारों की सुर्खियां इसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। इन्हीं सुर्खियों के बाजार में आजकल पत्थलगड़ी नामक भूत सरकार व प्रशासन की नींद हराम किए हुए है। पिछले एक साल से झारखंड के दक्षिणीछोटानापुर के खूंटी जिला के आदिवासी बहुल गांवों में पत्थलगड़ी की जा रही है। अब तक लगभग 50 गांवों में पत्थलगड़ी हो चुकी है।

क्या है पत्थलगड़ी

पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की एक पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है, जिसके तहत वे अपने गांव का सीमांकन करके बाहरी व्यक्तियों का गांव में प्रवेश को तब तक प्रतिबंधित करते हैं, जब तक ग्रामसभा उनके प्रवेश की इजाजत नहीं देता।  पत्थलगड़ी एक तरह से आदिवासी समाज का स्वायत शासन व्यवस्था है जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने संवैधानिक मान्यता दी थी।

इस बावत सेवा निवृत्त (प्रशासनिक सेवा झारखंड सरकार) संग्राम बेसरा कहते हैं कि 'जब अंग्रेजी हुकूमत आदिवासी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व कायम करने में असफल रही तो उसने 1872 में संताल परगना टेन्डेंसी एक्ट (एसपीटी) कानून बनाकर मांझी परगना प्रथा को मान्यता दे दी और इसी समुदाय के कुछ लोगों को जमींदारी देकर लगान की वसूली की। वहीं छोटानागपुर क्षेत्र में 1908 में छोटानागपुर टेन्डेंसी एक्ट बनाकर मांझी परगना प्रथा एवं मानकी मुंडा प्रथा की मान्यता दी।' बेसरा आगे कहते हैं — 'आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा एसपीटी में सन् 1949 में संशोधन किया गया, बावजूद ग्रामसभा के तहत स्वशासन की परंपरा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई । वहीं मांझी परगना सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस एक्ट के तहत इन क्षेत्रों में बाहर का कोई  भी व्यक्ति बिना ग्रामसभा की अनुमति के आकर बस नहीं सकता है, कारोबार नहीं कर सकता है।'

बताते चलें कि एक वर्ष पूर्व से इन क्षेत्रों में पत्थलगड़ी का काम चल रहा है लेकिन मामला सुर्खियों में तब आया जब पिछले 21 फरवरी 2018 को ग्रामीणों ने कुरूंगा गांव से कुछ दूर आगे 25 पुलिसकर्मियों की टीम को घेर लिया और 4 घंटे तक बंधक बनाए रखा, क्योंकि पत्थलगड़ी को लेकर कुरूंगा गांव के ग्राम प्रधान सागर मुंडा को पुलिस गिरफ्तार कर अड़की थाना ले जा रही थी। सागर मुंडा पर पिछले साल पुलिस को बंधक बनाने का आरोप है। इनके खिलाफ मामला भी दर्ज है। ग्राम प्रधान को हिरासत में लिये जाने की सूचना मिलने के बाद ग्रामीण गोलबंद हो गये और पुलिस कर्मियों को तब तक नहीं छोड़ा जब तक खूंटी जिले के जिला मुख्यालय से एसपी व डीसी आकर ग्राम प्रधान सागर मुंडा को छोड़ने का आदेश नहीं दिया।

विदित हो डीसी सूरज कुमार, एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा, एसडीपीओ रणवीर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर गये। अधिकारी ग्रामीणों से बातचीत के बाद ग्राम प्रधान को छोड़ने को तैयार हुए। ग्राम प्रधान को छोड़े जाने के बाद ग्रामीणों ने पुलिस टीम को मुक्त किया। उसके बाद देर शाम को डीसी-एसपी सहित अन्य पुलिसकर्मी वापस खूंटी लौट सके।

