अमित शाह ने हिंदू ह्रदयसम्राट को देश के नेता के रुतबे से खींचकर ओबीसी का नेता बना दिया

बाकी जनता ओबीसी के साथ, ओबीसी को लेकिन किसकी परवाह? फिर भी हिंदुत्व की इस नर्क को बनाये रखने में सारे बहुजन एक हैं। मनुस्मृति भी जलायेंगे और जात पांत से चिपके भी रहेंगे, ऐसी होगी क्रांति, वाह।...

पलाश विश्वास

मीडिया हमेशा आधिकारिक वर्जन को छापता है और सरकार या प्रशासन या पुलिस जब तक कनफर्म न कर दे, कोई खबर नहीं हो सकती। मसलन बिना एफआईआर दर्ज हुए किसी वारदात को मीडिया में खबर बनाने की सख्त मनाही है। ऊपर से गोपनीयता भंग न करने की शर्त है।

इसी विशेषाधिकार के दम पर मध्य पूर्व एशिया, वियतनाम, अफ्रीका और लातिन अमेरिका में अमेरिका ने मीडिया की सर्वज्ञ खामोशी की आड़ में सीधे नरसंहार अभियान चलाकर करोड़ों लोगों की जान लेते रहने का सिलसिला जारी रखा है।

यही है अमेरिका के आतंक के खिलाफ युद्ध का आधार।

भारत में भुक्तभोगी का एफआईआर दर्ज हो तो करिश्मा समझें तो आधिकारिक खबरें छापने वाले मीडिया की औकात भी समझ लें।

चूंकि खंडन नहीं हुआ है अभी तक और हम सच जानना चाहते हैं, इसीलिए वे वीभत्स तस्वीरें फिर ताकि कम से कम आपके दिलोदिमाग में कोई हलचल हो।

भारत में पिछड़े समुदायों के लोग कुल कितने हैं, जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक न होने के बावजूद यह कोई राज लेकिन है नहीं कि मंडल कमीशन के मुताबिक 54 फीसद न सही, सबसे ज्यादा जनसंख्या उन्हीं की है और इस हिसाब से उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

बाहुबलि जातियों के दबंगों की सत्ता में सक्रियभागेदारी के बावजूद सच यही है कि निनानब्वे फीसद ओबीसी की हालत दलितों और आदिवासियों और मुसलमानों से कतई बेहतर नहीं है।

सच यह भी है कि ओबीसी गिनती का आंदोलन लेकिन सत्ता में भागीदार और मनसबदार सिपाहसालार लोग नहीं चला रहे थे। जैसा कि मीडिया की हंगामाखेज रपटों से जाहिर है। संसद में जरूर उन लोगों ने इस आंदोलन का समर्थन किया है।

ओबीसी के हक हकूक का मसला सबसे पहले बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर संसद, संविधान और सड़क पर उठा रहे थे, लेकिन ओबीसी जातियां तब उनके साथ खड़ी नहीं थीं। वरना बाबासाहेब सिर्फ महाराष्ट्र के महार और बंगाल के नमोशूद्र जातियों के नेता बने रहकर घुटघुट कर मधुमेह के शिकार नहीं बन जाते और मौत के बाद उनका आखेट नहीं होता इसतरह बेलगाम।

बाबासाहेब भले हैं वे हम सबके, लेकिन अब भी वे उतने ही अस्पृश्य, दलित हैं। अनाथ हैं बाबासाहेब हमारे। कोई नहीं उनका।

मंडल कमीशन रपट जारी होने के बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन के साथ साथ राममंदिर आंदोलन का कमंडल विकल्प सुनामी बनकर देश को हिंदू राष्ट्र बना गया तो इसके तमाम सिपाहसालार ओबीसी के बाहुबलि क्षत्रप हैं और अपनी जातियों के वर्चस्व कायम रखने में किसी सूबे में किसी क्षत्रप ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। इसके उदाहरण बाद में।

सबसे बड़ा सच यह है कि बामसेफ के मंचों से लगातार लगातार ओबीसी की गिनती की मांग उठती रही है और देश भर में बामसेफ कार्यकर्ता इस सिलसिले में जनजागरण करते रहे हैं लेकिन तब भी बाहुबलि जातियों को बाकी लोगों की परवाह नहीं थी क्योंकि सूबों की सत्ता उनके हाथ में थी।

