उप्र : अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची में शामिल करने की घोषणा केवल चुनावी भुलावा

उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण उपलब्ध है। अतः इसे डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में बाँट कर उपलब्ध आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बा

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Updated on : 2018-09-10 16:18:32

उत्तर प्रदेश : अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची में शामिल करने की घोषणा केवल चुनावी भुलावा

एस आर दारापुरी,

आइपीएस (से.नि.),

राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार ने 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचीत जातियों की सूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव पारित कर इसे केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया है जिनमें निषाद, बिन्द, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा तथा गौड़ आदि जातियां शामिल हैं। सरकार का कदम इन जातियों को कोई वास्तविक लाभ न पहुंचा कर केवल उनको भुलावा देकर वोट बटोरने की चाल है।

इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि इस से पहले भी वर्ष 2006 में मुलायम सिंह की सरकार ने 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचीत जातियों की सूची तथा 3 अनुसूचीत जातियों को अनुसूचीत जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए शासनादेश जारी किया था, जिसे आंबेडकर महासभा तथा अन्य दलित संगठनों द्वारा न्यायालय में चुनौती देकर रद्द करवा दिया गया था। परन्तु सपा ने यह दुष्प्रचार किया था कि इसे मायावती ने 2007 में सत्ता में आने पर रद्द कर दिया था।

वर्ष 2007 में सत्ता में आने पर 2011 में मायावाती, जो कि अपने आप को दलितों का मसीहा घोषित करतीं हैं, ने भी इसी प्रकार से 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचीत जातियों की सूची में शामिल करने की संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेजी थी। इस पर केन्द्रीय सरकार ने इस के औचित्य के बारे में उस से सूचनाएं मांगी तो वह इस का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकीं और केन्द्रीय सरकार ने उस प्रस्ताव को वापस भेज दिया था।

इस विवरण से स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी और बसपा इन पिछड़ी जातियों को अनुसूचीत जातियों में शामिल कराकर उन्हें अधिक आरक्षण दिलवाने का लालच देकर केवल उनका वोट प्राप्त करने की राजनीति कर रही हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि न तो उन्हें स्वयम् इन जातियों को अनुसूचीत जातियों की सूची में शामिल करने का अधिकार है और न ही यह जातियां अनुसूचीत जातियों के माप दंड पर पूरा ही उतरती हैं।

वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी जाति को अनुसूचीत जातियों की सूची में शामिल करने अथवा इस से निकालने का अधिकार केवल संसद् को ही है। राज्य सरकार औचित्य सहित केवल अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज सकती है जो इस सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार ही रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया तथा राष्ट्रीय अनुसूचीत जाति आयोग से परामर्श के बाद संसद् के माध्यम से ही किसी जाति को सूची में शामिल कर अथवा निकाल सकती है।

संविधान की धारा 341 में राष्ट्रपति ही राज्यपाल से परामर्श करके संसद द्वारा कानून पास करवा कर इस सूची में किसी जाति का प्रवेश अथवा निष्कासन कर सकता है। इस में राज्य सरकार को कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है।

वास्तव में यह पार्टियाँ अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज कर सारा मामला कांग्रेस की झोली में डालकर यह प्रचार करती हैं कि हम तो आप को अनुसूचित जातियों की सूची में डलवाना चाहते हैं परन्तु केंद्र सरकार उसे नहीं कर रही है। यह अति पिछड़ी जातियों को केवल गुमराह करके वोट बटोरने की राजनीति है जिसे अब शायद ये जातियां भी बहुत अच्छी तरह से समझ गयी हैं।

अनुसूचित जाति में शामिल नहीं हो पाएंगी अति पिछड़ी जातियां क्योंकि ...

इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि अखिलेश यादव की सपा सरकार अथवा मायावती की बसपा सरकार द्वारा जिन अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में डालने की जो संस्तुति पहले की गयी थी अथवा आगे की जाएगी वह मान्य नहीं होगी क्योंकि यह जातियां अनुसूचित जातियों की अस्पृश्यता की आवश्यक शर्त को पूरा नहीं करती हैं। यह सर्व विदित है कि अनुसूचीत जातियां सवर्ण हिन्दुओं के लिए अछूत हैं जबकि सम्बंधित पिछड़ी जातियां उन के लिए सछूत हैं। इस प्रकार उनका किसी भी हालत में अनुसूचीत जातियों की सूची में शामिल किया जाना संभव नहीं है। यदि सपा सरकार इन पिछड़ी जातियों को आरक्षण का वांछित लाभ वास्तव में देना चाहती है, जो कि वार्तमान में उन्हें पिछड़ों में समृद्ध जातियों (यादव, कुर्मी तथा जाट आदि ) के शामिल रहने से नहीं मिल पा रहा है, तो उसे इन जातियों की सूची को तीन हिस्सों में बाँट कर उनके लिए 27% के आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँट देना चाहिए। देश के अन्य कई राज्य बिहार, तमिलनाडु, कर्नाटक अदि में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है। मंडल आयोग की रिपोर्ट में भी इस प्रकार की संस्तुति की गयी थी।

1975 में बना था साथी आयोग

उत्तर प्रदेश में इस सम्बन्ध में 1975 में डॉ छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में सर्वाधिक पिछड़ा आयोग गठित किया गया था जिस ने अपनी रिपोर्ट 1977 में उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी थी परन्तु उस पर आज तक कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी।

साथी आयोग ने पिछड़े वर्ग की जातियों को तीन श्रेणियों में निम्न प्रकार बाँटने तथा उन्हें 29.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की थी।

"अ" श्रेणी में उन जातियों को रखा गया था जो पूर्ण रूपेण भूमिहीन, गैर-दस्तकार, अकुशल श्रमिक, घरेलू सेवक हैं और हर प्रकार से ऊँची जातियों पर निर्भर हैं। इनको 17% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।

"ब" श्रेणी में पिछड़े वर्ग की वह जातियां, जो कृषक या दस्तकार हैं। इनको 10% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।

"स" श्रेणी में मुस्लिम पिछड़े वर्ग की जातियां हैं जिनको 2.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण उपलब्ध है। अतः इसे डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में बाँट कर उपलब्ध आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँटना अधिक न्यायोचित होगा। इस से अति पिछड़ी जातियों को अपने हिस्से के अंतर्गत आरक्षण मिलना संभव हो सकेगा।

समृद्ध जातियों यादव, कुर्मी और जाट के लिए आरक्षण बढ़ाना चाहती है सपा सरकार

इन अति पिछड़ी जातियों को यह भी समझना होगा कि सपा सरकार इन अति पिछड़ी जातियों को इस सूची से हटा कर अपनी समृद्ध जातियों यादव, कुर्मी और जाट के लिए आरक्षण बढ़ाना चाहती है और उन्हें अनुसूचीत जातियों से लड़ाना चाहती है। अतः उन्हें सपा और बसपा की इस चाल को समझाना चाहिए और उन के इस झांसे में न आ कर डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुसार अपना आरक्षण अलग कराने की मांग उठानी चाहिए।

इसी प्रकार कुछ जातियां जो वर्तमान में अनुसूचीत जातियों की सूची में हैं परन्तु उन्हें अनुसूचीत जनजातियों की सूची में होना चाहिए उन्हें सपा सरकार से एक आयोग बना कर उनकी स्थिति का आकलन करवा भारत सरकार को संस्तुति करने की मांग उठानी चाहिए तभी इन जातियों को भी उचित न्याय मिल सकेगा वरना वे इन पार्टियों द्वारा झूठे आश्वासन दे कर इसी तरह ठगे जाते रहेंगे।

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(हस्तक्षेप पर प्रथम बार December 23,2016 09:14 को प्रकाशित )

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