क्या 2019 में 1996 दोहराया जाएगा?

‘मोदी के मुकाबले कौन’ का झूठा सवाल .... राज्यस्तरीय व्यावहारिक गठबंधनों की फैडरेशन का ही होगा भाजपाविरोधी गठबंधन...

क्या 2019 में 1996 दोहराया जाएगा?

What will 1996 be repeated in 2019?

0 राजेंद्र शर्मा

पांच राज्यों के विधानसभाई चुनाव की पूर्व-संध्या में हुए कर्नाटक के उपचुनावों ने पिछले करीब एक साल में बढ़ती स्पष्टता के सामने आई इस सच्चाई की जोरदार तरीके से पुष्टि की है कि मोदी-शाह की भाजपा का ग्राफ गिरावट पर है और उसके साढ़े चार साल के राज से निराश जनता, विकल्प खोज रही है। इसी साल मई में हुए कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में, अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर निकलने के बावजूद, भाजपा को सरकार तक पहुंचने से, कांग्रेस-जनता दल सेकुलर के गठबंधन ने रोक दिया था। भाजपा को सत्ता पर काबिज होने से रोकने के लिए कांग्रेस ने, बड़ी दूरंदेशी तथा तत्परता का परिचय देते हुए, जनता दल सेकुलर के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनाने की पेशकश कर, भाजपा की खरीद-फरोख्त के जरिए बहुमत जुगाडऩे की तमाम कोशिशों को विफल कर दिया। अचरज की बात नहीं है कि इस पृष्ठभूमि में, जब कुमारस्वामी के नेतृत्व में कांग्रेस-जनता दल सेकुलर सरकार ने शपथ ली, उसके शपथ ग्रहण का मंच, भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता के प्रदर्शन का ही मंच बन गया।

हो गया साबित चुनाव में भी काम करेगी ये एकता

इसी पृष्ठभूमि में, यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा था कि क्या यह विपक्षी एकता, चुनाव में भी काम करेगी? क्या जनता इस तरह के गठबंधन को स्वीकार करेगी? उपचुनाव के नतीजों ने इन सारी शंकाओं को दूर कर दिया है।

लोकसभा की तीन और विधानसभा की दो सीटों के लिए एक साथ हुए उपचुनाव में, कांग्रेस-जनता दल सेकुलर गठबंधन ने, चार सीटों पर जीत दर्ज कराई है, जबकि भाजपा को एक शिमोगा की लोकसभाई सीट की जीत पर ही संतोष करना पड़ा है। याद रहे कि कर्नाटक में भाजपा के स्ट्रांगमैन कहलाने वाले येदियुरप्पा के बेटे ने इस सीट पर जीत दर्ज जरूर कराई है, लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा उम्मीदवार की जीत के अंतर में उल्लेखनीय कमी हो गई है। दूसरी ओर, मीडिया के हिसाब से इन चुनावों की मुख्य स्टोरी, खनन माफिया के रूप में कुख्यात रेड्डी बंधुओं के गढ़, बेल्लारी की लोकसभाई सीट, करीब ढ़ाई लाख वोट के अंतर से भाजपा से कांग्रेस का छीन लेना है। यह जीत गठबंधन के काम कर रहे होने का सबसे धमाकेदार सबूत है। जनता दल सेकुलर के गढ़ मांड्या की लोकसभाई सीट पर उसका कब्जा बनाए रखना और दो विधानसभाई सीटें कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के बीच बंट जाना, इस उपचुनाव की अन्य खबरें हैं।

The impact of Karnataka by-election results will not be limited to Karnataka only.

    जाहिर है कि कर्नाटक उपचुनाव के नतीजों का असर, सिर्फ कर्नाटक तक ही सीमित नहीं रहेगा। विपक्ष के लिए आई इस अच्छी खबर से, पांच राज्यों के विधानसभाई चुनाव में मुख्य भाजपा-विरोधी पार्टी के रूप में कांग्रेस के उत्साह में कुछ न कुछ बढ़ोतरी ही होगी। लेकिन, कर्नाटक उपचुनाव के नतीजों का वृहत्तर प्रभाव, इस तात्कालिक असर तक ही सीमित नहीं रहेगा। जैसे इसके भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता की एक वृहत्तर प्रक्रिया का हिस्सा होने को ही रेखांकित करते हुए, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, चंद्रबाबू नायडू ने झटपट कर्नाटक की जनता दल सेकुलर-कांग्रेस गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री, कुमारस्वामी और उनके पिता तथा जनता दल सेकुलर के राष्ट्रीय अध्यक्ष, एच डी देवगौड़ा से, लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता का हिस्सा बनने के लिए बात कर ली है।

मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए तथा उसकी सरकार से अलग होने के बाद से तेलुगू देशम पार्टी, उनकी मुखर विरोधी ही नहीं होती गई है बल्कि उसके नेता, चंद्रबाबू नायडू नव्बे के दशक के 1998 के चुनाव तक के दौर की, अपनी विपक्ष को एकजुट करने में सक्रिय भूमिका पर लौट गए हैं।

    इसीलिए, यह संयोग ही नहीं है कि चंद्रबाबू नायडू से मुलाकात के बाद, मीडिया से बात करते हुए एच डी कुमारस्वामी ने ‘2019 में 1996 दोहराने’ की उम्मीद जतायी।

1996 में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के केंद्रीय लक्ष्य के आधार पर ही, कांग्रेस-इतर भाजपाविरोधी पार्टियों ने एकजुट होकर सरकार बनायी थी, जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था।

