प्रभाष जोशी भाषायी पत्रकारिता में धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक पुरुष बन जाते हैं !!!

[box type="info" ]हस्तक्षेप पर प्रभाष जोशी जी के बारे में चर्चा चल रही है। हमारे सम्मानित स्तंभकार डॉ. प्रेम सिंह ने बुल्गारिया से इस बहस में हस्तक्षेप करते हुए एक लेख भेजा है। यह लेख प्रभाष जी के निधन पर नवम्बर 2009 में लिखी गई श्रद्धांजलि है जो युवा संवाद में प्रकाशित हुई थी। डॉ. प्रेम सिंह का मानना है कि प्रभाष जोशी नवउदारवाद के हमले का विरोध और आलोचना गरीब भारत की जमीन पर खड़े होकर करते हैं।[/box] जाना प्रभाष जोशी का स्मृति-लेखा प्रभाष जी के अचानक निधन का समाचार ईमेल से शिक्षक साथी कान्हाराम मीणा से मिला। ‘... एक बहुत बुरी खबर है। हमारे प्रभाष जी नहीं रहे।’ चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग की उस सुबह हमने धीरे से कुमकुम को यह दुखद खबर सुना दी। फिर नेट पर उनके निधन का समाचार पढ़ लिया। वीराने विदेश में प्रभाष जी की मौत की खबर पाकर जो संताप हुआ, उसके जिक्र का कोई मायना नहीं है। एकबारगी रिक्त हो गए मन में आया कि तत्काल कुछ नहीं कहना है; कुछ नहीं लिखना है। जब निर्मोही नाता ही तोड़ गया तो किसके लिए कहना; किसके लिए लिखना! कहां लौट कर उनसे टूट कर मिलना था, कहां अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए। कुमकुम ने बात चलानी चाही, लेकिन चली नहीं। सोच लिया ‘समय-संवाद’ में भी प्रभाष जी के चले जाने पर अभी नहीं लिखूंगा। भारत लौट कर आगे कभी उनके होने की सार्थकता का स्मरण कर पाया तो करूंगा। मंदी के दौर में अमेरिकी हथियार उद्योग की तेजी पर इस बार का ‘समय-संवाद’ लिखने का विचार बना लिया था। इस बीच कई युवा और हमउम्र साथियों के मेल आए। विशेषकर युवा साथियों और प्रेमपाल शर्मा ने लिखा कि उन्हें प्रभाष जी के प्रति मेरी श्रद्धांजलि का बेसब्री से इंतजार है। युवा साथियों को प्रभाष जी से मेरा घनिष्ठ नाता पता है। वे नवउदारवाद के विरुद्ध छिड़ी जंग में प्रभाष जोशी की अहम भूमिका के बारे में भी जानते हैं। साथियों का यह मानना स्वाभाविक है कि प्रभाष जी से घनिष्ठता और खुद नवउदारवाद के आलोचक के नाते मैं उनके निधन पर लिखूंगा ही और जल्दी। लिखने के आग्रह के साथ योगेंद्र यादव ने बर्लिन से प्रभाष जी का अंतिम वीडियो भेजा। हालांकि मुझे खबर मिल चुकी थी, उन्होंने लिखा कि पहले खबर इसलिए नहीं दी ताकि यात्रा में मन खट्टा न हो। एक दबाव-सा बन गया। सो, मन बदल कर, इसी बार यह श्रद्धांजलि लिख रहा हूं। एक बुद्धिजीवी के नाते प्रभाष जोशी ने अपने युग-धर्म को भली-भांति पहचान लिया था और उस पर लगातार अडिग बने रहे। केवल बौद्धिक स्तर पर नहीं, नवउदारवाद के विरोध में उन्होंने भरसक सक्रिय भूमिका निभाई। वे सीधे नवउदारवाद विरोधी आंदोलनों में तो अक्सर हिस्सेदारी करते ही थे, भाषण के अन्य अवसरों का उपयोग भी उस उद्देश्य के लिए कर लेते थे। नागरिक व मानवाधिकारों तथा संवैधानिक व लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष मंें वे सतत सक्रिय रहते थे। आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध के सशक्त प्रतीक तो थे ही। धर्म-विहीन धर्मनिरपेक्षता के समर्थक विद्वानों का प्रभाष जोशी की धर्म की उदार धारा को मानने और महत्व देने वाली धर्मनिरपेक्षता