ईद : पैगाम-ए- मोहब्बत

हस्तक्षेप
Updated on : 2013-08-09 20:47:51
ईद : पैगाम-ए- मोहब्बत डॉ. मोहम्मद आरिफ ईद-उल-फितर यानी ईद का नाम जेहन में आते ही खुशी का अहसास होने लगता है। वास्तव में यही इसका मकसद भी है। रमजान-उल-मुबारक के एक माह बाद ईद का चांद दिखलाई पड़ता है जिससे हर रोजेदार के चेहरे खिल उठते हैं और चारों ओर मस्ती का आलम फैल जाता है। रमजान के पूरे महीने इबादत और पाकीजगी में गुजारने वाले नेक बन्दों पर खुदा मेहरबान होता है। कुरआन में साफ-साफ लिखा है कि ऐ ईमानवालों ! रोजे तुम पर फर्ज किये गये ताकि तुम परहेजगार बन जाओ। ईद का चाँद निकलते ही एक-दूसरे की मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू होता है जो खुशी के इजहार का इन्सानी तरीका है। यह इस बात का भी सबूत हे कि खुदा ने हमारी इबादत कुबूल कर ली है और हमें ईद का नायाब तोहफा अता किया। लोग अपनी जरूरतों की चीज की खरीददारी में लग जाते हैं। बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है। मानों उन्होंने खुशी का समन्दर पा लिया हो। हर एक अमीर-गरीब, बच्चा-बूढ़ा सिर्फ यह सोचता है कि कैसे सुबह हो और नमाज अदा की जाय। लोगों के दिलो-दिमाग में बार-बार यह बात आती है कि खुदा का लाख-लाख शुक्र है जो उसने हमें रमजान जैसा पाक महीना और रोजे जैसी बरकत दी है और उसी मेहरबानियों का नतीजा ईद है।         इस्लामिक त्योहारों का मकसद सिर्फ खुशी का इजहार करना नहीं है बल्कि इसके पीछे कुछ ठोस वैज्ञानिक एवं सामाजिक कारण भी हैं। जिस समय इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ, पूरा अरबिस्तान सामाजिक बुराईयों एवं आर्थिक विषमता के मकड़जाल में जकड़ा हुआ था। इस्लाम के सामने यह एक यक्ष प्रश्न था जिसका हल खुदा के रसूल को ढूढ़ना था। रसूल-ए-अकरम ने जिन त्योहारों के जरिये इस विषमता को दूर कर एक समरस समाज बनाने की कोशिश की उसमें ईद-उल-फितर की खास अहमियत है। जकात एवं सदक-ए-फित्र की व्यवस्था सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विपन्नता को ध्यान में रखकर ही की गयी है। चूँकि इस्लाम में सम्पत्ति संग्रह को वर्जित किया गया है और अल्लाह के नेक बन्दों से यह अपेक्षा की गयी है कि वे जरूरत से अधिक धन एकत्रित न करें इसलिए एक तरीका ऐसा निकाला गया जिससे धन का वितरण जरूरतमन्दों के बीच भी होता रहे। जकात इसी प्रक्रिया को पूरा करता है। रमजान में जकात देने का जो मकसद है वह साफ-साफ इस बात की ओर इशारा करता है कि ईद का चाँद निकलने से पहले हर व्यक्ति अपनी जरूरत की चीजें हासिल कर ले जिससे वह ईद की खुशी का लुत्फ उठा सके। रसूल-ए-पाक ने अनेक बार इस बात को दोहराया है कि यदि समाज का एक तबका अपनी जायज जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता है तो आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे उसे खुशहाल जिन्दगी बसर करने में मदद करें। यही अल्लाह के नेक बन्दों का काम है। इस तरह ईद अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाटने में पुल का काम करती है। हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने भी कहा है कि अल्लाह के नजदीक वही व्यक्ति होगा जो टूटे हुए दिलों पर मरहम लगायेगा और उन्हें खुशी देगा। जरूरतमन्द लोगों की ईद को खुशगवार बनाने के लिए मुसलमानों को सदक-ए-फित्र देने का हुक्म दिया गया है। यह उन्हीं लोगों को दिया जा सकता है जो जकात के हकदार हैं यानी गरीब, मजलूम और मिस्कीन। ईद की नमाज पढ़ने से पहले अनाज या पैसे की शक्ल में इसे निकाल दिया जाय। हजरत मुहम्मद साहब ने सदक-ए-फित्र के बारे में कहा कि गरीबों एवं मोहताजों को इतना दे दो कि