क्या हिन्दुत्व आतंकवाद के मामलों में जांच एजेंसिया अपना रूख बदल रही हैं

फिलवक्त़ हिन्दुत्व के झंडाबरदार केन्द्र में हुकूमत हैं, जो भले संविधान के प्रति प्रतिबद्ध होने की बात करते हों, मगर उनका वास्तविक व्यवहार आए दिन इन प्रतिबद्धताओं को धता बताता दिखता है......

सुभाष गाताडे

क्या आतंकवाद से जुड़े मामलों में अदालतें एवं अधिकारी भारतीय समाज की रक्तपिपासा की भावना से सामंजस्य दिखाने की कोशिश करते हैं ? आतंकवाद से जुड़े लोग, फिर भले ही वह उपरोक्त अपराध को अंजाम देने में हाशिये पर रहते आए हों, उन्हें दोषी करार देकर सूली पर चढ़ाया जाता है ?’

वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी ने याकूब मेमन को फांसी देने के निर्णय को प्रश्नांकित करते हुए यह बात पिछले दिनों लिखी। /देखें http://www.thewire.in  व्हाय याकूब मेमन शुड नाट बी हैंग्ड, 17.7.2015/ गौरतलब है कि 1993 में मंुबई में हुए बम धमाके के एक आरोपी याकूब मेमन की प्रस्तावित फांसी के प्रति असहमति प्रगट करने में महज जनतांत्रिक अधिकारों के लिए समर्पित लोग एवं संगठन ही आगे नहीं आए हैं बल्कि सिविल सोसायटी के अन्य लोग मसलन पत्रकार, लेखक, अभिनेता आदि भी आगे आए हैं। इस कतार में एक नया नाम रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग से जुड़े रहे बी रमन जैसे लोगों का भी जुड़ा है, जिन्होंने याकूब मेमन को भारत में लाने में भूमिका अदा की थी। यूं तो 2013 में उनका देहान्त हुआ, मगर 2007 में लिखे अपने एक आलेख में / जो तब प्रकाशित नहीं हुआ था, जिसे हाल ही में उपरोक्त वेबसाइट रिडिफ डाट कॉम ने प्रकाशित किया है/ साफ कहा था कि उसे फांसी नहीं दी जानी चाहिए। याकूब मेमन द्वारा मुंबई बम धमाकों को लेकर दी गयी तमाम जानकारी, पाकिस्तान की उसमें संलिप्तता को लेकर उसकी जरिए पहली बार सरकार के हाथ लगे महत्वपूर्ण सबूत, यहां तक कि अपने परिवारजनों को भी भारत लाने की उसकी कोशिश या जेल में उसका आचरण, आदि तमाम बातों को रेखांकित करते हुए बी रमन ने यह लिखा था।

पिछले दिनों देश के गणमान्य नागरिकों, जिसमें राजनेता, न्यायविद और रिटायर्ड न्यायाधीश आदि शामिल हैं उन्होंने राष्ट्रपति के पास एक नयी याचिका दायर कर याकूब मेमन की फांसी टाल देने की गुजारिश की है। प्रस्तुत याचिका पर दस्तखत करनेवालों में सीपीएम के सीताराम केसरी, कांग्रेस के मणि शंकर अययर, भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा, वरिष्ठ वकील, प्रशान्त भूषण, अभिनेता नसीरूददीन शाह, फिल्म निर्माता महेश भट आदि शामिल हैं। इसमें लिखा गया है कि याकूब मेमन की तुलना में उसके दस सहअभियुक्त जिन्होंने बम रखे और उपरोक्त षडयंत्र को अमली जामा पहनाने में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, उन्हें क्षमा दी गयी है, मगर याकूब एकमात्रा ऐसा दोषी है, जिस पर दया नहीं दिखायी गयी है। याचिका में इस बात का भी उल्लेख है कि डाक्टरों ने याकूब को ‘दिमागी तौर पर अस्थिर और खंडित मनस्कता ;ेबीप्रवचीतमदपंद्ध से ग्रस्त ’’ पाया है और ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के हिसाब से उसे सज़ा ए मौत नहीं दी जा सकती।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने याकूब मेमन की तरफ से एक पुनर्विचार याचिका भी दायर की गयी है जिस पर न्यायमूर्ति ए आर दवे, अमिताभ रॉय और अरूण मिश्रा की पीठ गौर करेगी। इस याचिका में अन्य दलीलों के अलावा एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह उठाया गया है कि कि तरह ‘उसके ही मामले में प्रक्रिया का उल्लंघन’ किया जा रहा है। ( http://www.firstpost.com/india/schizophrenia-to-b-ramans-letter-6-arguments-yakub-memon-may-make-in-his-curative-petition-to-sc-2364456.html )

