ट्यूबलाइट : सलमान को महंगी पड़ी इस बार राष्ट्रभक्ति

ट्यूबलाइट आज के सीएफएल के जमाने में चल ही नहीं पाएगी। उम्मीद है सलमान आगे से विषय चयन पर गंभीरता बरतेंगे।...

हमारे पुराने घाव नहीं भर सकतीं ट्यूबलाइट जैसी सतही फिल्में...

मनीष कुमार जैसल

नवंबर 1962 का वो महीना जब असम और आसपास के लोग डरे सहमे हुए थे कि न जाने किस समय चीनी उनके इलाक़े मे अपना कब्जा कर लें। यहाँ तक कि आसाम के राष्ट्रीय बैंकों के मैनेजरों आधी रात को बैंक से करेंसी निकाल कर मात्र इसलिए जला दी कि कहीं ये मुद्रा चीनियों के हाथ न लग जाएँ। चीन द्वारा तिब्बत को जीत लेने के बाद सुरक्षा संबंधी मामलों के लिए सरदार पटेल द्वारा नेहरू को 1950 में लिखी गयी चिट्ठी में भी असम पर चाइना के नज़र होने की बात स्पष्ट थी।

आखिर आसाम के लोग क्यो डरे सहमे हुए थे ?

वजह 19-20 अक्तूबर से शुरू भारत चीन युद्ध के बाद की स्थिति थी। 20 नवंबर 1962 को चीन ने ऐलान किया कि उसने यह युद्ध जीत लिया है। और दिल्ली जैसे लगभग 28 शहर बसने वाली 42735 वर्ग किलों मीटर की भारतीय जमीन पर उसने कब्जा कर लिया। इतिहास में यह युद्ध काले अक्षरों में आज भी दर्ज है।

आज का भारत महाशक्ति बनने पर भले ही अग्रसर हो लेकिन अतीत में उसने चीन से बड़ी मात खाई है।

1383 शहीद,1047 घायलों और 3968 सैनिकों के बंदी होने के रूप ने भारत ने मात खाई। जिसके घाव अभी तक नहीं भरे है। आज भी चाइना बॉर्डर से छिटपुट गोलीबारी की ख़बरें मीडिया में अक्सर आती रहती है।

हिन्दी सिनेमा अक्सर ऐसे विषयों को प्रमुखता से अपने दर्शकों को दिखाता आया है। भारत पाक युद्ध और उससे जीत को आज भी फिल्मों गीतों के जरिये संप्रेषित किया जाता है। बॉर्डर, हिंदुस्तान की कसम, कारगिल, मिशन कश्मीर जैसी अन्य फिल्में बनी हैं। इन्हीं फिल्मों में देश प्रेम से सजे गीत भी आपको देखने/सुनने को मिल जाएंगे।

एक महीने तक चलने वाले इंडो चीन युद्ध और उसके लक्षणों को लेकर कबीर खान ने सलमान खान अभिनीत फिल्म ट्यूबलाइट बनाई। जो 23 जून को प्रदर्शित हुई। यह फिल्म भले ही पूरी तरह इस युद्ध पर केन्द्रित करके मीडिया प्रमोशन के जरिये न भुनाई गयी हो, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि हमें इसी युद्ध से प्रेरित दिखती है। इसके पहले भी 1964 में चेतन आनंद हकीकत नाम से इस फिल्म को बना चुके थे। हालांकि उस फिल्म को ताजा ताजा युद्ध के बाद ही बनाया गया तो उसमें भारत के जज्बे पर ज्यादा केन्द्रित किया गया। लेकिन आज लगभग पचास साल बाद भी इंडो चाइना के संबंध उसी दहलीज़ के लिए वैसे ही हैं जैसे तब थे। ऐसे में कई और फिल्मों की दरकार भारतीय फ़िल्मकारों से की जा सकती है।

आखिर उस युद्ध के नतीजे क्या आज भी पूरे हुए ?