उल्लेखनीय है कि पिछले 25 अगस्त 2017 को खूंटी थाना क्षेत्र के कांकी सिलादोन गांव के लोगों ने खूंटी के डीएसपी रणवीर कुमार सहित पुलिस टीम को बंधक बना लिया था। ग्रामीणों और पुलिस के बीच हल्की झड़प भी हुई थी। पुलिस को फायरिंग भी करनी पड़ी थी। करीब 24 घंटे के बाद बंधक बने पुलिसकर्मियों को मुक्त कराया जा सका था।   

उल्लेखनीय है पिछले 9 मार्च 2018 को पत्थलगड़ी के एक वर्ष पूरे होने पर खूंटी के भंडरा के स्थानीय बाजारटांड़ में एक सभा का आयोजन किया गया था। सभा में आदिवासियों से एकजुट होने की अपील के साथ साथ पत्थलगड़ी के महत्व को समझाते हुए वक्ताओं में आदिवासी महासभा के यूसुफ पूर्ति ने कहा कि 'पारंपरिक पत्थलगड़ी हम आदिवासियों की परंपरा है। इसमें हम संवैधानिक अधिकारों को अंकित कर रहे हैं। इसे गलत बता कर हमें देश विरोधी बताया जा रहा है। जो हमारी पारंपरिक स्वशासन पर हमला है।' 

इस कार्यक्रम में लगभग 3000 से अधिक लोगों की मौजूदगी के चारो तरफ तीर-धनुष से लैस आदिवासी युवक तैनात थे। सभा के दौरान वीर बिरसा मुंडा के जयकारे लगाये जा रहे थे।

सभा समाप्ति के बाद पत्रकारों से बात करते हुए यूसुफ पूर्ति ने कहा कि — 'किसी भी सरकार को सरकार कहलाने के लिए भू-भाग की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। बिना भू-भाग के ये सरकार कैसे बन गयी हैं? वर्जित क्षेत्र में घुस कर सीएम और जिला प्रशासन तानाशाही कर रहे हैं। वर्जित क्षेत्र में गैर आदिवासियों का मौलिक अधिकार लागू नहीं है। डीसी और एसपी कह रहे हैं कि संविधान की गलत व्याख्या की गयी है। ऐसा कहीं नहीं है, वे सामान्य कानून को हम पर थोपने का काम कर रहे हैं। जिला प्रशासन को भी वर्जित क्षेत्र में काम करने के लिए गवर्नर लोक अधिसूचना जारी करते हैं, जो आज तक जारी नहीं की गयी है। इसलिए जिला प्रशासन अवैध है। गवर्नर जिस दिन अधिसूचना जारी करेंगे, तब जिला प्रशासन वैध हो जायेगा। अवैध जिला प्रशासन की ओर से चुनाव होते हैं। विजेता को अवैध डीसी की ओर से सर्टिफिकेट दिया जाता है। इसलिए एमपी-एमएलए भी अवैध हैं। अवैध लोगों द्वारा बनाया गया कानून पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होता है।'

 आगे यूसुफ पूर्ति ने कहते हैं — 'भारत  देश आजाद नहीं हुआ है। 15 अगस्त 1947 को ट्रांसफर ऑफ पावर हुआ था। आजादी  का मतलब स्वशासन होता है, जो हम आदिवासियों को नहीं मिला है। यह वर्जित  क्षेत्र है। भारत के संविधान में इसे पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र के रूप में बताया गया है। इसी के तहत गांव में स्वशासन व्यवस्था चलायी जा रही है। ओआइजीएस ग्राम सभा को राष्ट्र विरोधी की संज्ञा दे रहे हैं। हम आदिवासी राष्ट्र विरोधी नहीं हैं, न ही संविधान की गलत व्याख्या कर रहे हैं। हम आदिम आदिवासी भारत सरकार हैं।'