याचिका में याकूब का तर्क है कि उसे फांसी चढ़ाने के मामले में ही अत्यधिक जल्दबाजी का परिचय दिया जा रहा है, जबकि उसे रोकने के लिए उसके द्वारा जिन कानूनी विकल्पों का सहारा लिया गया है, उन पर अभी निर्णय आना बाकी है। याकूब का यह भी आरोप है कि ‘‘उसके खिलाफ सज़ा ए मौत का वारण्ट जारी करने की औपचारिकताएं मुंबई में पूरी हुईं जबकि वह नागपुर में जेल में है और अदालती कार्रवाई के दौरान उसका वकील वहां मौजूद नहीं था।

याचिका यह भी कहती है कि मौत का वारंट मुंबई में ‘टाडा अदालत ने जारी किया जबकि उसकी सर्वोच्च न्यायालय के सामने लम्बित थी और इस तरह उसे ‘नकारात्मक ढंग से प्रभावित करने की कोशिश की गयी।’..

अदालत में जबभी मामला उठेगा तब मेमन की तरफ से यह दलील भी सम्भवतः रखी जाएगी कि उसके वास्तविक अमल के 14 दिन पहले उसके सम्बन्ध में वारंट जारी होना चाहिए और उसकी तारीख पहले से तय नहीं की जा सकती थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उसकी curative petition पर गौर कर रहा था। टाईम्स आफ इंडिया के मुताबिक उसकी प्रस्तुत याचिका सर्वोच्च न्यायालय ने 21 जुलाई को खारिज की।

मेमन को हल्की सी आशा होगी क्योंकि उत्तर प्रदेश के हत्या के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि ऐसे वारंट महज इस वजह से जारी नहीं किए जा सकते क्योंकि अदालत ने सज़ा ए मौत की पुष्टि की है जबतक दोषी ठहराया गया व्यक्ति द्वारा सभी कानूनी विकल्पों को आजमाया न गया हो।

रेखांकित करनेवाली बात है कि जिस पीठ के सामने यह याचिका है, उसी पीठ ने यह कहा है कि आखिर मेमन की आखरी सुधारात्मक याचिका पर गौर करते वक्त प्रक्रियाओं का अनुपालन क्यों नहीं किया जा सका था। उसके मुताबिक आखिर जिस पीठ ने याकूब की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई की थी, वह सभी उस पीठ का हिस्सा क्यों नहीं थे, जिसने उसकी सुधारात्मक याचिका खारिज की, जबकि वह सभी न्यायाधीश उस वक्त उपलब्ध थे। /देखें, इंडियन एक्स्प्रेस, 28 जुलाई 2015, ‘एससी क्वश्चन्स हाउ याकूब मेमन्स प्ली वॉज डिसमिसड’/

अभी दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता कि मामला कैसे आगे बढ़ेगा ? चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी दया याचिका खारिज की है तो क्या वह फिर नए बिन्दुओं के साथ उपस्थित उसकी अर्जी पर गौर करेगी ? क्या रॉ के वरिष्ठ अधिकारी की स्वीकारोक्ति न्यायालय को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी ? क्या महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास भेजी गयी उसकी याचिका पर वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेंगे ? वाकई आखरी लमहे पर उसे कुछ मोहलत मिलेगी क्या ? क्या सरकार इस मामले को टाल देगी या अमल की तरफ बढ़ेगी।