ईद के दिन उन्हें किसी चीज का अभाव महसूस न हो और वे निश्चिन्त होकर खुदा का शुक्रिया अदा कर सकें। इस तरह ईद के बहाने हर साल आर्थिक विषमता को दूर करने का एक प्रयास किया जाता है। इस्लाम का अर्थ ही शान्ति होता है लेकिन तब तक शान्ति नहीं हो सकती जब तक की आर्थिक विषमता की खाई पट न जाय। जकात एवं सदका ऐसी इस्लामी व्यवस्था है जिसका ईमानदारी से निर्वहन कर हम न केवल आर्थिक विषमता को दूर कर सकते हैं बल्कि ईद की वास्तविक खुशी भी प्राप्त कर सकते हैं जो इस त्योहार का मूल उद्देश्य है। खुदाई फरमान को आए सदियों हो गये परन्तु अभी तक विषमता की खाई बरकरार है। हमें आत्मचिन्तन करना होगा कि गरीबों एवं मजलूमों का यह हक उन्हें मिल रहा है कि नहीं इसके लिए सार्थक पहल की जरूरत है। ईद की नमाज के लिए प्रत्येक व्यक्ति नये-नये  कपड़े पहनता है, इत्र लगाता है और घर में मुंह मीठा कर ईदगाह में नमाज अदा करता है। नमाज के बाद लोग एक-दूसरे के गले लगकर मुबारकबाद देते हैं। देखने में यह एक साधारण सा कार्य लगता है लेकिन इसके पीछे जो मकसद छिपा हुआ है वह सामाजिक समानता और न्याय का महत्वपूर्ण पहलू है। अमीर एवं गरीब बिना भेदभाव के एक-दूसरे को खुशी-खुशी गले लगाते हैं और हाथ मिलाते हैं जो अन्य खास मौकों पर नामुमकिन होता है। ईद नामुमकिन को मुमकिन बना देती है। अर्थात ईद ऊँच-नीच, अमीर-गरीब एवं छोटे-बड़े का फर्क खत्म कर देती है। ईद के जरिये इन्सान के दिलों में एक ऐसा अहसास उभरता है कि सभी इन्सान बराबर हैं और वास्तव में यही फरमान-ए-इलाही भी है। ईद का दिन इन्सानियत और मुहब्बत का होता है। ईद का एक दूसरा पहलू यह भी है कि इस दिन आपसी तनाव, रंजिश व दुश्मनी का एक-दूसरे को गले लगाकर भुला दिया जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ईद के दिन से पिछली जिन्दगी के गम-ओ-गुस्सा को भूलकर नई खुशनुमा जिन्दगी का आगाज होता है। इस तरह ईद आर्थिक विषमता को दूर करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि सामाजिक समानता एवं सौहार्द का प्रतीक भी है।  बनारस की ईद हिन्दुस्तान में मुसलमानों के आने के साथ ही ईद मनाने के दृष्टान्त मिलने लगते हैं। बनारस में मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व ही मुस्लिम बस्तियां बस गयी थी और गोविन्दपुरा एवं हुसैनपुरा में ईद की नमाज पढ़ने की जानकारी मिलती है। जयचन्द की पराजय के बाद बनारस के मुसलमानों की ईद को देखकर कुतुबुद्दीन को आश्चर्य हुआ कि ईद की नमाज के बाद जो सौहार्द पूर्ण वातावरण यहाँ पर बना हुआ है उसमें हिन्दू मुसलमान की अलग-अलग पहचान करना मुश्किल है। यह बनारसी तहजीब थी जो मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व बनारस में मौजूद थी। जिसने एक नई संस्कृति हिन्दुस्तानी तहजीब को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक ईद का त्योहार पारम्परिक ढंग से मनाया जाता है। अनेक बार दहशत पसन्द ताकतों द्वारा इसमें रोड़ा अटकाने की नाकाम कोशिश की गयी लेकिन बनारस के हर धर्म-बिरादरी के लोगों द्वारा इसमें शिरकत एवं खुशी का इजहार करना आम बात है। ईद बनारस के लोगों के बीच गंगा-जमुनी तहजीब का आइना है। इधर ईद मिलन समारोहों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है जो स्वस्थ परम्परा का प्रतीक है। इस समारोह में प्रत्येक धर्म एवं विश्वास के लोग साम्प्रदायिक तनाव से मुक्त होकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं तथा ईद के वास्तविक मकसद को जानने-समझने की कोशिश करते हैं। (लेखक सेन्टर फॉर हारमोनी एण्ड पीस, वाराणसी के चेयरमैन हैं)
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