हम इस मुहिम में लगातार शामिल रहे हैं। सूबे में वे ओबीसी राजकाज क्या कर रहे हैं, विजयराजे सिंधिया से लेकर अखिलेश, नीतीश कुमार तक तमाम ओबीसी नेताओं की क्या कहिये अमित साह के मुताबिक देश के प्रथम ओबीसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजकाज का नजारा देख लीजिये।

वैसे अमित के दावे के विपरीत पहले ओबीसी प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह थे और उनके बाद फिर कर्नाटक के देवगौड़ा।

चौधरी साहेब की जमींदारी पश्चिम उत्तर प्रदेश में तो उनके जीते जी हरिजनों को वोट डालने के अधिकार ही न थे और मुसलमानों के खिलाफ दंगे भी उन्हीं इलाकों में सबसे ज्यादा और लगातार होते रहे हैं

इसी तरह कर्नाटक मे देवगौड़ा का जलवा अभी खत्म हुआ नहीं है। जिन जातियों को आरक्षण का लाभ सबसे ज्यादा मिला है, वे इसे दूसरे जातियों को देना नहीं चाहतीं और उन जातियों की संख्या कहीं ज्यादा है जिन्हें आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिला है।

दलितों और आदिवासियों को मिले आरक्षण की सारी मलाई गिनी चुनी जातियों को मिली और यह भी कोई राज नहीं। कोई भी उन जातियों के नाम उंगली पर गिना सकता है।

भारत में बंगाल से लेकर पंजाब तक कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक गुजरात से लेकर राजस्थान तक महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक और पूर्वोत्तर और सत्ता केंद्र दिल्ली में सत्ता में भागेदारी भी इनी गिनी जातियों को ही मिली और बाकी बहुजन जनता जाति समीकरण में कमतर औकात के कारण ठगी रह गयी।

मध्यबिहार में नरसंहार के करिश्मे में भी ओबीसी जमींदारों की बहुत बड़ी भागीदारी है। बंगाल में दलितों, आदिवासियों को कही किसी भी क्षेत्र में कोई प्रतिनिधित्व सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि बाबाहसाहेब ने जिन जातियों को शूद्र कहा है, वे सवर्ण आधिपात्य में सत्ता में भागेदारी निभा रहे हैं।

समता और सामाजिक न्याय सिर्फ विचाधारा तक सीमाबद्ध है, हकीकत की जमीन पर कहीं नहीं। क्योंकि बहुजनों की फितरत है कि एक बार अपना हिसाब किताब बराबर हो जाये तो बाकी जनता की सोचो नहीं। सबसे हैरत अंगेज मामला बिहार का है जहां चुनाव होने वाले हैं और वहां ओबीसी का जलवा इतना प्रलयंकर है कि चुनाव जीतने के लिए संघ परिवार की समरसता जीतन मांझी की डगमगाती नैय्या और पासवान के दलित वोटबैंक के बावजूद ओबीसी पहचान के हवाले हो गयी और अमित शाह ने हिंदू ह्रदयसम्राट को देश के नेता के रुतबे से खींचकर ओबीसी का नेता बना दिया।

उस बिहार में लखासराय से कुछ दिल दहलाने वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर वाइरल हैं।

हमने पहले इन तस्वीरों को अंग्रेजी डिसक्लेमर के साथ ग्राफिक फोटो के बतौर सोशल मीडिया के साथ साथ अपने ब्लागों पर साझा किया। लेकिन कहीं कोई प्रतिक्रिया न होने पर हमने इस पर कल रात हिंदी में लिखा। अमलेंदु को फोन किया तो वे बोले कि इन तस्वीरों की क्या प्रामाणिकता है। हो सकता है कि यह कोई दुर्घटना हो। हस्तक्षेप में फिरभी वह आलेख लगा है। तस्वीरों के साथ।

तो बिहार में सरकार तो सामाजिक न्याय और समता के नाम है और इन तस्वीरों की जिम्मेदारी सीधे उस पर है। इन तस्वीरों में पुलिस की मौजूदगी भी दर्ज है तो यह हरगिज नहीं हो सकता कि पुलिस प्रशासन को इस वाकये के बारे में कुछ भी मालूम न हो।

