लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाते त्रिपुरा विधानसभा चुनाव परिणाम

पुरा विधानसभा चुनावों में जो भी जीत हार हुयी है वह नियम से ही हुयी होगी। पराजितों द्वारा एवीएम आदि पर बिना प्रमाण के आशंका करना गलत परम्परा है, भले ही भाजपा खुद भी 2004 और 2009 में चुनाव हारने पर ऐसे ...

वीरेन्द्र जैन

त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव परिणामों ने वहाँ 25 साल से लगातार चली आ रही वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया है। उससे सत्ता भारतीय जनता पार्टी ने छीनी है। उल्लेखनीय यह भी है यह काम तब हुआ है जब मोदी शाह के नेतृत्व वाली भाजपा सबसे अधिक आलोचना की शिकार हो रही थी। न केवल विपक्षी दल अपितु सोशल मीडिया के साथ एक निष्पक्ष मीडिया भी उनकी तीव्र आलोचना कर रहा था व समर्थक हतप्रभ नजर आ रहे थे। चुनाव प्रचार में सीमा को मुद्दा बना कर तत्कालीन सरकार की आलोचना करने वाले इस् दल के शासन में सीमा पर गहरी हलचल थी व प्रति सप्ताह सैनिक शहीद हो रहे थे। न्यायाधीश अपना असंतोष व्यक्त कर रहे थे और साफ संकेत दे रहे थे कि न्यायालय में न्यायिक स्वतंत्रता शेष नहीं रह गयी है। नोटबन्दी से जनित अनेक समस्याओं के बाद व्यवसायियों द्वारा बैंकों को चूना लगा कर विदेश भाग जाने समेत अनेक आर्थिक अपराधों की घटनाएं प्रकाश में आयी थीं और उनको सहयोग देने के आरोप सत्तारूढ दल पर लग रहे थे। इससे बैंकों में भरोसा कम हुआ था जिससे गहरे आर्थिक संकट की आशंका महसूस की जा रही थी। बैंकों के शेयर गिरने के कारण बाज़ार लुढक रहा थ। साम्प्रदायिक टकराव की घटनाएं वृद्धि पर थीं, तथा दकियानूसी बयानों से बुद्धिजीवी वर्ग सरकार के खिलाफ क्षोभ से भरा हुआ था। बेरोजगारी अपने चरम पर थी और हर वर्ष दो करोड़ रोजगार देने के वादे के जबाब में पकोड़े बनाने जैसे स्वरोजगार की सलाह मिलनेसे युवा ठगा हुआ महसूस कर रहा था। भाजपा के छुटभैए नेताओं से लेकर बड़े बड़े नेता इसे वामपंथी विचारधारा का पतन बता कर सामान्यजन को एक और धोखा देने में लग गये हैं।

इसके विपरीत वामपंथ देश में एक बेहद जिम्मेवार और अनुशासित विपक्ष की तरह सामने था और उसकी त्रिपुरा राज्य में सरकार थी। इसके नेता की ईमानदारी और सादगी के चर्चे दंतकथाओं की तरह प्रचलित थे। उनकी एकमात्र कमजोरी व्यापक जन समर्थन से उनका लगातार पिछले 25 वर्षों से सत्ता में बने रहना था। यही कारण रहा कि वामपंथ ने पिछले चुनावों में प्राप्त साढ़े दस लाख मतों में से कुल 69000 मत कम पाये। उनकी चुनावी पराजय उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं दर्शाती है, अपितु विपक्षी वोटों को एकजुट करने के प्रबन्धन का परिणाम है।

