अमेरिका का ही उत्पाद है "इबोला" ?

व्हाइट हाउस कोई स्पष्टीकरण देगा या ग्वाटेमाला में किए गए क्लीनिकल ट्रायल पर छह दशक बाद मांगी गई माफी की तरह ही छह दशक बाद इबोला के लिए अफ्रीकियों से माफी मांगेगा ?...

अमलेन्दु उपाध्याय

इबोला एक गंभीर अंतर्राष्ट्रीय बीमारी के रूप में सामने आया है। इसकी गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इससे निपटने को आक्रामक कदम उठाने के लिए अपने प्रशासन को लगातार निर्देश दे रहे हैं और अपने साप्ताहिक संबोधन में भी इबोला से लड़ने पर जोर दे रहे हैं।

लेकिन क्या यह आरोप सही है कि अमरीका का रक्षा विभाग व पश्चिमी देश, अफ्रीकी देशों में इबोला वायरस के फैलने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं?

दरअसल कुछ अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों का आरोप है कि इबोला से दवा बनाने वाली अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हितसाधन कर रही हैं और इबोला कोई महामारी या प्राकृतिक प्रकोप नहीं है, बल्कि यह अमेरिका के जैव रसायन कारखाने की देन है।

कुछ अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने आरोप लगाया है कि इबोला और एड्स जैसे घातक रोग अफ्रीकियों पर परीक्षण किये जा रहे जैव हथियार हैं।

अफ्रीकी मीडिया खासकर लाइबेरिया में आई कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक इबोला वायरस अफ्रीका की आबादी कम करने का अमेरिकी प्रयास है। लाइबेरिया महाद्वीपों की सबसे तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या वाला देश है।

लाइबेरिया विश्वविद्यालय के कृषि और वानिकी विद्यालय में प्लांट पैथोलॉजी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक ने लाइबेरिया के डेली ऑबजर्बर में विगत माह प्रकाशित लेख में दावा किया था कि सियरा लियोन के केनेमा कस्बे में अमरीकी सरकार की एक अनुसंधान प्रयोगशाला है, जहां ब्रॉडरिक के शब्दों में “वायरल फीवर टेररिज्म” का अध्ययन किया जाता है।

उनके अनुसार यह प्रयोगशाला पश्चिम अफ्रीका में इबोला का प्रकोप फैलाने का उपरिकेंद्र है। वह कहते हैं कि “ज्यादातर वायरल या बैक्टीरियल जीएमओ के स्रोतों जिन्हें रणनीतिक रूप से जैविक हथियार के डिजाइन में बनाया गया है, से संयुक्त राज्य अमेरिका और अधिकांश पश्चिमी देशों जैसी संपन्नता से विहीन कम समृद्ध गरीब देशों, खासकर अफ्रीकी नागरिकों, के बचाव के लिए सकारात्मक कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है।”

वह कहते हैं इबोला एक आनुवंशिक रूप से संशोधित ऑर्गेनिज्म (जीएमओ) है।  

डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं, जब वह कहते हैं कि, यह सर्वाधिक परेशान करने वाली बात है कि अमेरिकी सरकार सिएरा लियोन में एक वायरल रक्तस्रावी बुखार जैव आतंकवाद (viral hemorrhagic fever bio-terrorism) अनुसंधान प्रयोगशाला संचालन कर रही है। क्या वह (अमरीकी सरकार) और भी जैव आतंकवाद अनुसंधान प्रयोगशालाएं- बायो टेररिज्म रिसर्च लेबोरेटरी चला रही है?”