हमारे पाठक बिना प्रिंट के सोशल मीडिया पर लाखों में हैं, दो दिनों से हम लगातार इस मामले को उठा रहे हैं।

लखनऊ की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर इसे उठा रही है।

दूसरे लोग भी सोशल मीडिया पर बेचैन करने वाली टिप्पणियां कर रहे हैं। लेकिन राजनीति और सत्ता के मोर्चे में सिरे से सन्नाटा है। मीडिया खामोश। खबर और तस्वीरें गलत हैं तो वही बता दें ताकि ज्यादा रायता न फैलें।

ऐसा भी नहीं कि सत्ता और राजनीति के लोग सोशल मीडिया पर नहीं है।

हम खुद तमाम मंत्रियों, अफसरों और सारे मीडिया संपादकों के साथ जुड़े हैं। मीडिया हमेशा आधिकारिक वर्जन को छापता है और सरकार या प्राशासन या पुलिस जबतक कनफर्म न कर दे, कोई खबर नहीं हो सकती। मसलन बिना एफआईआर दर्ज हुए किसी वारदात को मीडिया में खबर बनाने की सख्त मनाही है। ऊपर से गोपनीयता भंग न करने की शर्त है। इसी विशेषाधिकार के दम पर मध्य पूर्व एशिया, वियतनाम, अफ्रीका और लातिन अमेरिका में अमेरिका ने मीडिया की सर्वज्ञ खामोशी की आड़ में सीधे नरंहार अभियान चलाकर करोड़ों लोगों की जान लेते रहने का सिलसिला जारी रखा है। यही है अमेरिका के आतंक के खिलाफ युद्ध का आधार।

अमेरिका और इजराइल के और माफ करें, अखंड हिंदू राष्ट्र के आतंक के खिलाफ युद्ध का सच भी वहीं है कि मीडिया जनता के खिलाफ जारी चांदमारी पर खामोश आधिकारिक बयान और एफआईआर के इंतजार में होता है और पुलिस और प्रशासन के बयान को वह सौ टका सच मान लेता है, भले ही वह मंत्रियों और राजनेताओं की खूब खिंचाई करें अपने-अपने समीकरण के हिसाब से।

भारत में भुक्तभोगी का एफआईआर दर्ज हो तो करिश्मा समझें तो आधिकारिक खबरें छापने वाले मीडिया की औकात भी समझ लें।

चूंकि खंडन नहीं हुआ है अभी तक और हम सच जानना चाहते हैं, इसीलिए वे ही वीभत्स तस्वीरें फिर ताकि कम से कम आपके दिलोदिमाग में कोई हलचल हो।

सच सामने आया होता तो कि इराक ने कोई जलसंहारी हथियारों का जखीरा जमा नहीं किया तो यकीनन न्यूयार्क का ट्विन टावर वहीं बहाल रहता और दुनिया भर में मुसलमानों के कत्लेआम का यह जायनी जश्न भारत में भी मनाया नहीं जा रहा होता।

न्यूयार्क से लेकर गुजरात, गुजरात से लेकर यूपी, खस्मीर, मध्यभारत और असम तक सच कब सामने आया है?

 मीडिया की सीमा है लेकिन सत्ताविरोधी हर आवाज को कुचलने रौंदने और जनपदों से राजधानियों में भी सच बोलने लिखने का साहस कर रहे मडियाकर्मियों के वध महोत्सव के इस परिवेश में जब कश्मीर या मध्यभारत पर लिखा कुछ भी पोस्ट करने से तत्काल चंद सेकंड में ही सारे ईमेल आईडी ब्लाक कर दिये जायें, ब्लाग डिलीट कर दिये जायें, जैसा कि रोज रोज मेरे साथ होता है।

जबतक नये सिरे से रिेक्टिवेट हो आईडी या नये सिरे से ब्लाग बहाल हो तब तक डैमेज कंट्रोल हो जाता है।