से विरोध है। लेकिन प्रभाष जोशी ने धर्म की उदार धारा का अवगाहन करते हुए संघ संप्रदाय की सांप्रदायिकता का डट कर विरोध किया है। उनका अपना धर्म हिंदू था तो उन्होंने हिंदू होने का धर्म निभाया। दूसरे अपने-अपने धर्म का धर्म निभा सकते हैं। धर्म-विहीनता के समर्थक मानव धर्म का। इस तरह नागरिक स्तर पर चलने वाली बौद्धिक बहसों और जनांदोलनों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण बन गई थी। हम अपने समवेत उद्यम से उनकी कमी को भर पाते हैं तो वह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। नेट पर देखने से पता चलता है कि उन्हें बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों और नेताओं ने अपनी श्रद्धांजलि दी है। श्रद्धांजलियों और स्मृति सभाओं का सिलसिला अभी चल रहा है। यह उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। विशेषकर बुद्धिजीवियों ने उनके विचारों और कार्यों का स्मरण करते हुए उनके द्वारा किए जाने वाले नवउदारवाद विरोध का विशेष रूप से उल्लेख किया है। प्रभाष जी की भरपाई हालांकि मुश्किल होगी, लेकिन ये सभी लोग अपने स्तर पर उस दिशा में भूमिका निभाएंगे तो नवउदारवाद विरोध का संघर्ष आगे बढ़ पाएगा। कई स्मृतियां हैं जो बार-बार उभर कर सामने आ रही हैं। एक का हम यहां जिक्र करते हैं। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं सालगिरह की शुरुआत के मौके पर साहित्य वार्ता के तत्वावधान में मेरठ शहर में एक-दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया था। दिल्ली से साथी इंद्रदेव और राजेश ढोकवाल और मेरठ से साथी नवीन लोहनी और राजेश चैहान ने इंतजाम किया था। उस गोष्ठी में प्रभाष जी सहित कई विद्वानों ने हिस्सेदारी की थी। गोष्ठी के बाद ज्यादातर विद्वान चले गए। प्रभाष जी देर तक शहीद स्थल पर चक्कर काटते रहे। जब रात होने आई तो लौटे। गोष्ठी खत्म होने से लौटने के बीच कोई पानी-पत्ता उन्होंने नहीं मांगा। जब अगला मई का महीना आया तो उन्होंने कहा कि सालगिरह की समाप्ति पर भी हमें मेरठ में कार्यक्रम करना चाहिए। दो भागों में वह कार्यक्रम हुआ। दिन में साथी नवीन लोहनी के सहयोग से मेरठ विश्वविद्यालय में गोष्ठी हुई। शाम को शहर के एक व्यस्त चैक पर साथी इंद्रदेव और सतेंद्र यादव के सहयोग से विद्यार्थी युवजन सभा -वियुस- के तत्वावधान में आम जलसा रखा गया। निशांत नाट्य मंच की टीम के साथ शमसुल इस्लाम और नीलिमा जी दोनों कार्यक्रमों में मौजूद थे। गोष्ठी में शिरकत करके ज्यादातर विद्वान चले गए। प्रभाष जी को अतिथिगृह में थोड़ी देर के लिए आराम करने के लिए कहा गया। लेकिन वे वहां भी साथियों से चर्चा करते रहे और शाम को जलसे में पहुंचे। आप सोच सकते हैं इतने बड़े कद का वयोवृद्ध पत्रकार भयंकर गर्मी में मेरठ की खाक छानता फिरेे? आज के नवउदारवादी माहौल में, जिसे बनाने में साम्राज्यवादी ताकतों के साथ पत्रकारों की मिलीभगत है; अनेक पत्रकार पूंजीपतियों की दलाली में लगे हैं। उनका लक्ष्य अधिक से अधिक धन कमाना और सुविधाओं का भोग करना है। और प्रभाष जोशी कुछ युवाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मेरठ शहर के एक चैक पर बैठे हैं। यह देश की आजादी के प्रति गहरे सरोकार के बगैर नहीं हो सकता। दरअसल, प्रभाष जोशी हमारे दौर के उन थोड़े लोगों में हैं