त्रिपुरा में कुछ नहीं हुआ केवल ताकतवर लोगों ने खुद को बचाने के लिए लाल की जगह गेरुआ ओढ़ लिया

बांग्लादेश से आ रहे शर्णार्थियो का मसला स्थानीय स्तर पर है और भाजपा ने उसको और हवा दी है लेकिन ये कहना कि कोई मसला ही नहीं है, झूठ है। ...

Vidya Bhushan Rawat

त्रिपुरा के चुनाव नतीजों के निहितार्थ और आदिवासी प्रश्न

विद्या भूषण रावत

त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से खबरें आ रही हैं कि संघी कार्यकर्ताओं ने लेनिन की मूर्ति को बड़ी बेशर्मी से गिरा दिया है। वहां के संघी राज्यपाल तथागत राय को इसमें कोई गलत नहीं दिखा, वो कहते हैं कि यह भी एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुए सरकार की इच्छा है और उसका सम्मान होना चाहिए। हालांकि अभी सरकार बनी नहीं है। वैसे खबरे आ रही हैं कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं और कई लोग अपने घरों से भी नहीं निकल पा रहे हैं। ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक है। क्या यह भविष्य का संकेत है कि अगले पांच साल केंद्र की तर्ज पर कोई काम नहीं होगा केवल पिछली सरकार की बुराइयां और उसके समर्थकों पर हमला होता रहेगा। नयी सरकार को चाहिए कि वह अपने अजेंडे पर चले और सकारात्मक कार्य करे नहीं तो उत्तर पूर्व में भयावह स्थिति हो सकती है।

खैर इन चुनावों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है लेकिन पहले नतीजों की समीक्षा कर ली जाए, बाकी प्रश्नों पर बाद में आया जाएगा। 60 सदस्यीय विधान सभा में 59 में मतदान हुआ था और भाजपा को 43% वोट मिले और माकपा को 42.7% वोट प्राप्त हुए। लेकिन बराबर वोट प्रतिशत के बावजूद भाजपा को 35 सीटें और भाकपा को मात्र 19 सीटें मिली जो वर्तमान चुनाव प्रणाली की खामियों को दर्शाता है।

हकीकत ये है अगर देश में आनुपातिक चुनाव प्रणाली लागू होती तो दोनों पार्टियों को लगभग बराबर सीटें मिलतीं क्योंकि उनका वोट शेयर लगभग बराबर है।  हमारे जैसे बहुत से लोग पिछले एक दशक से भारतीय चुनाव प्रणाली में परिवर्तन की बात कर रहे हैं लेकिन ताकतवर पार्टियां उसका समर्थन नहीं करतीं क्योंकि वर्तमान प्रणाली एक अल्पमत आधारित है जो विपक्षियों के मतों को विभाजित कर बनती है और इसमें माफिया, मनी और मीडिया की बड़ी भूमिका है। तीनों के रोल अलग-अलग हैं लेकिन मिलकर काम कर रहे हैं ताकि देश में एक पार्टी का राज्य कायम हो सके। वैसे कम्युनिज्म के नाम पर दुनिया भर में ऐसा हुआ है, लेकिन ब्राह्मणवादी संघी तंत्र ये सब ‘पारदर्शी’ और ‘लोकंतांत्रिक’ तरीके से करेगा और त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में जो हुआ है वो उस तंत्र की कार्यशैली का प्रतीक है जिनका असली स्वरूप हमें अगले चुनावों में दिखाई देगा।

त्रिपुरा की हार से बहुत लोग सदमे में हैं। बहुत लोग कह रहे हैं कि मानिक सरकार जैसे इमानदार आदमी को हरा कर त्रिपुरा ने गलत संकेत दिए है और ये भी कि भारत में ईमानदार व्यक्ति राजनीति में नहीं रह सकते। मेरे हिसाब से ये उत्तर पूर्व की राजनीति का सरलीकरण है। अगर लोग ईमानदार व्यक्ति को नहीं चाहते तो मानिक सरकार इतने वर्षों तक मुख्यमंत्री कैसे रहते ? ईमानदार होना और असरदार होने में बहुत फर्क है। मानिक सरकार की सी पी एम् ने केरल और बंगाल से भिन्न कोई कार्य नहीं किया और त्रिपुरा की कम्युनिस्ट पार्टी भी बंगाली सवर्णों की डोमेन कायम रखने वाली पार्टी बनी रही और त्रिपुरा और उत्तरपूर्व की भौगौलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को कभी भी अपनी राजनीति में नहीं ला पायी लिहाजा एक बड़े वर्ग की पार्टी बन कर रह गयी। सी पी एम् को देखना पड़ेगा कि आज 25 वर्षो के राज के बावजूद भी वह कभी भी वहां की जनजातियों का दिल नहीं जीत पायी। आखिर ऐसा क्यों ?

