नवारुणदा के बहाने- फिलवक्त प्रभाष जोशी से बड़े पत्रकार हैं ओम थानवी !

नवारुणदा के बहाने- फिलवक्त प्रभाष जोशी से बड़े पत्रकार हैं ओम थानवी !

नवारुणदा, हम फैताड़ु फौज के साथ लामबंद हैं और इस छिनाल कयामत के खिलाफ कोई बैरिकेड जरूर बनायेंगे, यकीनन।

पलाश विश्वास

आज की दिनचर्या की शुरुआत मैंने फेसबुक वाल पर अविरल मूत्रपातमध्ये इस पोस्ट के साथ शुरु की हैः

Forgive me my male friends. I decided top-most priority to connect the female world. I am requesting female activists, writers, professionals mostly as they are much more committed, serious, honest and unaddressed hitherto. It is nothing to do with my gender status. No fair lady ever knocked my door. I expect none at this time. But I believe that the ladies and the generation next have the potential and the genuine explosive power to blast this bloody male imperialism fascist. I am asking all lady professional to be kind enough to listen to me.

मेरा दांव अब सचमुच महिलाओं और युवाओं पर है।

शास्त्रसम्मत धर्मनिरपेक्षता बतर्ज महिलाएं शूद्र अंत्यज हैं और सामाजिक आर्थिक स्टेटस के फेरबदल से उनकी मौलिक दशा बदलती नहीं हैं। साम्राज्ञी हैसियत में भी वे अंततः- सीता गीता या द्रोपदी हैं। तसलिमा हो गयी या शिमोन या हमारी हिंदी प्रभा खेतान, तो उनका सामाजिक राजनीतिक आर्थिक बहिष्कार विधवा दशा तय है।

युवासमाज सर्वकालीन बदलाव ख्वाबों का हर्बर्ट बनेने को अभिशप्त है लेकिन कीड़ा मकोड़ा बन जाने के पहले क्षण तक वह जो हाइड्रोजन बम है, उसमें दुनिया के किसी भी मुद्रा वर्चस्व, वर्ण वर्चस्व या नस्ल वर्चस्व को तोड़कर छत्तू बनाकर निगल जाने का हाजमा है क्योंकि वह वर्ग, जाति, नस्ल, धर्म, वर्ण निरपेक्ष चेतना का रचनाशील सर्जक और धारक वाहक है।

चाहे तो सारे मर्दवादी और प्रतिष्ठित तमाम लोग मुझे अपनी फ्रेंडलिस्ट से निकाल दें, मैं आखिरकार इस छिनाल कयामत के खिलाफ बेरिके़ड बनाने के आखिरी फैताड़ुआ प्रयास में इन्हीं दो वर्गों को साथ लेकर जीरो बैलेंस के साथ इस युद्धक समय के बरखिलाफ रीढ़ सीधी करके मरना या मारा जाना पसंद करुंगा।

माफ करना दोस्तों, अंत्यज हूं और फैताड़ू भी। लेकिन हर्बर्ट नहीं हूं एकदम। दढ़ियल दंडवायस हूं तो फेलकवि गर्भपाती विद्रोही पुरंदर भट या मालखोर मदन जैसा कोई डीएनए मेरा भी होगा। जन्मजात बदतमीज हूं और मानता हूं कि चरण छू सांढ़ संस्कृति में निष्णात भद्रजनों की तुलना में बदतमीजी में ही रीढ़ ज्यादा पुख्ता होती है।

मसलन सारस्वत पत्रकारिता प्रतिमाओं की तुलना में अबतक घनघोर नापसंद ओम थानवी को हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में मैं आगे रखूंगा सिर्फ मुक्तबाजारी बंदोबस्त के खिलाफ कारपोरेट मैनेजर सीईओ या विचारधारा जुगाली मध्ये सफेद पाखंडी वर्णवर्चस्वी सत्तादलाली के इस पेड न्यूज जमाने में हमारे जनसत्ता में बने रहने का औचित्य साबित करने के लिए।

हो सकता है कि ओम थानवी से कभी मेरा कोई संवाद न हो, हो सकता है कि पिछले तेइस साल की तरह भविष्य में जनसत्ता के पन्नों पर मेरा नाम कभी न छपें, तो भी मेरे लिए फिलवक्त प्रभाष जोशी से बड़े पत्रकार हैं ओम थानवी। समयान्तर संपादक हमारे अग्रज थानवी आलोचक पंकज बिष्ट से जन्मजात मित्रता और आत्मीयता के बावजूद मेरा यह निष्कर्ष है।