इतने चाक चौबंद नियंत्रण प्रणाली के बावजूद नीतीश कुमार और लालू प्रसाद तो क्या केंद्र सरकार को अपनी तमाम एजंसियों और अपने डिजिटल इंडिया के सवा अरब लोगों से सीधे इंटरएक्ट करने वाले प्रधानमंत्री तक ये तस्वीरें पहुंची हैं नहीं, ऐसा कमसकम हम मान नहीं सकते।

फिर चुनाव समीकरण पलट देने वाले इस वाकये पर जीतन राम मांझी, दलितों के राम बने हनुमान रामविलास पासवान और उनके चतुर सुजान पुत्र चिराग पासवान क्यों खामोश हैं, यह समझ से परे हैं।

इस देश की इंच इंच जमीन पर संघपिरवार काबिज है और सचमुच उसका हिंदू राष्ट्र अखंड है तो बिहार में ओबीसी राजकाज के इस वाकये पर वह क्यों खामोश है।

इसका लेकिन जवाब है कि दलितों को और मुसलमानों को और आदिवासियों को हमेशा औकात में रखने की रणनीति सवर्ण राजनीति है संघपरिवार की समरसता रस से महमहाती।

चाहे घटना खैरलांजी की हो या नागौर की या बोलनगीर की, या मधय भारत के आदिवासी भूगोल की या कश्मीर या पूर्वोत्तर के आफ्स्पा आखेटगाहों की, जब बलात्कार के शिकार हों, कत्लेआम के शिकार हों, दलित, आदवासी या मुसलमान तो गोपनीयता की दुहाई देकर उनकी उदात्त घोषणा होती है कि यह नृशंस वारदात मनुष्यता के विरुद्ध अपराध है किसी दलित, मुसलमान या आदिवासी के खिलाफ नहीं।

वारदात की शिकार महिला या वारदात में जिनका कत्लेआम हुआ, उनकी पहचान बताकर अंखड हिंदू राष्ट्र और सनातन वैदिकी हिंदू समाज का विभाजन न करें और खासतौर पर वारदात जब बाहुबली या सवर्णों की ताकत का इजहार हो तो संघपरिवार योगाभ्यासी मौन धारण कर लेता है।

यह भी पढ़ें - फासीवाद : कारपोरेट राजनैतिक शासन की नग्न आतंकवादी तानाशाही

सत्तर दशक के जनांदोलनों की पैदाइश मुलायम, मायावती, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, शरद यादव और रामविलास पासवान इतने मुखर है कि हम उनकी आवाज को ही दलितों और पिछड़ों की आवाज मानते रहे हैं दशकों से। इनमें से सिर्फ मायावती की कोई भूमिका सत्तर के दशक में नहीं रही हैं और वे मान्यवर कांशीराम के बहुजन आंदोलन की उपज हैं।

सचमुच यकीन नहीं आता कि दिखाने को चेहरे अनेक हैं, संसद और विधानसभाओं में बहुजनों के मनुमाइंदे भी गिनती के लिए अनेक हैं, जिनकी सत्ता में भागेदारी को हम अब तक सामाजिक बदलाव मानते रहे हैं, लेकिन बाबासाहेब का मूक भारत नसिर्फ मूक है, वधिर और अंधा भी है। हम इस आलेख के साथ फिर वे ही तस्वीरें नत्थी कर रहे हैं, कृपया संबद्ध लोग बतायें कि ये तस्वीरें सच है या झूठ।

यह भी पढ़ें - एर्दोआन से मुहब्बत और मोदी-योगी से नफरत, यह सुविधा का सेकुलरिज्म है

बहरहाल धारणा यही है कि ओबीसी गिनती जनगणना में ओबीसी सिपाहसालारों की वजह से है, यह सरासर झूठ है। यह आंदोलन बामसेफ का रहा है, ओबीसी सिपाह सालारों और मनसबदारों का नहीं। बहरहाल धारणा यही है कि सरकार ये आंकड़ें सामने इसलिए नहीं ला रही है कि जनसंख्या के मुताबिक नौकरियों में आरक्षण देना होगा।

