नेपाल में फेकू हारा है, भारत नहीं

भारत-नेपाल की जनता की एकता जिंदाबाद ! भारत की विदेश नीति का यह प्रमुख हिस्सा रहा है कि पड़ोसी देशों की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न  किया जाए और इसी कारण उसके सम्बन्ध पाकिस्तान को छोड़कर सभी से अच्छे रहे हैं। भारत में नयी सरकार आने के बाद उसकी विदेश नीति अस्पष्ट हो गयी है, जिसका नतीजा नेपाल में दिखाई दे रहा है। वहां इस चुनाव में भारतीय हस्तक्षेप की बात खुल कर सामने आयी कि सांसदों को खरीदने के लिए रुपया तक भेजा गया। हमारे प्रधानमंत्री की पहली नेपाल यात्रा पर उनका भव्य स्वागत हुआ था, लेकिन दूसरी यात्रा में उनकी अनाप-शनाप बातों ने नेपाली जनता को रुष्ट  कर दिया था। नेपाली संविधान को बनाये जाने की प्रक्रिया में उनकी पार्टी के हस्तक्षेप ने नेपाली जनमानस में देश के प्रति आक्रोश पैदा  कर दिया। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार नागपुरी दिशा निर्देशों के अनुरूप संविधान में वह हिन्दू राष्ट्र घोषित कराना चाहते थे, जिसको वहां के संविधान निर्माताओं ने अस्वीकार कर दिया। जिसके फलस्वरूप हस्तक्षेपकर्ताओं को मुंह की खानी पड़ी। नए संविधान के बाद नेपाल ने कल अपना प्रधानमंत्री भी चुन लिया है। 558 सदस्यों वाली संसद ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनीफाइड मार्कसिस्ट लेनेनिस्ट के नेता खड्ग प्रसाद शर्मा ओली उर्फ के पी ओली को प्रधानमंत्री चुना। केपी शर्मा ने नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को हराया है। संसद में हुए मतदान में सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख ओली को 338 मत मिले, जबकि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष कोइराला ने सिर्फ 249 मत हासिल किए। प्रधानमंत्री चुने जाने के लिए 299 मतों की जरूरत थी। कुल 587 सदस्यों ने मतदान किया। यदि मोदी सरकार ने हस्तक्षेप न किया होता तो शायद परिणाम दूसरे होते। इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री लगातार विदेश यात्राएं करते रहते हैं और अप्रवासी भारतीयों से जय-जयकारा कराते रहते हैं। विरोध वहां भी शुरू हो गया है। विरोध में अप्रवासी भारतीयों द्वारा अपशब्दों का प्रयोग भी किया जा रहा है। प्रधानमंत्री विदेश में भी चुनाव सभा संबोधित करते हैं और विपक्षी दलों के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप करके देश की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। पहले यह नीति थी कि जो भारतीय किसी भी देश का नागरिक हो गया है वह उसी मुल्क की बेहतरी के सम्बन्ध में सोचे तथा उसी मुल्क के प्रति निष्ठावान रहे। अब यह नीति बदल गयी है। अप्रवासी भारतीयों को बार-बार संबोधित करने से अगर इन अप्रवासी भारतीयों की निष्ठा संदेह के घेरे में आयी तो निश्चित रूप से जिस मुल्क में रह रहे हैं, दिक्कतें पैदा हो जाएंगी। इस सम्वन्ध में नागपुरी सोचने में असमर्थ है। अमरीकियों ने सुनियोजित तरीकों से मुसलमानों में यह नारा दिया कि पहले वह मुसलमान हैं फिर जिस देश में रहते हैं, वहां के नागरिक है। जिसका असर यह हुआ कि दुनिया में उनके ऊपर सवाल भी अमरीकियों ने ही खड़ा करा दिया। उनकी दिक्कतें बढ़ीं। नेपाल की जनता और भारतीय जनता में घनिष्ठ सम्वन्ध है। फेकू की उल्टी सीधी हरकतों से सम्बन्ध खत्म नहीं होने जा रहे हैं, लेकिन एक विवाद बढ़ रहा है। समय रहते इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। भारत-नेपाल की जनता की एकता जिंदाबाद ! -रणधीर सिंह सुमन

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
hastakshep
>