क्या सिद्दारमैया की झोली में जाएगा लिंगायत वोटबैंक

पिछले साल जून से पूरे राज्य में जबरदस्त तरीके से चल रहे आन्दोलन के बारे में भाजपा और आरएसएस गाफिल रह गए हैं

शेष नारायण सिंह
Updated on : 2018-04-02 12:32:36

क्या सिद्दारमैया की झोली में जाएगा लिंगायत वोटबैंक

शेष नारायण सिंह

कर्नाटक की राजनीति लिंगायत धर्म को अल्पसंख्यक दर्जा देने के मुद्दे पर केन्द्रित हो गई है। लिंगायत लोग पहले कांग्रेस के समर्थक हुआ करते थे लेकिन जब राजीव गांधी ने 1990 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र पाटिल को अपमानित करके हटा दिया, तो लिंगायतों में कांग्रेस के प्रति घोर नाराजगी पैदा हो गई। वीरेन्द्र पाटिल कर्नाटक के बहुत ही आदरणीय नेता थे और लिंगायत समुदाय से सम्बंधित थे। 1957 में पहली बार विधायक बने थे और रामकृष्ण हेगड़े के साथ कर्नाटक के उस दौर के सबसे बड़े नेता, एस निजलिंगप्पा के प्रिय पात्र थे।

जनता पार्टी राज में मुख्यमंत्री भी बने थे। चिकमंगलूर लोकसभा के 1978 के विख्यात उपचुनाव में जब इंदिरा गांधी जीत गईं तो जनता पार्टी ने उनको अपमानित किया। नाराज वीरेन्द्र पाटिल ने कुछ समय बाद इंदिरा कांग्रेस की सदस्यता ले ली। 1989 में जब राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस केंद्र में चुनाव हार गई थी, तो वीरेन्द्र पाटिल के नेतृत्व में कांग्रेस को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत मिली थी। 224 सीटों में से कांग्रेस को 178 सीट मिली थी। वे मुख्यमंत्री और शराब माफिया के दखल को राज्य की राजनीति में कंट्रोल करने में कामयाब रहे थे लेकिन न्यस्त स्वार्थों ने एक दंगा करवा कर और राजीव गांधी के कान भर कर उनको मुख्यमंत्री पद से हटवा दिया। उसके बाद वे बहुत दुखी थे। इस बीच भाजपा ने लिंगायतों में काम शुरू कर दिया और लिंगायत पूरी तरह से भाजपा के साथ हो गए और जब 1994 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं बन सकी।

लिंगायतों के आन्दोलन को समर्थन देकर सिद्दारमैया ने कांग्रेस के उसी वोट बैंक को फिर से कांग्रेस के पक्ष में करने की कोशिश की है और जानकार बताते हैं कि पिछले साल जून से पूरे राज्य में जबरदस्त तरीके से चल रहे आन्दोलन के बारे में भाजपा और आरएसएस गाफिल रह गए हैं और ऐन चुनाव के वक्त लिंगायतों की बहुत पुरानी मांग के साथ खड़े होकर और उसको राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन देकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने राजनीति को जारदार तरीके से प्रभावित किया है।

एक अल्पसंख्यक और अलग धर्म के रूप में मान्यता के लिए लिंगायत समुदाय के लोग बहुत वर्षों से प्रयास कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों में यह आन्दोलन का रूप ले चुका है और एक भावनात्मक मुद्दा बन चुका है। पिछले साल कर्नाटक के बीदर, गुलबर्गा और कलबुर्गी में अलग धर्म की मांग करते हुए बड़ी रैलियां की गई थीं। महाराष्ट्र के लातूर में भी लिंगायतों को बड़ी सभा हुई थी। उनकी मांग थी कि बारहवीं शताब्दी के समाज सुधारक और दार्शनिक बासवन्ना के अनुयायियों को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता दी जाए। उनका तर्क है कि बासवन्ना के बाद के महान संत, गुरुनानक देव के अनुयायी एक अलग धर्म के रूप में मान्यता पा चुके हैं, उसके पहले गौतम बुद्ध और महावीर जैन के अनुयायी भी अलग धर्म में आते हैं इसलिए लिंगायतों को भी वैसी ही मान्यता दी जानी चाहिए। वे अपने को वैदिक धर्म से बिल्कुल अलग बताते हैं और अपने को हिन्दू धर्म का अनुयायी मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं।

समानार्थक शब्द नहीं हैं वीरशैव और लिंगायत

लिंगायत सम्प्रदाय को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिलवाने के आन्दोलन के कई आयाम हैं। कई बार कोशिश की जाती है कि लिंगायतों को वीरशैव सम्प्रदाय से जोड़कर हिन्दू धर्म के शैव मत में शामिल कर लिया जाए लेकिन लिंगायत नेताओं का कहना है कि वीरशैव वास्तव में हिन्दू धर्म का ही हिस्सा हैं। वे पंचपीठ के अनुयायी हैं, पांच आचार्यों की बात मानते हैं, स्वर्ग-नरक की अवधारणा में विश्वास करते हैं लेकिन लिंगायत ऐसा नहीं मानते हैं। वे वर्णाश्रम व्यवस्था के विरोधी हैं, मंदिर नहीं जानते, किसी देवी-देवता की पूजा नहीं करते, अपने शरीर को ही मन्दिर मानते हैं और जाति की ब्राह्मण व्यवस्था का विरोध करते हैं। हिन्दू धर्म के नेताओं की कोशिश हमेशा से रही है कि लिंगायतों को शैव मत की एक शाखा के रूप में ही मान्यता दी जाए। इसीलिये वीरशैव और लिंगायत को एक-दूसरे का समानार्थक शब्द भी बताया जाता है।

