क्या दुनिया के 1.5 अरब मुसलमानों से जंग छेड़ कर सारी दुनिया के ऊपर एक नया युद्ध थोप रहे हैं ट्रंप?

फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच झड़पें शुरू पूरी दुनिया में अमरीकी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ाई गई चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, ईरान, सीरिया समेत कई देशों ने की ट्रंप की आलोचना...

फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच झड़पें शुरू

पूरी दुनिया में अमरीकी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ाई गई

चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, ईरान, सीरिया समेत कई देशों ने की ट्रंप की आलोचना

फ़िलिस्तीनी संगठनों ने अमरीकी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के सामने प्रदर्शन करने की अपील की

चौतरफा आलोचनाओं के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने औपचारिक रूप से क़ुद्स (जेरूस्लम) को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी है। जहां ट्रंप के इस निर्णय की सारी दुनिया में आलोचना हुई है वहीं ट्रम्प के इस एलान के कुछ घंटे के भीतर ही पूरे अतिग्रहित क्षेत्रों में फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच झड़पें शुरु हो गईं और पूरी दुनिया में अमरीकी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ा दी गई। संयुक्त राष्ट्र महासचिव समेत कई देशों ने ट्रंप के इस फैसले की आलोचना की है।

जेरूस्लम को इजरायल की राजधानी बनाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्या दुनिया के 1.5 अरब मुसलमानों से जंग छेड़ कर सारी दुनिया के ऊपर एक नया युद्ध थोप रहे हैं?

जी हाँ, ट्रंप ने बुधवार की रात जो निर्णय लिया है, उससे गाजा पट्टी में तो खून की नदियां बहेंगी ही, बल्कि सारी दुनिया के ऊपर एक नए युद्ध का खतरा हावी हो गया है। ट्रंप का कदम सारी दुनिया को खून से सराबोर कर देगा।

पूरी दुनिया से इस बात की चेतावनी के बावजूद कि क़ुद्स को इस्राईल की राजधानी घोषित करने से पश्चिम एशिया में हिंसा की नई लहर उठेगी, डोनल्ड ट्रंप ने क़ुद्स (जेरूस्लम) को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी।

ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित 1995 के कानून की मदद से अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से जेरूसलम में स्थानांतरित करने की घोषणा की। ट्रंप ने इसे शांति के लिए उठाया गया कदम बताया, जो वर्षों से रुका हुआ था।

हालाँकि ट्रंप के दामाद जेयर्ड कुश्नर जहां इस विवादास्पद मुद्दे के समाधान के लिए नाकाम प्रयासों में लगे हुए थे, वहीं अब अमेरिकी राष्ट्रपति की इस घोषणा से पहले से ही संवेदनशील मध्य पूर्व में कूटनीतिक संकट और गहरा गया है।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने ट्रंप की घोषणा के तुरंत बाद कूटनीतिक तौर पर इस फैसले की आलोचना की। गुटेरस ने कहा,

"वे ऐसे किसी भी एकतरफा फैसले के खिलाफ हैं, जिससे इजरायल और फिलिस्तीन के बीच शांति की संभावना पर नकारात्मक असर पड़े।"

चीन, ब्रिटेन व फ्रांस समेत कई देशों ने ट्रंप के फैसले की आलोचना की है।

उधर ट्रंप के फैसले के तुरंत बाद, पूरे अतिग्रहित क्षेत्रों में फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच झड़पें शुरु हो गईं।

बुधवार को अमरीका के ख़िलाफ़ ग़ज़्ज़ा पट्टी में विभिन्न फ़िलिस्तीनी गुटों की ओर से व्यापक प्रदर्शन हुए जिसमें इन गुटों ने अमरीकी राष्ट्रपति के क़ुद्स को इस्राईल की राजधानी के रूप में मान्यता देने और अमरीकी दूतावास को तेल अवीव से क़ुद्स स्थानांतरित करने के फ़ैसले को अतिग्रहण की संज्ञा देते हुए बल दिया गया कि ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ एक और इन्तेफ़ाज़ा आंदोलन शुरू करेंगे। यह झड़पें, ट्रम्प के एलान के कुछ घंटे के भीतर बुधवार रात पूरे अतिग्रहित क्षेत्रों में फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच शुरु हुयीं।

फ़िलिस्तीनी गुटों ने इसी तरह दुनिया भर के देशों और विभिन्न गुटों से मांग की कि वे अमरीकी राष्ट्रपति के फ़ैसले को लागू न होने दें।

हमास आंदोलन के वरिष्ठ सदस्य सलाह अलबर्दवील ने कहा कि ट्रम्प को यह भ्रम हो गया है कि इस्लामी पवित्र स्थलों को नष्ट करने की उनकी साज़िश को फलस्तीनियों का प्रतिरोध नाकाम नहीं बना सकता, लेकिन फलस्तीनी इस साज़िश को भी पिछली साज़िशों की तरह नाकाम बनाकर रहेंगे।

फ़िलिस्तीनी संगठनों ने गुरुवार और शुक्रवार को क्रोध दिवस घोषित किया है और अमरीकी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के सामने प्रदर्शन करने की अपील की है।

इस्तांबोल में भी ट्रम्प के एलान के ख़िलाफ़ तुर्क जनता ने अमरीकी वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया।

तुर्क विदेश मंत्री ने ट्रम्प के एलान की ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान के रूप में आलोचना की।

