जानिए क्या है एफआईआर और क्या हैं इसे दर्ज कराने के कानूनी रास्ते

पुलिस और एफआईआऱ का नाम सुनते ही किसी भी भले आदमी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। आज भी किसी वारदात में उचित एफआईआऱ दर्ज कराना बहुत कठिन काम है।...

जानिए क्या है एफआईआर और क्या हैं इसे दर्ज कराने के कानूनी रास्ते

पुलिस और एफआईआऱ का नाम सुनते ही किसी भी भले आदमी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। आज भी किसी वारदात में उचित एफआईआऱ दर्ज कराना बहुत कठिन काम है।

क्या है एफआईआर

किसी (आपराधिक) घटना के सं विषय में पुलिस के पास कार्रवाई के लिए दर्ज की गई सूचना को प्राथमिकी/ प्रथम सूचना रपट/ First Information report (F I R) कहा जाता है।

एफआईआर से जुड़े सवाल

एफआईआर दर्ज कराने से पहले कुछ सवाल आपके जेहन में उठते हैं मसलन - fir format, केस करने का तरीका, फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट, फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट ऑनलाइन, online fir, first information report online, मोबाइल चोरी की रिपोर्ट, How to File an FIR, अगर पुलिस एफआईआर दर्ज न करे तब, एफआईआर के बारे में पूरी जानकारी।

जानिए क्या हैं एफआईआर दर्ज कराने के कानूनी रास्ते

कई बार ऐसा होता है कि गाड़ी चोरी हो जाने या चलती बस या बाजार में मोबाइल चोरी हो जाने पर जब एफआईआर के लिए थाने जाते हैं तो पुलिस एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती है। वैसे, संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज करना पुलिस की ड्यूटी है और सीआरपीसी में इसके लिए प्रावधान है। इसके बावजूद अगर पुलिस गंभीर मामले में केस दर्ज न करे, जो कि अक्सर होता है तब आपके पास क्या रास्ता, यह जानना जरूरी है।

देशबन्धु की एक ख़बर में एफआईआर कराने के रास्ते बताए गए हैं, जो निम्न हैं -

1)  ऐसा कोई भी अपराध जो संज्ञेय है, उसमें पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी होगी, पुलिस एफआईआर दर्ज न करने का कोई बहाना नहीं बना सकती।

2) सीआरपीसी की धारा-154 के तहत पुलिस को किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना के आधार पर केस दर्ज करना होता है। जब कोई संज्ञेय अपराध होने की स्थिति में थाने में शिकायत लिखकर देता है तो पुलिस उसकी एक कॉपी पर मुहर लगाकर दे देती है। इसके बावजूद अगर केस दर्ज नहीं होता है तो पीड़ित व्यक्ति अदालत जा सकता है। इस मामले में 9 जुलाई 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने शुभंकर लोहारका बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली के केस में दिशानिर्देश जारी किए हैं।

3) यदि थाने में की गई शिकायत के बावजूद केस दर्ज न हो तो शिकायतकर्ता 15 दिनों के अन्दर जिले के पुलिस कप्तान यानी दिल्ली में डीसीपी या राज्यों में पुलिस अधीक्षक (एसपी) के सामने शिकायत कर सकता है। इस शिकायत की पावती लेनी होती है। शिकायत डाक के जरिये भी डीसीपी को भेजी जा सकती है या ईमेल भी किया जा सकता है। इसके बावजूद अगर केस दर्ज न हो तो उक्त शिकायत की कॉपी के साथ शिकायतकर्ता सीआरपीसी की धारा-156 (3) के तहत इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायत कर सकता है। तब मजिस्ट्रेट के सामने अर्जी दाखिल कर कोर्ट को यह बताना होता है कि कैसे संज्ञेय अपराध हुआ।

 4)  कानूनी जानकारों के मुताबिक अगर शिकायतकर्ता की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट संतुष्ट हो जाता है तो कोर्ट इलाके के एसएचओ को निर्देश जारी करता है कि वह केस दर्ज करे और अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे।

5) मैजिस्ट्रेट चाहें तो अर्जी पर पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कह सकते हैं और फिर जवाब के बाद केस दर्ज करने का आदेश दे सकते हैं।

6) अगर मजिस्ट्रेट की अदालत शिकायतकर्ता की अर्जी खारिज कर देती है तो उक्त आदेश को सेशन कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। वहां भी अगर अर्जी खारिज हो जाए तो हाई कोर्ट में अपील दाखिल हो सकती है।

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