आरक्षण (प्रतिनिधित्त्व) क्यों नहीं मिलना चाहिए…….????

सवाल उठता है जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं। वो किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं? क्या इस तरह का समाज जिसमें गैरबराबरी-व्यवस्था को बनाए रखें ?

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-09-10 15:58:16

आरक्षण (प्रतिनिधित्त्व) क्यों नहीं मिलना चाहिए…….????

रजनीश कुमार अम्बेडकर

आज जहां से देश में बौद्धिक वर्ग का निर्माण होता है, वहां पर क्या जातिवाद नहीं है ??? इसलिए इस रिपोर्ट को जरूर पढ़ें....!

आइए देखते हैं देश के कुल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल प्रोफेसरों के पद-10086 हैं, जिसमें ओबीसी- 642 (पुरूष- 500, महिला-142), एससी- 695 (पुरूष- 531, महिला-164), एसटी- 502 (पुरूष- 317, महिला-185), पीडब्ल्यूडी- 72 (पुरूष- 59, महिला-13), मुस्लिम- 1420 (पुरूष- 1074, महिला-346) और अन्य अल्पसंख्यक - 150 (पुरूष- 93, महिला-57) हैं। जो कुल मिलाकर 3481 पदों पर हैं। जिसमें सामान्य- 6605 पदों पर हैं।

अत: अंतर साफ नजर आता होगा कौन किसके पदों पर कब्जा बनाए हुए है....???

इसी प्रकार से देश के कुल राज्य विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के पद- 38578 हैं। जिसमें ओबीसी- 6067 (पुरूष- 4585, महिला-1482), एससी- 3567 (पुरूष- 2606, महिला-961), एसटी- 648 (पुरूष- 472, महिला-176), पीडब्ल्यूडी-134 (पुरूष- 100, महिला-34), मुस्लिम- 998 (पुरूष- 780, महिला-218), और अन्य अल्पसंख्यक- 636 (पुरूष- 370, महिला-266) हैं। जो कुल मिलाकर 12050 पदों पर हैं। जिसमें सामान्य- 26528 पदों पर हैं। इसमें भी आप लोगों को अंतर साफ नजर आता होगा, कौन किसके पदों पर कब्जा बनाए हुए है...??? (स्रोत- UGC REPORT RTI : 2011-12)

अम्बेडकरी व्यवस्था क्यों जरूरी है

अब सवाल उठता है जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं। वो किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं? क्या इस तरह का समाज जिसमें गैरबराबरी-व्यवस्था को बनाए रखें ? या फिर गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर मानवतावादी व्यवस्था बनाने वाली विचारधारा, जिसमें संपूर्ण मानव का निर्माण समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व एवं न्याय के आधार पर किया जा सके। ऐसी सामाजिक-व्यवस्था बनाने के लिए हमें अम्बेडकरी विचारधारा की आवश्कता होगी। इसको हम “अम्बेडकरवाद” कह सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में सबको विकास, समान प्रतिनिधित्व एवं सहभागिता का अधिकार मिलता है।

किसी भी धर्म, जाति या रंगभेद को नहीं मानता अम्बेडकरवाद

अम्बेडकरवाद किसी भी धर्म, जाति या रंगभेद को नहीं मानता, अम्बेडकरवाद मानव को मानव से जोड़ने या मानव को मानव बनाने का नाम है। अम्बेडकरवाद वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मानव के उत्थान के लिए किए जा रहे आन्दोलन या प्रयासों के नाम है। अम्बेडकरवाद “भारत के संविधान” को भी कहा जा सकता है।

एक अम्बेडकरवादी होना तभी सार्थक है, जब मानव वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर समाज और मानवहित में कार्य किया जाए। अब तय आप लोग करें... गैरबराबरी वाला समाज चाहिए या समतामूलक समाज...... जरूर बताएं .....! फिर जी खोलकर आरक्षण का विरोध करें.... मैं आपके साथ में कधें-से कंधा मिलाकर चलूंगा.......!

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

rame>

(हस्तक्षेप पर June 3,2016 11:07 को प्रथम बार प्रकाशित)

संबंधित समाचार :