 वे आगे कहते हैं —

'सारे दस्तावेज आदिवासियों के पास हैं। आदिवासियों के पक्ष में हैं। आदिवासी जाग चुके हैं। ग्राम सभा सभी नियम कानून बना सकती है और अनुपालन नहीं करने पर सजा भी दे सकती है। आदिवासियों पर केस करने के लिए हिज मजिस्ट्रेट यानी ब्रिटेन प्रिवी काउंसिल मतलब ब्रिटेन के पार्लियामेंट से परमिशन लेना होता है। यह भारत सरकार का रूलिंग कहता है।

वे सुप्रीम कोर्ट चले जायें, हम बहस करने को तैयार हैं। सीएनटी एक्ट, संविधान, विलकिंसन रूल या किसी भी कानून में संशोधन करने के लिए भारत सरकार के रूलिंग में ओआइजीएस को अधिकार नहीं है। किसी भी नियम कानून को संशोधन करने के लिए केंद्र सरकार, राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट को प्रिवी काउंसिल ब्रिटेन से अनुमति लेनी होती है।'

 चुनाव पर यूसुफ पूर्ति ने कहा — 'यह देश बड़े देश के अंदर उपनिवेशवाद के अधीन चल रहा है। वर्जित क्षेत्र में चुनाव को लेकर लोक अधिसूचना लागू नहीं ह। लोक अधिसूचना जारी होती है, तो हम शामिल हो जायेंगे। जब तक अधिसूचना नहीं हुई है, तब तक हम चुनाव में क्यों शामिल हों।'

ग्राम सभा द्वारा शिक्षा व्यवस्था चलाने के सवाल पर उन्होंने कहा — 'जब तक नन ज्यूडिशनल आरक्षण गवर्नर द्वारा जारी नहीं किया जाता,  हम अपने बच्चों को ज्यूडिशनल स्कूल-कॉलेज में नहीं भेजेंगे।'

बौखलाई सरकार ने पत्थलगड़ी का वर्षगांठ मनाने वालों के खिलाफ करवाया एफआईआर

दूसरी तरफ इलाके में चल रहे पत्थलगड़ी पर झारखंड सरकार की बौखलाहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के निर्देश पर उच्चाधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की गई जिसमें खूंटी जिले के उपायुक्त, एसपी समेत प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ मुखिया और ग्रामसभा के अध्यक्षों को भी शामिल किया गया। बैठक की जानकारी देते हुए गृह सचिव एसकेजी रहाटे ने बताया कि पत्थलगड़ी को गलत तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। पत्थलगड़ी के जरिये भारत के संविधान की गलत व्याख्या की जा रही है। सुदूरवर्ती गांवों में कुछ लोग स्थानीय ग्रामीणों को सरकार की विकास योजनाओं के खिलाफ भड़का रहे हैं। इस तरह के काम में संलिप्त कई लोगों को प्रशासन ने चिन्हित किया है। उनके खिलाफ प्रशासन के द्वारा कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जायेगी। उन्होंने बताया कि प्रभावित इलाकों में सरकार विशेष कार्यक्रम चलाकर लोगों को रोजगार मुहैया करायेगी। वहां के स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच संवाद बढ़ाया जायेगा, ताकि सरकार के प्रति लोगों का विश्वास वापस स्थापित किया जा सके।

बैठक में मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और विशेष शाखा के अपर पुलिस महानिदेशक समेत कई अधिकारी शामिल हुए। बैठक के दौरान मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम जिले के पुलिस अधीक्षकों से भी बात की और उनके द्वारा उठाये गये कदम की जानकारी ली।

वहीं खूंटी के भंडरा गांव में नौ मार्च को पत्थलगड़ी की वर्षगांठ मनाने के बहाने सभा कर साजिश रचने के आरोप में खूंटी पुलिस ने मामला दर्ज कर 27 लोगों को नामजद एवं 1500 अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया है। नामजद अभियुक्तों में मुख्य रूप से बबीता कच्छप, डॉ. जोसेफ पूर्ति, विजय कुजूर, जॉन तिड़ू, बलराम समद आदि शामिल हैं। 

