आइए जानें, क्या है पेरिस जलवायु समझौता

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन के लिए भारत-चीन को दोष देते हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से खुद को अलग करने की घोषणा की है। समझौते से अमेरिका के हटने से दुनिया सकते में है।...

देशबन्धु

What is Paris climate agreement ?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन के लिए भारत-चीन को दोष देते हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से खुद को अलग करने की घोषणा की है। समझौते से अमेरिका के हटने से दुनिया सकते में है।

ट्रंप के इस फैसले से दूसरे देशों पर क्या पड़ेगा असर ?

किस देश का क्या है रुख ?

आखिर क्या है पेरिस जलवायु समझौता ?

आइए आपको समझाते हैं...

पिछले साल दिसम्बर में पेरिस में हुई सीओपी की 21वीं बैठक में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस के आदर्श लक्ष्य को लेकर एक व्यापक सहमति बनी थी। इस बैठक के बाद सामने आए 18 पन्नों के दस्तावेज को सीओपी-21 समझौता या पेरिस समझौता कहा जाता है। अक्टूबर, 2016 तक 195 सदस्य देश इस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। यानी अधिकांश देश ग्लोबल वार्मिंग पर काबू पाने के लिये जरूरी तौर-तरीके अपनाने पर राजी हो गए हैं।

अब जानते हैं... मसौदे की खास बातें

1. 2020 में समझौता लागू होने के पहले सभी देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती के अपने लक्ष्य की समीक्षा करेंगे, ताकि यथासंभव और कठोर लक्ष्य तय किया जाए।

2. 2025 तक कार्बन उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य तय किया गया, जबकि कुछ देशों ने कहना है कि 2030 तक उनकी कार्बन उत्सर्जन की सीमा उच्चतम स्तर पर पहुंचेगी।

3, 2023 से हर पांच साल के अंतराल में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के प्रभावों की समीक्षा की जाएगी। उसके अनुसार बदलाव किया जाएगा।

4. 100 अरब डॉलर की सालाना मदद 2020 से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए हर साल विकासशील देशों को देंगे अमीर देश, 2025 से समीक्षा होगी।

अमेरिका की भूमिका

1. अमेरिका दुनिया में सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है।

2. दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का करीब 15 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है।

3. अमेरिका ने टेक्नोलॉजी में पैसा लगाकर लाखों नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य रखा।

4. 2020 तक पिछड़े देशों की मदद के लिए हर साल 100 बिलियन डॉलर देने का वादा

किस देश का क्या है रुख?

- भारत इस समझौते पर अमल करता रहेगा, भले ही अमेरिका इससे अलग हो जाए

- चीन का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से बचाव वैश्विक ज़िम्मेदारी है

- रूस का कहना है कि अमेरिका के हाथ खींचने से पेरिस डील का प्रभाव घटेगा

- ब्रिटेन ने कहा, अमेरिका से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अपील करेगा। स्वच्छ ऊर्जा के लिए

- फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युल मैकों ने कहा- ट्रंप ने पृथ्वी के भविष्य के लिए भूल की

- अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का कहना है कि- ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकों को संकट में डाला

मसौदा साफ नहीं

दो डिग्री के लक्ष्य को तय करके कहा गया कि इस तक जल्द से जल्द पहुंचना होगा। लेकिन इस तक पहुंचने का कोई साफ रास्ता नहीं तय किया गया। मतलब यह पता ही नहीं है कि देशों को इसके लिए करना क्या होगा?

अगर अमेरिका की बात करें तो उसे 2025 तक कार्बन उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत तक कम करना होगा। तय हुआ है कि 2020 में सभी देश बताएंगे कि उन्होंने अब तक क्या-क्या कदम उठाएं हैं। इसको तोड़ने पर क्या सजा मिलेगी यह भी साफ नहीं है।

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