डोकलाम गतिरोध : PM को धन्यवाद, उन्होंने चीन से सहयोग कर 'एशिया की सदी' को साकार करने की ओर कदम बढ़ाया

प्रधानमंत्री कहते थे, 21वीं सदी एशिया की सदी होगी। ये 'देशभक्त' इसे एशिया में महायुद्ध की सदी में बदल देना चाहते थे।...

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हाइलाइट्स

जो तमाम लोग युद्ध-युद्ध की रट लगा रहे थे उन्हें इस बात का जरा भी अनुमान नहीं है चीन के साथ लगी इतनी बड़ी सीमा के लगातार सुलगते रहने का क्या अर्थ होता है ? इनमें से अधिकांश आर्थिक विषयों पर पूरी तरह से शून्य लोग हैं ; ये नोटबंदी की तरह के तुगलकीपन के भी समर्थक रहे हैं ; ये पुराने नोटों को गिनते-गिनते हांफ रहे भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर के विदूषक की तरह के चेहरे को देख कर तालियां बजाते हुए नाचा करते हैं।

 

डोकलाम गतिरोध का अंत अन्य कई गतिरोधों की गांठों को खोलने में सहायक हो सकता है 

-अरुण माहेश्वरी

येन केन प्रकारेण डोकलाम पर भारत और चीन के बीच का गतिरोध खत्म हुआ। छः दिन बाद ही प्रधानमंत्री को चीन जाना है। पूर्वी चीन के च्यामेन शहर में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक होने वाली है। वहां मोदी जी की चीन के राष्ट्रपति से भी मुलाकात होगी। 

महीना भर पहले चीन और भारत ने संयुक्त रूप से डब्लूटीओ के स्तर पर चल रहे कृषि उत्पादों के मसले पर अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा, जापान, स्वीट्जरलैंड और नार्वे की तरह के देशों में दी जा रही क्षतिपूर्ति के मसले को एक प्रस्ताव के जरिये उठाया था। डब्लीटीओ के 164 देशों की यह बैठक आगामी दिसंबर महीने में होने वाली है और इस बैठक में अपने इस संयुक्त मत के पक्ष में इन दोनों देशों को दुनिया के तमाम देशों को लामबंद करने का अपना आधार तैयार करना है। डोकलाम की तरह के फिजूल के तनाव के चलते साझा आर्थिक हितों की ऐसी अन्तरराष्ट्रीय पहलकदमी भी प्रभावित हो सकती थी। 

2008 की दोहा वार्ता के समय ही अमेरिका और इन पश्चिमी देशों ने अपने यहां में कृषि को दी जाने वाली भारी क्षतिपूर्ति को जारी रखने और भारत अथवा चीन जैसे देशों में दी जा रही मामूली क्षतिपूर्तियों को भी खत्म कर देने की बेजा मांग उठा कर कृषि उत्पादों पर वैश्विक वाणिज्य के मसले पर वार्ता में गतिरोध पैदा कर दिया था। अब नौ साल बाद, जब फिर इस मसले के उठने और उस पर गंभीरता से विचार किये जाने की पूरी संभावना है, तब चीन और भारत के बीच चल रहे सीमा पर इस अनावश्यक तनाव की छाया दोनों देशों के हित को ही नुकसान पहुंचा सकती थी।

डोकलाम के गतिरोध की समाप्ति का दोनों देशों को यह एक तत्काल और सीधा लाभ साफ दिखाई देता है।

अभी इस गतिरोध के अंत के बारे में दोनों पक्षों के बयान में जो फर्क दिखाई देता है, उसकी एक बड़ी वजह भूटान की अब तक की चुप्पी भी है। यह सच है कि खास डोकलाम के पहाड़ी मैदान में यदि कोई सीमा-विवाद है तो वह भारत और चीन के बीच का नहीं है, चीन और भूटान के बीच का है। भारत का कहना था कि उसने भूटान के साथ अपने रक्षा संबंधी रिश्तों को देखते हुए अपने सैनिकों को वहां चल रही चीन की गतिविधियों को रोकने के लिये भेजा था।

