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Shaheed E Azam Bhagat Singh

भगतसिंह का लेख – लाला लाजपत राय और नौजवान

(यह वह दौर था जब कौंसिल के चुनावों में लाला लाजपत राय ने कांग्रेस का साथ छोड़कर उसकी मुख़ालफ़त करनी आरम्भ कर दी थी और अनेक ऐसी बातें कहीं जो कि किसी भी तरह उन्हें शोभा नहीं देती थीं। यह देखकर कुछ संवेदनशील नौजवानों ने लाला जी के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उसका बदला लेने के लिए लाला जी ने खुले आम भाषणों में कहा कि ये नौजवान बहुत ही ख़तरनाक एवं बोल्शेविक हैं तथा लेनिन जैसा नेता चाहते हैं। मुझमें लेनिन बनने की ताक़त नहीं। अपनी रौ में लाला जी यहाँ तक कह गए कि यदि इन नौजवानों को पचास रुपये की भी नौकरी मिल गई तो ये झाग की तरह बैठ जाएंगे। भगत सिंह, जो भारत के स्वतंत्रता के संघर्ष में शामिल प्रत्येक सिपाही के लिए तमाम वैचारिक मतभेद के बावजूद बहुत सम्मान रखते थे, लाला जी के इस कथन को आया-गया नहीं कर सके। उन्होंने “कीर्ति” के अगस्त 1928 के अंक में “लाला लाजपत राय और नौजवान” शीर्षक से लेख लिखकर लाला जी से पूछा – इसका क्या अर्थ है? क्या पचास रुपयों के लिए अपना आदर्श छोड़ने वाले नौजवान ही लेनिन के साथ थे? क्या लेनिन इसी स्तर का है? नहीं तो ऐसी बात क्यों कही गई? यहाँ हम उसी लेख का संक्षिप्तिकरण प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि उसमें भगतसिंह ने बहुत तार्किक ढंग से नौजवानों और वामपंथ का पक्ष सामने रखा है। – प्रस्तुति: अरुण कान्त शुक्ला)

Bhagat Singh’s article – Lala Lajpat Rai and Naujawan

लाला लाजपत राय आदि न जाने क्यों पहले से ही नौजवानों के भाषणों के विरोधी चले आ रहे हैं। यह जानना दिलचस्प है कि लाला जी ने देश-भक्ति का आदर्श इटली के महान मैजिनी से सीखा। वह नौजवानों का बहुत बड़ा प्रशंसक था और कहता था कि “महान कार्यों का भार नौजवान ही उठाते हैं, उनकी आवाज़ में जादू-सा असर होता है। वे जनता को स्वतन्त्रता-संग्राम के लिए तुरन्त तैयार कर देते हैं।” ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बताने वाला व्यक्ति इसके बिल्कुल विपरीत आचरण करे, यह देखकर आश्चर्य होता है। 1907-08 के पुराने गड़े मुर्दे क्या उखाड़ने? आजकल की ही कुछ बातें पर्याप्त हैं।

पिछले कौंसिल के चुनावों में लाला जी ने कांग्रेस का साथ छोड़कर उसका विरोध करना शुरू कर दिया और इस दौरान वे ऐसी बातें कहते रहे जो कि किसी भी तरह उन्हें शोभा नहीं देती थीं। यह देखकर कुछ संवेदनशील नौजवानों ने आपके विरुद्ध आवाज़ उठायी। उसका बदला लेने के लिए लाला जी ने खुलेआम भाषणों में कहा कि ये नौजवान बहुत ही ख़तरनाक एवं क्रान्ति-समर्थक हैं तथा लेनिन जैसा नेता चाहते हैं। मुझमें लेनिन बनने की ताक़त नहीं। साथ ही यह भी कह दिया कि इन नौजवानों को अगर पचास रुपये की भी नौकरी मिल गई तो ये झाग की तरह बैठ जायेंगे। इसका क्या अर्थ है? क्या पचास रुपयों के लिए अपना आदर्श छोड़ने वाले नौजवान ही लेनिन के साथ थे? क्या लेनिन इसी स्तर का है? नहीं तो ऐसी बात क्यों कही गई? ऐसी बातों से लाला जी जहाँ एक ओर सरकार को इनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने के लिए उकसा रहे हैं, वहीं जनता की नज़रों में नौजवानों का सम्मान गिराने की कोशिश भी कर रहे हैं।