तय बात है कि सरकार उसके अमल की दिशा में आगे बढ़ती है तो यह विवादों में घिरी एक और फांसी होगी। कहा जाएगा जहां राजनीतिक दबाव रहता है, वहां सरकार फांसी पर पुनर्विचार करने को तैयार रहती है, जैसा कि पंजाब के आतंकी राजोअना के बारे में या राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर नज़र आ रहा है और जहां ऐसा कोई दबाव नहीं रहता तो वही सरकार – संसद भवन आतंकी हमले के आरोपी में शुमार अफजल गुरू के मामले की तरह – जिसे न्यायाधीश के मुताबिक ‘समाज के सामूहिक ज़मीर’ को शान्त करने के लिए अन्ततः सजा ए मौत दी गयी थी।

बहरहाल कमजोर दिखती याकूब की जिन्दगी की डोर बरबस हमें यह भी सोचने के लिए मजबूर करती है कि जहां देश की न्यायपालिका 1993 के बम धमाकों के मामले में अभियुक्तों दंडित कर चुकी हैै, वहीं इन बम विस्फोटों का सिलसिला जिस वजह से सामने आया था, उन मुंबई दंगों में न्याय का सवाल अभी भी क्यों लम्बित पड़ा है।

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मालूम हो कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद दिसम्बर 6 से 10 दिसम्बर 92 और 6 जनवरी से 20 जनवरी 93 के बीच बम्बई में हुए दंगों में एक हजार से अधिक लोग मारे गये थे। हिंसा और दंगों का जो ताण्डव रचा गया उसकी जांच का जिम्मा बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्रीकृष्ण को सौंपा गया था । यह भी सभी जानते हैं कि प्रस्तुत रपट में शिवसेनाप्रमुख बाल ठाकरे तथा उनके शिवसैनिकों पर भी दंगा भड़काने के आरोप लगे थे। संघ-भाजपा के कई नेताओं पर भी दंगे भड़काने के आरोप दर्ज किए गए थे। इस रपट के पहले खंड के पृष्ठ 21 पर ठाकरे का उल्लेख हुआ है। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण ने कहा था, 8 जनवरी 1993 से शिवसेना और शिवसैनिकों ने मुसलमानों के जान माल पर संगठित हमले किये। एक शक्तिशाली सेनापति की भांति इन हमलों का नेतृत्व शिवसेनाप्रमुख ने किया। उनके मार्गदर्शन में शाखा प्रमुखों से लेकर शिवसेना नेताओं तक सभी दंगों में भाग लिया..

अपने भड़काऊ लेखों या बयानों में बाल ठाकरे ने कहा था:

‘‘हिन्दुओं अपना तीसरा नेत्र खोलो’’ ‘‘ हिन्दुओं को आक्रामक होना चाहिए’’ ‘‘मुसलमानों से समझौता नहीं, उन्हें लात मार कर बाहर करो’’

इन उद्गारों को श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट में उद्धृत किया था।

श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था

‘यह साफ होने के बावजूद कि शिवसेना के नेता साम्प्रदायिक दंगों को भड़का रहे हैं, पुलिस ने इस मसले पर आनाकानी की, जिसमें उसका मानना था कि अगर ऐसे लोगों को पकड़ा गया तो साम्प्रदायिक परिस्थिति और खराब हो सकती है, या अगर मुख्यमंत्राी सुधाकरराव नाईक के शब्दों का इस्तेमाल करें तो ‘बम्बई जल उठेगी’ ; लेकिन इन सबके बावजूद बम्बई को जलने से बचाया नहीं जा सका।’ –

22 जून 1997 को पत्रकार युवराज मोहिते ने श्रीकृष्ण आयोग के सामने गवाही दी। युवराज मोहित कहते हैं

‘‘इस दौरान, सेनाप्रमुख को आ रहे टेलिफोन कॉल्स की वजह से बातचीत में लगातार व्यवधान पड़ रहा था। वह एक साथ कई फोन पर बात कर रहे थे और जैसा मैंने सुना मुझे एहसास हुआ कि वह मुसलमानों पर हमला करने के लिए सेना के कार्यकर्ताओं को निर्देश दे रहे हैं। ‘सर्व लांडयांना मारून टाका’ उन्होंने कहा। उन्होंने फोन करनेवाले लोगों को बताया कि वह इस बात को सुनिश्चित करें कि अदालत में गवाही देने के लिए एक भी मुसलमान न बचे।’’ -/ मिड डे, जनवरी 13, 2003/

