एक ख़ास तरह के अंधराष्ट्रवाद के शिकार थे राजेन्द्र माथुर

[box type="note" ]राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता पर वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद स्वरूप वर्मा जी का यह लेख 1987 में 'हंस' में छपा था. वर्मा जी का राजेंद्र माथुर के संदर्भ में राय है, “उनकी भाषा बहुत शानदार थी लेकिन एक ख़ास तरह के अंधराष्ट्रवाद से वह ग्रस्त थे यद्यपि माथुर साहब का राष्ट्रवाद प्रभाष जोशी के 'उग्र' राष्ट्रवाद से कम आक्रामक था. बहरहाल, हिंदी का यह दुर्भाग्य ही कहेंगे इन दोनों 'महान' संपादकों ने हिदी पत्रकारिता को प्रतिगामी बनाने में ज़बर्दस्त योगदान किया.” लेख लंबा है, धैर्य से पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से भी अवगत कराएं। इस बहस में यदि आपको भी कुछ कहना है तो हमें अपने विचार भेजें।[/box] सितम्बर 1987 के ‘हंस’ में प्रकाशित    हिंदी पत्रकारिता संदर्भ राजेन्द्र माथुर आनंद स्वरूप वर्मा अब से कुछ वर्ष पूर्व तक 25  करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी में ऐसा एक भी दैनिक पत्र नहीं था जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलता रहा हो, जो राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर व्यापक जनमत तैयार करने की सामर्थ्य रखता हो तथा आम जनता के जीवन को निर्धारित करने वाली नीतियों के निर्माताओं को प्रभावित करता हो.  अभी 12--15 वर्ष पूर्व तक स्थिति यह थी कि राजधानी दिल्ली से बड़ी प्रसार संख्या वाले दो दैनिक पत्र ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ तो निकलते भी थे, पर हिंदी भाषी राज्यों से एक भी दैनिक ऐसा नहीं था जिसकी प्रसार संख्या लाख के ऊपर रही हो.  ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ की स्थिति यह थी कि पढ़े-लिखे लोग हिंदी की बजाय अंग्रेजी अखबार ही लेना पसंद करते थे.  इसके लिए केवल औपनिवेशिक मानसिकता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. दरअसल हिंदी के अखबार किसी सजग पाठक को मानसिक स्तर पर तृप्ति नहीं दे पाते थे. सामाजिक क्षेत्र में ये अखबार दकियानूसी विचारों, प्रतिगामी प्रवृत्तियों और कर्मकांडों को तथा राजनीतिक क्षेत्र में सत्ताधारी पार्टी की नीतियों को प्रचारित करने में लगे रहते थे. इसके बाद जो स्थान बचता था वह जैन-मुनियों के प्रवचनों से लेकर बिड़ला मंदिर के सत्संगों और रिपोर्टों से भरा रहता था. एक ही संस्थान से अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित होने वाले अखबारों के स्तर में इतना बड़ा फर्क रहता था कि हैरानी होती थी. यह फर्क संपादक, संपादकीय विभाग के सदस्यों एवं लेखकों के पारिश्रमिक से लेकर अखबार की विषयवस्तु और छपाई तक में परिलक्षित होता था. हिन्दी अखबार मालिकों और उनके रिश्तेदारों के व्यक्तिगत संदेशवाहकों का काम करने लगे थे. अमुक सेठ के घर पुत्र ने जन्म लिया है या अमुक सेठ के यहां फलां तारीख को फलां संत का प्रवचन या कवि सभा रखी गयी है--ये जानकारियां समाचार वाले कालम में छपती थीं. इसके अलावा मालिकों के लिए राजनेताओं, अफसरों से मेल-जोल बढ़ाकर उनका काम निकलवाने की जिम्मेदारी भी हिंदी पत्रकार की ही थी. सभी हिंदी अखबारों की यही स्थिति थी और ‘नवभारत टाइम्स’ भी इसका अपवाद नहीं था. ‘दिनमान’ के संपादन से हिंदी पत्रकारिता को एक सम्मानजनक स्थिति दिला पाने में सफल होने के बावजूद अज्ञेय जी भी ‘नवभारत टाइम्स’ को कोई बेहतर स्वरूप नहीं दे सके थे. लेकिन शायद पहली बार संपादक को प्रोफेशनल धरातल पर लिया गया था--मालिक या उप मालिक के गांव का या बेहद वफादार, व्यापक जन-सम्पर्की होने की ‘योग्यता’ पर नहीं। 1982  में राजेन्द्र माथुर ने जब ‘नवभारत टाइम्स’ का संपादन संभाला तो उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ कुछ कर दिखाने की चुनौती का सामना करना पड़ा. वे मध्य प्रदेश के एक सम्मानित अखबार ‘नई दुनिया’ के संपादक थे और ‘नई दुनिया’ को एक बेहतर और सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने ‘नई दुनिया’ को वह प्रतिष्ठा दी थी जो दिल्ली के किसी हिंदी अखबार की नहीं थी. उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ के साथ तमाम अच्छे लेखकों को जोड़ना शुरू किया--अब तक अच्छे लेखक पत्रकार ‘दिनमान’ में तो अपनी रिपोर्टें प्रकाशित करा लेते थे पर ‘नवभारत टाइम्स’ में अपना नाम देखना भी अपमानजनक समझते थे. राजेन्द्र माथुर ने उन सबको इस अखबार के साथ जोड़ा. अपने पूर्ववर्ती संपादकों के विपरीत उन्होंने समसामयिक राजनीति से लेकर सामाजिक विषयों पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखे और अपनी भाषा-शैली के अनूठेपन से पाठकों को आकर्षित किया. एक सजग, अध्ययनशील और विचारवान संपादक के रूप में उनकी छवि स्थापित होने लगी और ‘नवभारत टाइम्स’ को लोगों ने गंभीरता से लेना शुरू किया. नवम्बर 1983 में जनसत्ता का प्रकाशन शुरू होने के बाद जिस स्वस्थ स्पर्धा की शुरुआत हुई, उससे नवभारत टाइम्स को अपना स्वरूप निखारने में और भी मदद मिली. लेकिन 1980 के दशक की शुरूआत इमरजेंसी के काले कारनामों से पराजित श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के साथ हुई थी. इस दशक की शुरूआत जनता पार्टी के रूप में विपक्षी दलों के जमावडे़ के प्रति आम जनता के मोहभंग के साथ हुई थी. यह दशक श्रीमती गांधी द्वारा शुरू की गयी हिंदू सांप्रदायिकता और भिंडरावाले द्वारा स्थापित सिख सांप्रदायिकता के बीच जानलेवा होड़ वाला दशक साबित होने लगा. दक्षिण भारत के अनेक राज्यों उत्तर पूर्वी क्षेत्र और पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में गैर कांग्रेसवाद प्रबल होता गया था और श्रीमती गांधी की कांग्रेस पार्टी हिंदी--हिंदू क्षेत्र उत्तर भारत में सिमट कर रह गयी थी जहां उसकी प्रतिद्वंद्विता भारतीय जनता पार्टी यानी भूतपूर्व जनसंघ से थी. भारतीय जनता पार्टी हिंदू सांप्रदायिकता के आधार पर खड़ी थी और श्रीमती गांधी के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह हिंदू मतदाताओं को यह समझा सकें कि उनके हितों की रक्षा कांग्रेस (ई) से ज्यादा बेहतर ढंग से कोई दूसरी पार्टी नहीं कर सकती. पंजाब में फैल रही सिख सांप्रदायिकता के मुकाबले हिंदू सांप्रदायिकता को सरकारी छत्रछाया में पोसा जाने लगा. 15  जुलाई, 1983  को श्रीमती गांधी ने पंजाब हिंदू संगठन के अध्यक्ष अमरनाथ शर्मा के नेतृत्व में आये 12  सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल से भेंट की और इसे अपना आशीर्वाद दिया. कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘दि टेलीग्राफ’ (16 जुलाई, 1983 ) ने लिखा कि इस संगठन को न केवल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बल्कि इंका के दरबारा सिह गुट का भी समर्थन प्राप्त है जिसमें श्रीमती गांधी की ओर से राजीव गांधी पूरी दिलचस्पी ले रहे हैं. उधर 1982 में भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री डा. कर्णसिंह के नेतृत्व में विराट हिंदू समाज की स्थापना हो चुकी थी और 1964 से सुस्त पड़ा  विश्व हिंदू परिषद मीनाक्षीपुरम की घटनाओं को लेकर सक्रिय हो गया था. कुल मिलाकर पूरे देश में बड़े जबर्दस्त ढंग से एक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी और 2  जून, 1984  को ब्लू स्टार आपरेशन के तहत अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश के साथ इस ध्रुवीकरण का चरम रूप सतह पर आ गया. राजेन्द्र माथुर के दिलो-दिमाग में एक अखंड भारत का सपना बहुत दिनों से पल रहा था--एक ऐसा भारत जिसकी सीमा के अंदर तिब्बत, बर्मा, नेपाल, श्रीलंका शामिल हों, जिसका एक चक्रवर्ती राजा हो और जिसकी बुनियाद हिंदू राष्ट्रवाद हो. श्रीमती गांधी की तरह वह भी इस बात से क्षुब्ध थे कि छोटे-छोटे पड़ोसी देश भारत जैसे बड़े देश को आंखें दिखा रहे हैं और उनकी सारी उम्मीदें श्रीमती गांधी पर टिक गयी थीं. उन्हें लगता था कि उनके सपनों का ‘राष्ट्र राज्य’ श्रीमती गांधी ही निर्मित कर सकती हैं और भारत को एक महाशक्ति का दर्जा दिला सकती है. 1984 तक उनकी यह आकांक्षा संकोच के गर्त में डूबी बेचैनी के साथ करवटें लेती रही पर ब्लू स्टार आपरेशन के बाद वह एकदम उठ बैठी और 1987 आते-आते तो उसने एकदम आक्रामक रूप ले लिया. 2  जून, 1984  को स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश पर हिंदी के तमाम अखबारों ने एक राजनीतिक समस्या के सैनिक समाधान की भूरि-भूरि प्रशंसा की और मीडिया के इस सांप्रदायिक उन्माद का नेतृत्व किया राजेन्द्र माथुर और ‘जनसत्ता’ के संपादक प्रभाष जोशी ने.  राजेन्द्र माथुर ने लिखा- ‘‘इस अंतिम कार्रवाई के बाद अब केंद्र सरकार के पास ऐसा कोई हथियार नहीं बचा हैं जिसका इस्तेमाल पंजाब में करना बाकी हो, इसलिए यह बेहद जरूरी है कि यह ब्रह्मास्त्र सफल हो और हमारी सेना श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान तक चुटकुलों और चिमगोइयों का विषय न बने. सेना इस ओर देश की एकता की अंतिम गारंटी है और भारत के लोकतंत्र के लिए यह शाबाशी की बात है कि इस अंतिम ब्रह्मास्त्र का उपयोग बैरकों में रचे गये किसी षडयंत्र के अंतर्गत नहीं बल्कि देश के करोड़ों लोगों के अरमानों को पूरा करने के लिए एक चुनी हुई सरकार की छत्रछाया में हो रहा है, इस माने में 2 जून का दिन भारतीय गणतंत्र के इतिहास का एक ऐतिहासिक दिन साबित होगा।’’ (‘और अब फौज के जिम्मे,‘ 4  जून, 1984  , नभाटा). इस बात को बार-बार दुहराने की कोई जरूरत नहीं दिखाई देती कि कांग्रेस ने भिंडरावाले का निर्माण किया और सिख साम्प्रदायिकता फैलायी ताकि जवाब में हिंदू सांप्रदायिकता फैलायी जा सके और अपने वोट बैंक के खाते को समृद्ध किया जा सके। इस बात को अब सभी जानते हैं और इस पर दुःख प्रकट करते हैं. राजेन्द्र माथुर भी इसे जानते हैं पर उन्हें न तो इस पर दुःख है और न हैरानी--वे इसे एक स्वाभाविक क्रिया मानते हैं। उनका कहना है— ‘‘भिंडरावाले की मदद लेकर अकालियों को पीटने की कोशिश अगर कांग्रेस ने की तो ऐसा कोई काम नहीं किया जो राजनीति में होता नहीं हो, अकाली भी भिंडरावाले की मदद लेकर कांग्रेस को पीटने का खेल एक हद तक चला सकते थे और वह उन्होंने चलाया भी लेकिन मूर्खता हुई कि उन्होंने खेल की सीमाएं नहीं पहचानीं... दूसरी बात यह है कि भिंडरावाले को अगर कांग्रेस कभी हाथ न लगाती तो भी आज या पांच साल बाद एक आतंकवादी आंदोलन का जन्म पंजाब में होना ही था।  (‘‘जोखिम भरे समुद्र के कुछ पार आया जहाज, ‘नभाटा, 15 जुलाई, 1984). क्या शानदार तर्क है. माथुर साहब को पता है कि पांच साल बाद पंजाब में आतंकवाद उभरना ही था इसलिए उनकी राय में कांग्रेस ने इस काम को जल्दी कराकर अच्छा ही किया। अपनी इस थीसिस के पक्ष में तमाम उल्टे-सीधे तर्क देते हुए वह आगे फरमाते है- ‘‘यह कहना कोई माने नहीं रखता कि जैलसिंह अगर गृहमंत्री के रूप में भिंडरावाले को दिल्ली में गिरफ्तार कर लेते, या दरबारा सिंह उन्हें चौक मेहता का संत ही बने रहने देते तो बाद की घटनाएं नहीं घटतीं. इस शाखा के लोग यह भी मानते हैं कि अगर पाकिस्तान का बंटवारा साल भर टल जाता तो पाकिस्तान कभी बनता ही नहीं, क्योंकि जिन्ना टी.बी. से 1948 में मरने ही वाले थे।’’ राजेन्द्र माथुर पंजाब समस्या को उलझाने में कांग्रेसियों और सरकार के योगदान से अच्छी तरह परिचित है, उन पर कड़वी-मीठी टिप्पणियां भी करते हैं पर इंदिरा-नेहरू सल्तनत से इतने आक्रांत हैं कि उनकी आंखों पर एक पट्टा हमेशा बंधा रहता है। श्रीमती गांधी की इस चतुर रणनीति से वह हमेशा अभिभूत रहे कि वह ‘बाघिन की प्रस्तर प्रतिमा की तरह वर्षों खड़े रहने के बाद बाघ की तरह झपट पड़ती हैं और फिर प्रतिमा बन जाती हैं।‘ श्रीमती गांधी की प्रशंसा में उन्होंने विरुदावलियां रचीं और अपने लंबे-चौड़े लेखों में जगह-जगह टांकते हुए अपनी भक्ति का प्रदर्शन किया। इन पंक्तियों पर गौर करें— ‘‘न्यूयार्क के समुद्र में जेसे स्वाधीनता की महिला मूर्ति खड़ी है उसी तरह भारतीय राष्ट्र-राज्य के जोखिम भरे समुद्र में इंदिरा गांधी एक मूर्ति की तरह खड़ी रहती हैं. समुद्र का पानी चढ़ता जाता है लेकिन वे कुछ नहीं करतीं, महानगर बर्बाद होने लगते हैं, लोग त्राहिमाम करके भागने लगते हैं, लेकिन वे कुछ नहीं करतीं, कुछ लोग कहने लगते हैं कि इस बार प्रलय होकर रहेगी, और हम सब श्रीमती गांधी के साथ डूब मरेंगे, दूसरे लोग कहते हैं कि प्रलय के पहले ही श्रीमती गांधी जरूर कोई चमत्कार करेंगी। उनके होते हम डूब कैसे सकते हैं?  इस तरह बहस चलती रहती है। लेकिन श्रीमती गांधी का स्टैचू तब तक हरकत में नहीं आता, जब तक पानी गले के ऊपर न चढ़ने लगे, फिर क्या होता है, यह हम सब जानते हैं.  यह कहना मूर्खतापूर्ण है कि यह सब श्रीमती गांधी का षड्यंत्र है और वे जान-बूझकर बार-बार प्रलय को निमंत्रित करती रहती हैं’’ (‘जोखिम भरे समुद्र के कुछ पार आया जहाज, ‘15 जुलाई, 1984 , नभाटा) भक्ति रस की यह अजस्र सलिला पं. नेहरू और इंदिरा गांधी से होती हुई राजीव गांधी के पांव पखारने के लिए उमड़ पड़ती है। ‘‘राजीव गांधी को ईश्वर हजार साल की उम्र दे क्योंकि राजीव गांधी सिर्फ प्रधानमंत्री  नहीं हैं, वे भारत की एकता के युद्ध के प्रधान सेनापति भी हैं।’’ (‘एक डरावने सप्ताह की प्रतिक्रिया में’, नभाटा 5 अक्टूबर, 1986) राजेन्द्र माथुर बोफोर्स और फेयरफेक्स कांडों के साथ राजीव गांधी के संबद्ध होने के विरोध में लगातार दलीलें देते रहे पर एक सीमा के बाद उन्होंने भी मान लिया कि-‘‘बच्चन बंधुओं के प्रति वफादारी के कारण ही राजीव सफाई से बच रहे हैं यह मानना बचकाना होगा.  खुद अपने से संबंधित कोई सच्चाई वे ढांपना चाह रहे हैं’’ (‘सी.आई.ए. के साये और शिखर पुरुषों का अर्धसत्य,’ नभाटा, 6 अप्रैल, 87)। राजेन्द्र माथुर को लगा कि 1985 के राजीव गांधी की मूर्ति 1987 तक खंडित हो गयी. 