सारी दुनिया में बढ़ रहे हैं इंडिजिनश पीपुल्स पर हमले

कई देशों के अंदर इंडिजिनश पीपुल्स के जल-जंगल-जमीन पर हमलों से इंडिजिनश लोगों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।...

हाइलाइट्स

नयी तकनीक के विकास और आर्थिक वार से आदिवासी समुदाय के संस्कृति कुप्रभाव ने जल जंगल जमीन आदिवासी समाज की सबसे बडी पहचान है ,इसे पूंजी के साथ बढ़ते हमले ये अब आदिवासी के जीवन पर जीविका के आधार पर हमला बढ़ा है।  पूरी दुनिया में इंडिजिनश महिलाएं गभ्भीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं इनके लिए यूनाईटेड नेशन ने इंडिजिनश महिलाओं के लिए सीडीआरओ जैसे कानून बनाए जिसका उपयोग सभी देश ठीक से नहीं कर रहे जिससे महिलाओं के ऊपर महिला हिंसा बढ़ रही है।

 

मानवाधिकर के सवाल साथ मलेशिया के चार दिन

मलेशिया से लौटकर आलोका कुजूर

19 नवम्बर से 23 नंबम्बर 2017 तक गुड होप होटल जोहोर बारू मलेशिया में एआईपीपी के द्वारा आयोजित इंडिजिनश पीपुल्स मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की वर्कशॉप मलेशिया के जोहोर बारू में किया गया जिसमें थाइलैण्ड, मलेशिया, इंडोनेशिया, बांगलादेश, नेपाल, फिलीपीन्स, कम्बोडिया, भारत, म्यानमार, 9 देशों के 27 इंडिजिनश के मानवाधिकार के सवालों पर लोगों ने भाग लिया। जिसका विषय था इंडिजिनश पीपुल्स के मानवाधिकार। जिन देशों में इंडिजिनश पीपुल्स रह रहे हैं वहां उनके जीवन में लगातार हमले बढ रहे हैं। 9 देशों में जमीन के सवाल और मिलिटरिजायशन से आदिवासी समाज में हमला बढ़ा है ऐसी स्थिति में इंडिजिनश पीपुल्स के जीवन पर लगातार खतरे आ रहे है। यही वह समुदाय है जो अपनी रक्षा की लड़ाई वह अकेले लड़ रहे हैं। कई देशो के अंदर इंडिजिनश पीपुल्स के जल-जंगल-जमीन पर हमला ने इंडिजिनश लोगों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा  रहा है। इन तमाम परिस्थिति में मानवाधिकार के रूप में कार्य कर रहे इंडिजिनश पीपुल्स पर बढी जिम्मेदारी से इंडिजिनश खुद से कई नये तरीके निकाल रहे।

मानवाधिकार हनन जैसे सवालों के साथ विश्वस्तर पर बनाये गये मानवाधिकार संस्थाओं से कैसे सहायक हो सकता है, इसके सहयोग के लिए कौन कौन सी तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर चर्चा और उपाय की खोज करने के लिए यह सम्मेलन 5 दिन तक चला। प्रति एक देश के इंडिजिनश पीपुल्स अपनी जनसस्मयाओं के साथ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कानून की उपयोग पर विचार मंथन किया गया।

नयी तकनीक के विकास और आर्थिक वार से आदिवासी समुदाय के संस्कृति कुप्रभाव ने जल जंगल जमीन आदिवासी समाज की सबसे बडी पहचान है ,इसे पूंजी के साथ बढ़ते हमले ये अब आदिवासी के जीवन पर जीविका के आधार पर हमला बढ़ा है।

वहां यह भी चर्चा हुई कि पूरी दुनिया में इंडिजिनश महिलाएं गभ्भीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं इनके लिए यूनाईटेड नेशन ने इंडिजिनश महिलाओं के लिए सीडीआरओ जैसे कानून बनाए जिसका उपयोग सभी देश ठीक से नहीं कर रहे जिससे महिलाओं के ऊपर महिला हिंसा बढ़ रही है।

जिन देशो में मानवाधिकार के सवाल गभ्भीरता से उठाया जा रहे और कार्यकर्ता इसे चुनौती के रूप में ले रहे हैं ऐसी स्थिति में मानवाधिकार कार्यकर्ता के कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार ऐसे कार्यकर्ता पर भी हमले राजनीतक सामाजिक और आर्थिक रूप से होते हैं।

अंतिम दिन इंडिजिनश  न्यूल ‘‘ मीडिया ’’ नेपाल से आई वीणा देवी और इंडिया के सफदर संस्था के आलोका कुजूर ने पैनल चर्चा किया गया कि वैश्विक रण के इस दौर में मीडिया में आ रहे इंडिजिनश पीपुल्स समाचार में मानवाधिकार के सवाल गौण है। समाचार हर राज्य के अन्दर सिमट कर रह जाता है। भारत के 27 राज्य में 10 राज्य इंडिजिनश पीपुल्स बहुल इलाका रहा है। जो प्रिंट मीडिया के माध्यम से पढ़ नहीं पाते है। डिजिटल दुनिया ने इंडिजिनश पीपुल्स के सूचना और घटना तुरंत तुंरत मिल रही है। जिसमें ब्लॉग, फेसबुक, वाटसप, इस्टाग्राम, ट्विटर आदि में अब इंडिजिनश पीपुल्स के मानवाधिकार के सवाल के साथ सूचनाएं प्रसारित हो रही हैं। पूरी दुनिया में घट रही घटना को हम देखते समझते जानते हैं। नेपाल में पलायन और जमीन के सवाल को मीडिया में थोडी बहुत जगह मिल पाती है।