अभी लगातार त्रिपुरा में जनजातीय संगठनों के साथियों के संपर्क में हूँ और वो बता रहे कि वामपंथियों को हराना इसलिए जरूरी था क्योंकि उन्होंने आदिवासी हकों को ख़त्म करने के प्रयास किये। आखिर त्रिपुरा जैसे राज्य में जहाँ 1901 में आदिवासियों की जनसँख्या 58% थी वह 1981 तक 28% रह गयी हालाँकि अभी के आंकड़े ये कह रहे है कि यह 31% है। अनुसूचित जातियों की आबादी 17% और पिछड़ी जातियों की आबादी 24%। सभी को अगर जोड़ दे तो 72% आबादी देश के सबसे सीमान्त तबकों की है लेकिन संसाधनों पर इनकी भागीदारी कहां है ? त्रिपुरा में दलितों और आदिवासियों के आरक्षण की वो ही हालात है जैसे बंगाल और केरल में और त्रिपुरा सरकार उनकी संख्या 24% बताती है लेकिन उनके आरक्षण को लागू करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए। त्रिपुरा देश के उन राज्यों में है जहां मंडल आधार पर आरक्षण लागू नहीं है। आखिर इसका दोषी कौन ? सत्ता पर बंगाली भद्रलोक का कब्ज़ा है और अगर वहां के दबे कुचले लोग अपना हिस्सा मांग रहे हैं तो किसका दोष ?

हमें बताया जा रहा है कि त्रिपुरा में ओबीसी आरक्षण इसलिए लागू नहीं किया गया क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण से ही 48% कोटा जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने 50% की लिमिट लगाई हुई है इसलिए उससे आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

पहली बात यह कि क्या वाकई में त्रिपुरा सरकार के हर लेवल पर आदिवासियों की संख्या 31% और दलितों की 17% है। क्या दलित आदिवासियों की भागीदारी बनाये रखने के लिए त्रिपुरा की सरकार ने कोई कोशिश की या ये डाटा केवल दिखाने का है। सभी जानते हैं कि ओबीसी आबादी सत्ता के ढांचे से बाहर है और क्या त्रिपुरा सरकार का ये कर्त्तव्य नहीं था का उनको सत्ता में भागीदारी देने के प्रयास करती और सुप्रीम कोर्ट में ये बात रखती। आखिर तमिलनाडु और कर्नाटक में भी तो सरकारों ने 50% की सीमा को लांघा है और इससे कही भी मेरिट प्रभावित नहीं होती। क्या त्रिपुरा की वामपंथी सरकार ने कभी इन प्रश्नों को कोई महत्व दिया ?

त्रिपुरा के जनजातीय लोग अपनी स्वायत्तता और अस्मिता को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। उनका साफ़ मानना है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों को चालाकी से उनके नियंत्रण से बाहर किया जा रहा है और त्रिपुरा में बाहर से आये लोगों के कारण उनके अल्पसंख्यक होने का खतरा है। दिल्ली में हम सब लोग देश के सारी समसयाओं को हिन्दू मुसलमान के चश्मे से देखते हैं लेकिन उत्तर पूर्व के मसले में इन सबके बावजूद अन्य बाते भी हैं जिनको समझना जरूरी है।

बांग्लादेश से आ रहे शर्णार्थियो का मसला स्थानीय स्तर पर है और भाजपा ने उसको और हवा दी है लेकिन ये कहना कि कोई मसला ही नहीं है, झूठ है। उत्तरपूर्व में अनेक जनजातियां है और उनके अपने अंतर्विरोध भी हैं इसलिए उनको समझना जरूरी भी है और उनके हल के लिए स्थानीय स्तर पर प्रयास करने होंगे, लेकिन ये बात जरूर है कि उत्तर पूर्व की स्वायत्ता के नाम पर भी दमदार लोगों का बर्चस्व कभी न कभी तो विरोध और विद्रोह झेलेगा ही।

भाजपा ने बहुत चालाकी से इन अंतर्द्वंद्वों को देखा और सत्ता के लिए वो सब तिकडम की जिनका वो विरोध करने का दावा करती रही है। इन अंतर्द्वंद्वों को उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद के चश्मे से देखना आग से खेलना होगा।

त्रिपुरा में वन अधिकार कानून के तहत भी आदिवासियों को लाभ नहीं हुआ। वह अभी भी सवाल कर रहे हैं कि ये कानून क्या वाकई में उनके लिए बना है या नहीं ? शिक्षा और नौकरियों में दलित आदिवासियों की स्थिति तो नगण्य है और तकनीकी तौर पर ओबीसी आरक्षण भी नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक त्रिपुरा में अभी भी चतुर्थ वेतन आयोग के अनुसार ही वेतन दिया जा रहा है जबकि देश भर में अभी 7 वे वेतन आयोग की बातों के आधार पर बात चल रही है। सरकारी कर्मचारियों का असंतोष भी सरकार के विरुद्ध काम किया। और ये भी सही है कि 25 वर्षो तक भी एक पार्टी की सत्ता नहीं होनी चाहिए लेकिन अगर विपक्ष नहीं है तो वो ताकतें हावी होंगी ही जो नकारात्मकता के बहाने पे अपने अजेंडा थोपना चाहती हैं।