इस मान्यता को लिंगायत नेता गलत बताते हैं। उनका कहना है कि लिंगायत बासवन्ना के वचन को मानने वालों का धर्म है जबकि वीरशैव सम्प्रदाय का मूल पंचार्यों के विचार में है। जिनके आदिपुरुष रेणुकाचार्य हैं। इनका मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिखामणि है जो मूलरूप से संस्कृत में है, वह वेदों और उपनिषदों के हवाले से अपनी बात कहता है। इसके बरक्स बासवान्ना के अनुयायी पंचार्यों की मान्यताओं को निंदा करते हैं और आरोप लगाते हैं कि यह सब लिंगायतों की मांग को विवाद में लाने के लिए किया जा रहा है। लिंगायतों का दावा है कि वीरशैव पूरी तरह से बासवन्ना की बात नहीं मानते हैं। वे वैदिक ग्रंथों में विश्वास करते हैं, शिव की मूर्तियों की पूजा करते हैं और धार्मिक मठों में विश्वास करते हैं जबकि लिंगायत अपने गुरु के अलावा किसी भी सत्ता को स्वीकार नहीं करते।

आन्दोलन नया विवाद बहुत ही पुराना है

लिंगायतों का आन्दोलन नया है लेकिन विवाद बहुत ही पुराना है। ब्रिटिशकाल में हुई 1871 और 1881 की जनगणना में लिंगायतों को शूद्र के रूप में रिकार्ड किया गया है। उस समय के लिंगायतों ने इसका बुरा माना था और अपने को ब्राह्मण का दर्ज़ा देने की मांग की थी। 1926 में बाम्बे हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि वीरशैव शूद्र नहीं हैं। उन दिनों वीरशैव और लिंगायत को एक ही मानने की बात लगभग स्वीकार कर ली गई थी। लेकिन लगभग इसी समय लिंगायतों के नेता इस बात पार जोर देने लगे कि वे एक अलग धर्म के अनुयायी हैं जो हिन्दू धर्म से बिल्कुल अलग है। 1904 में एक प्रस्ताव पास किया गया था कि लिंगायत और वीरशैव हिन्दू हैं लेकिन 1940 आते-आते बात इसके एकदम उलट हो गई। 1940 में वीरशैव महासभा ने कहना शुरू कर दिया कि लिंगायत धर्म अलग है और वह हिन्दू धर्म से अलग है। सन् 2000 आते-आते लिंगायतों को अलग धर्म के रूप में सरकारी मान्यता देने की बात ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था और अब वह एक आन्दोलन का रूप ले चुका है। कहते हैं कि बी एस येदियुरप्पा को उनके राजनीतिक शिखर तक पहुंचाने में लिंगायतों के इस आन्दोलन की बड़ी भूमिका है।

इतिहास के गलियारों से गुजरते हुए 2017 आते-आते यह मांग एक आन्दोलन के रूप में स्थापित हो गई। बी एस येदियुरप्पा लिंगायतों के सबसे बड़े नेता थे और वह भी इस मांग का समर्थन कर रहे थे। भाजपा से अलग होने के बाद उनका भी आरएसएस की लाइन से कोई लेना-देना नहीं था हालांकि आरएसएस की हमेशा से कोशिश रही है कि लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग न होने दिया जाए। इस बीच लिंगायत सम्प्रदाय को अलग धर्म बनवाने की कवायद में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया जी-जान से जुट गए। उन्होंने सभी शिक्षा संस्थाओं को आदेश दिया कि वे अपने यहां बासवन्ना की फोटो अवश्य लगाएं। उन्होंने लिंगायत धर्म की संत अक्का महादेवी ने नाम पर महिला विश्वविद्यालय का नाम रख दिया है। अक्का महादेवी को लिंगायतों में वही मुकाम हासिल है जो वैष्णवों में मीराबाई को है।

कांग्रेस की चाल के सामने अपने को असहाय मान रही भाजपा

दिसंबर 2017 में कर्नाटक सरकार ने नागमोहन दास की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी जिसने अभी कुछ दिन पहले सिफारिश कर दी कि लिंगायत समुदाय को अलग धर्म के रूप में मान्यता दे दी जाए। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने तुरंत ही केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख दी कि लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक मान लिया जाए। कांग्रेस की इस चाल के सामने भाजपा अपने को असहाय मान रही है क्योंकि कर्नाटक के चुनाव जीतने की भाजपा की सारी रणनीति लिंगायतों को अपना वोट मानकर चलने की थी। इसी प्रयास में अध्यक्ष अमित शाह ने येदियुरप्पा को दुबारा पार्टी में शामिल किया था और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। आज येदियुरप्पा भारी दुविधा में हैं। लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की सरकारी मान्यता वाली बाजा सिद्दारमैया ने अपने नाम कर ली है। इसके अलावा भी वे पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों में पिछले पांच साल से चुनाव को ध्यान में रख कर काम कर रहे हैं।

अब भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। पार्टी के नेता अब टीपू सुलतान पर ध्यान दे रहे हैं जिसने अपने शासनकाल में लिंगायतों पर बहुत अत्याचार किया था। अब वे सिद्दारमैया पर आरोप लगा रहे हैं कि वे और राहुल गांधी हिन्दू धर्म को बांट रहे हैं जबकि भाजपा वाले वृहत हिन्दू समाज को एक करने की कोशिश कर रहे हैं। अभी चुनाव अभियान तो एक शक्ल ले रूप ले रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले पांच हफ्ते में कर्नाटक का चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा।

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