नेपाल की वीण देवी ने बताया कि नेपाल में बहुराष्ट्रीय कम्पनी के द्वारा मीडिया संचालित है। इंडिजिनश पीपुल्स के लिए अल्टरनेटिव मीडिया है पर वह लोगों के पहुंच से बाहर है।

20 नंवम्बर को सभी कार्यकर्ता कानपूंग बकार बाटू गये। वह लगभग जोहोर बारू शहर से 9 कि0 मी0 की दूरी पर समुद्र के किनारे बसा हुआ है। जहां ओरंग अरसी आदिवासी समुदाय रहते हैं। जिनका मुख्य पेशा समुद्र के जीव जंतू को बाहर कर बाजार में पहुंचाना, यही उनकी जीविका का आधार है। इस गांव में 188 ओरंग परिवार रहते हैं।

गांव में लोगों ने हमें घुमाया गांव में दो छोटे छोटे तालाब हैं जो वर्तमान में गंदा हो चुकी है शहर का सारा गंदा पानी इस गांव में आता है। गांव में प्लास्टिक से पानी में बदबू आ चुकी है। इस समुदाय के यहां आज भी राजा प्रथा है। घर पक्का बनाये गये हैं। गांव में नारियल के पेड में पीला नारियल देखने को मिला। यह समुदाय एक तालाब के ऊपर ओरंग आदिवासी के छोटा सा म्यूजियम बनाये है जिसमें गांव कैसा था और कैसे लोग अपनी जीवन यापन करते थें क्या उपयोग करते थे जिसकी तस्वीर समय के अनुरूप लगाया गया है। इस म्यूजियम में राजा के पूरे परिवार की तस्वीर सजाया गया है। वह म्यूजियम लकड़ी के घर तालाब के उपर ही बनाये है। साथ ही टुरिस्ट प्लेस होने के कारण वहां कई खाने के दुकान खुले हुए हैं, जहां केकड़ा, घोधी, सीतूआ, मछली के कई प्रकार के चीजे बना कर देते है। ये समुदाय  बोटिंग करते है और समुद्र में आदिवासी विधि से सितवा और घोघो के खेती के लिए डब्बा और रस्सी बांध कर समुद्र में डाल कर रखते हैं। समुद्र का पानी भी गंदगी के चपेट में आ गया है अब समुद्र के पानी से बदबू आने लगी है।

वहां के लोगों ने बताया कि यह समुद्र का बंटवारा हो चुका है। पास में सिंगापूर है वहां के सरकार समुद्र को घेर दिया है जिससे केकडा और घोघी पेड में आ कर रहते हैं। वहां के आदिवासी विस्थापन के खिलाफ कोर्ट में अर्जी डाल चुके हैं। ओरंग आरसी समुदाय के लोग अपनी भाषा और संस्कृति के साथ सरल जीवन जीते है।

पूरी दुनिया में 3 मिलियम इंडिजिनश पीपुल्स हैं

इंडिजिनश पीपुल्स महिलाओं के अधिकार लेकर अलग से कई देश में लोग लड़ रहे। पूरी दुनिया में 3 मिलियम इंडिजिनश पीपुल्स है। सभी जगह देशज लोगों को बचाने की मांग चल रही है। मानवाधिकार की रक्षा के लिए हर देश के अंदर काम चल रहे हैं। जमीन पर अधिकार, परिवर्तन और महिलाओं के अधिकार को लेकर दुनिया में लडाई जारी है।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इंडिजिनश पीपुल्स के लिए कई संस्थाएं हैं जिसका उपयोग कर अपने हक की मांग किया जा सकता है।

जोहोर बारू और मलेशिया एक मुस्लिम देश है, वहां की आबादी कम है। लोग पैदल नहीं चलते, सभी के पास कार है। जगह जगह नमाज पढ़ने के लिए स्थान बनाए गये हैं। महिलाएं खास तौर पर बहुत स्वतंत्र लगीं जो खुद गाड़ी चला कर ऑफिस जाना होटलों में काम करना, जीन्स एवं मिनी स्कर्ट आदि का उपयोग करती हैं। हम जिस गुड होप होटल में थे, वहां के रूम को बेहतर तरीके से मेन्टेन मुस्लिम महिलाएं ही करती हे। खाना बनाने से लेकर रिशेपशन के काम का देख भाल के साथ आफिॅस के कामों को मुस्लिम महिलाएं ही संभाले हुए हैं। वहां के बाजार में 40 प्रतिशत दुकानों में मुस्लिम महिलाएं खाना का होटल, श्रंगार की दुकान कपड़े की दुकान जैसे अनेकों दुकान वह स्वंय रात में 10 बजे तक खोल कर रखती हैं। खान-पान में वहां की महिलाएं समुद्र का उत्पादन को भी खाती हैं। मशरूम के कई व्यंजन वो पंसद से खाती दिखीं। वहां की दुकानों में मशरूम बनते है और मुस्लिम समुदाय खाते है।

अंतिम निर्णय यह हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार कार्यकर्ता तो काम करते है और न्याय के लिए जितने संस्थान बने है सब का उपयोग करते हैं। पर अन्तराष्ट्रीय स्तर के बने सहयोगी संस्थाओं पर अपना आवेदन नहीं दे पाते मगर अब सभी संस्थाओं पर न्याय की मांग करेंगे।

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