इस विपर्यस्त समय में यह सार्वजनिक स्वीकारोक्ति का दुस्साहस बेहद जरूरी है क्योंकि प्रिंट में हमारी कोई आवाज कहीं नहीं है।

मेरे लिए आवाज ही अभिव्यक्ति का मूलाधार है, शब्द संस्कृति का ब्राह्मणवाद नहीं। व्याकरण नहीं और न ही अभिधान और न सौंदर्यशास्त्र का अभिजन दुराग्रह।

मेरे लिए भाषा ध्वनि की कोख से जनमती है और आखर पढ़े लिखे लोगों के वर्ण नस्ली धार्मिक सत्ता वर्चस्व का फंडा है, ज्ञान का अंतिम सीमा क्षेत्र नहीं आखर। वह ध्वनि के उलझे तारों की कठपुतली ही है।

इसलिए ध्वनि ही मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

ध्वनि ही मेरी अभिव्यक्ति है।

ध्वनि ही अभिधान। ध्वनि ही व्याकरण और ध्वनि ही सौंदर्यशास्त्र।

अरस्तू से लेकर पतंजलि तक और उनके परवर्ती तमाम पिद्दी भाषाविदों, संपादकों, प्रकाशकों, आलोचकों और विद्वतजनों को मैं इसीलिए बंगाल की खाड़ी में या अरब सागर में विसर्जित करता हूं समुचित तिलांजलि के साथ।

जिस आखर में ध्वनि की गूंज नहीं, जो आखर रक्त मांस के लोक का वाहक नहीं, जो कोई बैरिकेड खड़ा करने लायक नहीं है, उस आखर से घृणा है मुझे।

यह घृणा लेकिन नवारुणदा की मृत्युउपत्यका मौलिक और वाया मंगलेशदा अनूदित हिंदी घृणा के सिलसिले में है, जाहिर है कि यह घृणा मौलिकता में नवारुणदा की पैतृक विरासत है, जिसको मात्र स्पर्श करने की हिम्मत कर रहा हूं, उन्हीं की जलायी मोमबत्तियों के जुलूस में स्तब्ध वाक खड़ा हुआ।

मैं इस मृत आखर उपनिवेश का बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिक होने से साफ इंकार करता हूं, और यह इंकार गिरदा से लेकर मंटो, इलियस, मुक्तिबोध, दस्तावस्की, काफ्का, कामू,डिकेंस, उगो, मार्क्वेज, मायाकोवस्की,पुश्किन, शा,  हकर माणिक से लेकर नवारुण दा की मौलिक विरासत है और मैं दरअसल उसी विरासत से नत्थी होने का प्रयत्न ही कर रहा हूं। यही मेरी संघर्ष गाथा है और प्रतिबद्धता भी है जो संभ्रांत नहीं, अंत्यजलोक है।

नवारुण दा कि तरह मेरे लिए गौतम बुद्ध और बौद्धधर्म कोई आस्था नहीं, जीवनपद्धति है और वर्चस्ववादी सत्ता के खिलाफ लोक का बदलाव ख्वाब है, जिसे साधने के लिए ध्यान की विपश्यना तो है लेकिन मूल वही पंचशील।

पंचशील अभ्यास के लिए प्रकृति का सान्निध्य अनिवार्य है बौद्धमय होने से हामारा तात्पर्य प्राकृतिक पर्यावरण चेतना है, जिसके बिना धर्म फिर वही है जो पुरोहित कहें और आचरण में पाखंड का जश्न जो है और जो अनंत फतवा श्रंखला है नागरिक मानवाधिकारों के विरुद्ध दैवी सत्ता के लिए।

यह पंचशील मुझे तसलिमा के साथ भी खड़ा करता है, पुरुषवर्चस्व के खिलाफ उनकी गैरसमझौतावादी बगावत के लिए जबकि उनकी देहगाथा में मैं कहीं नहीं हूं।

और चितकबरा सांढ़ संस्कृति का तो हम सत्तर के दशक से लगातार विरोध करते रहे हैं। स्त्री वक्ष, स्त्री योनि तक सीमाबद्ध सुनामी के बजाय प्रबुद्ध स्त्री के विद्रोह में ही हमारी मुक्ता का मार्ग है और हमें उसकी संधान करनी चाहिए।