और तमाम निष्पक्ष विश्लेषकों ने इस बात की ओर इशारा किया था कि बम धमाके एक तरह से बम्बई दंगों की प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आए थे। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण जिन्होंने बम्बई दंगों की जांच की, उन्होंने इन दोनों के बीच इसी सम्बन्ध को रेखांकित किया था। लेकिन विडम्बना कही जाएगी कि इन दोनों के बीच के अन्तर्सम्बन्ध को लोग लगभग भूल गए हैं। मीडिया के जरिए अल्पसंख्यक समुदायों के बारे में जो एकांगी किस्म की बातें छपती है, उसके चलते बड़ा हिस्सा यह भी मानने लगा है कि बम धमाके पहले सामने आए और बाद में कुख्यात दंगे हुए।

बम धमाकों की चर्चा करते हुए न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण ने कहा था:

‘‘ बम धमाकों एवम् बम्बई दंगों के बीच का एक साझा सूत्रा यही नज़र आता है कि दंगों की प्रतिक्रिया में धमाकों को अंजाम दिया गया। दिसम्बर 1992 और जनवरी 1993 में अयोध्या और बम्बई में जो कुछ हुआ उसकी प्रतिक्रियास्वरूप बम धमाकों को सिलसिला सामने आया। सरकार एवम पुलिस के बारे में मुस्लिम युवकों के अच्छे खासे हिस्से में व्याप्त असन्तोष का पाक द्वारा सहायता प्राप्त राष्ट्रविरोधी तत्वों ने फायदा उठाया। उन्हें सबसे पहले बदला लेने के लिए तैयार किया गया, एक षड्यंत्रा की रूपरेखा बनी जिसे दाऊद इब्राहिम ने अमल किया।’’

लेकिन आज तक वह रपट कार्रवाई की बाट जोह रही है। यह बातें भी जगजाहिर हो चुकी हैं कि किस तरह तत्कालीन भाजपा शिवसेना सरकार ने उसे आखरी वक्त तक दबाये रखा और आयोग की सिफारिशों को खारिज कहते हुए एकतरफा ऐलान कर दिया कि वह पूर्वाग्रहों से प्रेरित रही है। इस बात को जानबूझकर भूला दिया गया कि अपने पांच साला कार्यकाल में आयोग ने हजारों लोगों, विभिन्न सेक्युलर विचारों वाले संगठनों या हिन्दुत्ववादी तथा मुस्लिम संगठनों या उनके प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी तथा उनके बयान लिये थे।

श्रीकृष्ण आयोग की उपरोक्त रिपोर्ट में कई सारे ऐसे तथ्य हैं, जिसे प्रकाशित हुए लगभग बीस साल होने को हैं। न केवल वे तमाम दोषी पुलिस अधिकारी जिन पर कार्रवाई करने की आयोग ने सिफारिश की थी, तरक्की पा गए हैं, न ही वे सियासतदां जिन्हें सलाखों के पीछे होना चाहिए था, अपने किए की सज़ा पाए हैं और वक्त़ बीतने के साथ इस बात की सम्भावना लगातार क्षीण होती जा रही है कि उन दिनों बम्बई को आग के हवाले करनेवाले उन्मादी संगठनों/जमातों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई होगी।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि शिवसेना-भाजपा की सरकार के महाराष्ट्र में सत्ता से बेदखल होने के बाद से महाराष्ट्र में लगातार धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करनेवाली कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की साझी सरकार पिछले साल तक सत्ता में रही है। लेकिन इस दौरान भी दंगे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, सियासतदानों पर कार्रवाई करने की उन्होंने हिम्मत नहीं दिखायी।