और चीन लगातार इस बात पर आपत्ति कर रहा था कि (1) चीन जो भी कर रहा है, अपने देश की सीमा में कर रहा है जो किसी भी सार्वभौम राष्ट्र के अख्तियार में पड़ता है ; (2) अगर इसमें कोई मसला हो भी सकता है तो वह चीन और भूटान, दो सार्वभौम राष्ट्रों के बीच का मसला है, उसमें तीसरे किसी देश की कोई भूमिका नहीं हो सकती है।

इसके विपरीत भारतीय पक्ष संकेतों-संकेतों में यह कह रहा था कि (1) भूटान सरकार की चिंता और उसके आग्रह पर ही भारत के सैनिकों ने चीन के सैनिकों को सड़क बनाने से रोका है और ; (2) भारत के सिक्किम की सीमा के इतना नजदीक चीन के सड़क बनाने से भारत को अपनी खुद की सुरक्षा के लिये खतरा लगता है और इसीलिये हम चीन की इस गतिविधि से आंख मूंद कर नहीं रह सकते हैं।

जून महीने से शुरू हुआ यह वितंडा लगभग तीन महीने तक चलता रहा। दोनों पक्षों से एक-दूसरे को धमकाने वाले चरम बयान जारी किये जाते रहे। चीन के सरकारी बयानों का तुर्की पर तुर्की जवाब भारत के मीडिया और उसमें बैठे बयान-वीर पूर्व फौजी मूंछों के जरिये दिलाया जा रहा था। और स्थिति यहां तक बदतर हो गई कि दोनों ओर से इन सीमाओं के नजदीक बाकायदा सैनिक अभ्यास शुरू हो गये। भारत के जनरल रावत अढ़ाई मोर्चे पर युद्ध चलाने की अपनी ताकत के बारे में गैर-जरूरी बयान देने लगे ; 1962 को याद किया जाने लगा। हमारे यहां कुछ इतने उत्साही लोग थे जो कागज के नक्शों पर रोजाना लकीरें खींच-खींच कर चीन की निश्चित भारी पराजय और 1962 का प्रतिशोध लेने की तरह की बातों से अपने राष्ट्रवाद की फड़कती भुजाओं का अंग- प्रदर्शन करने लगे थे।

बहरहाल, आज कहा जा सकता है कि अंत भला तो सब भला। 

भारत के विपक्ष ने इस पूरे विषय पर अनोखी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया। सुषमा स्वराज ने विपक्ष के साथ जो बैठक बुलाई थी उसमें सबने एक स्वर में पूरे मामले का एक कूटनीतिक समाधान निकालने की कोशिशों पर बल दिया था और देखा गया कि उसी रास्ते से भारत सरकार ने इस विषय को एक बार के लिये सुलझा लिया है।

जो तमाम लोग युद्ध-युद्ध की रट लगा रहे थे उन्हें इस बात का जरा भी अनुमान नहीं है चीन के साथ लगी इतनी बड़ी सीमा के लगातार सुलगते रहने का क्या अर्थ होता है ? इनमें से अधिकांश आर्थिक विषयों पर पूरी तरह से शून्य लोग हैं ; ये नोटबंदी की तरह के तुगलकीपन के भी समर्थक रहे हैं ; ये पुराने नोटों को गिनते-गिनते हांफ रहे भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर के विदूषक की तरह के चेहरे को देख कर तालियां बजाते हुए नाचा करते हैं। इन सबके लिये राजनीति महज एक तमाशा है जिसके बारे में हर शाम गोस्वामियों के चैनल में चीखते हुए जानवरों की अलग-अलग आवाजों का लुत्फ उठा कर ये अपनी शामों को आबाद रखते हैं। ये लोग ही इस बार चीन के साथ युद्ध का कुछ अतिरिक्त मनोरंजन ढूंढ रहे थे।

भारत सरकार को धन्यवाद कि कम से कम इस बार उसने ऐसे 'देशभक्त' तमाशबीनों की खुशी के लिये इस प्रकार के युद्ध की तरह के खतरनाक आयोजन से परहेज किया। प्रधानमंत्री कहते थे, 21वीं सदी एशिया की सदी होगी। ये 'देशभक्त' इसे एशिया में महायुद्ध की सदी में बदल देना चाहते थे। प्रधानमंत्री ने इनकी ख्वाहिश को पूरा न कर चीन से सहयोग के बल पर सही दिशा से 'एशिया की सदी' को साकार करने की ओर कदम बढ़ाया है। हम इसका स्वागत करेंगे।

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