इमरान खान बेहतर पाकिस्तान नहीं बना सकता - प्रो. परवेज़ हूदभाई

इतिहास जिन्नाह को एक मुस्लिम राष्ट्र का जनक बना देता है, वही जिन्नाह है जो जूते पहन कर मस्जिद चला जाता है, उर्दू जिसे नहीं आती और न कुरआन की कोई आयत...

हाफिज सईद की सुर्खियाँ बनाने वाला मीडिया राष्ट्रवादी है या परवेज़ हूदभाई जैसे लोगों की बातों को छिपाने वाला मीडिया जनद्रोही ? सवाल मेरे हैं जवाब आप दें

शमशाद इलाही शम्स

टोरंटो। कमेटी आफ प्रोग्रेसिव पाकिस्तानी कनेडियन के झंडे तले एक जलसा आज मिसिसागा (कनाडा) में आयोजित किया गया था. 'पाकिस्तान में बढ़ती बुनियादपरस्ती' विषय पर. दुनियाभर में जाने माने प्रोफ़ेसर परवेज़ हूदभाई ने अपने विचार रखे.

इस विषय पर विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि मध्य काल से लेकर 200-250 साल पहले तक भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक पहचान आधारित न कोई विचार था न कोई आन्दोलन. 1857 के ग़दर के बाद अंग्रेजों ने इस विचार को पहली बार सिलसिलेवार तरीके से फैलाया जिसे गोलवलकर ने पहली बार स्वीकार्यता दी. पाकिस्तान बनाने वाले जिन्ना के बहुप्रचारित दो देशों के सिद्धांत से पहले उसकी कल्पना अल्लामा इकबाल ने की थी जो 1971 में ध्वस्त हो गयी. पाकिस्तान बनने के वक्त तक उसके नेताओ को खुद पता नहीं था कि आखिर करना क्या है ? जिन्नाह के खुद कई विरोधाभासी ब्यान इस मौजूं पर पढ़े जा सकते हैं, कभी वे कहते पाए गए कि पाकिस्तान शरिया से निर्धारित होगा तो कभी उनकी वह ऐतिहासिक स्पीच जिसमे वह धर्म को राजनीति से दूर रखने की बात करते हैं. जिन्नाह के व्यक्तित्व में भी कई विरोधाभास पाए जाते हैं जो शराब भी पीते हैं, सूअर का मांस भी पसंद करते हैं लेकिन इतिहास उन्हें एक मुस्लिम राष्ट्र का जनक बना देता है, वही जिन्नाह है जो जूते पहन कर मस्जिद चला जाता है, उर्दू जिसे नहीं आती और न कुरआन की कोई आयत.

क्या इमरान खान एक नया पाकिस्तान बना सकते हैं? सभागार में उपस्थित एक महिला ने प्रश्न किया. ‘यदि इमरान खान ने कुछ बनाया तो वह एक बेहतर पाकिस्तान नहीं हो सकता'.

फिर एक सवाल आया, सर धर्म का अपना बड़ा स्वरूप है, निज़ाम है उसके पास नफरी ताकत है. क्या उसके बिना बेहतर समाज की कल्पना हो सकती है?

गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री, तर्कवादी ने जवाब दिया, मैं आपके प्रश्न से असहमत हूँ क्योकि स्वीडन, नार्वे जैसे देशों में धर्म का सार्वजानिक जीवन में कोई महत्त्व नहीं और वे बेहतर जीवन व्यतीत कर रहे है.

प्रश्नों के सिलसिले को और आगे बढ़ाते हुए एक शख्स ने पूछा  कि सर आप भविष्य के प्रति बहुत आश्वस्त हैं जबकि वर्तमान में घुप अँधेरा है. दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली दिमागों वाली लिस्ट (2011) में जगह पाने वाले प्रोफ़ेसर साहब ने जवाब दिया,

'भविष्य के प्रति आशावान ही रहा जा सकता है क्योकि उसके बीज हमारे वर्तमान में हैं. हमारे समाज में बहुत से युवा प्रतिभावान हैं जिन्हें मौका मिले तो चीजे बदलेंगी. चीजें बदलें तो उनका उत्सव मनाना चाहिए, नहीं बदले तो हमें और जोर से कोशिश करनी होगी. जीवन का यही बस एक तरीका हो सकता है'.

एक लेखिका ने प्रश्न किया

'क्या भारत में हिंदुत्व की लहर मुसलमानों में बढ़ती विश्व व्यापी कट्टरता का परिणाम है’?