बम्बई बम धमाकों में कुछ आरोपियों को सज़ा सुनाते हुए जिन्होंने हिंसाचार किया था, टाडा अदालत के विशेष न्यायाधीश कोडे ने कहा था कि ‘उनकी कार्रवाई एक आतंकवादी गतिविधि थी जो राज्य के खिलाफ युद्ध को न्यौता देने जैसी थी’। अगर यह पैमाना उचित है तो आखिर जिन लोगों ने एवं उनके सहयोगियों ने ‘सेनापति की तरह इन दंगों का संचालन’ किया उनकी कार्रवाई को क्या उसी श्रेणी में नहीं डाला जाना चाहिए। भारतीय दण्ड विधान के अन्तर्गत उन्हें सज़ा दिलाने का इन्तज़ाम कौन करेगा ? बाल ठाकरे को सज़ा दिलाना दूर रहा, उनके मरने पर उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय तामझाम के साथ हुआ था और इन दिनों सरकारी खर्चे से उनके स्मारक बनाने की बात चल रही है।

ऐसी परिस्थिति है कि बम्बई आई आई टी के पूर्व प्रोफेसर राम पुनियानी का यह कथन लोगों को ज्यादा मौजूं लग रहा है जिसमें बम्बई दंगों के अपराधियों को दण्डित करने पर खामोशी और बम्बई बम धमाकों के आततायियों को मिली सज़ा की तुलना करते हुए उन्होनंे देश में उभरती दोहरी न्याय प्रणाली की बात कही थी। उन्होंने पूछा था

‘दरअसल ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम समग्रता में दो किस्म की न्याय प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। एक प्रणाली अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बधित है, जिसमें वे साम्प्रदायिक दंगों में भारी नुकसान झेलते हैं, मारे जाते हैं, उनकी सम्पत्तियां तबाह होती हैं। आम तौर पर ऐसे मामलों के अपराधी दण्डित नहीं होते। ऐसे मामलों में सहायता करनेवाले लोग बेदाग छूट जाते हैं और कभी-कभी प्रमोशन भी पा जाते हैं। अन्य मामलों में फिर चाहे बम धमाकों का मसला हो या आतंकी कार्रवाइयों का मामला हो, अगर उसमें मुसलमान शामिल हैं तो उन मामलों की जांच होती है और सज़ा सुना दी जाती है।’ (www.countercurrents.org )

फिलवक्त़ हिन्दुत्व के झंडाबरदार केन्द्र में हुकूमत हैं, जो भले संविधान के प्रति प्रतिबद्ध होने की बात करते हों, मगर उनका वास्तविक व्यवहार किस तरह आए दिन इन प्रतिबद्धताओं को धता बताता दिखता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। आए दिन संघ भाजपा के नेता अपने नफरत भरे बयानों के जरिए समूचे माहौल को विषाक्त करते रहते हैं और साम्प्रदायिक सदभाव के तानेबाने का खंडित करने पर आमादा दिखते हैं, मगर ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। यह अकारण नहीं कि केन्द्र के ग्रह मंत्रालय का ताज़ा आकलन यह बताता है कि 2015 के शुरूआती पांच महिनों में – अगर 2014 के इसी कालखण्ड के साथ तुलना करें जब कांग्रेस की अगुआई में संप्रग की सरकार कायम थी – साम्प्रदायिक दंगों में 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। हिन्दुत्व आतंकवाद में संघ एवं उसके आनुषंगिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता को देखते हुए, ऐसे तमाम आतंकी मामलों में उन्हें ‘क्लीन चिट’ देने के इंतज़ाम किए जा रहे हैं।

1950 में जब भारत का संविधान देश के सामने समर्पित किया जा रहा था तब यह वायदा किया गया था कि देश में सबके लिए एक समान न्याय प्रणाली चलेगी। आज़ादी के बाद विगत लगभग सत्तर सालों में हुए साम्प्रदायिक दंगे और उसके पीड़ितों को इन्साफ से मिला बार बार इन्कार इसी बात की ताईद करता है कि इस वायदे हम कोसों दूर खड़े हैं।

और हक़ीकत में नज़र आ रही इस दोहरी न्याय प्रणाली से भारतीय अवाम को कब मुक्ति मिलेगी यह बात भविष्य के गर्भ में ही छिपी है।

July 26,2015 02:39 पर प्रकाशित

 

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