गायब होती झोला संस्कृति, आर्थिक उदारीकरण और कचरे से निपटने की चुनौती

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हाइलाइट्स

एक अनुमान के मुताबित 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होगी। अभी हाल में अफ्रीकी देश केन्या ने भी प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के बाद वह दुनिया के 40 देशों के उन समूह में शामिल हो गया है जहां प्लास्टिक पर पूर्णरूप से प्रतिबंध है। यहीं नहीं केन्या इसके लिए कठोर दंड का भी प्राविधान किया है।

 

प्रभुनाथ शुक्ल

महानगरों में जमा होता प्लास्टिक कचरा कितना भयावह और जानलेवा हो सकता है इसका उदाहरण हमनें पिछले दिनों दिल्ली के गाजीपुर इलाके में देखने को मिला। जब यह घटना हुई लोग कोंडली नहर में नहा रहे थे और काफी लोग सड़क से उधर से गुजर रहे थे। उसी दौरान कचरे का पहाड़ ढ़ह गया जिसकी वजह से दो लोगों की मौत हो गई। हादसा दिल्ली और गाजियावाद बार्डर के करीब हुआ।

हमारे लिए खतरे की घंटी है दिल्ली की घटना

दिल्ली वैसे भी प्रदूषण को लेकर दुनिया के प्रमुख शहरों में शुमार हैं। अभी पिछले साल वातावरण में इतना धुंध हो गया था कि इस मामले में अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा था। दिल्ली सरकार को प्रदूषण का लेवल कम करने के लिए आड-इवेन फार्मूला अपनाना पड़ा। दिल्ली की घटना हमारे लिए खतरे की घंटी है।

महानगरों से निकलता प्लास्टिक कचरा जहां पर्यावरण का गला घोंटने पर उतारु हैं, वहीं इंसानी सभ्यता और जीवन के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है। लेकिन हमारी संसद और राजनीति के लिए यह मसला कभी बहस का हिस्सा नहीं बना। बढ़ता प्रदूष जनांदोलन नहीं बन पाया। प्रदूषण के खिलाफ छिड़ी जंग को अभी तक जमींन नहीं मिल पायी।, वह मंचीय और भाषण बाजी तक सीमट गया।

दिल्ली और देश के दूसरे महानगरों में बढ़ते प्लास्टिक कचरे का निदान कैसे होगा, इस पर विचार करने के बजाय दिल्ली सरकार और नगर निगम एक दूसरे के खिलाफ कीक गेम खेलते दिखते हैं। समस्या के निदान के बजाय इस पर पालटिक्स हो रही है।

राज्यों की अदालतों और सरकारों की तरफ से प्लास्टिक संस्कृति पर विराम लगाने के लिए कई फैसले और दिशा निर्देश आए, लेकिन इसका कोई फायदा होता नहीं दिखा। भारत में प्लास्टिक का प्रवेश लगभग 60 के दशक में हुआ। आज स्थिति यह हो गई है कि 70 साल में यह पहाड़ के शक्ल में बदल गया है। दो साल पूर्व भारत में अकेले आटोमोइल क्षेत्र में इसका उपयोग पांच हजार टन वार्षिक था संभावना यह जताई गयी भी कि इसी तरफ उपयोग बढ़ता रहा तो जल्द ही यह 22 हजार टन तक पहुंच जाएगा। भारत में जिन इकाईयों के पास यह दोबारा रिसाइकिल के लिए जाता है वहां प्रतिदिन 1,000 टन प्लास्टिक कचरा जमा होता है। जिसका 75 फीसदी भाग कम मूल्य की चप्पलों के निर्माण में खपता है। 1991 में भारत में इसका उत्पादन नौ लाख टन था।

गायब होती झोला संस्कृति और आर्थिक उदारीकरण संकट की असल वजह

आर्थिक उदारीकरण की वजह से प्लास्टिक को अधिक बढ़ावा मिल रहा है। दूसरी तरह आधुनिक जीवन शैली और गायब होती झोला संस्कृति इसकी सबसे बड़ी कारक है।

2014 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार समुद्र में प्लास्टि कचरे के रुप में 5,000 अरब टुकड़े तैर रहे हैं। अधिक वक्त बीतने के बाद यह टुकड़े माइक्रो प्लास्टिक में तब्दील हो गए हैं।

जीव विज्ञानियों के अनुसार समुद्र तल पर तैरने वाला यह भाग कुल प्लास्टिक का सिर्फ एक फीसदी है। जबकि 99 फीसदी समुद्री जीवों के पेट में है या फिर समुद्र तल में छुपा है।

