जानिए पंडित नेहरू का वो सच जो आपसे छुपाया गया!

सोवियत रूस के विखंडन के बाद उत्पन्न एक नए वैश्विक परिवेश के साथ सामंजस्य बैठाने के बावजूद, नेहरू द्वारा प्रतिपादित साम्राज्यवाद विरोधी भारत की विदेश नीति समय और बदली हुई परिस्थितियों की कसौटी पर खरी ...

अतिथि लेखक
जानिए पंडित नेहरू का वो सच जो आपसे छुपाया गया!

What is the role of jawaharlal nehru in building new india

अमरेश मिश्रा

आज जब देश पंडित जवाहरलाल नेहरू की 129वीं जयंती मना रहा है तब उनकी विरासत पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

पच्चीस साल पहले आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद से नेहरू और खासकर उनकी आर्थिक नीतियों की आलोचना करने का एक फैशन सा हो गया है।

नेहरू को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है कि उनके लाए हुए 'कोटा-परमिट राज' के कारण देश का विकास अवरुद्ध हुआ। उन्हें देश के विभाजन, कश्मीर-समस्या और अमेरिका- विरोधी विदेश नीति के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाता है।

परन्तु 2008 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी, उसके भयावह परिणामों और मोदी के 4 सालों के फासीवादी राज को भुगतने के बाद आज नेहरू के कई विचारों को एक नई रोशनी में देखा जाने लगा है।

बाज़ारवाद के समर्थक बेमन से ही सही मगर इस सच्चाई को स्वीकार अवश्य करते हैं कि 2008 मे आत्मनिर्भरता, देसी औद्योगीकरण और सरकार के सामयिक हस्तक्षेप ने देश को भीषण आर्थिक मंदी की चपेट में आने से बचाया था।

अर्थव्यवस्था और नेहरू

आजादी से पहले भारत की विकास दर शून्य थी। नेहरू ने इसे 3–4% तक पहुंचाया। नि:संदेह यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसकी वजह से करोड़ों लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ गए।

हालांकि आज भारत की विकास दर 8% के आसपास बताई जाती है मगर गरीबी उन्मूलन का आंकडा अब भी 0.8 % को पार नहीं कर पाया है।

आज दुनिया जिस विशाल भारतीय बाजार का ज़िक्र करते नहीं अघाती उसका अधिकाँश श्रेय नेहरू की उन नीतियों को जाता जिनके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में सरकार ने भारी खर्चा किया।

समाजवाद का समर्थक होने के बावजूद नेहरू अर्थव्यवस्था को पूर्णतया राज्य- नियंत्रित करने के पक्षधर नहीं थे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को वरीयता देने के बावजूद उन्होंने निजी उद्यमों को भी साथ-साथ प्रोत्साहन दिया।

साथ ही उन्होंने पूंजीवाद की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों पर भी लगाम लगाए रक्खी। उन्हें मालूम था कि बेलगाम पूंजीवाद भारत की कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर सकता है।

1944 में भारत के बड़े व्यावसायिक घराने स्वयं ही ‘बॉम्बे प्लान' लेकर आए जिसमे राज्य द्वारा भारी निवेश की वकालत की गई थी। इस प्लान के तहत बड़े व्यवसाइयों ने स्वीकार किया कि राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही।

राजनीतिक अर्थशास्त्र कहता है कि सामन्तवाद के उच्छेदन और गाँवों में भूमि-सुधार किए बगैर सही मायनों में गतिशील पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना असंभव है।

नेहरू ने जमींदारी-भूमि का किसानों के मध्य वितरण किया था जिसकी वजह से आज भारत के गाँवों में एक बड़ा मध्यम वर्ग पैदा हो सका है।

नेहरू के भूमि सुधारों की वजह से ही ग्रामीण अंचलों की मध्ययुगीन परिपाटियों में फंसी पड़ी एक बड़ी श्रमशक्ति गाँवों से बाहर निकलकर भारत के विकसित होते उद्योगों की प्रगति में अपना योगदान दे पाई।

मगर यह सब इतना आसान नहीं था। सामंती, अनुदारपंथी सूदखोरों-व्यापारियों- कालाबाजारियों की लॉबी ने नेहरू के मार्ग में कदम-कदम पर रोड़े अटकाए।

खेद के साथ कहना पड़ता है कि भारत के नवजात पूंजीपतियों ने नेहरू के प्रगतिवादी नज़रिए का तहेदिल से कभी भी समर्थन नहीं किया।

यहाँ तक कि नेहरू को स्वयं कांग्रेस के भीतर मौजूद रूढ़िवादी-दक्षिणपंथी तत्वों के विरोध का भी सामना करना पड़ा।

