रोहिंग्या को म्यांमार वापस नहीं भेज सकता भारत - UNHRC

अंतर्राष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार संधि का हिस्सा होने के चलते भारत पूरी प्रक्रिया का पालन करने और शरणार्थियों को मौत के मुंह में न धकेलने के यूनिवर्सल प्रिंसिपल का पालन करने के लिए बाध्य है...

हाइलाइट्स

ह्यूमनराइट्स कौंसिल के 36वें सेशन में अपनी रिपोर्ट रखते हुए जीद राद अल हुसैन ने कहा, , "मैं ऐसे समय में रोहिंग्या मुसलमानों को उनके देश वापस भेजे जाने के लिए भारत द्वारा उठाए जा रहे कदमों की कड़ी निंदा करता हूं, जब उनके देश (म्यांमार) में उन पर जुल्म हो रहे हों."

रोहिंग्या को म्यांमार वापस भेजने की योजना पर UNHRC ने की भारत की निंदा

UN human rights body deplores india on deporting rohingyas

नई दिल्ली। रोहिंग्या समुदाय को उनके देश वापस भेजने की भारत की योजना को लेकर संयु्क्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के उच्चायुक्त जीद राद अल हुसैन ने भारत की कड़ी निंदा की है।

ह्यूमनराइट्स कौंसिल के 36वें सेशन में अपनी रिपोर्ट रखते हुए जीद राद अल हुसैन ने कहा, , "मैं ऐसे समय में रोहिंग्या मुसलमानों को उनके देश वापस भेजे जाने के लिए भारत द्वारा उठाए जा रहे कदमों की कड़ी निंदा करता हूं, जब उनके देश (म्यांमार) में उन पर जुल्म हो रहे हों।"

बता दें म्यांमार से भागकर भारत सहित भारतीय उपमहाद्वीप के कई देशों में शरण ले चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर कुछ समय से काफी विवाद चल रहा है। कुछ देश जहां रोहिंग्या समुदाय को शरण देने के इच्छुक हैं, वहीं कई देश अपने यहां अवैध रूप से घुस आए रोहिंग्या मुसलमानों को बिल्कुल भी शरण नहीं देना चाहते, जिसमें भारत भी शामिल है।

जीद राद अल हुसैन ने कहा कि भारत में 40,000 रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी हैं, जिनमें से 16,000 रोहिंग्या ने संयुक्त राष्ट्र से शरणार्थी प्रमाण-पत्र ले लिए हैं।

भारतीय विदेश राज्यमंत्री के अंतर्राष्ट्रीय कानून के संबंध में बयान का हवाला देते हुए जीद राद अल हुसैन ने कहा, "भारत के विदेश राज्यमंत्री ने हाल ही में कहा था कि चूंकि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए भारत इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय कानून से बाहर जा सकता है और मानवीय अनुकंपा से बंधा हुआ नहीं है।"

बता दें कि विदेश राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में कहा था कि शरणार्थियों के मामले में अंतर्राष्ट्रीय संगठन भारत को लेक्चर न दें। रिजिजू ने यह भी कहा था कि रोहिंग्या मुसलमान भारत में अवैध प्रवासी हैं और कानून के मुताबिक उन्हें वापस जाना ही होगा।

रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बीते सप्ताह ही सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करने के लिए एडवाइजरी जारी की थी। एडवाइजरी में रोहिग्या मुसलमानों से खतरे की बात भी कही गई है। ज्ञात हो कि एडवाइजरी जब जारी हुई उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी म्यांमार दौरे पर थे।

अल हुसैन ने आगे कहा, "लेकिन व्यावहारिक धरातल पर, अंतर्राष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार संधि का हिस्सा होने के चलते वह पूरी प्रक्रिया का पालन करने और शरणार्थियों को मौत के मुंह में न धकेलने के यूनिवर्सल प्रिंसिपल का पालन करने के लिए बाध्य है. और इसलिए भारत सामूहिक निर्वासन नहीं कर सकता या शरणार्थियों को ऐसी जगह वापस नहीं भेज सकता, जहां उन पर जुल्म होने या अन्य गंभीर प्रताड़नाएं मिलने का खतरा हो।"

यूएनएचआरसी के इस वक्तव्य पर पाकिस्तानी मूल के विवादास्पद लेखक तारक फतेह ने कहा कि एक तानानशाह जॉर्डन के राजकुमार, जो UNHRC का नेतृत्व करते हैं रोहिंग्या औरगौरी लंकेश हत्याकांड पर भारत की खाल उतार रहे हैं।

Human Rights Council के 36th session में United Nations High Commissioner for Human Rights Zeid Ra'ad Al Hussein के खुले बयान का रोहिंग्या व भारत के संदर्भ में वक्तव्य मूल का अंश निम्नवत् है।

I deplore current measures in India to deport Rohingyas at a time of such violence against them in their country. Some 40,000 Rohingyas have settled in India, and 16,000 of them have received refugee documentation. The Minister of State for Home Affairs has reportedly said that because India is not a signatory to the Refugee Convention the country can dispense with international law on the matter, together with basic human compassion. However, by virtue of customary law, its ratification of the International Covenant on Civil and Political Rights, the obligations of due process and the universal principle of non-refoulement, India cannot carry out collective expulsions, or return people to a place where they risk torture or other serious violations.

I am also dismayed by a broader rise of intolerance towards religious and other minorities in India. The current wave of violent, and often lethal, mob attacks against people under the pretext of protecting the lives of cows is alarming. People who speak out for fundamental human rights are also threatened. Gauri Lankesh, a journalist who tirelessly addressed the corrosive effect of sectarianism and hatred, was assassinated last week. I have been heartened by the subsequent marches calling for protection of the right to freedom of expression, and by demonstrations in 12 cities to protest the lynchings. Human rights defenders who work for the rights of India's most vulnerable groups – including those threatened with displacement by infrastructure projects such as the Sardar Sarovar Dam in the Narmada river valley – should be considered allies in building on India's achievements to create a stronger and more inclusive society. Instead, many are subject to harassment and even criminal proceedings, or denied protection by the State.

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