सद्भावना से किसी व्यक्ति के किसी कार्य अथवा विचार की कठोरतम आलोचना करने का अधिकार प्रत्येक को है, लेकिन जानबूझकर किसी के विचारों को ग़लत तरह से पेश करके, ग़लतफ़हमियाँ फैलाकर किसी को हानि पहुँचाने का प्रयत्न करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए गलत है। तब चाहे वह लाला लाजपत राय हों या कोई अज्ञात नौजवान। उस चुनाव के बाद अनेक अवसर ऐसे आये, लेकिन उनका उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है।

लाला जी ने अभी दूसरा लेख लिखा है। वास्तव में तो यह ‘कण्ट्री लीग’, जिसका उल्लेख हम पिछले अंक में कर चुके हैं, के सन्दर्भ में लिखा गया था, लेकिन उसमें नौजवानों का उल्लेख आ गया। लाला जी कहते हैं कि आजकल के उग्र विचारों वाले नौजवानों के भाषणों से जनता को बचना चाहिए। ये युगान्तकारी क्रान्ति समर्थक हैं। संपत्ति के लिए इनका प्रचार हानिकारक है, क्योंकि इससे वर्ग-संघर्ष छिड़ने का डर है। अन्त में कहा कि यह काम कुछ विदेशी शरारती तत्वों के उकसावे में आकर किया जा रहा है। वे बाहरी तत्व हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट डालना चाहते हैं, इसलिए वे बहुत ख़तरनाक हैं। साथ वह यह भी मानते हैं कि इस तरह के प्रचार से संपत्तिवान व्यक्ति सरकार से मिल जायेंगे। इन प्रचारक नौजवानों को गुमराह, बाहरी तत्त्वों के उकसावे में आये हुए, शरारती और लोभी बताते हुए अन्त में लाला जी कहते हैं कि उन्हें पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर पूरी तरह यक़ीन है। वे यदि कुछ कर रहे हैं अथवा कह रहे हैं तो नेकनीयती और समझबूझ से। बहुत ख़ूब! जिन पण्डित जवाहरलाल नेहरू के विचारों पर रूस का अच्छा-ख़ासा असर हुआ, जिन्होंने रूस से लौट आने पर इन विचारों का प्रचार शुरू किया, उनकी नीयत पर कोई शक नहीं। वह विदेशी प्रभाव या उकसावे में ये बातें नहीं कह रहे, बल्कि नेकनीयती से कह रहे हैं, लेकिन जो बेचारे देश से बाहर नहीं जा सके वे उकसावे में आये हुए हैं! ख़ूब! बहुत ख़ूब! असल बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू की हैसियत बहुत बड़ी हो गई है। उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेश हो रहा है, और उम्मीद भी है कि वे जल्द ही अध्यक्ष बन भी जायेंगे। उनके विरुद्ध लिखने पर ईंट का जवाब पत्थर से मिलने का भय होता है, लेकिन गुमनाम नौजवानों के लिए जो मन में आये बोलते रहिये कौन पूछता है? नौजवानों को संकटों में फँसाने की इन कोशिशों को हम क्या कहें? लाला जी को यह शोभा नहीं देता। ख़ैर, जो उनके मन में आये, वे करें। अब हम उनकी कुछ बातों का उत्तर देना चाहेंगे।