वैसे त्रिपुरा और उत्तर पूर्व में भाजपा का अजेंडा बहुत पहले से चल रहा है और वो खतरनाक भी है। तथागत राय को बिना सोचे समझे वहां नहीं भेजा गया था और वह राज्यपाल बनने के शुरू से ही बेहद ही घटिया दर्जे की राजनीति कर रहे हैं और अपने पद की गरिमा के विरुद्ध काम किये जा रहे थे लेकिन उनका काम ही था कि वह संघ के लिए माहौल बनाएं और उसके कार्यकर्ताओं को अपना सुरक्षा कवच पहनाएं। पहले भाजपा ने लोगों से बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियो को वापस भेजने की बात की लेकिन अब भारतीय नागरिकता कानून 1955 में संशोधन कर संघ के शिष्यों ने इसका भी संप्रदायीकरण कर दिया है और उसका पूरा चुनावी फायदा लिया गया। भाजपा अब कह रही है बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओ को तो वो नागरिकता देगी लेकिन मुसलमानों को नहीं। इसके दूसरे मायने भी हैं, अब बाहर से आने वाला गैर क़ानूनी हिन्दू भी भारत की नागरिकता ले लेगा लेकिन देश में ईमानदारी से रह रहा मुस्लिम नागरिक हमेशा दवाब में रहेगा और उसको संघी सेना बंगलादेशी कह कर प्रताड़ित करती रहेगी। त्रिपुरा के चुनावों की इस पृष्ठभूमि को हम नहीं नकार सकते।

सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भाजपा को छोड़ अन्य राष्ट्रीय पार्टियों ने इसमें कुछ नहीं किया। कांग्रेस ने शर्मनाक तौर पर विपक्ष का पूरा स्पेस संघ को सौंप दिया और नतीजा ये हुआ जो आज हम भुगत रहे हैं। वामपंथियों और अन्य दलों ने उत्तर पूर्व की हालात पर कोई विशेष धयान नहीं दिया जिसके नतीजे में संघी प्रोपगंडा सफल हो गया।

उत्तर पूर्व की संवेदनाओं को समझने की जरूरत है और उस पर हम दिल्ली की बहस न थोपें। जरूरत इस बात की भी है कि तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां स्थानीय भावनाओं को समझें, सार्थक बहस चलाएं और मुद्दों को छिपाने की कोशिश ने करें।

त्रिपुरा का पूरा प्रश्न आदिवासियों के मुद्दों को किनारे करके बहस नहीं किया जा सकता। ये हकीकत है कि बांग्लादेश में चकमा आदिवासियों के प्रति बेहद ही ख़राब रवैया चल रहा है। गत वर्ष एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मेरी मुलाकात बांग्लादेश के चटगाँव क्षेत्र में कार्य कर रहे एक चकमा कार्यकर्ता से हुई जिसने वहां की सेना और इस्लामिक उग्रपंथियो द्वारा उन पर हमले की दास्तान सुनाई। वो इंटरव्यू प्रकाशित भी हुआ, लेकिन उस साथी ने सुरक्षा कारणों से अपना नाम बदल देने की शर्त पर मुझे इतना विस्तृत इंटरव्यू दिया।

कहने का आशय यह कि अब समय आ गया है जब भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और श्रीलंका गंभीरता से एक दूसरे के साथ बैठें और इन प्रश्नों पर विचार करें। जरूरत इस बात की है कि हम अपने अपने देशों में धार्मिक, भाषाई अल्पसंख्यकों को पूर्ण सुरक्षा दें और उनकी समस्याओं को अपने देश के अन्दर की राजनीति में न लपेटें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये सभी लोगों के नाम पर अलग-अलग देशों में बहुलतावादी राजनीति चलेगी और जिन लोगों की किसी भी देश में राजनीतिक पैठ नहीं होगी वे फिर अपना अलग रास्ता तय करेंगे।

त्रिपुरा में चुनाव के नतीजों से एक बात साफ़ है कि तथाकथित राजनैतिक दल अभी भी ब्राह्मणवादी मुख्यधारा की राजनीति में लगे जिसके फलस्वरूप हाशिये में रह रहे लोगों के प्रश्न हमेशा हाशिये पर ही रह जाते हैं और ताकतवर जातीय अपने राजनैतिक समीकरण बदल देते हैं। त्रिपुरा में कुछ नहीं हुआ केवल ताकतवर लोगों ने अपने को बचाने के लिए नए तेवर अपना लिए हैं और लाल की जगह अब गेरुआ ओढ़ लिया है। देखना यह है कि दलित आदिवासियों-पिछड़ों की 72% आबादी वाले त्रिपुरा को अभी अपना मुख्यमंत्री बनाने में और सम्मानपूर्वक राजनैतिक भागीदारी करने के लिए कितने और वर्षों का इंतज़ार करना पड़ेगा।

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