पत्थलगड़ी से सरकार की बौखलाहट का असली कारण कुछ और है

मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते हैं कि 'पत्थलगड़ी के बहाने इलाके में अफीम की खेती की जा रही है, प्रशासन इस काले काम पर प्रतिबंध नहीं लगा सके इसलिये ग्रा​मीणों को सरकार व प्रशासन के खिलफ भड़काया जा रहा है, जो हम होने नहीं देंगे।'  रटे रटाए जुमलों में रघुवर दास कहते हैं कि 'पत्थलगड़ी के नाम पर राष्ट्रद्रोही ताकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।'

वहीं सरकार के पक्ष में आरएसएस भी आकर खड़ा हो चुका है और पत्थलगड़ी को ईसाइयों का खुराफात बता रहा है।

जबकि पत्थलगड़ी के जानकार कहते हैं कि कोई गलत काम नहीं हो रहा है। उनका मानना है कि पत्थलगड़ी से सरकार की बौखलाहट का असली कारण कुछ और है।

बताते चले कि फरवरी 2017 को झारखंड में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट मोमेंटम झारखंड का आयोजन किया गया था जिसमें 210 कंपनियों के साथ करीब तीन लाख करोड़ के एमओयू साइन हुए थे। अवसर पर सरकार की चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा ने अपने भाषण में झारखंड में उद्योग की संभावनाओं पर चर्चा की और कहा था कि 'इज ऑफ डूइंग बिजनेस में झारखंड टॉप पर है तो लेबर रिफॉर्म्स में भी झारखंड नंबर एक पर है।'

जाहिर है उनका इशारा सस्ते दरों पर उपलब्ध मजदूरों की ओर था।

सीएस ने आगे कहा था कि 'इंवेस्टमेंट के लिए जमीन सबसे अहम होती है और राज्य सरकार ने लैंड बैंक बनाया है, जहां आज निवेश के लिए 2.1 मिलियन एकड़ जमीन उपलब्ध है।

जाहिर है उनका इशारा उन जमीनों की ओर था जो आदिवासियों के जीवन—यापन से जुड़ी हुई हैं।

अब जब पत्थलगड़ी के बहाने संवैधानिक आधार के तहत आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल होने को तैयार नहीं दिख रहे हैं तो कारपोरेट परस्त भाजपा नीत रघुवर सरकार की बौखलाहट बढ़ गई है और इसी बौखलाहट का नतीजा है कि मुख्यमंत्री भारतीय संविधान पर ध्यान तक नहीं दे रहे हैं जिसमें पत्थलगड़ी समर्थकों द्वारा दी जा रहीं दलीलों में दम दिखता है। 

कोचांग के ग्राम प्रधान काली मुंडा कहते हैं, 'हम स्वशासन की मांग नहीं कर रहे हैं यह पत्थलगड़ी तो हमारा अधिकार है। हमलोग संविधान में उल्लिखित अधिकारों से समस्त आदिवासियों को वाकिफ़ कराना चाहते हैं। हमारी पत्थलगड़ी इसी कारण है। हमलोग अपने इलाके के तमाम गांवों में यह आयोजन करेंगे। अगर सरकार ने इसे रोकने की कोशिश की, तो इसका विरोध होगा।'

शंकर महली कहते हैं कि 'सरकार हमारे इलाके में शौचालय बना रही है। यह कैसा विकास है। आदिवासियों के खाने के लिए पेट में अन्न नहीं है, तो शौचालय बनाकर क्या कीजिएगा। हम विकास के इस सरकारी मॉडल में शामिल नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार हम आदिवासियों पर अपना कानून थोपना चाहती है। हम मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार के ख़िलाफ़ संवैधानिक लड़ाई लड़ेंगे।'

वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि झारखंड के आदिवासी भोले-भाले हैं। उन्हें कुछ बाहरी लोग गुमराह कर रहे हैं।