क्यों आज भी गोलीबारी चीन की तरफ से लगातार होती रहती है ? कभी चीन मानसरोवर यात्रा रोक देने की धमकी देता है तो कभी भारत से मधुर संबंध रखने की भी बात करने लगता है। पंचशील समझौता क्या सही मायनों आज भी पूर्ण रूप ले पाया है ? ऐसे कई सवालों को हमें सिनेमा के जरिये उठाने की जरूरत महसूस होती है।

किसी राष्ट्र का मीडिया ही उन सवालों के प्रति जनता को जागरूक करवाने की अपनी महती भूमिका निभाता है। लेकिन यहाँ तो फ़िल्म विधा के जरिये कोई फ़िल्मकार अपना रुख सही नहीं कर पाया है।

मीडिया माध्यम ऐसे ही चुप है जैसे उन दिनों नेहरू इंडो चाइना विवाद को लेकर चाइना से अपनी तरफ से कोई बातचीत नहीं करना चाह रहे थे। हालांकि नेहरू दूरदर्शी थे, उन दिनों वो युद्ध नहीं चाहते थे। देश के हालातों और क्षमताओं को वो अच्छी तरह जानते थे। आज का सिनेमा समृद्ध है विकसित है उसे ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सवालों पर आवाज उठानी चाहिए।

कबीर खान निर्देशित फ़िल्म सलमान खान के लिहाज से भी अलग थी, सलमान ने इस फ़िल्म में अपना एक प्रयोग किया,एक अलग तरह का अभिनय किया। जिसे जनता ने पसंद नहीं किया। उनका रोना दर्शकों को नहीं भाया। कई दर्शकों ने तो सोशल मीडिया पर उनके दबंग रूप में ही बने रहने की सलाह भी दे डाली।

कबीर खान ने ही इस फ़िल्म की पटकथा लिखी है। लेकिन कहीं से भी फ़िल्म अपने किसी एक सीन से दूसरे सीन में जुड़ती नहीं दिखती।

पूरी फ़िल्म में अगर देखा जाए तो एक ही प्रतीक दिखाई देता है, जो भारत चाइना युद्ध में हमारी हालत को प्रतिबिम्बित करता है, वो है सोहेल खान के फटे जूते।

वहीं दूसरी तरफ जूते को प्रतीक के तौर फ़िल्म पोस्टर में भी जगह दी गयी। लेकिन पूरी फ़िल्म में यह नहीं बताया गया कि जो जवान चाइना से इस जज्बे के साथ लड़ रहे थे उन्हें पहाड़ों पर चढ़ने कि ट्रेनिंग थी ही नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार वी जी वर्गीज़ जब बॉर्डर पर युद्ध के हालातों का जायजा लेने गए तो उन्होंने बताया कि भारत युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार ही नहीं था। युद्ध लड़ने के लिए जरूरी समान तक की भारी कमी थी। वही चाइना युद्ध के दौरान के ब्रिगेडियर महावीर चक्र सम्मानित एस पी श्री कान्त की भूमिका फ़िल्म से गायब है।

भारतीय फिल्मों में प्यार और इकरार अहम होता है। इसमें भी कुछ ऐसा है। चाइना से इम्पोर्ट अभिनेत्री झू झू ने चाइनीज नागरिक जो भारत मे ही रहती है का अहम किरदार निभाया। वही सलमान कि फिल्मों में जरूरी पात्र एक बच्चे का भी होना जरूरी सा मालूम देने लगा है। सलमान का ये बाल प्रेम कई सिने समीक्षकों को आने वाले दिनों में जरूर अखरेगा।

झू झू और सलमान आपसी प्रेम के जरिये जिस हिन्दी चीनी भाई भाई के नारे के सफल होने की बात करते दिखते है वो आज के अखबारों की हेडलाइन से इतर दिखने लगते हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन मुल्क हो सकता है तो हिन्दी चीनी भाई भाई कैसे ?

अपनी व्यक्तिगत राय में मैं शांति का पक्षधर हूँ। एकदम इन्दिरा गांधी की तरह। 1951 से लेकर 62 तक के कई महत्वपूर्ण अखबारों कि खबरों और मीडिया रिपोर्ट्स को पढ़ने पर पता चलेगा कि भारत और चाइना ने कई आपसी मुलाकातें की, कई फैसले किए, लेकिन सीमा विवाद को कोई बात नहीं की। जिसका नतीजा भारत और चाइना युद्ध के रूप में हमें देखने को मिलता है।