तुर्क विदेश मंत्री मौलूद चाउश ओग़लू ने कहा कि ट्रम्प के मान्यता देने से क़ुद्स इस्राईल की राजधानी नहीं बन जाएगा।

दुनिया के अनेक नेताओं जैसे सीरियाई राष्ट्रपति बश्शार अल असद, ब्रिटिश प्रधान मंत्री थेरेसा मे और फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने भी ट्रम्प के एलान की आलोचना की। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एनटोनियो गुटेरेस ने भी ट्रम्प के एलान की आलोचना करते हुए सचेत किया कि फ़िलिस्तीनियों के शहर क़ुद्स की स्थिति के बारे में विवाद को फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलियों के बीच सीधी बातचीत से हल होना चाहिए।

ईरान ने भी अमरीकी राष्ट्रपति के क़ुद्स को अतिग्रहणकारी इस्राईल की राजधानी घोषित करने के फ़ैसले की निंदा करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तावों का खुला उल्लंघन कहा है।

ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान इस बात पर हमेशा से बल देता आया है कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता व असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण ज़ायोनी शासन का अतिग्रहण और उसे अमरीकी सरकार की ओर से हासिल समर्थन तथा फ़िलिस्तीनियों को क़ुद्स की राजधानी वाली एक स्वाधीन फ़िलिस्तीनी सरकार के गठन के मूल अधिकार से वंचित रखना है।

इस्लामी सहयोग संगठन ने इस संबंध में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प को चेतावनी दी है।

ओआईसी ने एक बयान जारी करके कहा है कि यह संगठन, अतिग्रहित फ़िलिस्तीन में अमरीका के दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने के फ़ैसले को इसलामी देशों के संबंध में खुला अतिक्रमण समझता है। इस्लामी सहयोग संगठन ने बल देकर कहा है कि उसके सदस्य सभी देशों को, हर उस देश से अपने संबंध तोड़ लेने चाहिए जो अपना दूतावास बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करे।

ट्रंप के फैसला आने से पहले ही पूरे विश्व में अमरीकी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी।

अब अमरीकी विदेश मंत्रालय ने पूरे विश्व में अमरीकी दूतावासों की सुरक्षा को बढ़ाने के आदेश जारी कर दिये हैं क्योंकि अमरीका को आशंका है कि इस फैसले के बाद अमरीकी दूतावासों के लिए ख़तरा बढ़ गया है।

बता दें कि क़ुद्स यानी जेरूसलम का इस्राईल ने 1967 में अतिग्रहण किया था। तब से अब तक इस्राईल ने इस शहर पर पूरी तरह क़ब्ज़ा करने के लिए बहुत से क़दम उठाए हैं। अपना आधिपत्य जमाने केलिए इस्राईल ने जेरूसलम के मूल निवासियों को क़ुद्स से निकालने, उनकी संपत्ति को ज़ब्त करने, क़ुद्स की जनांकिक संरचना को बदलने के लिए वहां यहूदियों को बसाने, पवित्र इस्लामी स्थलों को तबाह करने और अतिवादी यहूदियों के हाथों मस्जिदुल अक़्सा का अनादर करने जैसे क़दम उठाए हैं।

अरब संघ के ने भी चेतावनी दी है कि अमरीकी दूतावास के तेलअवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने के बहुत भयानक परिणाम सामने आएंगे। इसके अतिरिक्त विश्व स्तर पर इस निर्णय की भर्त्सना की जा रही है। 

येरूशलम अरबों और इजरायलियों के बीच विवाद का एक प्रमुख मुद्दा रहा है। शहर के पूर्व में यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म के पवित्र धर्म स्थल हैं। यरुशलम की आबादी 8.82 लाख है। शहर में 64 फीसद यहूदी, 35 फीसद अरबी और एक फीसद अन्य धर्मों के लोग रहते हैं। शहर का क्षेत्रफल 125.156 वर्ग किमी है। इस ऐतिहासिक शहर में मुस्लिम, यहूदी और ईसाई समुदाय की धार्मिक मान्यताओं से जुड़े प्राचीन स्थल हैं।

बता दें कि आधिकारिक तौर पर इजरायल की स्थापना 1948 में हुई थी। इससे पहले इजरायल का कोई अस्तित्व नहीं था। यहां मूल रूप से फलस्तीनी निवास करते थे।

1947 में यूनाइटेड नेशन की जनरल एसेंबली ने अंतरराष्ट्रीय देख-रेख में फलस्तीन को एक स्वायत्त येरुशलम के साथ यहूदी स्टेट और अरब स्टेट में बांटने के लिए वोट दिया था, जिसके बाद इजरायल की स्थापना हुई। बीते 60 सालों में मध्य पूर्व के इस देश में कई बदलाव हुए।

साल 1967 में मध्य पूर्व युद्ध के दौरान इजरायल ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया था और पूरे शहर को अपनी अविभाज्य राजधानी घोषित कर दिया था।

हालांकि येरूशलम पर इजरायली अधिकार को कभी भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल पाई और सभी देश यहां तक कि इजरायल के सबसे करीबी देश अमरीका ने भी अपना दूतावास तेल अवीव में ही बनाए रखा।

इसके बाद इजरायल ने यहां पर कई नई बस्तियां बसाई हैं, जिनमें करीब दो लाख यहूदी रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक, इन्हें अवैध निर्माण माना जाता है। हालांकि, इजरायल इससे इनकार करता है।

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