आरक्षण वोट बैंक के लिए बहुत काम की चीज है रोजी रोजगार और नौकरियों के लिए नहीं।

मान लीजिये कि आंकड़े जग जाहिर हो भी गये और ओबीसी प्रदानमंत्री ने जनसंख्या के हिसाब से सुप्रीम कोर्ट की बाधादौड़ पूरी करके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दे भी दिया तो नौकरियां कहां हैं, उसका जायजा तो ले लीजिये। नौकरियां सार्वजनिक क्षेत्र में रह ही कितनी गयी है? वहां 1991 से स्थाई नौकरियां हैं ही कितनी? 1991 से नियुक्तियों के आंकडे तो पहले सार्वजनिक करायें। दरअसल जाति आधारित जनगणना से पहले संपूर्ण निजाकरण और संपूर्ण विनिवेश के आर्थिक सुधार लागू हैं और नौकरियां भी पीपीपी माडल

यह भी पढ़ें - गर्भ चीरने वाले बन गए, मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

एफडीआई में निष्णात हैं नौकरियां, आजीविकाएं, रोजी रोटी , जल जंगल जमीन नागरिकता, नागरिक और मानवाधिकार। बहुजनों की सत्ता में भागेदारी की राजनीति ने इस अश्वमेध अभियान के खिलाफ कभी अपना विरोध दर्ज कराया हो तो ब्यौरा जरुर दें।

गौर करें कि सरकारी नौकरियों में फजीहत इतनी ज्यादा है कि दबंग मेधा समुदायों को उनकी कोई गरज नहीं है क्योंकि निजी क्षेत्र में आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए गिनी चुनी नौकरियां हैं और जिन्हें मिल भी जाती हैं वे नौकरियां, उनकी कोई तरक्की नहीं होती।

यह भी पढ़ें - राजनीति में माँ : सत्ता की माँ और प्रतिरोध की माँ

 मीडिया में एक बार दाखिला लेकर तो देखें कि क्या हाल बनता है दो चार जातियों के अलावा बाकी किसी समुदाय से आये लोगों का। उन जातियों का हम नाम नहीं लेंगे बहरहाल। क्योंकि निजी क्षेत्र में शत प्रतिशत वर्चस्व सिर्फ खास इनी गिनी जातियों का है। फिर भी बहुजन समाज का झूठ बहुजनों के लिए ख्वाहबी पुलाव है और जाति की पहचान और गिनती के भरोसे वे गौतम बुद्ध की क्रांति दोहराने का ख्वाब देखते हैं जबकि ओबीसी के सबसे ज्यादा लोग राजकाज में हैं केंद्र में भी और राज्यों में भी और उन्हें वाकई दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों से कुछ लेना देना नहीं है। फिर भी हिंदुत्व की इस नर्क को बनाये रखने में सारे बहुजन एक हैं।

यह भी पढ़ें - संघी घोड़े की ढाई चाल : तीन तलाक का मुद्दा

मनुस्मृति भी जलायेंगे और जात पांत से चिपके भी रहेंगे, ऐसी होगी क्रांति, वाह। आपको याद होगा कि एक अंग्रेजी अखबार ने बरसों पहले डीएनए रपट के आधार पर खबर निकाली थी कि ब्राह्मण विदेशी हैं। आज उसी समूह के सबसे बड़े आर्थिक अखबार में फिर खुलासा हुआ है कि सरकार को इस बात का कतई डर नहीं है कि ओबीसी गिनती हुई तो तो बराबर हिसाब करना होगा और नौकरियां देनी होंगी क्योंकि आरक्षण देने लायक नौकरियां हैं ही नहीं और सारी आजीविकाएं, रोजी रोटी और नौकरियां मेकिंग इन पीपीपी है।

यह भी पढ़ें -

 भाजपा का उदय ही सांप्रदायिक हिंसा से हुआ था

खुलासा हुआ है कि अब आरक्षण से मनुस्मृति के वारिसान कतई डरते नहीं है और आर्थिक सुधारों से जो निजी क्षेत्र का देश बना है, उसमें दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों के लिए कोई जगह दरअसल नहीं है। फिर वही निष्कर्ष भूलभूलैय्या जिसमें बहुजन जनता की भेड़धंसान है कि जाति जनसंख्या के आंकड़ों से डर इसलिए है कि इनसे साबित होता है कि बहुजनों को किसी भी क्षेत्र में कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है और सत्ता में हिस्सेदारी तब देनी ही पड़ेगी। सत्ता का लालीपाप फिर वही।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
hastakshep
>