हमेशा से ही भारत मैकमोहन रेखा को अपनी अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा मानता आया है लेकिन चाइना ने इसका विरोध किया। हालांकि इससे पहले 1954 में पांचशील समझौते के जरिये पूरे विश्व में हिन्दी चीनी भाई भाई की अटूट मिसाल पेश की गयी।

कई जानकार बताते हैं कि चाइना द्वारा किये इस विद्रोह की बड़ी वजह भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना था। कबीर खान की फ़िल्म में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।

युद्ध के बाद भी आज अक्साई चीन चाइना का और अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। ऐसे में यह सवाल आज भी खड़ा होता है कि फिर वो युद्ध किस लिए था ? एक महीने चले युद्ध के क्या क्या असर भारत में देखे गए इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि चाइना ने भारतीय बाज़ारों में अपनी एक जरूरी पहचान जरूर बना ली है।

हम फिर से हिन्दी चीनी भाई भाई के नारे की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन चाइना बॉर्डर पर पाकिस्तान कि तरह ही समय समय धमकी देता रहता है। छिटपुट गोलीबारी की सूचनाएँ भी मिल जाती है। तो भारत को क्या चाइना से भी पाकिस्तान की भाषा में ही जवाब देना चाहिए ? ऐसे सवालों से भरा हमारा सिनेमा कब आएगा इसका हमें इंतजार है।

फिलहाल कबीर खान ने सलमान खान के कैरियर की एक डिजास्टर फ़िल्म दर्शकों को दी है। उम्मीद है सलमान आगे से विषय चयन पर गंभीरता बरतेंगे।

सलमान अभिनीत हालिया फिल्मों के विषय राष्ट्रवाद से ओत प्रोत दिख रहे हैं, लेकिन राष्ट्रभक्ति इस बार इन्हें महंगी पड़ी। पाकिस्तान की तरह चाइना के लिए मन में अंतर्द्वंद नहीं फैलाया जा सकता है। क्योकि आज भी देश कि बड़ी आबादी उन्ही चाइना के फोन पर सोशाल मीडिया में एक्टिव है। चाइना और भारत के अर्थशास्त्र को समझे बिना इस पर बात करना निरर्थक होगा।

फ़िल्म का सगीत पक्ष भी कमजोर सुनाई पड़ता है। फ़िल्म की लोकेशन भले ही बेहतरीन है। लेकिन सलमान द्वारा चट्टान को हिला देने वाले सीन अभी भी दर्शकों की हंसी का केंद्र बना हुआ है। इसे भूकंप से साथ जोड़ना भी एक बचकाना है।

फ़िल्म में चाइना युद्ध के बाद भारतीय सेना और भारत सरकार द्वारा हुए प्रयासों को भी नजरंदाज किया गया। लेफ़्टिनेट जनरल वी एम कौल और रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन से जुड़े तथ्य भी फ़िल्म में दिखाएँ जा सकते थे।

इंडो चाइना युद्ध के दौरान के इतिहास को खँगालने पर मुझे एक रोचक तथ्य वह मालूम हुआ कि ‘नेहरू द्वारा राज्य सभा में दिये वक्तव्य में यह कहाँ गया कि हम दोनों मुल्क उस बंजर जमीन के लिए फालतू लड़ रहे हैं उसी सदन में महावीर त्यागी का अपनी टोपी उतार कर अपने बिना बाल के सर को दिखा कर यह कहना कि यहाँ भी सब बंजर है तो क्या सर-कलम करवा लें ‘।

ट्यूबलाइट आज के सीएफएल के जमाने में चल ही नहीं पाएगी। क्योंकि फ़िल्म नाम की ही तरह धीरे धीरे बढ़ रही थी और आखिरी तक बढ़ नहीं पाई। दर्शकों को निराश होकर आना पड़ा।

फ़िल्म एक संदेश जरूर दे कर गयी कि उम्मीद और विश्वास है तो किसी भी चट्टान को कोई भी हिला सकता है। हमें भी हिन्दी सिनेमा से निर्देशकों से पाकिस्तान और चाइना दोनों के भारत से संबंध और अंतर्द्वंद विरोधाभास पर केन्द्रित फिल्मों की उम्मीद है। 

MANISH KUMAR JAISALMANISH KUMAR JAISAL 
PH.D. SCHOLAR  
Deptt. of  Performing (Theatre and Film ) Arts,
Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidhylaya,

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