2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होगी

एक अनुमान के मुताबित 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होगी। अभी हाल में अफ्रीकी देश केन्या ने भी प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के बाद वह दुनिया के 40 देशों के उन समूह में शामिल हो गया है जहां प्लास्टिक पर पूर्णरूप से प्रतिबंध है। यहीं नहीं केन्या इसके लिए कठोर दंड का भी प्राविधान किया है। प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल या इसके उपयोग बढ़ावा देने पर चार साल की कैद और 40 हजार डालर का जुर्माना भी हो सकता है। जिन देशों में प्लास्टिक पूर्ण प्रतिबंध है उसमें फ्रांस, चीन, इटली और रवांडा जैसे मुल्क शामिल हैं। लेकिन भारत में इस पर लचीला रुख अपनाया जा रहा है। जबकि यूरोपीय आयोग का प्रस्ताव था कि यूरोप में हर साल प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए।

यूरोपिय समूह के देशों में हर साल आठ लाख टन प्लास्टिक बैग यानी थैले का उपयोग होता है। जबकि इनका उपयोग सिर्फ एक बार किया जाता है। 2010 में यहां के लोगों ने प्रति व्यक्ति औसत 191 प्लास्टिक थैले का उपयोग किया। इस बारे में यूरोपीय आयोग का विचार था कि इसमें केवल छह प्रतिशत को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाया जाता है। यहां हर साल चार अबर से अधिक प्लास्टिक बैग फेंक दिए जाते हैं।

प्रशांत महासागर में प्लास्टिक सूप की शक्ल ले रहा है कचरा

वैज्ञानिकों के विचार में प्लास्टिक का बढ़ता यह कचरा प्रशांत महासागर में प्लास्टिक सूप की शक्ल ले रहा है। प्लास्टिक के प्रयोग को हतोत्साहित करने के लिए आरयलैंड ने प्लास्टिक के हर बैग पर 15 यूरोसेंट का टैक्स  2002 में लगा दिया था। जिसका नतीजा रहा किं 95 फीसदी तक कमी आयी। जबकि साल भर के भीतर 90 फीसदी दुकानदार दूसरे तरह के बैग का इस्तेमाल करने लगे जो पर्यावरण के प्रति इको फ्रेंडली थे। साल 2007 में इस पर 22 फीसदी कर कर दिया गया। इस तरह सरकार ने टैक्स से मिले धन को पर्यावरण कोष में लगा दिया।

पर्यावरणीय लिहाज से इंसानी सभ्यता के लिए बड़ा खतरा है प्लास्टिक

अमेरिका जैसे विकसित देश में कागज के बैग बेहद लोकप्रिय हैं। वास्तव में प्लास्टिक हमारे लिए उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक की स्थितियों में खतरनाक है। इसका निर्माण पेटोलियम से प्राप्त रसायनों से होता है। पर्यावरणीय लिहाज से यह किसी भी स्थिति में इंसानी सभ्यता के लिए बड़ा खतरा है। यह जल, वायु, मुद्रा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है। इसका उत्पादन अधिकांश लघु उद्योग में होता है जहां गुणवत्ता नियमों का पालन नहीं होता है। प्लास्टिक कचरे का दोबारा उत्पादन आसानी से संभव नहीं होता है। क्योंकि इनके जलाने से जहां जहरीली गैस निकलती है। वहीं यह मिट्टी में पहुंच भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट करता है। दूसरी तरफ मवेशियों के पेट में जान से नुकसान जानलेवा साबित होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार प्लास्टि नष्ट होने में 500 से 1000 साल तक लग जाते हैं।  दुनिया में हर साल 80 से 120 अरब डालर का प्लास्टिक बर्बाद होता है। जिसकी वजह से प्लास्टि उद्योग पर रि-साइकिल कर पुनः प्लास्टिक तैयार करने का दबाब अधिक रहता है। जबकि 40 फीसदी प्लास्टिक का उपयोग सिर्फ एक बार के उपयोग के लिए किया जाता है। दिल्ली की घटना से हमें सबक लेना होगा। प्लास्टिक के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए कठोर फैसले लेने होंगे। तभी हम महानगरों में बनते प्लास्टिक यानी कचरों के पहाड़ को रोक सकते हैं। वक्त रहते हम नहीं चते तो हमारा पर्यावरण पूरी तरफ प्रदूषित हो जाएगा।

लेखकः स्वतंत्र पत्रकार हैं

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