जिन्हें देश, समाज और व्यक्ति की आजादी का अर्थ और महत्व मालूम है। जो वाजपेयी जैसों की लफ्फाजी - ‘कोई माई का लाल भारत को गुलाम नहीं बना सकता’ - और सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह मंडली की ध्ूर्तता - ‘भारत दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहा है’ - के पार देश की संप्रभुता पर आए संकट को पहचानते हैं। प्रभाष जोशी नवउदारवाद के हमले का विरोध और आलोचना गरीब भारत की जमीन पर खड़े होकर करते हैं। भारत में गरीबों का सच्चा पक्ष लेने वाले बुद्धिजीवियों की कमी होती जा रही है। नवउदारवाद के पहले की पक्षधरताओं की कलई भी उतर रही है। प्रभाष जोशी इस अर्थ में सच्चे गांधीवादी थे कि वे भारत की आजादी, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, धर्म, मीडिया सभी को गरीब भारत की कसौटी पर कसते थे। उनका यह गुण और भूमिका हमें उनका करीबी बनाती है। ये बातें हम अभी श्रद्धांजलि स्वरूप नहीं कह रहे हैं। यह सब हमने अधिक उत्कंठा और विस्तार से उस जलसे में कहा था। अपने भाषण में हमने 1857, जिसकी याद में वह जलसा रखा गया था, का जिक्र नहीं किया। केवल प्रभाष जी के साथ होने पर अपना भाषण केंद्रित रखा था। वहां बैठे हुए वे अंदर ही अंदर रोए थे। जलसे में बोलने से फिर उन्होंने मना कर दिया था। अरुण त्रिपाठी, शमसुल इस्लाम, अमरेश मिश्रा और कई युवा साथियों के देर तक भाषण हुए। प्रभाष जी ने न पानी मांगा, न जलसा जल्दी समाप्त करने को कहा। हिंदी, जिसे जगत कहने की पुरानी रीत चली आई है, के क्षुद्रताओं से भरे कूप के बाहर प्रभाष जी के साथ होना गरिमामय लगता था। देर रात तक सब लोग दिल्ली लौटे। प्रभाष जी से हमारी अंतिम मुलाकात अगस्त के तीसरे या अंतिम सप्ताह में हिंदी अकादमी के पूर्व सचिव साथी नानकचंद के घर पर हुई थी। उसका जिक्र हम अंतिम मुलाकात के नाते उतना नहीं, प्रभाष जी के व्यक्तित्व के एक ऐसे गुण के नाते कर रहे हैं जो बुद्धिजीवियों में विरल होता जा रहा है। वे पहली बार हमारी काॅलानी में आए थे। तसल्ली से बैठे नानक के साथ बात-चीत कर रहे थे। उनकी बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हुए यौन उत्पीड़न के मामले का जिक्र आ गया। प्रभाष जी ने कहा, ‘लेकिन वह महिला भी ....’ हमने पहली बार अपने विभाग के उस प्रकरण में किसी सार्वजनिक चर्चा में जबान खोली और मजबूत स्वर में कहा, ‘प्रभाष जी वह महिला नहीं, विभाग की छात्रा है।’ प्रभाष जी आगे कुछ नहीं बोले। कई मिनट चुप्पी रही। उस बीच उनके चेहरे पर जो व्यंजना प्रकट हुई, वह शब्दों में बता पाना मुश्किल है। ऐसा लगा वे इस मामले में अपनी अभी तक की धारणा, जो जाहिर है, यौन उत्पीड़क के हिमायतियों के चलाए गए अभियान के फलस्वरूप बनी होगी, को लेकर आहत और ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। उस प्रकरण पर वहां आगे एक शब्द भी नहीं बोला गया। अलबत्ता प्रभाष जी के चेहरे से यह स्पष्ट हो गया कि उनका ह्दय पीडि़ता के लिए करुणा से भर आया है। बुद्धिजीवियों में यह मानवीय करुणा अब विरल होती जा रही है। हिंदी विभाग के यौन उत्पीड़न के प्रकरण में वह करुणा बड़ी और बड़े स्त्राीवादियों में भी देखने को नहीं मिली। अलबत्ता दांव-पेच देखने को खूब मिले। हमारी एक जुझारू साथी को जांच में पीडि़ता की मदद करनी थी। उन्होंने की भी। लेकिन