सबसे पहले हम यह बताना चाहते हैं कि इस प्रचार के लिए कोई भी विदेशी हमें गुमराह नहीं कर रहा। नौजवान किसी के उकसावे में आकर ऐसी बातें नहीं कह रहे, बल्कि अब देश के भीतर से ही वे महसूस करने लगे हैं। लाला जी स्वयं बड़े आदमी हैं। प्रथम या द्वितीय श्रेणी में यात्रा करते हैं। उन्हें क्या मालूम कि तीसरे दर्जे में कौन सफ़र कर रहा है? वे क्या जानें कि तीसरे दर्जे के वेटिंग-हाल में किसे लातें खानी पड़ती हैं? वे मोटर में बैठकर अपने साथियों के साथ हँसते-खेलते हज़ारों गाँवों से गुज़र जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि हज़ारों लोगों पर क्या गुज़र रही है? क्या आज हम ‘अनहैप्पी इण्डिया’ जैसी किताब के लेखक को हिन्दुस्तान के करोड़ों भूखों मरने वालों की दयनीय दशा बतायें? क्या आज उन करोड़ों लोगों को देखकर जो सुबह से शाम तक ख़ून-पसीना एक करके पेट भी नहीं भर सकते, यह आवश्यकता शेष रह जाती है कि कोई बाहर से आकर हमें कहे कि उनके पेट भरने की कोई राह निकालो। हम गाँवों में गर्मी, सर्दी, बारिश, धूप, लू और कोहरे में रात-दिन किसानों को काम करते देखते हैं। लेकिन वे बेचारे रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहे हैं और क़र्ज़ के नीचे दबे हुए हैं। तब क्या हम तड़प नहीं उठते? उस समय हमारे दिलों में आग नहीं भड़क उठती? तब भी क्या हमें किसी की आवश्यकता रह जाती है जो आकर यह बताये कि इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करो।

जब हम नित्य प्रति देखते हैं कि श्रमिक भूखे मरते हैं और निठल्ले बैठकर खाने वाले आनन्द मना रहे हैं, तो क्या हम इस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ियाँ अनुभव नहीं कर सकते? जब हम देखते हैं कि दिनोदिन अपराध बढ़ रहे हैं, जनता की हालत रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है, तब क्या हमें बाहरी उपदेशकों की आवश्यकता है जो हमें आकर समझायें कि क्रान्ति की आवश्यकता है? करोड़ों मनुष्यों की जिन्हें हमने अछूत कहकर दूर किया हुआ है दर्दनाक स्थितियाँ देखकर क्या क्रोध नहीं आता? करोड़ों लोग दुनिया का बहुत विकास कर सकते हैं, वे जन-सेवा कर सकते थे, लेकिन आज वे हम पर भार महसूस होते हैं। उनकी इस स्थिति में सुधार के लिए, उन्हें पूर्ण रूप से मनुष्य बनाने के लिए और कुओं की जगत पर चढ़ाने-मात्र के लिए क्या आन्दोलनों की ज़रूरत नहीं है? क्या उन्हें ऐसी अवस्था में लाने की आवश्यकता नहीं थी कि वे हमारी तरह कमा-खा सकें? इसके लिए क्या सामाजिक और आर्थिक नियमों में क्रान्ति आवश्यक नहीं है? क्या पंजाब तथा हिन्दुस्तान के नौजवानों में स्वयं कुछ अहसास करने की कोई शक्ति शेष नहीं बची? उनके सीने में क्या दिल नहीं धड़कता? क्या उनके दिलों में मानवता नहीं है? नहीं तो फिर क्यों कहा जाता है कि विदेशियों ने आकर उन्हें उकसाया है?

हाँ, हम यह स्वीकारते हैं कि रूसी क्रान्ति ने दुनिया के समक्ष एकदम नये विचार रखे हैं। हम मानते हैं कि जिन बातों का हल शायद अभी हम स्वयं नहीं सोच सकते, रूसी विद्वानों ने उम्र भर कष्ट सहते हुए, तिल-तिल कर जीवन समाप्त करते हुए उनके बारे में अपने विचार दुनिया के सामने रखे। क्या हमारे देश के करोड़ों भूखे, बेरोजगार, वंचित और शोषित जनों को उसका कोई लाभ नहीं मिलना चाहिए? क्या उनसे विचारों की समानता भी उकसावा है? तब तो लाला जी को भी, जो देशभक्ति मैजिनी से सीखे हैं, और लाला जी के समान अन्य नौजवानों को भी, मैजिनी ने गुमराह करके देशसेवा के काम में भिड़ाया हुआ था!

