आपकी नज़रस्तंभहस्तक्षेप

मोदी की मनोदशा और भाजपा के लिये उसके अशनि संकेत

Chowkidar Narendra Modi

मोदी जिस प्रकार से बिना सोचे-समझे अपने सब लोगों को चौकीदार बनाने में लग गये हैंमनोविश्लेषण की भाषा में इसे जुनूनी विक्षिप्तता (obsessional neurotic) कहते हैं। औरजब नेता विक्षिप्त हो जाए तो देश और उसके दल के अघटन की सीमा की क्या कोई कल्पना कर सकता है !

अरुण माहेश्वरी

जब कोई प्रधानमंत्री (Prime minister) अपने को चौकीदार (chowkidar) बताता है और रक्षा सौदों में चोरी (Theft in defense deals)करते हुए पकड़ा जाता है, तो राजनीति में ‘चौकीदार चोर है’ (chowkidar chor hai) के नारे से एक ही बात प्रेषित होती है कि प्रधानमंत्री चोर है। ऐसे में अगर मोदी जी को यह भ्रम है कि वह अपने पूरे दल को चौकीदारों का दल घोषित करके प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहचान को गायब कर देंगे और लोग उन्हें सचमुच छोटी-मोटी तनख्वाहों से बमुश्किल गुजारा करने वाला चौकीदार ही मानने लगेंगे तो यह उनका झूठे प्रचार की अपनी क्षमता पर पागलपन की हद तक भरोसा करना कहलायेगा।

जैसे दर्शन शास्त्र (Philosophy) में भौतिकवाद की सच्चाई स्वतंत्र भौतिक वस्तु की उपस्थिति से प्रमाणित नहीं होती है। सच्चा भौतिकवाद तो द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है जो वास्तव में न पदार्थ की प्राथमिकता पर टिका है और न ही पदार्थ को प्रथम सिद्धांत मानने पर, बल्कि द्वंद्व, दरार और इससे बनने वाले यथार्थ के आभास की धारणा पर टिका है। इसका संबंध यथार्थ में पड़ने वाली दरारों के साथ होता है।

The truth of the slogan of chowkidar chor hai

चौकीदार चोर है‘ के नारे की सच्चाई ही इस बात में है कि उसमें असली चौकीदार का तो अस्तित्व नहीं है। चौकीदार तो यहां प्रधानमंत्री है। लेकिन दुर्भाग्य कि मोदी जी जो मौजूद ही नहीं है, उसे ही पकड़ कर वोट की वैतरणी पार करना चाहते हैं !

कायदे से उन्हें सिर्फ यह साबित करना चाहिए कि वे चोर नहीं है। उन्होंने रफाल सौदे में अपने मित्र अनिल अंबानी को तीस हजार करोड़ क्या, एक करोड़ का भी लाभ नहीं पहुंचाया है।

उल्टे दक्षिणपंथी उग्रवादी तत्वों को कमीशनखोर पूंजीपतियों के विश्वस्त सेवकों की एक ख़ास ‘चौकीदार’ की पहचान दे कर मोदी ने फासीवाद की क्लासिकल परिभाषा को ठोस रूप में चरितार्थ किया है कि ‘यह वित्तीय पूंजी का बर्बरतम रूप है’।

हिटलर ने अपने लोगों से यहूदियों की शिनाख्त करवाई थी, लेकिन मोदी को देखिये, अपने ही लोगों को बेनकाब करने पर तुला हुआ है। आप इन्हें अब अपने आस-पास साफ़ देख सकते हैं !

मोदी यह सब क्यों कर रहे हैं ? उन सामान्य मेहनतकश मतदाताओं को खींचने के लिये जो उनसे पूरी तरह से दूर हो गये हैं ?

मनुष्य के आत्म के सिद्धांत की बहुत मोटी सी बात है कि ज्ञान, इच्छा और क्रिया के क्रमिक योग से ही किसी भी स्वतंत्र आदमी के चित्त की गति निर्धारित होती है। स्वतंत्र से तात्पर्य है किसी अन्य के इशारे पर न चलने वाला स्वछंद मन। ठोस चुनावी राजनीति में उसे ही फ्लोटिंग वोटर कहा जा सकता है। स्विंग करने वाला वोटर। भारत के आज तक के चुनावों के इतिहास में चुनाव परिणामों को अंतिम तौर पर तय करने वाला वोटर।

आज की सच्चाई यह है कि इस फ्लोटिंग वोटर को इस एक बात का ज्ञान हो चुका है कि मोदी सिर्फ झूठी भाषणबाजी करते हैं। चालू शब्दावली में वह जान गया है कि मोदी ‘फेंकू’ है। उनके पास देश के निर्माण की वास्तव में कोई दृष्टि नहीं है। और वे आम जनता के दुखों के प्रति जितने निष्ठुर हैं,  उतने ही अपने पूंजीपति मित्रों के प्रति उदार।

भारत के तमाम लोगों ने पिछले पांच सालों में मोदी के कई तुगलकी फैसलों की मार को सहा है। उन्होंने नोटबंदी की तरह की मोदी के द्वारा ढाई गई विपदा को देखा है। घर-घर में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। आंकड़ें बताते हैं कि मोदी के काल में बेरोजगारी पिछले पैंतालीस साल में सबसे नीचे चली गई है। युवाओं को भविष्य अंधेरे में नजर आता है। ऊपर से, ‘चौकीदार चोर है’ के आरोप का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है। आरबीआई, सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट के अंदर के विस्फोटों के अनुभव अभी ताजा है। मोदी ने जनतंत्र की सारी संस्थाओं को जकड़ कर रख दिया है।

इसीलिये अभी इन सबकी कामना है कि जितना जल्द हो, उन्हें इस स्थिति से निजात मिले। लोग अब सचमुच बदलाव चाहने लगे हैं। ऐसी स्थिति में इन फ्लोटिंग मतदाताओं का स्वाभाविक रुझान मोदी के खिलाफ, ऐसे दल के पक्ष में होगा जो किसी भी प्रकार से उनके जीवन में आशा का संचार कर सके। भारत को एक नई दिशा में आगे ले जा सके।

मोदी की हार तो सुनिश्चित है। उनकी जगह कौन जीत कर आयेंगे, यह सवाल अभी भी गर्भ में छिपा है। विपक्ष के सारे दल उसीमें अपनी जगह बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। पांच राज्यों में अपनी सरकारों के साथ कांग्रेस इस रेस में स्वाभाविक तौर पर अन्य सबसे आगे है।

दार्शनिक देकार्ते की बहुत प्रसिद्ध उक्ति है – “ मैं सोचता हूँ, इसलिये मैं हूँ।” (I think, therefore I am) यह कथन विचार की भौतिक सत्ता को बताता है। जो कहते हैं , महागठबंधन नहीं बना है, वे देश के कोने-कोने में गूँज रहे फासिस्ट मोदी को पराजित करने के संकल्प को सुनने में असमर्थ है। वे विचार की भौतिक शक्ति को नहीं जानते हैं।

हमारी दृष्टि में मोदी के ख़िलाफ़ महागठबंधन एक यथार्थ का रूप ले चुका है। मोदी-विरोधी दलों की आपसी खींच-तान इस महागठबंधन के समुच्चय में अपनी जगह बनाने की खींच-तान भर है।

कुल मिला कर अभी तक यह साफ हो चुका है कि मोदी के चक्कर में आगामी चुनाव में बीजेपी किस गहरी खाई में गिरने वाली है, उसका अंदाज तक लगाना कठिन हो गया है।

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