साथ में अपने पति का मित्र होने के नाते एक अन्य आरोपी को बरी करा लाईं। तीसरा आरोपी दूसरे आरोपी का मित्र होने के नाते बरी हो गया। इंसान अपना विवेक खोकर किस कदर अंधा हो जाता है, इसका पता हिंदी के एक अवकाश प्राप्त शिक्षक के व्यवहार से चला। उन्हें छात्रा के यौन उत्पीड़न से कोई शिकायत थी ही नहीं। जैसा कि पहले के यौन उत्पीडि़नों से भी नहीं रही थी। गोया वह ब्राह्मणों का शास्त्र-सम्मत अधिकार है! उन्हें पीडि़ता के शिकायत करने पर शिकायत थी। उन्होंने मामले को खतरनाक ढंग से पूर्व और पश्चिम का रंग देने की कोशिश की। इसके बावजूद कि पूरे विश्वविद्यालय में पीडि़ता के पक्ष में डटने वाले अकेले दो साथी पूर्व से आते हैं। यहां यह संक्षिप्त जिक्र करने का आशय यह है कि प्रभाष जी की संवेदनशीलता हमारे उनसे जुड़ने का दूसरा महत्वपूर्ण कारक है। पत्रकार होने का धर्म कहने की जरूरत नहीं कि प्रभाष जी मूल रूप से एक पत्रकार थे। उन्होंने ‘जनसत्ता’ भी जमाया और बहुत-से पत्रकार भी। वे अंत-अंत तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनी भूमिका पर आग्रह बनाए रहे। नवउदारवादी दौर में मीडिया की भ्रष्ट होती भूमिका की मुखर आलोचना वे कर रहे थे। वैसा करने की उनकी हैसियत भी थी और हक भी। एक पत्रकार के नाते उन्होंने अपनी अहमियत और आजादी को कभी गिरवीं नहीं रखा। जबकि कितने ही पत्रकार पहले कांग्रेस सरकारों के पिठ्ठू रहे, फिर संघ परिवार के पिठ्ठू बन कर मैदान में आ गए और अब नवउदारवाद के पिठ्ठू बने हुए हैं। प्रभाष जी को श्रद्धांजलि देते वक्त सभी सरोकारधर्मी पत्रकारों ने स्वीकार किया है, आज की एक बड़ी जरूरत भी है, कि मीडिया को मंडी बनने से बचाया जाए। यह कठिन है, लेकिन उनके बनाए और उनसे प्रेरित पत्रकारों को इस काम को आगे बढ़ाना चाहिए। प्रभाष जी मुख्यधारा मीडिया के बरक्स सहकारी आधार पर एक ऐसा मीडिया - अखबार, चैनल और पत्रिका समेत - बनाना चाहते थे जो लोगों को सही सूचना और विश्लेषण उपलब्ध कराए। पूंजीवादी-उपभोक्तावादी अपसंस्कृति का वाहक न हो। वह एक बड़ा काम है। लेकिन उन्हें चाहने वाले चाहें तो असंभव नहीं। यह भी कहने की जरूरत नहीं कि प्रभाष जी की रुचियां केवल राजनीति और खेल आदि तक सीमित नहीं थीं। उनमें पर्याप्त विविधता है। भारत जैसे विविधताधर्मी समाज में एक अच्छे पत्रकार के लिए यह जरूरी है। यह स्वाभाविक है एक पत्रकार के नाते उनके संबंध सबसे ज्यादा नेताओं और पत्रकारों से थे। उनमें से कई नेताओं और पत्रकारों से उनके संबंध को लेकर शिकायतें भी रहती थीं। उस समय ज्यादा जब संबंधों की प्रकृति पेशेवर और व्यक्तिगत से हटकर सार्वजनिक बन जाए। खासकर धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील साथी उनके भाजपाई नेताओं और पत्रकारों से संबंध पर परेशानी का अनुभव करते थे। सती और मंडल आयोग पर उनके मत से आज तक पूरा प्रगतिशील तबका असहमत है। हम खुद उनके लाख कहने पर दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के यहां दी जाने वाली दावत या समाजवादी विचारधारा और आंदोलन के द्रोही नेताओं के साथ आयोजित किसी बैठक या कार्यक्रम में नहीं जाते थे। इस विषय में यहां हम इतना ही कहना चाहेंगे कि यह 6 दिसंबर 1992 के बाद उदय हुए प्रभाष जोशी से लोगों की बढ़ी अपेक्षाओं को दर्शाता है। अन्यथा भी उनके संबधों पर विचार