प्रश्न यह है कि आज, 1928 में, क्या दुनिया को फ्रांसीसी क्रान्ति से कोई सबक नहीं सीखना चाहिये और उसे अपना आदर्श नहीं बनाना चाहिए या आज नये वातावरण में नये विचारों से पूर्ण रूसी क्रान्ति को अपना आदर्श नहीं बनाना चाहिये? क्या लाला जी की यह मंशा है कि क्रान्ति केवल अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध की जाये और फिर देश के शासन की बागडोर अमीरों के हाथों में दी जाये? देश के करोड़ों लोग इसी दशा में ही नहीं बल्कि इससे भी अधिक बुरी स्थितियों में पड़ें, मरें और तब फिर सैकड़ों बरसों के ख़ून-ख़राबे के पश्चात पुनः इस राह पर आयें और फिर हम अपने पूँजीपतियों के विरुद्ध क्रान्ति करें? यह पहले दर्जे की मूर्खता होगी।

लाला जी ने एक-दो बार ‘दास’ के दो चार शब्द सुन-सुनाकर गाँवों में संगठन की बात थोड़ी-सी उठायी थी। लाला जी को तो गाँवों में जाने की फ़ुरसत ही नहीं। वे क्या जानें कि जनता के विचार क्या हैं? लोग साफ़ कहते हैं कि हमें इन्‍क़लाब का क्या लाभ? जब इसी तरह मर-खपकर दो जून की रोटी जुटनी है और तब भी नम्बरदार, तहसीलदार और थानेदार को इसी तरह अत्याचार करने हैं, इसी तरह किराये वसूल किये जाने हैं तो हम अभी की रोटी क्यों गँवाये? किसी के लिए अपने प्रियजनों को क्यों उलझनों में डालें? हम उन्हें क्या बतायें कि उनके पूर्वज कैसे थे, जिससे कि वे बलिदान के लिए तैयार हो जायें।

अच्छा, माना कि यहाँ क्रान्ति हो जाये तब लाला जी के विचार से किसे शासन सौंपा जायेगा? क्या महाराज वर्द्धमान या महाराज पटियाला को और पूँजीपतियों के टोले को? क्या आज अमेरिका और फ्रांस के करोड़ों मज़दूर भूखों नहीं मर रहे? हम सब कुछ जानते-बुझते क्यों कुएँ में गिरें?

लाला जी कहते हैं कि हमारे साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूँजीपति सरकार के साथ मिल जायेंगे। बहुत ख़ूब! वे पहले ही किधर हैं? कितने पूँजीपति युग परिवर्तनकारी बने हैं? क्रान्ति से जिन्हें अपनी संपत्ति में थोड़ी-बहुत हानि होने का डर होगा वे हमेशा ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनकी जी-हजूरी के लिए आदर्श त्यागकर बेकार में अपने क्रान्ति के उद्देश्य को हानि पहुँचाना कतई उचित नहीं। दूसरी बात यह कि पूँजीपति ज़रा सोचें कि किस स्थिति में उन्हें लाभ है? आज अंग्रेज़ उन्हें अपने स्वार्थ के लिए अपने साथ अवश्य मिला लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूँजी छीनकर उसे अपने पूँजीपतियों के हाथों में स्थानान्तरित कर देंगे। तब यह ग़रीब हो गये सरमायेदार आज जैसे करोड़ों मज़दूरों में शामिल होकर मरते-खपते रहेंगे। इन्हें सामाजिक व्यवस्था में अन्याय दिखायी देगा। अगर वे साम्यवादी क्रान्ति कर लें तो आज उनकी हरामख़ोरी पर तो ज़रूर रोक लगायी जायेगी लेकिन दुनिया की आम ख़ुशहाली में जोकि निश्चय ही आनी है, शामिल होकर वे बहुत सुखी रहेंगे। हिन्दुस्तानी पूँजीपति सोच लें कि उनको किस में लाभ है?

लेकिन मज़दूर-आन्दोलन उनके लिए रुक नहीं सकता, उनकी प्रतीक्षा भी नहीं कर सकता। नौजवानों को घबराना नहीं चाहिए। काम को आरम्भ करने में बहुत सी कठिनाइयाँ पैदा होती हैं, धीरज से मुक़ाबला करना होगा। लाला जी और दूसरे प्रकार के पूँजीवादी नीति वाले नेता भी धीरे-धीरे स्वयं मैदान से बाहर हो रहे हैं, जिस प्रकार पहले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी हुए थे और आज सप्रू तथा चिन्तामणि जैसे लोग हो रहे हैं। अन्त में मज़दूर-आन्दोलन की जीत होगी। बोलो साम्यवादियों की जय! युगान्तकारी धारा क़ायम रहे!

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