इतना ही नहीं उन्हें आरएसएस के प्रतिगामी दुश्चक्रों की मार भी झेलनी पड़ी।

दक्षिणपंथी और आरएसएस संसदीय लोकतंत्र और भारतीय संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों, महिलाओं और दलितों को समान अधिकार दिए जाने के घोर विरोधी थे।

भारत-पाक विभाजन और नेहरू

Indo-Pak partition and Nehru

दक्षिणपंथी ताकतें नेहरू को देश के विभाजन के लिए उत्तरदायी ठहराती हैं। मगर साम्प्रदायिक-फासीवादी आरएसएस विरोधाभास का शिकार है। जहां वे एक तरफ ‘अखंड भारत' की वकालत करते हैं वहीँ दूसरी तरफ पाकिस्तान के खिलाफ नफरत का ज़हर उगलते रहते हैं।

नेहरू एक बुद्धिजीवी राजनेता थे। अकादमीशियन होने के साथ वह एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्हें न केवल भारत और विश्व के इतिहास की गहरी समझ थी, अपितु राजकाज की कला भी जानते थे।

उनकी पुस्तकें ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' Discovery of India और ‘ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री' Glimpses of World History आज भी साहित्य की धरोहर मानी जाती हैं .

नेहरू देश का विभाजन नहीं चाहते थे।

Nehru did not want to divide the country

अगर केवल ‘जिन्नाह को प्रधानमंत्री बना देने से विभाजन टल जाता' तो नेहरू अवश्य ही अपने कदम वापिस खींच लेते।

नेहरू एक सैद्धांतिक मुद्दे पर अड़े हुए थे: वह कैबिनेट मिशन प्लान-1946 से सहमत नहीं थे, जिसमें धर्म के आधार पर देश को तीन भागों में बाँट दिया गया था।

इससे पहले 1930 में नेहरू ने मुस्लिम लीग के उस एकता प्रस्ताव की मुखालफत की थी जिसमें मांग की गई थी कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि माने। यदि लीग के इस प्रस्ताव को मान लिया जाता तो कांग्रेस मात्र हिन्दुओं की प्रतिनिधि रह जाती।

ब्रिटिश, आरएसएस और मुस्लिम लीग यही चाहते थे लेकिन नेहरू ने कांग्रेस को ‘पहचान की राजनीति’ का मोहरा बनाने से साफ़ इनकार कर दिया।

वह जानते थे कि मध्ययुगीन धार्मिक पहचानों की नींव पर एक आधुनिक राष्ट्र की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती।

नेहरू किसी एक हिन्दू , मुस्लिम, दलित या ईसाई समुदाय का नहीं वरन एक आधुनिक राष्ट्र का समग्र उद्भव देखना चाहते थे।

आधुनिकता और नेहरू

Modernity and Nehru

नेहरू आधुनिक तकनीक के पैरोकार थे। अंग्रेज़ी में उनका भाषण हो या लेखन, वह किसी भी मायने में चर्चिल और रूजवेल्ट से कम न थे।

उर्दू पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। उनका फ़ारसी जुबां से लगाव जगजाहिर था। उनकी शेरवानी उर्दू के अज़ीम शायर जोश मलीहाबादी की शेरवानी को भी मात करती थी।

पाकिस्तान में एक मुशायरे का मशहूर वाकया है जब सूट-बूट में सजे धजे पाकिस्तानियों के बीच अकेले नेहरू को शेरवानी में देखकर जोश साहब नि:शब्द रह गए थे!

नेहरू के भीतर ईटन-हैरो (उस समय दुनिया मे आभिजात्य वर्ग के ब्रिटेन स्तिथ नम्बर 1 स्कूलो) की नफ़ासत और खुलापन और भदेस रवायतों का शहर इलाहाबाद, एक साथ सांस लेते थे।

नेहरू क्लबों वाले, उच्चशिक्षित अंग्रेजीदां हिन्दुस्तान के बीच भी उतना ही सहज रहते थे, जितना एक आम आदमी के साथ।

सदैव गरिमापूर्ण भाषा और व्यवहार उन्हें औरों से विशिष्ट बनाता था।

नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व के कई किस्से मशहूर हैं।

एक बुद्धिजीवी राजनेता और प्रधानमंत्री होने के बावजूद उन्होंने संघी गुंडों को लाठी से खदेड़ने में भी गुरेज़ नही किया। अक्तूबर 1947 में दिल्ली के ओडियन सिनेमा हॉल के बाहर वाकई एक ऐसा वाकया हुआ था।