करते वक्त विनोबा और जेपी के साथ रहे संबंधों का भी स्मरण रखना चाहिए। वह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण आयाम है जिस पर गंभीरता से लिखा जाना चाहिए। खैर, अब प्रभाष जी हमारे बीच नहीं हैं। साथी उनमें जो खूबियां पाते थे उन पर ध्यान करना जरूरी है। दरअसल, पिछले पांच सालों में एमडी नंजुदास्वामी और किशन पटनायक के बाद साम्राज्यवाद विरोधी खेमे से यह तीसरी बड़ी आकस्मिक मौत है। इन तीनों के जाने के बाद अभी हमारे बीच कई सहारे हैं। लेकिन यह लगातार याद रखने की जरूरत है कि बृजमोहन तूफान, रणध्ीर सिंह, कुलदीप नैयर, सुरेंद्र मोहन, राजेंद्र सच्चर, सच्चिदानंद सिन्हा, भाई वैद्य, कमलनयन काबरा, अनिल सदगोपाल, ब्रह्मदेव शर्मा सरीखी तपी हुई विभूतियां नदी किनारे के पेड़ हैं। इन सबके जाने के बाद हमारी क्या तैयारी है, यह सोचना भी प्रभाष जी को दी जाने वाली श्रद्धांजलि का अनिवार्य अंग है। वरना उनके निधन पर शोक-संदेश तो अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने भी भेजा बताते है! प्रभाष जी की इच्छा पर हमने एक बड़ा और कई दिनों तक चलने वाला शिविर आयोजित करने का वायदा किया था। साथी इंद्रदेव ने रानीखेत में सारा इंतजाम करने की जिम्मेदारी ली थी। ऐसा नहीं है कि ऐसे शिविर नहीं होते रहे हैं। प्रभाष जी का कहना था कि इस बार नवउदारवाद और भारत में उसकी समर्थक राजनीति के खिलाफ परिवर्तनकारी उद्यम करने का पूरा फैसला करके शिविर से बाहर निकलेंगे। वह शिविर इस साल अक्तूबर-नवंबर तक आयोजित हो जाना चाहिए था। लेकिन हम संस्थानों में काम करने वालों के सामाजिक-राजनीतिक काम और संकल्प आधे-अध्ूारे होते हैं। हमने शिविर का आयोजन अगले साल मार्च-अप्रैल तक टाल दिया। वह शिविर समय पर होता तो हो सकता है प्रभाष जी वह जानलेवा मैच नहीं देखते होते! अभी दिल्ली से नीरज कुमार का मेल आया है। लिखा है कि दिल्ली के युवा साथी मेरे लौटने पर प्रभाष जी के लेखन पर एक गोष्ठी रखना चाहते हैं। यह एक अच्छा विचार है। अलग-अलग शहरों, विशेषकर छोटे शहरों में उनके लेखन पर गोष्ठियां होनी चाहिए। उनकी याद में एक सालाना व्याख्यान भी शुरू किया जाना चाहिए। हमने उनके लोकप्रिय स्तंभ ‘कागद कारे’ को संकलित करके छपी पुस्तकों ‘जब तोप मुकाबिल हो’, ‘लुटियन के टीले का भूगोल’, ‘जीने के बहाने’, ‘धन्न नरबदा मैया हो’ और ‘खेल सिार्फ खेल नहीं है’ की समीक्षा की थी। समीक्षा का संपादित अंश हिंदी ‘तहलका’ के पहले अंक में छपा था। हमने प्रभाष जी से कहा था कि पूरी समीक्षा ‘युवा संवाद’ में छपेगी। ‘युवा संवाद’ की तरफ से श्रद्धांजलि स्वरूप वह समीक्षा ज्यों की त्यों यहां दे रहे हैं। ग्लोबल के बरक्स लोकल की दावेदारी भूमिका में प्रभाष जी ने बताया है कि उनके सहकर्मी जवाहर कौल ने उन्हें अलग ढंग का काॅलम लिखने का सुझाव दिया। तब से अब तक ‘कागद कारे’ के नियमित लेखन को प्रमाण मानें तो कह सकते हैं कि कौल साहब ने सुझाव न भी दिया होता, तब भी यह होता। ‘कागद कारे’ के रूप में न सही किसी और मीजान में। रज्जू बाबू - राजेंद्र माथुर - के साथ आस्टेलिया में हुए एक अतींद्रिय संवाद के अनुभव के बाद कौल साहब का सुझाव आया। लगता यही है कि वैसे सुझाव के पीछे प्रेरणा खुद प्रभाष जी की रही हो। यानी उनकी आंतरिक इच्छा को पहचान कर कौल साहब ने एक अच्छे साथी की तरह उस