बहरहाल, कर्नाटक के गठबंधन के अनुभव का संकेत स्पष्ट है कि 1996 को अगर दोहराया जाता है, तब भी कम से कम एक भिन्नता के साथ दोहराया जाएगा। इस बार कांग्रेस को इस एकता का महत्वपूर्ण हिस्सा होना होगा। रहा नेतृत्व का सवाल तो कर्नाटक में, विधानसभा में अपने से छोटी पार्टी को गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने का मौका देकर, कांग्रेस ने कम से कम इतना तो साबित कर ही दिया है कि वह भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए, सत्ता के अपने लालच को अंकुश में रख सकती है।

राज्यस्तरीय व्यावहारिक गठबंधनों की फैडरेशन का ही होगा भाजपाविरोधी गठबंधन

Anti-BJP alliance will be Federation of state-level practical alliances

    बहरहाल, आम तौर पर कर्नाटक की भाजपाविरोधी गठबंधन सरकार के अनुभव ने और खासतौर पर पांच सीटों के उपचुनाव के नतीजों ने, अगले आम चुनाव के लिए महत्व रखने वाली दो प्रमुख सच्चाइयों को गाढ़ी स्याही से रेखांकित कर दिया है। पहला तो यही कि राज्य के स्तर पर व्यावहारिक रूप से भाजपा विरोधी गठबंधन Anti-BJP alliance बन सकते हैं और प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों पर केंद्रित इस तरह के गठबंधन, राज्य-राज्य के स्तर पर भाजपा तथा उसके सहयोगियों की हार और विपक्षी ताकतों की जीत का रास्ता बना सकते हैं।

इसका अर्थ यह है कि भाजपा विरोधी एकता का रूप, किसी देशव्यापी ‘‘महागठबंधन’’ का न होकर, राज्यों के स्तर पर बनने वाले व्यावहारिक गठबंधनों की फैडरेशन का ही होगा। और इन अलग-अलग गठबंधनों या कतारबंदियों को आपस में बांधने वाली डोर होगी, भाजपा के विरोध की एकता। देश के स्तर पर मौजूदा संघ-भाजपा शासन के खिलाफ वातावरण बनाने में योग देते हुए भी, यह एकता राज्यों के स्तर पर ही चुनावी कतारबंदी का व्यावहारिक रूप लेगी। अचरज नहीं कि उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित सपा-बसपा गठबंधन या बिहार के राजद-केंद्रित गठबंधन या तमिलनाडु के द्रमुक केंद्रित गठबंधन की ही तरह, कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल सेकुलर गठबंधन के अगले लोकसभा चुनाव में भी काम करने की पहले ही घोषणाएं भी की जा चुकी हैं।

‘मोदी के मुकाबले कौन’ का झूठा सवाल

The question of 'Who compared to Modi' is false. Karnataka Rejects BJP

    कर्नाटक के उपचुनाव के नतीजों का एक और दूरगामी तथा स्पष्ट संदेश यह है कि संघ-भाजपा के चार साल के राज से आजिज़ आ चुकी जनता, अब उत्सुकता से विकल्प खोज रही है। जाहिर है कि मोदी-शाह जोड़ी के राज के सांप्रदायिक तथा तानाशाहीपूर्ण तौर-तरीकों से जमा होती रही जनता की नाराजगी को, पिछले साल-डेढ़ साल में गहराए चौतरफा आर्थिक संकट ने, जिसमें रोजगार का तेजी से बढ़ा संकट खास है, प्रकट असंतोष में बदल दिया था और पिछले कुछ महीनों में सामने आए रफाल घोटाले, बैंकों से सार्वजनिक धन की लूट तथा सीबीआइ समेत सभी संस्थाओं के ध्वंस ने, इस प्रकट असंतोष को सक्रिय रूप से विकल्प की तलाश के बिंदु तक पहुंचा दिया है। यहां आकर, ‘मजबूत नेता’ तथा ‘निर्णायक सरकार’ के सारे दावे बेअसर हो जाते हैं और ‘महागठबंधन’ तथा उसकी ‘खिचड़ी सरकार’ पर सारे हमले भोंथरे हो जाते हैं। ‘मोदी के मुकाबले कौन’ का सवाल झूठा पड़ जाता है। और 2019 में 1996 का दोहराया जाना, एक वास्तविक और सकारात्मक संभावना नजर आने लगता है।

    इसीलिए तो संघ-भाजपा जोड़ी अब, संविधान, कानून, देश की संस्थाओं और लोक-लाज से चलने के अपने सारे दिखावे को भी छोडक़र, शबरीमला से लेकर राम मंदिर तक, सांप्रदायिक गोलबंदी की नंगी तलवारों के साथ मैदान में कूद पड़ी है। लेकिन, यह रास्ता अपने तेजी से खिसकते जनाधार को किसी हद तक बचाने का रास्ता तो हो सकता है, इस विशाल तथा विविधताओं भरे देश में, सत्ता तक पहुंचने का रास्ता नहीं हो सकता है। कर्नाटक के रामनगर विधानसभाई उपचुनाव में जनता दल सेकुलर उम्मीदवार तथा मुख्यमंत्री की पत्नी, अनीता कुमारस्वामी के खिलाफ कांग्रेस से दल-बदल करा के उम्मीदवार जुटाने की भाजपा की चाल का उल्टा पडऩा और उसके उम्मीदवार का चुनाव से ऐन पहले बैठने की घोषणा कर गठबंधन उम्मीदवार को वॉकओवर दिला देना, इसका इशारा करता है कि हवा का रुख अब संघ-भाजपा के खिलाफ हो चुका है।       

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