हालांकि, नवनियुक्त मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी ने इस बाबत कहा है कि पत्थलगड़ी करने वाले लोग कुछ संदेश देना चाहते हैं। हमें इस संदेश को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

विकास की राह तकते गांवों का दर्द

कुरूंगा गांव की मुखिया गीता समद कहती हैं कि 'गांव में किसी के आने-जाने पर रोक नहीं है। हां, अपरिचित या नये लोग दिखते हैं, तो गांव के लोग पूछताछ करते हैं। 

गांव में अभी भी विकास की किरण तक नहीं पहुंची है। लोग चाहते हैं कि गांव में भी विकास हो। अभी भी गांव के लोग पेयजल के लिए कुरूंगा नदी के पानी पर ही निर्भर हैं। गर्मी में  काफी दिक्कत होती है। स्कूल है, पर आठवीं तक की ही पढ़ाई होती है। आगे की  पढ़ाई के लिए  खूंटी जाना पड़ता है। ममता वाहन का लाभ नहीं मिल पा रहा है।' 

 वे कहती हैं 'अगर कोई बीमार पड़ जाये, तो अड़की या खूंटी के स्वास्थ्य केंद्र में जाना पड़ता है। गांव तक पहुंचने का रास्ता जर्जर है। ज्यादा वाहन भी नहीं चलते। ऐसे में काफी परेशानी होती है।'

गीता आगे बताती हैं 'ग्राम सभा की बैठक में लोगों की सहमति से ही किसी मामले में निर्णय किया जाता है। यहां पर मुखिया या किसी व्यक्ति विशेष का जोर नहीं चलता।'

अड़की के जंगल के बसे गांवों के दर्द का आलम यह है कि अड़की से बीरबांकी तक जर्जर सड़क है। इसके बाद कुरूंगा तक जाने के लिए मिट्टी की सड़क। इलाके के लगभग सभी गांवों की यही दुर्दशा है। बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं इन गांवों में नहीं है। चप्पे-चप्पे में गरीबी और दिन-दोपहर नशे में डूबे लोग। इन गांवों में स्वास्थ्य कर्मी हो या फिर सरकार की योजनाओं को लागू करनेवाली एजेंसियां, कोई नहीं पहुंचती। गांव के लोगों को मालूम ही नहीं है कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है़। 

पांच अक्तूबर 2017 को ग्रामसभा उलीडीह के नाम से की गयी पत्थलगड़ी में कुछ ऐसा लिखा हुआ है

 1. भारत का संविधान अनुच्छेद 13(3)() के तहत रूढ़ी या प्रथा ही विधि का बल है, यानी संविधान की शक्ति है।

 2. अनुच्छेद 19(5) के तहत पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी गैर रूढ़ी प्रथा व्यक्तियों को स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना, निवास करना, बस जाना, घूमना-फिरना वर्जित करता है।

 3. भारत का संविधान के   अनुच्छेद 19(6)के तहत कोई भी बाहरी व्यक्तियों को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में व्यवसाय, कारोबार रोजगार पर प्रतिबंध है।

 4. पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में भारत का संविधान अनुच्छेद 244(1) भाग()   पारा(1) के तहत संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है।

पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी

झारखंड के गांवों में पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी। भारत जन आंदोलन के तत्वावधान में डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में खूंटी, कर्रा सहित कई जिलों के  दर्जनों गांवों में पत्थलगड़ी की गयी थी। इसके बाद झारखंड (एकीकृत बिहार) के गांवों में एक अभियान की तरह शिलालेख (पत्थलगड़ी) रामे की स्थापना की जाने लगी। डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव, पीएनएस सुरीन सहित अन्य लोग इस काम में जुटे। गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया। पत्थलगड़ी पूरे विधि विधान के साथ की जाने लगी। पत्थलगड़ी समारोह चोरी छिपे नहीं, बल्कि समारोह आयोजित करके किया जाता था। इसकी सूचना प्रशासन को दी जाती थी। खूंटी सहित अन्य जिलों में आज भी उस समय की पत्थलगड़ी को देखा जा सकता है।