प्रोफेसर डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक के रहस्योद्घाटन को भारत में चल रहे अवैध क्लीनिकल ट्रायल्स के जरिए भी समझा जा सकता है। एक गैर सरकारी सामाजिक संस्था स्वास्थ्य अधिकार मंच ने पिछले दिनों एक विज्ञप्ति में कहा था कि उसके द्वारा फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका पर उत्तर देते हुए सरकार ने स्वीकार किया था कि अवैध दवा परीक्षण के चल रहे 475 क्लीनिकल ट्रायल्स के मामले में सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। इससे एक बात तो साबित होती है कि गरीब मुल्कों के बाशिन्दों पर क्लीनिकल ट्रायल्स किए जाते हैं और उनमें मौतें भी होती हैं।

बॉडरिक के दावे पर सहज विश्वास इसलिए भी किया जा सकता है कि अक्टूबर 2010 में बॉस्टन ग्लोब में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक वेलेस्ले कॉलेज में महिला और लिंग के अध्ययन के प्रोफेसर; व महिला स्वास्थ्य के विषय पर कार्य करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता व हैल्थ पॉलिसी विश्लेषक व मेडिकल इतिहासकार सुसान एम रेवरबाई ने 2010 में खुलासा किया था कि अमेरिकी सरकार के वैज्ञानिकों ने चालीस के दशक (1940) में सैकड़ों ग्वाटेमाला के नागरिकों को जानबूझकर उनकी बिन अनुमति के सिफलिस और सूजाक से संक्रमित कर क्लीनिकल ट्रायल किए। अमेरिका की ओर से कभी भी इस अनैतिक अनुसंधान का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया गया, परंतु जब राष्ट्रपति ओबामा और दो ​​कैबिनेट सचिवों ने ग्वाटेमाला की सरकार और लोगों से माफी मांगी और अतीत की गलतियों को यह कहते हुए नहीं दोहराने का वचन दिया कि वह एक युग था जब मरीजों की सहमति के बिना उन पर प्रयोग करना डॉक्टरों के लिए असामान्य नहीं था, तब सुसान एम रेवरबाई के खुलासे पर मुहर लगी।

बॉस्टन ग्लोब की 2010 में प्रकाशित खबर के मुताबिक ओबामा ने ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति अलवारो कोलोम कैबेलर्स को फोन करके माफी माँगी थी और ओबामा के प्रवक्ता ने संवाददाताओं को बताया था कि प्रयोग "दुखद था और अमेरिका उन सभी से क्षमा मांगता है जो इससे प्रभावित हुए थे।"

दरअसल यह खुलासा ऐसे हुआ कि रेवरबाई अपनी पुस्तक "एक्जामिनिंग तुस्केजी" "Examining Tuskegee" के संदर्भ में जब पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड्स को खंगाल रही थीं, तभी उन्हें अमेरिका के सर्जन जनरल के रिकॉर्ड्स में इसकी जानकारी मिली और अमेरिका का एक गंदा रहस्य दुनिया के सामने उजागर हो गया।

डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और कई अन्य संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने वैकसीनेशन को बढ़ावा देने के लिए अफ्रीकी देशों को फंसाया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान अफ्रीका के चारों ओर व पश्चिमी अफ्रीका में बीमारियों खासकर इबोला के उभार और परीक्षण के लिए चुना गया है।

डॉ. ब्रॉडरिक ने रहस्योद्घाटन किया है, “अमेरिका का रक्षा विभाग मनुष्यों पर इबोला के ट्रायल को फंडिंग कर रहा है। यह ट्रायल कुछ सप्ताह पहले ही सियरा लियोन के गिनी में शुरू किया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक कनाडियन फार्मास्युटिकल कंपनी टेकमिरा को मनुष्यों पर इबोला का ट्रायल करने के लिए 140 मिलियन डॉलर का कॉँट्रैक्ट दिया। इस शोध कार्य में स्वस्थ मनुष्यों में घातक इबोला वायरस को इंजेक्ट करना शामिल था। अमेरिकी रक्षा विभाग इबोला क्लिनिकल ट्रायल NCT02041715 में सहयोगी के रूप में लिस्टेड है।“

डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक के आलेख पर अखबार के ई-संस्करण पर लंबी बहस चली है। नेशनल पोर्ट अथॉरिटी लाइबेरिया में कार्यरत रहे जेस्से मसोन ने डॉ. बॉडरिक के आलेख पर जो कमेंट किया है, वह अफ्रीकी देशों के नागरिकों में व्याप्त बेचैनी की गवाही देता है-