1985 के राजीव के बारे में उन्होंने एक मिथ तैयार किया था. उनका कहना था--‘‘जैसे समुद्र मंथन से अमृत और विष तथा रत्नादि उपजे थे, उसी तरह 1967 के समुद्र मंथन से भारत में गरल-सुधामय इंदिरा गांधी का आविर्भाव हुआ. उन्होंने 1967 के तूफानों को सत्रह साल थामे रखा लेकिन वह मंथन खत्म नहीं हुआ... गरल सुधामय इंदिरा गांधी ने 1974 के बाद गरल का अनुपात जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया... राजीव गांधी यदि 1985 में बहुत सफल हुए थे, तो इसका कारण यह था कि गरल-सुधा का पुराना अनुपात उन्होंने बिल्कुल उल्टा कर दिया।’’ (‘कांग्रेस का ध्वंस हमें 1946 में लौटा देगा,’  नभाटा, 29 अप्रैल, 1987) हमें यह नहीं पता कि राजीव गांधी ने गरल-सुधा का कौन सा अनुपात ग्रहण किया और गच्चा खा गये या उबर गये.  हमारे सामने रक्षा सौदों की खरीद में दलाली के कुछ मामले आये और इनका रहस्योद्घाटन किसी अमरीकी, रूसी या इजरायली खुफिया एजेंसी ने नहीं बल्कि देश के रक्षामंत्री ने किया. हमारे लिए यह चिंता का विषय है. सारे देश में इस पर चर्चा हो रही है. लोग सर्वोच्च स्तर पर घटित इस भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष व्यक्त कर रहे हैं पर इस बारे में 41 वर्षों से निकल रहे और ‘प्रादेशिक हिंदी राजधानियों में सबसे ज्यादा संस्करण’ वाले इस अखबार के राष्ट्रवादी संपादक का दृष्टिकोण क्या है जरा इस पर गौर करें--‘‘भ्रष्टाचार का नाम सुनते ही पवित्र क्रोध से भर जाने वाले लोगों को यह सुनकर बुरा लगेगा कि उनका क्रोध भी एक पश्चिमी चीज है जो इस देश ने अभी सौ-डेढ़ सौ सालों में सीखी है, और जो खून में पूरी तरह उतरी नहीं है. यदि भगवान राम से लेकर राजा विक्रमादित्य तक अनेक नाम पत्थर की तरह मेरी ओर न फेंके जायं, तो निवेदन करना जरूरी है कि अपने बटुए और सरकारी बटुए में फर्क है और दोनों को गड्डमगड्ड करना अपराध है. यह अवधारणा ही भारत के लोगों के लिए जरा नयी है. राजा हमारे यहां उस व्यक्ति को कहते थे जिसके पास शस्त्र बल के कारण लूट की मोनोपोली हो, और राजा की नौकरी में जो भी लग जाता था वह राज्य का उपलुटेरा होता था फिर चाहे वह अदना सिपाही, पटवारी ही क्यों न हो.  सरकारी नौकरी के प्रति भारत के मध्यम वर्ग के आकर्षण का कारण यह रहा है कि टूटी-फूटी कुर्सी भी हमें उपराजा का दर्जा दे देती है, और उसके साथ लूट की छोटी-मोटी सुविधाएं भी.’’( ‘लूटतंत्र को जिम्मेदार बनाने का अभियान’ नभाटा, 21 अप्रैल 1987). यदि अखबार सचमुच जनमत तैयार करते हैं तो उपरोक्त पंक्तियों के जरिए राजेन्द्र माथुर किस तरह का जनमत तैयार करना चाहते हैं? क्या भ्रष्टाचार के पक्ष में?  इसी लेख में उन्होंने फरमाया है-‘‘जो लोग भ्रष्टाचार से बहुत नाराज हैं और मानते हैं कि एक भ्रष्ट सरकार को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए, उनसे हमारी पूरी हमदर्दी है... लेकिन एक बात हम पूछना चाहेंगे. कांग्रेस के जो 413 लोकसभा सदस्य आजकल सदन में हैं, उन्हें जब पार्टी का हाईकमान चुनाव लड़ने के लिए अटैचियां भर-भर कर करेंसी नोट देता है तब क्या वे अपने नेता से पूछते हैं कि यह पैसा कहां से आया? वह काला है या सफेद है? नैतिक है या अनैतिक? क्या वे इतने भोले हैं कि इस सारे धन को कांग्रेस दफ्तर में लगे कल्पवृक्ष से टपका हुआ समझते हैं?  क्या भारत के कानून में ऐसा साफ नहीं लिखा है कि चोरी का माल अपने घर लाना भी एक अपराध है?’’ 20 अप्रैल, 1987  को ‘राष्ट्रपति पुनर्निर्वाचन पर पाबंदी’ शीर्षक संपादकीय में भ्रष्टाचार के पक्ष में दलील देते हुए विद्वान संपादक ने कहा है कि--‘‘लोकतंत्र इस बात का प्रबंध कर सकता है कि भ्रष्टाचार यदि होना ही है तो वह भी जनता से जुड़ा और उसे लाभ पहुंचाने वाला सिद्ध हो.  जब विनोबा भावे ने पच्चीस साल पहले भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कहा था तब वे कोई व्यंग्य नहीं कर रहे थे.  वे गंभीरतापूर्वक कह रहे थे कि जो भ्रष्टाचार समाज स्वीकृत है उसे शिष्टाचार ही क्यों न मान लिया जाए.’’ भ्रष्टाचार के प्रति, खासतौर से कांग्रेसियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के प्रति, हमदर्दी राजेन्द्र माथुर के संदर्भ में नयी बात नहीं है. ‘तेलुगु देशम’ के नेता एन.टी.रामाराव ने फरवरी 1984 में जब अपने श्रममंत्री  रामचंद्र राव को घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ा तो राजेंद्र माथुर की आत्मा प्रसन्न हो गयी पर वी.पी.सिंह अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ राजीव सरकार के विरुद्ध अभियान छेड़ते हैं तो यह संपादक भ्रष्टाचार के पक्ष में दुनियाभर के तर्क जुटाने लगता है. अब से तीन वर्ष पूर्व एक बार कांग्रेस के व्यापक भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए माथुर ने लिखा था--‘‘...