डॉ बीडी शर्मा ने अपनी पुस्तिका ‘गांव गणराज्य का स्थापना महापर्व’ में लिखा है कि ''26 जनवरी से दो अक्तूबर 1997 तक गांव गणराज्य स्थापना महापर्व के दौर में हर गांव में शिलालेख की  स्थापना और गांव गणराज्य का संकल्प लिया जायेगा। उन्होंने लिखा है कि हमारे गांव को 50 साल के बाद असली आजादी मिली है। यह साफ है कि आजादी का अर्थ मनमाना व्यवहार नहीं हो सकता है। उन्होंने लिखा है कि जब हमारा समाज हमारे गांव में हमारे राज की घोषणा करते हुए व्यवस्था की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है, तो उसके बाद हर भली-बुरी बात के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा और उसी की जवाबदेही होगी।''

पंचायती राज मंत्रालय का अधिदेश

पंचायती राज मंत्रालय (एमओपीआर) का अधिदेश संविधान, के नौवें भाग, भाग IX क, के अनुच्छेद 243 यघ, के अनुसार जिला योजना समिति के संबंध में प्रावधान और पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम,1996 (पेसा) के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए है।

देश में पंचायती राज व्यवस्था के संबंध में संवैधानिक प्रावधान

 24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992,जो भारत के संविधान के नौंवे भाग में सन्निविष्ट किया गया है, पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा देता है।

संविधान का अनुच्छेद243ड (1), अनुच्छेद244 के खंड (1) और (2) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को लागू करने से छूट देता है। हालांकि, अनुच्छेद243 ड (4) (ख) संसद को कानून बनाने और नौवें भाग के प्रावधानों को अनुच्छेद (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि ऐसे अपवादों और संशोधनों को ऐसे कानूनों में निर्दिष्ट किया गया हो और इस तरह का कोई भी कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा। 

 पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र

संविधान की पांचवीं अनुसूची किसी भी राज्य- असम,मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्य में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के रूप में भी प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण के साथ संबंधित है।संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों तथा असम,मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य किसी भी राज्य में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है। "पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996" (पेसा), कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भाग को, संविधान के अनुच्छेद 244(1)  के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10 राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं।

 गांव और ग्राम सभा की परिभाषा

 पेसा अधिनियम के अंतर्गत, {अनुच्छेद 4 (ख)},आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह या एक पुरवा या पुरवों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों के प्रबंधन करते हैं।

 पेसा अधिनियम, {अनुच्छेद 4 (ग)} के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं।

पेसा ग्राम सभा को निम्न के लिए विशेष रूप से शक्ति प्रदान करती है

(क) लोगों की परंपराओं और रिवाजों, और उनकी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना, (ख) समुदाय के संसाधन, और (ग) विवाद समाधान के परंपरागत तरीके की रक्षा और संरक्षा, (ii) निम्न कार्यकारी कार्यों को पूरा करना, सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देना, गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान करना, (ग) पंचायत द्वारा योजनाओं; कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए धन के उपयोग का एक प्रमाण पत्र जारी करना ।           

पेसा उपयुक्त स्तर पर ग्राम सभा / पंचायतों को निम्न लिखित की शक्ति प्रदान करता है-

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार, एक उचित स्तर पर पंचायत को लघु जल निकायों की योजना और प्रबंधन का कार्य सौंपा गया है, एक उचित स्तर की ग्राम सभा या पंचायत द्वारा खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस पट्टा, रियायतें देने के लिए अनिवार्य सिफारिशें करने का अधिकार,मादक द्रव्यों की बिक्री / खपत को विनियमित करना, लघु वनोपजों का स्वामित्व, भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि की बहाली, गांव बाजारों का प्रबंधन, अनुसूचित जनजाति को दिए जाने वाले ऋण पर नियंत्रण सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ताओ और संस्थानों, जनजातीय उप योजना और संसाधनों सहित स्थानीय योजनाओं पर नियंत्रण। 