नवारुण दा की तरह हमारे लिए वाम कोई पार्टी नहीं, न महज कोई विचारधारा है। यह शब्दशः वर्गचेतना को सामाजिक यथार्थ से वर्गहीन जातिविहीन शोषणविहीन समता और सामाजिक न्याय के चरमोतकर्ष का दर्शन है जैसा कि अंबेडकर का व्यक्तित्व और कृतित्व, उनकी विचारधारा, आंदोलन, प्रतिबद्धता, उनका जुनून, उनका अर्थशास्त्र, धर्म और जाति व्यवस्था के खिलाफ उनका बदतमीज बगावत और उनके छोड़े अधूरे कार्यभार।

नवारुणदा वाम को वैज्ञानिक दृष्टि मानते रहे हैं और बाहैसियत लेखक मंटो वाम से जुड़े न होकर भी इसी दृष्टिभंगिमा से सबसे ज्यादा समृद्ध हैं जैसे अपने प्रेमचंद, जिन्हें किसी क्रांतिकारी विश्वविद्यालय या किसी क्रांतिकारी संगठन का ठप्पा लगवाने की जरूरत नहीं पड़ी।

इलियस, शहीदुल जहीर से लेकर निराला और मुक्तिबोध का डीएनए भी यही है। शायद वाख, वैनगाग, पिकासो, माइकेल जैक्सन, गोदार, ऋत्विक घटक, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला का डीएनए भी वही। यह डीएनए लेकिन तमाम प्रतिष्ठित कामरेडों की सत्ता से अलहदा है।

इसीलिए हमारे लिए अंबेडकर के डीप्रेस्ड वर्किंग क्लास और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के सर्वाहारा में कोई फर्क नहीं है और न जाति उन्मूलन और वर्गहीन समाज के लक्ष्यों में कोई अंतर्विरोध है।

यही वह प्रस्थानबिंदु है, जहां महाश्वेता दी से एक किमी की दूरी के हजारों मील के फासले में बदल जाने के बाद भी नवारुण दा उन्हीं की कथा विरासत के सार्थक वारिस हैं तो अपने पिता बिजन भट्टाचार्य और मामा ऋत्विक घटक के लोक विरासत में एकाकार हैं उनके शब्दों और आभिजात्य को तहस नहस करने वाले तमाम ज्वालामुखी विस्फोट।

भाषा बंधन ही पहला और अंतिम सेतुबंधन है मां और बेटे के बीच। संजोग से इस सेतुबंधन में हम जैसे अंत्यज भी जहां तहां खड़े हैं बेतरतीब।

महाश्वेता दी ने बेटे से संवादहीनता के लिए उनकी मत्यु के उपरांत दस साल के व्यवधान समय का जिक्र करते हुए क्षमायाचना की है और संजोग यह कि इन दस सालों में मैं दोनों से अलग रहा हूं। जब दोनों से हमारे अंतरंग पारिवारिक संबंध थे, तब हम सभी भाषा बंधन से जुड़े थे। पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल से लेकर मैं, अरविंद चतुर्वेद और कृपाशंकर चौबे तक।

तभी इटली से आया था तथागत, जो हमें ठीक से जानता भी नहीं है। लेकिन आज महाश्वेता दी और तथागत के स्मृतितर्पण से सुबह से कुछ भी नहीं पढ़ सका। अखबार भी नहीं।

मुक्ति के लिए पीसी पर बैठा हूं। दिलो दिमाग खून से सराबोर है।

एई समय के नवारुणदा विशेषांक ने न जाने कितने खून के प्रपात खोल दिये जिसमें सत्तर के दशक के हर्बर्ट से लेकर बिनू और महाश्वेता दी की हजार चौरासी लाशें हैं।

महाश्वेता दी ने आज माना कि वह हजार चौरासवीं लाश में छुपा युवा विद्रोही दरअसल नवारुणदा हैं।

खून से सराबोर होने की वजह से खून का कोई कतरा मेरी उंगलियां चूं कर आपको छूने की बदतमीजी कर दें तो इस अंत्यज, हर्बर्ट, फैताड़ु, कंगाल मालसाट के चरित्र को माफ कर दीजिय़ेगा।

इसीलिए अरबन पृष्ठभूमि में अरबन साहित्य लिखते हुए बेदखल जनपदों की भाषा बुनते है नवारुण दा व्याकरण, सौंदर्यबोध और अभिधान को तहस-नहस करते हुए और अंत्यज व्रात्य सर्वहारा के पक्ष में निरंतर गुरिल्ला युद्ध है उनका साहित्य।