चंबल के डाकुओं का, बिहार की जातियों का, बंबई के तस्करों का, करोड़पति की तिजोरियों का इस्तेमाल उसने (कांग्रेस) किया... राजनीति में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो निश्चय ही नहीं होना चाहिए.  पर राजनीति का कायाकल्प भी एक अखिल भारतीय मुद्दा है, जिससे अलग से निपटना होगा’’ ( ‘जोखिम भरे समुद्र के कुछ पार, आया जहाज’, नभाटा, 15 जुलाई, 1984) जैसे-जैसे हथियारों की दलाली का मामला परत-दर-परत उधड़ता चला गया, राजेंद्र माथुर की मजबूरी हो गयी राजीव गांधी के खिलाफ लिखने की. पर अपने लेखन में वह बराबर इस बात पर ध्यान रखते रहे कि उनकी लेखनी कहीं कांग्रेस को कमजोर न बना दे वरना ‘भारत राष्ट्र-राज्य’ ही बिखर जायेगा. विचारों की कांग्रेसी पोशाक पहने इस हिंदू आत्मा ने भारत राष्ट्र-राज्य का गोया ठेका ले रखा हो. जून और जुलाई भर राजेंद्र माथुर ने अंततः राजीव गांधी के खिलाफ केवल लिखा ही नहीं, गालियां भी दीं. बानगी प्रस्तुत है-- 1. ‘‘राजीव गांधी के पिछले छः महीने बहुत घटिया, गंदे और बेईमान गुजरे हैं. एक हिरनौटी मासूमियत के साथ देश के प्रधानमंत्री बने थे और अपना पहला साल उन्होंने इंदिरा गांधी के जमाने के तनावों, उलझनों और विकृतियों को सीधा करने में बिताया था. लेकिन उस आदमी के साथ दिक्कत यह रही कि उसने अपने हिरनौटियेपन की मासूम ऊर्जा को भी नहीं पहचाना.  अपनी अच्छाइयां भी उसने चमड़े की तरह नहीं कोट की तरह पहनीं.  वे उसके लिए यकीन का विषय नहीं रही बल्कि छवि फरोशी का विषय बन गयीं. सीधापन, नेकनीयत, मृदुमुस्कान बिकती है इसलिए बेचो, नहीं बिकती तो और किसी प्रोडक्ट मिक्स की तलाश करो जो बिक सके. राष्ट्रपति के बारे में सवाल पूछा जाय तो अपने यकीन की गहराइयों में टटोलने के बजाय या संविधान की गहराइयों का जायजा लेने के बजाय एक जुमला फेंक दो, जो तत्काल गुदगुदी कर सके और आगे बढ़ जाओ.’’(‘कांग्रेस अब राजीव का पर्याय नहीं हो सकती,’ नभाटा, 21 जून 1987). 2. ‘‘क्या राजीव गांधी 1985 के समझौतों को सही और सार्थक सिद्ध करने के लिए 1990 के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को जितवा सकते है? क्या रक्षा सौदों के कारण अपनी विश्वसनीयता खो चुकने के बाद घायल और लहू-लुहान राजीव गांधी इस काम के काबिल रह गये हैं?... जब भारत की राजनीति राजीव गांधी को अप्रासंगिक बना कर संस्थागत स्तंभों पर कई वर्षों तक सहज चलती नजर आयेगी, तभी इस बात का विश्वास किया जा सकेगा कि एक पारिवारिक प्रेत से अंततः हमने मुक्ति पा ली है।’’(‘कांग्रेस का ध्वंस हमें 1946 में लौटा देगा’, नभाटा, 29 अप्रैल 1987 ) 3. ‘‘राजीव गांधी यदि पिछले छह महीनों से रसातल की ओर रड़क रहे हैं तो इसका कारण यह है कि एक सीधे, सहज, निष्कपट एयरलाइंस पायलट की तरह भारत पर राज करने का उनमें साहस ही नहीं है. तलघर में पहुंच कर वे संजय गांधी और इंदिरा गांधी बनना चाहते हैं और मंच पर बैठ कर वे जवाहरलाल नेहरू की तरह मुस्कराना चाहते हैं. वे अस्वस्थ हैं क्योंकि स्वयं में स्थिर नहीं हैं... स्वस्थ होना बहुत मुश्किल चीज है और पब्लिक स्कूलों का सारा माहौल जिद करता है कि आप स्वस्थ चाहे न हों पर सफल जरूर हों.  एक्जीक्यूटिव दाल रोटी प्राप्त करने तक यह फार्मूला ठीक है लेकिन जैसे ही आप साबुन-तेल बेचने वाली व्यावसायिकता से ऊपर उठते हैं, उसका कोई मतलब ही नहीं रहता.  इसी कारण राजीव गांधी आज अस्वस्थ भी हैं और असफल भी.’’ (‘जैलसिंह को रोकने वाले दो फैसले,’ नभाटा, 28 जून ’1987 ). 4. ‘‘तस्वीर अब यह है कि नेता के रूप में राजीव गांधी की विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है. अपने ही कर्मों से वे घायल और लहूलुहान हैं... एक लंगड़े नेता की तरह राजीव गांधी बहुत दिनों तक कांग्रेस पार्टी के सिर और नहीं रह सकते. कौन समझदार पार्टी दिसंबर, 1989 में होने वाले लोकसभा चुनाव को एक अपाहिज नेता के तत्वावधान में लड़ना पसंद करेगी?’’ (‘क्या राजीव की विश्वसनीयता लौट सकती है?’ नभाटा). 