विभाजन के बाद, जब साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर था तब भी वह अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए महात्मा गांधी को अपशब्द कहने वाली भीड़ के बीच कूद पड़े थे।

देश के सभी प्रगतिवादी-सुधारवादी तबकों ने नेहरू की इस अथकता का भरपूर समर्थन किया।

विभाजन-पूर्व भारत के एक प्रमुख देवबंदी उलेमा मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने साझा राष्ट्रवाद पर एक पर्चा लिखा था जिसमें उन्होंने जिन्नाह की धर्म पर आधारित राष्ट्रनिर्माण की परिकल्पना Jinnah's concept of nation building based on religion की जमकर आलोचना की थी। भारत के वामपंथी आन्दोलन ने भी संस्कृति और सिनेमा के क्षेत्र में समाजवादी विचारों को स्थापित करने में भरपूर योगदान दिया।

सोवियत रूस के विखंडन के बाद उत्पन्न एक नए वैश्विक परिवेश के साथ सामंजस्य बैठाने के बावजूद, नेहरू द्वारा प्रतिपादित साम्राज्यवाद विरोधी भारत की विदेश नीति समय और बदली हुई परिस्थितियों की कसौटी पर खरी उतरी है।

आज भी इस विदेश नीति के बल पर भारत विश्वपटल पर मुख्य भूमिका निभा रहा है .

बहुलतावाद और नेहरू

Pluralism and Nehru

रूढ़िवादी/अनुदारवादी तत्व हैदराबाद पर पटेल की सख्ती के बरक्स कश्मीर पर नेहरू की उदार नीति को रखने की गलती करते हैं। नेहरू जनभावना का सम्मान करते थे। हैदराबाद में ताकत का इस्तेमाल उस जन-आन्दोलन को मद्देनज़र रखते हुए किया गया था, जिसे कुचलने के लिए निजाम सैन्यबल का प्रयोग कर रहा था। कश्मीर में शेख अब्दुल्ला, जो नेहरू के मित्र और हमख्याल भी थे और भारत के पक्षधर थे, जनभावना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जबकि कश्मीर के राजा हरी सिंह पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे।

नेहरू ने 1947-48 के इस कश्मीर संकट से निपटने के लिए तुरंत सेना भेजने का निर्णय लिया। मगर साथ ही कश्मीर के इतिहास को मद्देनज़र रखते हुए और भारत के साथ रहते हुए स्वायत्तता की कश्मीरियों की आम राय का सम्मान करते हुए नेहरू ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग स्वीकार किया।

भू-राजनीति, 1970 के बाद भारत और कश्मीर के नेताओं की गलतियों , अमेरिका के प्रवंचनापूर्ण किन्तु अप्रत्यक्ष रूस-विरोधी युद्धों का ही परिणाम है जो आज कश्मीर घाटी आतंकवाद के शिकंजे में फंसी हुई है।

राष्ट्रवाद और नेहरू

Nationalism and Nehru

यह नेहरू का मध्यममार्गी लोकतान्त्रिक राष्ट्रवाद ही था जिसने भारत को उस गर्त में गिरने से बचाया जिसमें तीसरी दुनिया के वे देश गिरे, जिन्होंने औपनिवेशिक राज से मुक्ति पाने के बाद अर्द्ध-समाजवादी किन्तु निरंकुश अथवा अमेरिका-समर्थक तानाशाही शासन-व्यवस्था को अपनाया।

नेहरू महात्मा गांधी की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी थे। वह एक धर्म निरपेक्ष, बहुलतावादी, गरीब-समर्थक, वैचारिक परम्परा की समृद्ध विरासत छोड़कर गए हैं।

जब तक यह देश उनकी विचारधारा के अनुरूप शासित होता रहा तब तक आरएसएस और साम्राज्यवादी ताकतें अपने बिलों में घुसी रहीं।

आजाद भारत का इतिहास अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि वह नेहरू के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कोई निर्णयात्मक आक्षेप या टिप्प्णी कर सके। नेहरू विरोधी आज भी उनके विचारों को व्यवहार में लाने की किसी भी पहल का विरोध करते नहीं थकते हैं।

इसके बावजूद भारत संकट से घिरी इस दुनिया में एक आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए प्रयासरत है ।

अंतत: इस देश की जनता और बुद्धिजीवी ही नेहरू की देन का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के अधिकारी हैं।

नेहरू की विरासत उन्हीं के सद्प्रयासों से पुनर्जीवित होगी !

(अमरेश मिश्रा इतिहासकार, वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म लेखक हैं, अंग्रेज़ी से उनके मूल लेख का अनुवाद साध्वी मीनू जैन ने किया है।)

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