“इबोला का निर्माण आनुवंशिकी वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इन वैज्ञानिकों ने इस वायरस का निर्माण किया और जब इसका इलाज मिल गया तो इसे फैलाया गया ताकि पीड़ित दवाएं खरीदें। वे आपराधिक तौर पर अफ्रीकी संसाधनों पर कब्जा करने व विश्व जनसंख्या खासकर अफ्रीका की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं।“

बहरहाल इबोला से निपटने के प्रयासों के बीच अमेरिका भी सवालों के घेरे में आ ही गया है। याद होगा कि इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर अमेरिका ने आरोप लगाया था कि इराक रासायनिक हथियारों का प्रयोग कर रहा है। हालांकि उस वक्त भी आरोप लगे थे कि जिन जैव हथियारों का इराक के पास होने का आरोप लगाया जा रहा है वे तो अमेरिका ने ही सद्दाम सरकार को ये घातक जीवाणु और विषाणु 1980 में न्यायोचित चिकित्सा अनुसंधान के घोषित लक्ष्य के लिए दिए थे। लेकिन कहा जा रहा है कि तब इराक-ईरान युद्ध जोरों पर था और ईरान-अमेरिका के बीच तनाव भी चरम पर था इसलिए ईरान के विरुद्ध इन जैव हथियारों का प्रयोग करने के लिए सद्दाम सरकार को ये हथियार सौंपे गए थे।

वर्ष 2002 में समाचार एजेंसी एपी की वाशिंगटन डेटलाइन से प्रकाशित एक खबर में कहा गय़ा था,

“अमेरिकी कांग्रेस और सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के दस्तावेजों से यह सनसनीखेज रहस्योद्घाटन हुआ है कि खतरनाक जीवाणुओं के नमूने सीधे इराक के उन केन्द्रों को भेजे गए थे जिन पर अब संयुक्त राष्ट्र हथियार निरीक्षण दल को शक है कि वे जैव हथियारों के इराकी कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। दस्तावेजों से साफ है कि इराक ने जैव हथियार बनाने के लिए जिन जीवाणुओं का इस्तेमाल किया है, वे सब के सब सीडीसी और एक अमेरिकी जैव नमूना कंपनी ' अमेरिकन टाइप कल्चर कलेक्शन' के भेजे हुए हैं। इन जीवाणुओं में बहुचर्चित एन्थ्रेक्स भी है जो घातक बोटुलिनम विष का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त अमेरिका ने इराक को गैस गैंगरीन फैलाने वाला अत्यंत घातक जीवाणु भी सौंपा था। इतना ही नहीं अमेरिका इराक को 'वेस्ट नाइल' विषाणु समेत अनेक मारक पैथोजेन्स भी सौंप चुका है।“ बीबीसी के साथ एक बातचीत में अमरीका के बुश प्रशासन की एक वरिष्ठ अधिकारी, तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, कॉन्डोलिज़ा राईस ने उस वक्त कहा था, "इराकी नेता ने जैव हथियार बनाए हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को बार-बार इन हथियारों की संख्या के विषय में झूठ बोला है और अपने ही लोगों और पड़ोसियों के विरुद्ध रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है।"

और इन्हीं आरोपों के बाद इराक पर हमला करके उसे तबाह-औ-बरबाद कर दिया गया था। अब प्रश्न उठता है कि क्या डॉ. सिरिल ब्रॉडरिक के आलेख में लगाए गए आरोपों के बाद व्हाइट हाउस कोई स्पष्टीकरण देगा या ग्वाटेमाला में किए गए क्लीनिकल ट्रायल पर छह दशक बाद मांगी गई माफी की तरह ही छह दशक बाद इबोला के लिए अफ्रीकियों से माफी मांगेगा ?

यह आलेख मूलतः November 7,2014 01:30 प्रकाशित हुआ था।

नोट - यह समाचार किसी भी हालत में चिकित्सकीय परामर्श नहीं है। यह समाचारों में उपलब्ध सामग्री के अध्ययन के आधार पर जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई रिपोर्ट मात्र है। आप इस समाचार के आधार पर कोई निर्णय कतई नहीं ले सकते। स्वयं डॉक्टर न बनें किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लें।) 

 

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