5. ‘‘राजीव गांधी कुछ दिन या काफी दिन प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं लेकिन इस हिंदुस्तान में कोई भी सार्थक काम करने की उनकी क्षमता समाप्त हो चुकी है... कांग्रेस के हर गलत और सही नेता के पास आज राजीव को ब्लैकमेल करने की ताकत है। यह ब्लैकमेल अगले ढाई साल तक उन्हें बंधी मुश्कों वाला प्रधानमंत्री बनाये रखेगा... मुश्कें खोल कर राजीव गांधी आजाद हों, इसके लिए जरूरी है कि वे विश्वनाथ प्रताप सिंह से ज्यादा बड़े नजर आयें और साबित करें कि कांग्रेस को एक सात्विक और पुण्यवान पार्टी बनाने का काम वे मांडा के राजा से बेहतर कर सकते हैं। लेकिन इस मामले में वे सारी गाड़ियां बुरी तरह चूक गये हैं और एक ऐसे प्लेटफार्म पर लोहे का बक्सा ले कर खडे़ हैं जिस पर अब कोई रेल नहीं आयेगी... दस टन का पत्थर अपने गले में लटकाने वाले राजीव में ऐसे कौन से सुरखाव के पर लगे हैं कि देश अपने उद्धार के लिए उन्हीं की ओर टकटकी लगाये देखता रहे... क्या यह देश इतना अपाहिज हो गया है कि एक नैतिक तहखाने में अपने कर्मों की बेड़ियों से जूझते कैदी के अलावा उसे कोई नेता ही नहीं मिल पा रहा।’’ (‘सिंहासन खाली हो चुका है,’ नभाटा 21 जुलाई, 1987). उपरोक्त उदाहरणों की रोशनी में क्या माथुर साहब ऐसे प्रधानमंत्री को हटाने के पक्ष में हैं जो ‘अपनी विश्वसनीयता खो चुकने के बाद घायल और लहूलुहान पड़ा है।‘ जो मानसिक रूप से ‘अस्वस्थ और असफल’ है, जो आगामी चुनाव की दृष्टि से ‘लंगड़ा और अपाहिज’ हो चुका है और जो एक-‘नैतिक तहखाने में पड़ा अपने कर्मों की बेड़ियों से जूझता कैदी है?’ उनका सवाल बहुत वाजिब है कि क्या सचमुच देश अपाहिज हो गया है कि उसे कोई और नेता नहीं मिल पा रहा?  क्या एक भ्रष्ट प्रधानमंत्री का बने रहना उचित है? क्या एक ‘पारिवारिक प्रेत’ से माथुर साहब सचमुच मुक्ति चाहते हैं? जवाब है--कतई नहीं.  उनको लगता है कि यदि ऐसा हुआ तो यह राष्ट्र-राज्य बिखर जायेगा.  पत्रकार कमर वहीद नकवी से एक बातचीत में उन्होंने कहा कि ‘‘मेरी निगाह में भारत में सबसे जिम्मेदारी और सबसे गंभीर चुनौती का काम अगर कोई है तो वह इस राष्ट्र-राज्य को कायम रखने की है। इस गुरु गंभीर काम की तुलना में मेरी राय में सारे काम छोटे हैं.  इसलिए अगर आप मुझसे पूछें कि भ्रष्टाचार इस देश का नंबर वन प्रश्न है तो मैं कहूंगा कि वह नहीं है. सबसे बड़ा प्रश्न भारत में यह है कि जो लोग इस देश के मालिक बन चुके हैं उन सबके निहित स्वार्थों को ज्यादा कैसे ‘एडजस्ट’ किया जाये ताकि यह देश चल सके.” (‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित भेंटवार्ता, 19—25 अप्रैल, 1987). इस भेंट वार्ता में उन्होंने कहा कि इस राष्ट्र-राज्य को कायम रखने के लिए भ्रष्टाचार को बर्दाश्त किया जा सकता है. अब माथुर साहब को कौन बताये कि अपाहिज यह राष्ट्र नहीं है बल्कि उन जैसे पत्रकारों की मानसिकता है जो किसी विकल्प के बारे में सोच भी नहीं सकती. दरअसल माथुर साहब को लगता है कि यदि कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट आता है तो इस संकट की परिधि में समूचा देश आ जायेगा.  जब वह कहते हैं कि--‘‘एक अखिल भारतीय पार्टी के रूप में कांग्रेस का जीवित रहना सिर्फ राजीव गांधी का क्षुद्र स्वार्थ नहीं है. वह भारत की राष्ट्रीयता की एक गारंटी है.’’ (संपादकीय 13 जनवरी 1987) या यह कि “यदि कांग्रेस नामक अखिल भारतीय पार्टी का अस्तित्व ही लगभग न बचे, तो हो सकता है कि हमें अपने संसदीय तंत्र को समाप्त कर एक राष्ट्रपति तंत्र कायम करना पड़े ताकि सारे देश से बांधे रखने वाला एक सर्वसम्मत महानायक हम मतदान से खोज सकें,”  (नभाटा, 5 अक्टूबर, 1986) तो उनके मन में न तो कोई खोट है और न कोई निहित स्वार्थ. यह मानते हुए भी कि ‘कांग्रेस की शरारतें सिर्फ अकाली दल को परेशान करने के लिए ईजाद नहीं की गयी थीं, दल-बदल और राष्ट्रपति शासन द्वारा विरोधी सरकारों को उलटना कांग्रेस की अखिल भारतीय कुटेव थीं’ (‘अंधी गली से निकलने का अवसर’, सितंबर 1985) तो राजेंद्र माथुर कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं. यह उनकी विचारधारात्मक गड़बड़ी है. दलाली नहीं.  अगर इसे दलाली कहें भी तो उसके पीछे कोई निजी स्वार्थ नहीं है. मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि उनके हिंदूवादी मन में यह धारणा निरंतर पुष्ट होती गयी है कि मौजूदा संदर्भ में कांग्रेस ही (अगर अपने में थोड़ा और सुधार कर ले तो) भारत में हिंदू हितों की रक्षा कर सकती है। समय-समय पर उन्होंने अपने लेखों और संपादकीयों में अपने हिंदू मन की पीड़ा को व्यक्त किया है--कभी खुल कर तो कभी एक प्रगतिशील मुलम्मे के साथ. हिंदू राष्ट्रवाद से अलग किसी ज्वार की वह कल्पना भी नहीं कर सकते-- ‘‘जब तक देश आपके लिए एक उन्माद, एक दीवानगी, एक बावलापन नहीं, तब तक वह देश आपका हो नहीं सकता. लेकिन भारत का किस्सा यह है कि कई और बावले शौक भी हमने पाले हुए हैं और उन सबके ऊपर एक सर्वोपरि, सार्वभौम राष्ट्रोन्माद हम पालना चाहते हैं. सैकड़ों विरोधी उप आधारों को समाहित करती एक मुख्यधारा, एक ज्वार, एक प्रलय! राष्ट्रवाद के इस ज्वार की अस्सी प्रतिशत जलराशि यदि हिंदू है, तो इसका कोई इलाज नहीं है, क्योंकि किसी भी नुस्खे या मुक्ति से भारत में राष्ट्रवाद का ऐसा ज्वार नहीं खड़ा किया जा सकता, जिसका अधिकांश गैर हिंदू हो।’’ (नभाटा) देश में अगर हिंदूवाद बढ़ता है तो बकौल राजेंद्र माथुर इससे घबराने की बात नहीं है.  अपने एक लंबे लेख ‘सौ बरस और एक खोई हुई कड़ी’ (27 दिसंबर,1985) में उन्होंने हमें यह जानकारी दी कि आंध्र  प्रदेश में एन.टी.रामाराव की और असम में गण परिषद की जीत वस्तुतः जनसंघ की जीत है. इसी प्रकार तमिलनाडु में एम.जी.रामचंद्रन का बने रहना भी हिंदू मानसिकता की ही जीत है. “आंध्र में एक नेता संन्यासी के वस्त्र पहन कर, धर्म के रथ पर चढ़ कर, राम और कृष्ण के रजत पर विश्व को ठोस जमीन पर उतारने का वायदा करते हुए जन-आंदोलन का सूत्रपात करे, यह आंध्र के प्रादेशिक धरातल पर जनसंघ की सफलता है।’’ राजेंद्र माथुर के सूत्रों का प्रायः भाष्य प्रस्तुत करते हैं सूर्यकांत बाली जिनके ‘बेबाक विश्लेषणों’ को आए दिन नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया जाता है. उनका कहना है कि “(हिंदू) अपनी कमजोरियों, बुराइयों और संकीर्णताओं पर भारी से भारी हमला करने की छूट भी देता है. वह उस हमले का स्वागत ही नहीं करता प्रोत्साहित भी करता है... एक अटल सत्य है कि हिंदू इस देश में आम सहमति का नाम है.’’ (‘आक्रामकता नहीं बन सकती हिंदू की पहचान’, सूर्यकांत बाली, नभाटा, 19 जून, 1986). इसी लेख में लेखक ने हिंदू संगठनों की शिकायत बतायी है कि--‘‘सरकार को सांप सूंघ जाता है पर मुसलमानों की मस्जिदों या सिखों के गुरूद्वारों के मामले में सरकार हमेशा सतर्क और सहायक रहती है।“ राजेन्द्र माथुर की तरह सूर्यकांत बाली भी मानते हैं कि ‘‘जिस देश की पचासी प्रतिशत जनता हिंदू हो, उस देश की समझ पालने के लिए हिंदू को लताड़ कर, नकार कर या भुला कर आप आगे बढ़ ही नहीं सकते।’’ (“हिंदुत्व को समझना जरूरी है’’, सूर्यकांत बाली, 5 सितंबर, 86). इसी लेख में हिंदुओं के त्रिशूल धारण करने के पक्ष में दलील देते हुए कहा गया है कि ‘‘आज देश के हिंदू को त्रिशूल धारण करने में  अपना मोक्ष दिखाई देने लगा है जो इस बात का सीधा-साधा प्रतीक है कि उसका विकास ठीक नहीं हुआ, उसके व्यक्तित्व को ठीक संवारा नहीं गया, उसे सिर्फ गालियां सुनायी गयी हैं. इसलिए वह गली के आवारा बच्चों की संगत में पड़ कर चाकूबाज बनने के फेर में पड़ गया है, गली का दादा बनना चाह रहा है. जरा कल्पना करिये कि अगर मोहल्ले के सौ में से पचासी लोग दादा किस्म के हों तो कैसा लगेगा? आंतरिक कारण यह है कि अपनी तमाम ऐतिहासिक कुप्रथाओं के बावजूद हिंदुत्व के स्वभाव और जीवन दर्शन में आज भी वह धारा अखंड रूप से प्रवाहित हो रही है जिसे समन्वय की आधारभूत धारा माना जा सकता है इसलिए देश में हिंदुत्व को, उसकी समन्वय भावना को, उसकी जीवन-धारा को, उसके तमाम दर्शन को रचनात्मक दृष्टि से समझना, और संवारना बेहद जरूरी है।’’ राजेन्द्र माथुर की हिंदूवादी ग्रंथि कई पेचों से भरी है और यह एक अलग लेख का विषय है. फिलहाल उनकी इस चेतावनी से हम यह प्रसंग समाप्त करते हैं--‘‘पंजाब में पांच साल से जो चल रहा है, वह निश्चय ही बीसवीं सदी का सबसे अकारण, ऊलजलूल और पागल सिलसिला है.  पांच साल के धैर्य के बाद अब उसके खिलाफ एक हिंदू आंधी उठा चाहती है. यह आंधी सफल हुई तो देश ईरान बन जायेगा और असफल हुई तो देश सड़ते खून के अनगिनत पोखरों में बंट जायेगा.’’ (‘अब नरमी ले डूबेगी,’ संपादकीय नभाटा, 11 अगस्त, 86 ) 1980  में कंपूचिया के प्रश्न पर जब भूटान ने भारत से भिन्न अपना स्वतंत्र निर्णय लिया और जनवादी कंपूचिया को मान्यता दी तो श्रीमती गांधी बौखला उठीं और उन्होंने दर्जनों सभाओं में यह बात कही कि ‘भूटान जैसा छोटा देश आज हमें आंखे दिखा रहा है।’  यह उग्रराष्ट्रवाद जो क्षेत्रफल और आबादी के आधार पर किसी देश की संप्रभुता को मान्यता देता है,  अपनी रक्षा के नाम पर आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए किसी भी समय छोटे देश की संप्रभुता को अपना ग्रास बना लेता है. राजेन्द्र माथुर इसी तरह के उग्र राष्ट्रवाद के शिकार हैं और इसकी थीसिस को अपने अखबार में उन्होंने प्रायः स्थान दिया है.  हाल ही में श्रीलंका में भारत के हस्तक्षेप पर ‘नवभारत टाइम्स’ का जो रवैया रहा, उसे हर दृष्टि से उग्रवादी और साम्राज्यवादी ही कहा जायेगा. श्री माथुर ने 3 अगस्त, 1983 को ही अपने संपादकीय में लिखा था कि भारत को श्रीलंका में ‘नरमी और अदब के साथ’ हस्तक्षेप करना चाहिए’. 