आम जनता के लिए भस्मासुर है डोनाल्ड ट्रंप की दक्षिणपंथ की राजनीति

हर नया अमेरिकी शासक स्वतंत्रता, उदारता, लोकतंत्र, विश्वशांति की दुहाई देता है, लेकिन हालात अमेरिका और उसके साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए बद से बदतर हो रहे हैं।...

हाइलाइट्स

Terrorist Attack in Texas Church

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उकसावे की राजनीति

राजीव रंजन श्रीवास्तव

पिछले एक सप्ताह में तीसरी बार #अमेरिका आतंकी हमले का शिकार हुआ है।

#टेक्सास प्रांत के सदरलैंड स्प्रिंग्स के विलसन काउंटी इलाके के एक चर्च में प्रार्थना कर रहे लोगों पर एक शख्स ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरु कर दीं, जिसमें 26 लोगों की मौत हो गई जबकि कई घायल हुए हैं।

यह और बात है कि हिंसा और आतंक को धर्म की नजर से देखने वाला America हर हमले को आतंकी हमला नहीं मानता है।

नवंबर की शुरुआत में न्यूयार्क में एक ट्रक ड्राइवर ने पैदल चल रहे लोगों पर ट्रक चढ़ा दी थी, जिसमें आठ लोग मारे गए थे। इसे आतंकी हमला कहा गया था और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बाहर से आने वाले लोगों के प्रति और सख्ती बरतने की चेतावनी दी थी। लेकिन कोई गोरी चमड़ी वाला अमेरिकी नागरिक अपनी सनक में कई मासूम जानें ले लेता है, तो वह अमेरिकी सरकार की नजर में केवल दुखद घटना होती है, आतंकी घटना नहीं।

याद करें कुछ समय पहले लास वेगस के संगीत कार्यक्रम में हुई गोलीबारी को अमरीका ने आतंकी हमला नहीं कहा इसे केवल गोलीबारी की घटना कहा था।

टेक्सास की ताज़ा घटना पर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मृतकों के प्रति शोक जताते हुए, पुलिस को पूरा सहयोग देने की बात कही है। लेकिन गोलीबारी की घटनाओं को रोकने और सख्ती बरतने जैसा कोई इरादा नहीं जताया है। उनकी सारी सख्ती गैरधर्मी, गैरवर्णी लोगों के लिए ही नजर आती है।

दक्षिणपंथ की जो राजनीति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं, उसमें ऐसी सोच ही उनके लिए मुफीद होती होगी, लेकिन आम जनता के लिए यह भस्मासुर की तरह काम कर रही है। उनके पूर्ववर्ती अमेरिकी शासकों ने जो गलतियां कीं, उसका परिणाम वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले से लेकर अफगानिस्तान, ईरान, इराक, पाकिस्तान हर जगह देखा जा सकता है।

हर नया अमेरिकी शासक स्वतंत्रता, उदारता, लोकतंत्र, विश्वशांति की दुहाई देता है, लेकिन हालात अमेरिका और उसके साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए बद से बदतर हो रहे हैं। उकसावे की यह राजनीति विश्व में बारूद का ढेर बढ़ाती जा रही है और साथ-साथ चिंगारियों का इंतजाम भी कर रही है। अभी ट्रंप एशिया की यात्रा पर हैं और यहां भी उनकी बदजुबानी चालू है। वे उत्तर कोरिया के तानाशाह की सनक का हवाला तो खूब देते हैं, लेकिन उसे शांत रखने की जगह उकसाने में ही लगे हुए हैं।

उ.कोरिया को बार-बार धमकियां दी जाती हैं, बदले में वह भी धमकी देता है, या धमाके करता है। ज़रा सोचिये कि इस खेल में अगर किसी पक्ष ने परमाणु हथियारों का उपयोग कर दिया, तो उसके परिणाम इन शासकों को नहीं बल्कि आम जनता को भुगतने पड़ेंगे। लेकिन उ.कोरिया और अमेरिका दोनों को इसकी परवाह नहीं है।

वैसे अगर गौर फरमाएं, तो हालात भारत में भी बहुत अच्छे नहीं हैं। यहां चुनावी राजनीति का शोर इतना अधिक है कि गंभीर मुद्दों से जनता का ध्यान हट जाता है। लेकिन पिछले तीन वर्षों से जम्मू-कश्मीर के जो हालात बिगड़े हैं, वे भी भारत के लिए आत्मघाती ही साबित हुए हैं।

भाजपा जब विपक्ष में थी, तब भी पाकिस्तान के लिए, एक सिर के बदले दस सिर वाले अंदाज में बात करती थी और मोदी सरकार बनी तब भी सबक सिखाकर रहेंगे, जैसी धमकी दी गई। सरकार की आलोचना करने वालों को बात-बात पर #पाकिस्तान जाने की घुड़कियां दी जाती रहीं। अब आलम ये है कि कोई दिन नहीं बीतता, जब सीमा पर घुसपैठ या मुठभेड़ न होती हो। तीन सालों में इतने जवान शहीद हो गए, जितने किसी युद्धकाल में नहीं हुए।

हर वक्त सेना की ताकत का दंभ भरने और सैनिकों के नाम पर भावनाओं को भुनाने की रीत चल पड़ी है। अगर जवानों की इतनी ही परवाह है तो क्यों नहीं स्थायी शांति की कोशिशें सरकार करती है, ताकि सीमा पर केवल पहरेदारी हो, गोलीबारी नहीं।

एक कहावत है कि-जो बोए पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होए- ये कहावत आज अमरीका पर सटीक बैठ रही है और अगर #मोदी_सरकार का रवैया भी ऐसा ही रहा, तो भारत भी बबूल के कांटों की पीड़ा सहने को अभिशप्त रहेगा।

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