इच्छा को फलीभूत होने का रास्ता सुझाया हो और अन्य सहकर्मियों ने भी उसका सम्मान किया हो। कहना न होगा कि अपनी इच्छा की पूर्ति का यह लोकतांत्रिक और सहयोगी तरीका प्रभाष जी के काॅलम के लिए वरदान साबित हुआ। पंचों की राय से तय हुआ काॅलम ‘जनसत्ता’ अखबार में पिछले 16 सालों से लगातार लिखा जा रहा है। प्रभाष जी के संपादक न रहने के बाद भी। कैरियर के हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी वैमनस्य और ‘राजनीति’ की कमी नहीं है। नवउदारवादी दौर ने तो उसे कााफी नीचाइयां प्रदान कर दी हैं। प्रभाष जी शायद पहले संपादक हैं जो अवकाश प्राप्ति के बाद भी अपने अखबार में नियमित काॅलम लिख रहे हैं। वह भी ऐसे मीडिया घराने में जिसका अंग्रेजी अखबार उदारीकरण का अंध समर्थक है और उसका संपादक अडवाणी का। प्रभाष जी की इच्छा सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की थी। पत्रकार रहते हुए साहित्य रचना करने का रास्ता उन्होंने नहीं अपनाया था। लिहाजा, वह पत्रकारिता के माध्यम से ही पूरी होनी थी। पत्रकारिता के साथ कई लोगों ने साहित्य रचना की है। वे अच्छे पत्रकार भी सिद्ध हुए हैं। लेकिन अपनी सर्जनात्मकता को पत्रकारिता में ही पिरो देने का काम ‘कागद कारे’ के माध्यम से प्रभाष जोशी ने किया है। भूमिका में उन्होंने लिखा है, ‘‘... संपादकीय और लेख लिखता रोज हूं लेकिन लगता है कि मन की बात मन ही में रह गई। कथा-कहानी लिखता रहता तो शायद अपनी अभिव्यक्ति पूरी हो पाती। लेकिन जब ऐसा लिखने का उत्साह और कहानियां थीं तब लगता था कि अपने आस-पास के राजनैतिक संसार को प्राप्त परिस्थितियों में समझना और समझाना भी जरूरी है। ठोस और भौतिक वर्तमान से उसी के उपकरणों से निपटना भी एक चुनौती है और उसका भी सामना करना चाहिए। अगर गांव सुनवानी महाकाल और ग्रामसेवा छोड़ कर पत्रकारिता में नहीं आता तो शायद साहित्य में ही लगा रह सकता था। लेकिन पत्रकारिता में रपट पड़ा हूं तो यों ही ‘हर गंगा’ क्यों करूं? इसीलिए तथ्यों और वर्तमान को साधने में लगा रहा। कल्पना और अनुभूति के बजाय तथ्यों और तर्कों को औजार बनाया।’’ कल्पना और अनुभूति से रहित तथ्य और तर्कपरक पत्रकारिता के साथ जीवन नहीं कट सकता था। भीतर जड़ जमाए बैठा सर्जक आखिर ‘कागद कारे’ पर उतर ही आया! प्रभाष जी के इस सर्जनात्मक उद्यम से हिंदी भाषा और पत्रकारिता को कितना विरल अवदान मिला है इसका प्रमाण हाल में प्रकाशित ‘कागद कारे’ के पांच खंड हैं। संपादन सुरेश शर्मा ने किया है। खंडों के शीर्षक हैं: ‘जब तोप मुकाबिल हो’, ‘लुटियन के टीले का भूगोल’, ‘जीने के बहाने’, ‘ध्नन नरबदा मैया हो’ और ‘खेल सिार्फ खेल नहीं है’। संपादक ने लेखों का विषयवार विभाजन करने का सराहनीय प्रयास किया है। हालांकि अंतिम दो खंडों को छोड़ कर बाकी के तीन खंडों में विषय एक-दूसरे में आवा-जाही करते हैं। ‘धन्न नरबदा मैया’ में उनके भारतीय संस्कृति से संस्कारित मन ने स्थानीय रंगत के साथ अपने को अभिव्यक्त किया है। ‘खेल सिर्फ्र खेल नहीं है’ खंड में उनके ज्यादातर क्रिकेट के खेल पर लिखे गए लेख हैं। हालांकि इस खंड का शीर्षक ‘खेल सिर्फ क्रिकेट है’ ज्यादा सही होता! एक पत्रकार पर सबसे ज्यादा दबाव राजनैतिक घटनाओं, विषयों, उन्हें अंजाम देने वाले नेताओं और समाज पर उन सबके प्रभावों के विश्लेषण का होता है। प्रभाष