30 जुलाई, 1987 को राजीव-जयवर्धने के बीच समझौता हुआ और भारतीय सेना ने श्रीलंका में प्रवेश किया. इस समझौते के खिलाफ थे श्रीलंका के प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री और रक्षामंत्री. समझौते से क्षुब्ध हो कर एक सिंहली सैनिक ने राजीव गांधी पर हमला किया पर राजेन्द्र माथुर ने “बांग्लादेश के बाद सबसे बड़ी घटना” शीर्षक से पहले पृष्ठ पर ही एक संपादकीय लिख मारा. इसमें उन्होंने लिखा कि “भारत से बचने की कोई गली श्रीलंका को उपलब्ध ही नहीं है.” श्रीलंका समझौते से पूर्व राजेन्द्र माथुर ने कई लेख अपने अखबार में प्रकाशित किये जिनका उद्देश्य एक आक्रामक राष्ट्रवाद के पक्ष में मानसिकता तैयार करना था। ‘भारत के महाशक्ति होने का अर्थ’ (सूर्यकांत बाली, 13 जून ’1987) शीर्षक इस लेख में दुःख प्रकट किया गया है कि आज नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान भारत के अंग नहीं हैं,  इसमें कहा गया है कि--‘अगर नेपाल या श्रीलंका या भूटान को कोई विदेशी शक्ति वहां पहुंच कर हथिया ले तो भारत सुरक्षित नहीं है.  ये सब देश संप्रभु हैं पर भारत इन सबसे ज्यादा संप्रभु है. भारत की संप्रभुता इनकी संप्रभुता के कारण खतरे में नहीं डाली जा सकती. मोहम्मद गोरी से पराजित हो रहे पृथ्वीराज चौहान को देखने और इंतजार करने की मूर्खता जयचंद ही कर सकता था. इसी महाशक्ति दृष्टि के अभाव का परिणाम है कि भारत ने तिब्बत चीन के हवाले कर अपनी उत्तरी सीमा खतरे में डाल दी,  बर्मा को उसके हाल पर छोड़ उत्तर पूर्व को संकटग्रस्त कर दिया, डिएगो गार्शिया में अमरीकी अड्डे बनने दे कर या त्रिंकोमाली में उसकी उपस्थिति सहन कर अपनी दक्षिण सीमा कमजोर कर दी और पाकिस्तान को शक्तिशाली बनाने का मौका देकर पश्चिमी सीमा को लगातार आक्रमणग्रस्त बना ही रखा है।’’ अपनी संप्रभुता को दूसरे देश की संप्रभुता से श्रेष्ठ मानने वालों को क्या कहेंगे? यह एक फासिस्ट मानसिकता है जिसे इस अखबार के जरिए प्रचारित किया जा रहा है। श्रीलंका में भारतीय सेना इसीलिए तैनात है कि समझौते के खिलाफ उस देश की जनता चूं भी न कर सके। माथुर साहब लिखते हैं--‘‘दरअसल कोलम्बो समझौते का एक निहितार्थ यह भी है कि जयवर्धने के खिलाफ कोई सैनिक तख्तापलट भारत होने ही नहीं देगा.’’  भारतीय शासकों का कहना है कि ‘‘श्रीलंका में हमारी सेना तबतक रहेगी जब तक उसकी वहां जरूरत है.’’  हर आक्रामक देश इसी तरह के बयान देता है--अफगानिस्तान में भी रूसी सेना यही कहती है. सर से पांव तक कम्युनिस्ट विरोधी होने के कारण राजेंद्र माथुर अफगानिस्तान से भी रूसी सेना की मौजूदगी पर तो लंबे लंबे संपादकीय लिख देते हैं पर श्रीलंका के संदर्भ में बड़ी बेशर्मी के साथ वह लिखते हैं-- ‘‘श्रीलंका की किस्मत संवारने के लिए जैसा रचनात्मक दखल भारत ने दिया है,  वैसा 1947 के बाद भारत ने इस उपमहाद्वीप में और कहीं नहीं दिया।’’ राजेंद्र माथुर के 2 अगस्त, 1947 के संपादकीय के स्वर में जो उद्दंडता है वह तो हमलावर सेना के किसी सेनापति को भी मात कर देगीः “यदि कोई सुदृढ़ भारत विरोधी सरकार कोलंबो में कायम हुई... और उसने मांग की कि भारत बिना शर्त बोरिया बिस्तर बांध कर श्रीलंका के बाहर निकल जाय तो नरसंहार पर आमादा इस सरकार की दया पर तमिल आबादी को छोड़कर क्या हम लौट आयेंगे? हम नहीं लौटेंगे. उत्तर और पूर्व श्रीलंका में हम बने रहेंगे और इस बने रहने से श्रीलंका का व्यावहारिक बंटवारा हो जायेगा, क्योंकि भारत को हटाने का काम कोई सरकार नहीं कर सकती.” माथुर साहब की इन पंक्तियों को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे केाई विदूषक रंगमंच पर तलवार भांज रहा हो. राजीव गांधी के विदेश और रक्षा सचिव को भी इतना जोश नहीं आया होगा जितना माथुर की काया और लेखनी में उछाहें भर रहा है। वह आगे लिखते हैं -- “इन सारी स्थितियों में भारत का जिम्मा यह होगा कि हम तमिल उग्रवादियों की बाहें मरोड़ें’’ या ‘‘हमें आशा करनी चाहिए कि वह अशुभ दिन (जब कोलम्बो सरकार समझौते से इनकार कर दे) कभी आयेगा ही नहीं. लेकिन वह आया तो भारत की भू-राजनैतिक हैसियत कम करने वाली कोई बात हम श्रीलंका में नहीं होने दे सकते।’’ श्रीलंका के प्रसंग ने राजेंद्र माथुर के चेहरे से छद्म प्रगतिशीलता की नकाब उतार कर फेंक दी। [author image="https://fbcdn-sphotos-e-a.akamaihd.net/hphotos-ak-xaf1/v/t1.0-9/25121_396812804456_5053525_n.jpg?oh=b09f516f108cf8fd8989f6b17e4e45a7&oe=55E54B0B&__gda__=1438260026_da40901aed5d59feac8d37b0ca701919" ]आनंद स्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकर हैं। समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं।[/author]

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