बनो निशंक, रहो निशंक

दस साल के उत्तराखंड को देखना हो तो आइये दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले के उत्तराखंड राज्य पवेलियन में. इन दस वर्षों में उत्तराखंड वाकई कहाँ खड़ा है इसकी झलक आपको यहाँ देखने को मिल जाएगी. कल यानि 23 नवम्बर को राजधानी दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में उत्तराखंड दिवस का आयोजन था. यूँ तो हर साल ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में उत्तराखंड दिवस आयोजित होता है. लेकिन इस बार मन में कौतूहल ये भी था कि आखिर राज्य की दस साल की उपलब्धियों को सरकार कैसे दर्शाती है. सच कहूं तो इतने वर्षों में पहली बार उत्तराखंड राज्य पवेलियन देखकर बहुत निराशा हुई. यूँ तो पहले भी राज्य के पवेलियन में शहद, जूस, केचप, गहथ, मंडुआ, झंगोरा इत्यादि बेचने वालों की भरमार रहती थी. लेकिन साथ में राज्य की प्रगति को दर्शाते कुछ स्टाल भी होते थे. लेकिन इस बार तो हद ही हो गई. शहद, जूस, केचप के स्टाल तो बरकरार थे लेकिन बाकी स्टाल लगभग नदारद. उत्तराखंड टूरिज्म, सिडकुल और उत्तराखंड जल विद्युत् निगम के स्टाल लगे तो थे लेकिन बिलकुल सूने. ऐसा शायद इसलिए क्योंकि वहां देखने के लिए कुछ है ही नहीं. सरकारी नुमाइनदे कैसे काम करते हैं इसकी झलक भी आपको यहाँ देखने को मिल जाएगी. पवेलियन में एक वीआइपी लाउंज जरुर बनाया गया है जिसमे कुछ कोट-पैंट पहने (शायद सरकारी अधिकारी) यहाँ-वहां घूमते नज़र आ जाते हैं. यहाँ प्रेस के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. प्रसंगवश बता दें कि इस बार बहुत से प्रेस वालो को निमंत्रण पत्र नहीं मिल पाए. पूछने पर एक अधिकारी बताते हैं कि "हम क्या करें जितने निमंत्रण पत्र देहरादून से मिले, बाँट दिए". चूंकि मुख्यमंत्री को कार्यक्रम में शिरकत के लिए आना है, इसलिए अधिकारियों में अफरा-तफरी का माहौल है. प्रोटोकॉल अधिकारी और अपर निदेशक उद्योग से राज्य पवेलियन के स्तर के बारे में बातचीत जरुर हुई, लेकिन मुख्यमंत्री के देरी से आने की टेंशन उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही है. लिहाजा, चुप्पी लगा जाने में ही भलाई समझी. इधर, वरिष्ठ राज्य आन्दोलनकारी एस के शर्मा इसलिए भड़के हुए हैं कि पवेलियन में सरकार ने उत्तराखंड आन्दोलनकारिओं की अनदेखी की है. अपने खर्च से वे चार फ्लेक्स बोर्ड बना लाये हैं और पवेलियन के मुख्य द्वार पर लगा भी चुके हैं. सरकार उत्तराखंड राज्य आन्दोलनकारियों को कितना सम्मान दे रही है इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे. लेकिन, शर्मा जी की नाराजगी को नज़रंदाज़ तो नहीं ही किया जा सकता. इस बीच राज्यसभा सांसद तरुण विजय अकेले ही अन्दर आते दिखते हैं. नितांत अकेले. द्वार पर उपस्थित मीडियाकर्मी उन्हें घेरते हैं. औपचारिक बातों के बाद वे अन्दर चले जाते हैं. मीडियाकर्मी फिर से मुख्यमंत्री का इंतज़ार करने लगते हैं. लगभग सात बजे निशंक हाल नंबर छः के उत्तराखंड पवेलियन के मुख्य द्वार पर प्रकट होते हैं. एक बार फिर मीडियाकर्मियों में अफरातफरी मच जाती है. मुख्यमंत्री फीता काटते हैं. हाल के अन्दर बेसब्री से उनका इंतज़ार हो रहा है. अधिकारियों से घिरे निशंक अन्दर जाते हैं और मात्र पांच मिनट में स्टालों का मुआयना कर लाल चौक की ओर चल पड़ते हैं जहाँ उन्हें राज्य दिवस में शिरकत करनी है. मुख्यमंत्री निशंक अपने बडबोलेपन के लिए भी जाने जाते हैं. लिहाजा यहाँ भी नहीं चूके. महाकुम्भ की उपलब्धियों के बखान के बाद उन्होंने बताया कि किस तरह धोनी ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें वन्यजीव सम्पदा का brand ambassador बना लें. ये भी कि कैसे हेमा मालिनी ने स्पर्श गंगा का brand ambassador बनना स्वीकार किया. अब ये बताना जरुरी नहीं है कि ये brand ambassador क्या और कैसे काम करते हैं. इसके अलावा राज्य के नागरिकों के लिए सीख भी कि क्या होगा, कैसे होगा को भूलकर बस आँख मूँद  'निशंक' बन जाओ. हद तो तब हो गई जब निशंक साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि चार लाख साल पूर्व पहला परमाणु बम उत्तराखंड में ही बना था....!!!

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।