अफीम की खेती का सच

जबसे पत्थलगड़ी चर्चे में आया है तबसे इलाके में अफीम की खेती की खबरें भी सुर्खियों मे रही हैं। खासकर राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास इसपर काफी कुछ बोल चुके हैं। उन्होंने अफीम की खेती में ​राष्ट्रविरोधी ताकतों और नक्सलियों का हाथ बताया है। मुख्यमंत्री और उनके प्रायोजित संस्करणों में संघ सहित कुछ मीडिया ने भी इस हंगामे में बराबर की भागीदारी निभाया है। जब मैंने इसकी सच्चाई जानने की कोशिश की तो बड़ा ही चौकाने वाला मामला सामने आया। इस बावत ग्रामीण बताते हैं कि यह सच है कि यहां अफीम की खेती भी होती है और इसका दुष्परिणाम भी गर्भवती महिलाओं में देखन को मिल रहा है। लेकिन यह काम भी सरकारी तबके के लोगों का ही देन है। ग्रामीण बताते हैं कि 2014 में सीआरपीएफ के लोगों ने अफीम का बीज दिया था और खेती के तरीके भी बताए थे। उन्हीं के लोग औने पौने दाम देकर तैयार अफीम ले जाते हैं, प्रशासन के लोग भी इसमें शामिल हैं।

सच तो यह है कि सरकार किसी भी बहाने इन क्षेत्र के आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर कारपोरेट को सौंपना चाहती है, जिसका आभास क्षेत्र के आदिवासियों को हो चुका है, ऐसे में आदिवासी समाज और रघुवर सरकार आमने सामने हैं, बहाना जो भी हो।

बताते चलें कि पिछले दिसंबर माह में रघुवर सरकार द्वारा मजदूर संगठन 'मजदूर संगठन समिति' को माओवादियों का अग्र संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया गया। दरअसल 'मजदूर संगठन समिति' मजदूरों, दलित—पीड़ित गरीब तबकों और आदिवासियों के शोषण—दमन के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहा था, उनके हक—अधिकार को लेकर आंदोलन करता रहा था। पिछले 9 जून 2017 को गिरिडीह के मधुबन स्थित पारसनाथ पर्वत पर सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन द्वारा जब एक डोली मजदूर आदिवासी मोतीलाल बास्के की हत्या कर दी गई तो इस मामले पर 'मजदूर संगठन समिति' ने प्रतिरोधात्मक रूख अख्तियार करते हुए तमाम जनवादी ताकतों को एकजुट किया और मोतीलाल बास्के की हत्या की न्यायिक जांच की मांग के साथ साथ उसके परिवार वालों को मुआवजा दिलाने की आवाज बुलंद की। मोतीलाल की हत्या के विरोध में हो रहे जनआंदोलनों से घबड़ाकर रघुवर की सरकार 'मजदूर संगठन समिति' को ही अलोकतांत्रिक तरीके से प्रतिबंधित कर दिया कि 'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी'। अब स्थिति यह है कि पारसनाथ पर्वत पर सीआरपीएफ अपना तांडव कर रहा है जो आए दिन खबरों से साफ हो गया है, वहीं वहां के डोली मजदूरों की स्थिति काफी दयनीय होती जा रही है।

कहना ना होगा कि रघुवर सरकार अपने तमाम अलोकतांत्रिक तरीके का इस्तेमाल करके इन आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करना चाहती है। देखना यह है कि सरकार अपने इस मिशन में कामयाब होती है या झारखंड में एक नए उलगुलान की शुरूआत होगी।

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