जी ने भी राजनैतिक दबाव का जुआ उतार कर नहीं फेंका है। तात्कालिकता पत्रकारिता का पहला धर्म होता है जिसे दूरगामी लक्ष्य के मद्देनजर हर बड़े पत्रकार को निभाना पड़ता है। हिंदी, भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के कई पत्रकारों की तरह प्रभाष जी ने भी वह बराबर निभाया है। यह उनकी अपनी खूबी है कि उन्होंने ‘कागद कारे’ में अपने दौर की राजनीति को दर्ज करने के साथ-साथ उसके इतर विविध विषयों और विभूतियों - साहित्यकारों, विचारकों, संगीतकारों, फिल्मकारों, जनांदोलनकारियों, पत्रकारों, खिलाडि़यों, उद्योगपतियों - पर उतनी ही संलग्नता के साथ लिखा है। अपने जीवन में आने वाले कतिपय सामान्य जनों और विशाल भारतीय देहाती जीवन पर भी वे लिखते तो ‘कागद कारे’ में तस्वीर ज्यादा समावेशी होती। ‘जीने के बहाने’ खंड में प्रत्येक राजनैेतिक धारा के नेताओं पर लेख हैं। एक भी कम्युनिस्ट नेता पर अलग से नहीं लिखे जाने की कमी खटकती है। बहरहाल, अभी तक के लिखे विषयों और व्यक्तियों में प्रभाष जी की रसाई इस कदर है कि उनके लेखन में उनके व्यक्तित्व की तलाश और वह व्यक्तित्व किस तलाश में लगा है, इसकी तलाश की जा सकती है। इस संक्षिप्त समीक्षा में वैसा करना संभव नहीं है। यहां हम ‘कागद कारे’ में व्यक्त प्रभाष जी के सरोकारों पर एक संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। पहली नजर में यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रभाष जी का लेखन वैश्विक - ग्लोबल - के बरक्स स्थानीय - लोकल - का दावा पेश करता है। स्थानीयता उनकी केवल वैचारिक-सैद्धांतिक मान्यता नहीं बल्कि उनके भावबोध का हिस्सा है, जो मालवा की मिट्टी और नर्मदा के पानी से बना है। करीब दो दशक से बह रही वैश्वीकरण की आंधी के बावजूद उनके चिंतन में मालवा की मिट्टी के ताजा जर्रे चिपके देखे जा सकते हैं। मिट्टी-पानी-पहाड़ चाहे मालवा-नर्मदा के हों या फिर उड़ीसा-झारखंड-छत्तीसगढ़ के - आपस में जुड़ जाते हैं। प्रभाष जोशी आपसी जुड़ाव से बनने वाली स्थानीयता की ताकत को सींचते हैं। उनके यहां वैश्वीकरण का विरोध विचार से ज्यादा एक संस्कार है, जो साम्राज्यवादी शक्तियों के पिछले तीन सौ सालों के हमले के बावजूद बचा हुआ है। मालवा की मिट्टी से मिला यह संस्कार सबसे ज्यादा गांधी के विचार से पुष्ट होता रहा है। पहली नजर में ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रभाष जी के लेखन का उतना ही महत्वपूर्ण सरोकार आरएसएस द्वारा प्रतिपादित और प्रचारित सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी विचारधारा के बरक्स भारतीयता का दावा पेश करना है। उनके इस उद्यम में 6 दिसंबर 1992 को आरएसएस द्वारा बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद ज्यादा निखार और धार आती है। एकबारगी प्रभाष जोशी भाषायी पत्रकारिता में धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक पुरुष बन जाते हैं। हालांकि धर्मनिरपेक्षता का उनका विमर्श अन्य सेकुलर जमातों से अलग भारतीयता और आधुनिक युग में उसे धारण करने वाले गांधीवाद से निर्मित और पुष्ट होता है। इसीलिए आधुनिकतावादी और मार्क्सवादी दोनों को उनके साथ इस मसले पर उलझन होती है। हालांकि उलझन के कुछ व्यावहारिक कारण भी बनते हैं। पिछले दिनों प्रभाष जी ने लखनउ में एक लेखक की पुस्तक का विमोचन किया और भारतीय संस्कृति पर अपने विचार व्यक्त किए। खबर दिल्ली के ‘जनसत्ता’ में छपी तो साथी शमसुल इस्लाम ने फोन करके पूछा ‘भाई साहब यह क्या हो रहा है? प्रभाष जी द्वारा एक संघी लेखक की पुस्तक के विमोचन और उसके संदर्भ में भारतीय संस्कृति पर चर्चा करने का क्या औचित्य हैं?’ शमसुल वाकई परेशान थे। मैंने उनसे कहा कि प्रभाष जी लौट आएंगे तो इस विषय पर हम दोनों मिल कर उनसे चर्चा करेंगे। पिछले दिनों ‘कागद कारे’ के पांच खंडों का भव्य विमोचन दिल्ली में हुआ। खुद मेरे कई युवा लेखक-पत्रकार साथियों ने, जो प्रभाष जी के बाजारवाद विरोधी लेखन में गहरी आस्था रखते हैं, ऐतराज उठाया कि ‘कार्यक्रम का संचालन बाजारवाद के एक ‘बजरबट्टू’ ने क्यों किया?’ ‘बजरबट्टू’ शब्द उन्होंने प्रभाष जी से ही लिया था। प्रभाष जी बताते हैं कि आरएसएस लोगों को ‘बजरबट्टू’ बना कर छोड़ देता है। कैसी संगति है बाजार भी लोगों के साथ वही सुलूक करता है। बहरहाल, भारतीय समाज और राष्ट पर संप्रदायवाद और बाजारवाद का शिकंजा मजबूत होते जाने के साथ उसके खिलाफ संघर्ष करने वालों के सामने चुनौती बढ़ती जा रही है। शायद उसी बेचैनी के चलते प्रभाष जी और उन सरीखे दूसरे वरिष्ठ सज्जनों से युवाओं की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। बाजारवाद और संप्रदायवाद का सतत और सुचिंतित विरोध करने के साथ-साथ प्रभाष जोशी दलित और स्त्री जैसे महत्वपूर्ण समकालीन विमर्शों में भी अपने ढंग से सार्थक हस्तक्षेप करते हैं। नागरिक एवं मानव अधिकारों की पक्षधरता और रक्षा में लेखन के अलावा सक्रिय भागीदारी करते हैं। जिन सच्चाइयों को ‘मीडिया हाइप’ दबा देता है या दरकिनार कर देता है प्रभाष जी उन्हें सम्यक विवेक और साहस के साथ नागरिकों के सामने लाते हैं। यही कारण है कि संजीदा और विवादास्पद मुद्दों पर प्रभाष जी की जानकारी और राय जानने के लिए लोग उनके ‘कागद कारे’ और सामान्य लेखों का उत्सुकता से इंतजार करते हैं। अगर हमारी सभी भाषाओं में प्रभाष जी जैसे पत्रकार बने रहें तो भले ही सरकारें और उच्च बौद्धिक/अकादमिक गतिविधियां अंग्रेजी में चलती रहें, समाज में अंग्रेजी का वर्चस्व और आतंक कभी भी मुकम्मल नहीं हो पाएगा। बाजारवादी पत्रकार और बुद्धिजीवी हाल तक परमाणु करार की लहर पर सवार थे। अमेरिका से लगातार ऐसी लहरें न आती रहें तो इतनी रंगीनी और दौलत के बावजूद वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। अमेरिकी शाबासी लगातार न मिलती रहे तो प्रभाष जोशी और उनके समानधर्मा साम्राज्यवाद विरोधी लेखन के सामने वे कुंठा से भर जाते हैं। आजकल उनका महान अमेरिका आर्थिक मंदी का शिकार है। लिहाजा, वे उखड़े हुए हैं। ऐसा नहीं है बाजारवादियों से टक्कर में प्रभाष जी न उखड़ते हों। लेकिन मालवा की मिट्टी से जुड़ा उनका मन बार-बार जीवट से भर उठता है। राजकमल ने पुस्तकें अच्छी छापी हैं। हालांकि प्रूफ की गलतियां हैं। सभी खंडों के सस्ते पेपरबैक संस्करण निकलने पर ही यह महत्वपूर्ण लेखन ज्यादा पाठकों तक पहुंच पाएगा। 20 नवंबर 2009 प्रेम सिंह [author ]Dr. Prem Singh, Presently Visiting Professor, Center of Eastern Languages and Cultures, Dept. of Indology, Sofia University, Sofia, Bulgaria[/author]

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