बूथ के सरकारी कर्मचारी भी गड़बड़ी करके जितवा सकते हैं चुनाव : शोध में हुआ खुलासा

मतदान करवाने वाले अधिकारी कई बार चुनाव नतीजों को इस हद तक प्रभावित करते हैं कि नतीजे पलट भी सकते हैं।...

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली, 02 अक्टूबर। भारत में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले कारणों में एक नया आयाम जुड़ गया है. एक शोधपत्र में यह नतीजा निकला है कि बूथों पर चुनाव संपन्न करने वाले पोलिंग अधिकारी और पीठासीन अधिकारी भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं।

ज़मीनी आंकड़ों को इकठ्ठा करके गंभीर मंथन के बाद यह बात सामने आई है कि मतदान करवाने वाले अधिकारी कई बार चुनाव नतीजों को इस हद तक प्रभावित करते हैं कि नतीजे पलट भी सकते हैं। कुछ मामलों में तो बूथ अधिकारी की पक्षधरता मत प्रतिशत में सात प्रतिशत तक का बदलाव का कारण बनी है।

ब्राउन विश्वविद्यालय के डॉ युसफ नेगर्स ने अपनी नई खोज में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हरेक बूथ पर काम करने वाले सरकारी अधिकारी भी चुनाव को प्रभावित करते सकते हैं. “ Enfranchising your own ? Experimental Evidence on Bureaucrat Diversity and Election Bias in India “ नाम का उनका शोधपत्र उपलब्ध है।

युसूफ नेगर्स आजकल ब्राउन विश्वविद्यालय में हैं। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पाब्लिक पालिसी में पी एच डी किया है।

लन्दन स्कूल आफ इकनामिक्स के छात्र रहे डॉ नेगर्स को राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अधिकारी विद्वान् माना जाता है। उनके यह नतीजे आने वाले समय में भारत में चुनाव करवाने वाली संस्थाओं का ध्यान निश्चित रूप से आकर्षित करने वाले हैं।

शोध का नतीजा है कि अपनी बिरादरी या धर्म के लोगों के पक्ष में बूथ स्तर के अधिकारी मतदान के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं, इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होती है। इस बात को इस पर्चे में सिद्ध कर दिया गया है। अगर पोलिंग पार्टी में एक जाति विशेष के ही अधिकारी हैं तो उस जाति के उम्मीदवार या पार्टी को ज्यादा वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है। अगर चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल में संपन्न हो रहा है तो जो पार्टी अधिसंख्य आबादी वालों की प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित हुयी रहती है, उसका फायदा होता है। ऐसे माहौल में आम तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहचान आदि में काफी सख्ती बरती जाती है। कई बार उनको लौटा भी दिया जाता है लेकिन अगर पोलिंग पार्टी में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अल्पसंख्यक समुदाय का होता है तो यह धांधली नहीं हो पाती।

कुल मिलाकर इस तरह के आचरण से चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं।

भारत में चुनाव प्रक्रिया, उसके नतीजों आदि के राजनीति शास्त्र पर दुनिया भर में बहुत शोध हुए हैं लेकिन इस विषय पर यह पहला काम है।

पर्चे में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि भारत में चुनाव अधिकारियों की निष्पक्षता पर अब ऐलानियाँ सवाल उठाये जा रहे हैं। पूरी दुनिया के देशों के चुनावी आचरण पर सर्वे करने वाली संस्था, वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सर्वे किये गए कुल देशों के तीन चौथाई देशों में करीब 25 प्रतिशत लोग मानते हैं कि चुनाव अधिकारी आम तौर पर बेईमानी करते हैं। और यह भी कि आधी दुनिया में बूथ पर होने वाली हिंसा राजनीतिक चिंता का विषय है। विकासशील देशों में यह वारदातें ज्यादा होती हैं। लेकिन यह बीमारी अमरीका जैसे विकसित देशों में भी है।

2014 के एक सर्वे के अनुसार अमरीका में भी भरोसेमंद, प्रशिक्षित और निष्पक्ष चुनाव कर्मचारियों की भारी कमी है।

शोधपत्र में भारतीय चुनाव प्रक्रिया को तकनीकी रूप से उच्च श्रेणी की बताया गया है।लेकिन फिर भी अधिकारियों के पूर्वाग्रह जनता के मत को प्रभावित कर सकते हैं और करते हैं। इस गड़बड़ी को दूर करने का तरीका यह हो सकता है कि हर बूथ पर जाने वाली पोलिंग पार्टी में एक ही जाति या धर्म के लोगों को न रख कर बूथों पर ऐसे कर्मचारी तैनात किये जाएँ जिनकी जाति और धर्म में वैभिन्य हो।

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