कयामत के सेक्सी वक्षस्थल की विभाजक पर मशालें जनलाने का दुस्साहस है उनका परिचय और कुलीनत्व को तिलांजलि देकर पर्यावरण बंधु बौद्धमय हैं नवारुणदा लेकिन अंबेडकरवादी नहीं है।

मार्क्सवादी होकर जिये वे और मार्क्सवादी होकर मरे वे और बिजन भट्टाचार्य के विख्यात संवाद की तरह, आमि कोनो कम्प्रोमाइज करिनि, मैंने कोई समझौता नहीं किया, उतनी ही सशक्त रीढ़ लेकर खूनी कयामत के विरुद्ध बैरिकेड बनाने के संकल्प के साथ अग्नाशय कैंसर के शिकार इस मृत्यु उपत्यका देश को अलविदा कहा उन्होंने।

बौद्धमय विचार और अंत्यज प्रतिबद्धता के दम पर हमारे नवारुणदा किसी भी अंबेडकर अनुयायी की तुलना में ज्यादा अंबेडकरवादी हैं।

कम से कम उनके साहित्य में मुझे मार्क्स और अंबेडकर एकाकार लगते हैं। और इसे लिए नवारुण दा का फैताड़ु होने की घोषणा करने में मुझे कोई हिचक नहीं है।

हमने आवाज से लेकर प्रभात खबर, जागरण, अमर उजाला होकर जनसत्ता तक दस साल पहले तक भयंकर बवाल मचाया है संपादकीय नीति के लिए अपनी न्यूनतम हैसियत के बावजूद। किसी से मेरा कोई निजी विवाद नहीं रहा।

सारी लड़ाई आखर को जिंदा रखने की रही है। वह लड़ाई अब कमसकम दस साल से खत्म है। क्योंकि हम सिर्फ पेस्टर डिजाइनर में सीमाबद्ध हो गये हैं।

मृत अखबारों के पेड न्यूज समय में जनसत्ता की आंतरिक व्यवस्था में मैं कभी ओम थानवी तो क्या किसी और संपादक के साथ खड़ा हो ही नहीं सकता। अब उनके मुखातिब हो जाने का भी कोई मतलब नहीं है।

यह हमारे पालतू हो जाने का सबूत लेकिन नहीं है। अखबारों के गैरप्रासंगिक हो जाने की कथा व्यथा है।

मुझे यह कहते हुए कोई द्विधा नहीं है, चाहे कोई इसका कुछ भी मतलब निकाले, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी भी सूरत में मेरी अंत्यज जन्मजात हैसियत बदलने वाली नहीं है, एक जिंदा अखबार इस दुस्समय में नकालने के लिए मैं ओम थानवी को सलाम करता हूं।

यह वक्त है उस सड़ी गली बाजारु मसीहा विरासत को सिरे से खारिज करने के लिए ताकि गूंज वाले आखर और लोकध्वनि वाली अभिव्यक्ति की बहाली हो, क्योंकि इसके बिना कोई बैरिकेड हम बना नहीं सकते।

अंध भक्तों, आपकी अनंत आस्था पर कुठारा घात के लिए मुझे माफ करना और हो सकें तो मेरी खैरियत के लिए दुआ दारु की रस्म निभाना।

मैं अपनी ऐसी की तैसी कराने के लिए दिवंगत जोशी की सारस्वत आत्मा को कोई तकलीफ देता नहीं, लेकिन पंजाब में और सिख समूहों में आपरेशन ब्लू स्टार के पुनरूत्थान, बाबरी विध्वंस, मंडल कमंडल घमासान और तेलयुद्ध में शिककबाब गाजापट्टी और यूपी, सैन्य राष्ट्र के हमलों मे मुक्तबाजारी विध्वस्त जनगण के मध्य फैताड़ुआ गुरिल्ला प्रतिरोध के प्रस्थानबिंदु बतौर आपरेशन ब्लू स्टार समर्थक जोशी माथुर युगलबंदी की हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक शर्म और सती प्रथा समर्थक संपादकीय के बावजूद मैं किसी को मसीहा बनाने से साफ मान करता हूं।

यह बयान आदरणीय जोशी जी या माथुर जी के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन कारोबारी कामयाब कारपोरेट कलम के सिपाहियों के लिए हैं जो अपनी बदबू गोटी चलाने के लिए दशकों से रघुवीर सहाय को खारिज करते रहे हैं।

August 10,2014 05:08 को प्रकाशित

 

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