चुनाव परिणाम आने से पहले सोशल मीडिया पर एक लेखक ने लिखा था कि अगर मानिक सरकार हार गये तो लोगों का विश्वास इस लोकतांत्रिक प्रणाली से उठ जायेगा”। उक्त सरकार हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के आदर्श का नमूना थी और उसकी हार उन आदर्शों के समक्ष चुनावी प्रबन्धन के कौशल का नमूना है। यह ठीक उसी तरह है कि कोई छात्र परीक्षा से पहले सलेक्टेड क्वेश्चन पेपर पढ़, नकल और सिफारिश के सहारे प्रथम श्रेणी की डिग्री का जुगाड़ कर ले व शिक्षा को ज्ञानार्जन मान कर मेरिट में आने वाला छात्र पीछे रह जाये। एक समर्पित मतदाता और प्रलोभन ग्रस्त मतदाता में फर्क किया जाना चाहिए। वामपंथियों पर कभी यह आरोप नहीं लगा कि उन्होंने चुनाव में धन बांटा या दलबदल का सहारा लिया। उल्लेखनीय है कि चुनावों में अवैध रूप से अर्जित धन ही बांटा जाता है और उसका सीधा सम्बन्ध ऐसा करने वाले दल से प्रत्यक्ष या परोक्ष जुड़ा होता है। शायद ही कोई ऐसा चुनाव रहा होगा जिसमें भाजपा पर पैसा बांटने का आरोप न लगा हो। उनके गठबन्धन की बहुत सारी सरकारें प्रलोभन के द्वारा दलबदल से बनी हैं। भाजपा के मुख्यालय से धन के गबन किये जाने और उसकी रिपोर्ट न कराके किसी प्राईवेट जासूस से जाँच कराने की खबरें अखबारों में प्रमुख रूप से छायी रही हैं। इतनी सारी नकदी का एकत्रित रहना और उसके गायब होने को सामने न ला पाने से ही स्पष्ट है कि वह अवैध ही होगा। पता नहीं वह नकदी नोटबन्दी से पहले बदलवा ली गयी थी या बाद में बदलवायी गयी। जो नोट संसद में लहराये गये थे वे कहाँ से आये थे उसके बारे में देश अब तक अनजान है

त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में जो भी जीत हार हुयी है वह नियम से ही हुयी होगी। पराजितों द्वारा एवीएम आदि पर बिना प्रमाण के आशंका करना गलत परम्परा है, भले ही भाजपा खुद भी 2004 और 2009 में चुनाव हारने पर ऐसे ही आरोप लगाने की भूल करती रही है। फिर भी कुछ सूचनाएं आशंकाओं को जन्म देती हैं जैसे जब गुजरात विधान सभा, तथा राजस्थान, और मध्य प्रदेश में हुए उपचुनावों के परिणाम से कांग्रेस के पुनर्जीवित होने की उम्मीद बँध रही थी तब उसके वोट आठ लाख से घट कर इकतालीस हजार पर आना जो 36.53% से 1.8% होना है, सीधे सीधे हजम नहीं होता। उसी तरह वहाँ के दो अलगाववादी दलों के मतों के विचलन से संकेत मिलता है आईएनपीटी को पिछले चुनाव में मिले 167078 वोटों की तुलना में इस बार कुल 17568 मत मिले जबकि पहले 10147 वोट पाने वाली भाजपा की सहयोगी आईपीएफटी को इस बार 173603 वोट मिले। यह मात्र संयोग भी हो सकता है किंतु जब दलित नेता जिग्नेश मेवाणी सवाल पूछते है कि हर चुनाव में भाजपा को 41% के आसपास मत ही क्यों मिलते हैं तो ध्यान जाता ही है। स्वयं भाजपा द्वारा पिछले चुनावों में 33808 मतों के साथ छठे नम्बर से उठ, व 999053 वोट प्राप्त कर पहले नम्बर पर आना भी ध्यानाकर्षित करता है। मतों का यह उछाल अभूतपूर्व है, अस्वाभाविक है।

मोदी और शाह के नेतृत्व में लड़े गये पहले लोकसभा चुनाव में ही खुले आम चुनावी इवेंट मैनेजर प्रशांत किशोर को लाया गया था जिनकी सेवाएं बाद में काँग्रेस, जेडीयू, वायएसआर रेड्डी काँग्रेस ने भी लीं जो बताता है कि इन दलों के लिए चुनाव एक इवेंट हैं जिसकी सफलता से सत्ता के सारे सूत्र हाथ में आ जाते हैं। इसी प्रबन्धन ने इस बार त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य से भ्रष्टाचार मुक्त, एक आदर्श सरकार और चुनाव संहिता के अनुसार संचालित दल को पराजित कर दिया है। भाजपा प्रबन्धन के हाथों मिली इस पराजय से लोकतंत्र की आत्मा को दुख पहुंचा है क्योंकि यह जीत हार दूसरी जीत हारों से भिन्न है।

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