‘नहीं मैं ऐसा नहीं मानता, यह अंशतः सही है, कांग्रेस अगर भ्रष्ट नहीं होती जिसकी वजह से वह अलोकप्रिय हुई. वह सही काम करती,  साफ़ रहती और जनहित योजनाओ को लागू करती तो यह हालात न बनते.'

परवेज़ हूदभाई ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का जिक्र करते हुए कहते हैं कि वह भी अपने निजी जीवन में लिबरल भले ही रहे हों, लेकिन सियासी फायदे के लिए धर्म को इस्तेमाल करने में उनका कोई सानी नहीं. इसी कथित प्रगतिशील भुट्टो ने रविवार के बजाय शुक्रवार की साप्ताहिक छुट्टी की थी. अहमदिया मुसलमानों को गैर मुस्लिम करार देना भुट्टो के शासन का कमाल था.

उन्होंने कहा कि हमारे राजनेताओं को ये बात कायदे से मालूम थी कि जितना जनता को धर्म के आधार पर बांटोगे उतना ही उनका सियासी कद बड़ा होगा. हालांकि मज़हब से उन्हें कोई लेना देना नहीं था.

हाल में भारतीय मीडिया द्वारा उद्घाटित उस खबर का हवाला देते हुए परवेज़ कहते हैं कि हम 70वें आज़ादी दिवस मनाने की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन नहीं जानते कि 100 भी पूरे कर पायेंगे कि नहीं. क्योकि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान जिन भारतीय वायुसेना के दो जगुआर विमानों ने लाक किये टारगेट पर बम न गिराने का फैसला किया था यदि वह गिरा दिया जाता तो उसके परिणामस्वरूप दोनों देशो के मध्य परमाणु युद्ध हो चुका होता. क्योंकि उस टारगेट पर पाकिस्तान के सेनापति (परवेज़ मुशर्रफ ) और प्रधानमंत्री (नवाज़ शरीफ़) उस वक्त दोनों मौजूद थे. दोनों के मारे जाने की स्थिति में कयादत के पास उसका जवाब परमाणु हमला ही होता. वह हमला नहीं हुआ इसका मतलब यह नहीं कि खतरा टल गया है.

वह इस खबर पर पाकिस्तानी मीडिया द्वारा बरती गयी चुप्पी पर अफ़सोस करते हैं साथ ही आगाह करते हैं कि भारत की मौजूदा हकूमत की कारगुजारियां किसी भी वक्त इस खित्ते में अमन ख़त्म  कर सकती हैं क्योकि पाकिस्तान विरोध इस हकुमत को सियासी फायदा देता है.

परवेज़ हूदभाई कहते हैं कि सरहद के इस पार लाहौर या उस पार अमृतसर में पैदा होने वाले नागरिको को इस बात पर गौर करनी चाहिए कि जहाँ वह पैदा हुए हैं इसमें उनका कोई दोष नहीं है, और न यह उनके नियंत्रण की बात है. सरहद के दोनों तरफ के लोगो को यह सोचना होगा कि वह हिंदुस्तान पाकिस्तान के बाशिंदे नहीं बल्कि इस दुनिया, इस पृथ्वी के निवासी हैं, समृद्धि सिर्फ शांति के जरिये ही आ सकती है, युद्ध और नफ़रत बर्बादी का रास्ता है जिसकी सभ्य समाज में कोई जरुरत नहीं.

परवेज़ हूदभाई के मुताबिक आवाम को अपनी मज़हबी पहचान के बजाए खुद को एक इंसान के बतौर सोचने की जरुरत पर जोर दिया. बतौर इंसान ही एक इंसान दूसरे इंसान के दुःख दर्द समझ सकता है. मानवता की रक्षा ही इंसानी सभ्यता को महफूज़ रख सकती है .

इस बुनियादी नोट पर जब परवेज़ हूदभाई अपनी बात ख़त्म करते हैं तब एक दो से शुरू हुई तालियों की गड़गड़ाहट जब उपस्थित सभी लोगों की जुबान बन जाती है तब वाकई यह भरोसा होता है कि अमन मुमकिन है.

इन पंक्तियों का लेखक इत्तेफाक से मेरठ में पैदा हुआ जो आध दर्जन भारतीयों के साथ इस आयोजन में शिरकत करने के बाद इस कशमकश में घर वापस आता है कि हाफिज सईद की सुर्खियाँ बनाने वाला मीडिया राष्ट्रवादी है या परवेज़ हूदभाई जैसे लोगों की बातों को छिपाने वाला मीडिया जनद्रोही ? सवाल मेरे हैं जवाब आप दें.

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