बीजेपी को न तो इंसानों से लेना देना है न गायों से उसे मतलब है सिर्फ वोट से

महेंद्र मिश्र बुंदेलखंड शब्द सुनाई नहीं दिया बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इलाहाबाद से महज 50 किमी दूर बुंदेलखंड का इलाका शुरू हो जाता है। पूरा इलाका सूखे की चपेट में है। और मौत के रेगिस्तान में तब्दील हो गया है। लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। यहां आये दिन भूख से मौतें हो रही हैं। इलाके से तकरीबन 14 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं। लेकिन इलाहाबाद में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न बुंदेलखंड शब्द सुनाई दिया। न ही उसके बाद हुई रैली में किसी नेता की जुबान पर आया। इस इलाके के बाशिंदे इंसान नहीं हैं? या देश के नागरिकों की सूची में उनका नाम नहीं हैं? या फिर यूपी के चुनावों में वोट नहीं देंगे? बीजेपी को इनके पलायन से कुछ लेना-देना नहीं है। पार्टी इनकी कोई सूची नहीं बना रही है। न ही वहां कोई जांच दल जा रहा है। लेकिन कैराना की हुकुमी सूची पार्टी के लिए राष्ट्रीय मुद्दा है। वह सूची जो अब फर्जी साबित हो चुकी है। क्योंकि 346 लोगों के इन नामों में एक हिस्सा अभी वहीं मौजूद है। कुछ की 15-20 साल पहले मौत हो गई। और एक बड़ा हिस्सा रोजी-रोटी की तलाश और जीवन की बेहतरी के लिहाज से दूसरे शहरों या फिर कस्बों का रुख कर लिया। हुकुम सिंह तक ने मान लिया कि वह सांप्रदायिक आधार पर नहीं बनाई गई है। हां प्रशासन ने 8-9 नाम जरूर ऐसे गिनाएं हैं जिनको किसी दबाव में इलाका छोड़ना पड़ा। उसके पीछे इलाके के किसी दबंग या किसी आपराधिक गैंग का हाथ हो सकता है। किसी भी इलाके में इस तरह के अपराधी सक्रिय रहते हैं। लेकिन उसे सांप्रदायिक रंग देना न केवल नैतिकता के खिलाफ है बल्कि अपराध भी है। इसके जरिये न केवल आप उन अपराधियों को सामाजिक संरक्षण मुहैया करा रहे हैं बल्कि पूरे समाज में इस तरह के अपराधियों के बचने के लिए नया रास्ता खोल रहे हैं। आखिरकार मोदी जी ने बुंदेलखंड का नाम क्यों नहीं लिया? बीजेपी यूपी चुनाव कैराना और प्रधानमंत्री मोदी के जुमलों के सहारे जीत लेना चाहती है। आखिरकार मोदी जी ने बुंदेलखंड का नाम क्यों नहीं लिया? उन्होंने सत्ता सौंप कर पांच साल तक देख लेने के बाद लात मारने की बात क्यों कही? इसके पीछे एक खास वजह है। दरअसल प्रधानमंत्री रहते बुंदेलखंड के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से वो बच नहीं सकते। अगर सूबे की अखिलेश सरकार की जिम्मेदारी बनती है तो उनकी भी जवाबदेही कम नहीं है। इस लिहाज से केंद्र द्वारा बरती गई आपराधिक लापरवाही ने उन्हें सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। वह इसी से बचना चाहते हैं। और खुदा ना खास्ता वह मुद्दा बन गया तो पार्टी की लुटिया डूबनी तय है। फिर जनता पांच साल का इंतजार नहीं करेगी। बल्कि यूपी चुनाव में ही अपना फैसला सुना देगी। ऐसे में वह ‘मार’ बहुत जल्द पड़ जाएगी। संजीव बलियान और आखलाक प्रधानमंत्री जी के एक कबीना मंत्री हैं। नाम है संजीव बलियान। जनाब आखलाक के गांव बिसेहड़ा में मरे एक जानवर के 150 किलो मांस का हिसाब चाहते हैं। वह भी एक सूची बना रहे हैं। मांस खाने वाले हिस्सेदारों की सूची। और फिर उनकी तलाश कर उन्हें जेल में डालना चाहते हैं। इन सज्जन के पास और कोई दूसरा काम नहीं है। मंत्री जी को खबर नहीं है या फिर उन्हें कोई बता दे कि बुंदेलखंड में लाखों-लाख पशु काल के गाल में समा गए हैं। किसी को चारा नहीं मिला तो कोई पानी के बगैर तड़प-तड़प कर मर गया। इसमें हजारों हजार गाएं भी शामिल हैं। ऐसे में एक जानवर की मौत के बाद उसके मांस का हिसाब जरूरी है या फिर हजारों जानवरों को मौत के मुंह में जाने से बचाना? कृषि मंत्री रहते यह उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा भी बन जाता है। लेकिन मंत्री जी के किसी काम से ऐसा नजर नहीं आया कि वह इसको महसूस करते हैं। न उन्होंने इलाके की यात्रा की। न ही कोई पहल। यात्रा की बात तो दूर एक बयान देना भी जरूरी नहीं समझा। अलबत्ता केंद्र सरकार ने इलाके के लोगों के घाव पर नमक रगड़ने का काम जरूर किया। और पानी के नाम पर खाली डिब्बों वाली एक ट्रेन भेज दी। बीजेपी को अगर मतलब है तो सिर्फ वोट से दरअसल बीजेपी को न तो इंसानों से लेना देना है और न ही गायों से। पार्टी को अगर मतलब है तो सिर्फ वोट से। इसलिए पार्टी एक बार फिर सूबे को सांप्रदायिकता की भट्टी में झोंक देना चाहती है। क्योंकि उसके वोट की फसल लोगों की लाशों पर लहलहाती है। इसलिए पूरी दंगाई जमात एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय हो गई है। और इसके जरिये वह चाहती है कि जनता के बुनियादी सवालों पर बात किए बगैर सांप्रदायिकता और पीएम के जुमलों के सहारे लखनऊ की कुर्सी हासिल कर ली जाए। रिहाई मंच ने हुकुम सिंह की सूची की कलई खोल दी अच्छी बात यह है कि लोग भी इनके घृणित मंसूबों को पहचानने लगे हैं। शायद इसी का नतीजा है कि जनता के पक्ष में सोचने वाली ताकतें सक्रिय हो गईं। सोशल मीडिया ने हुकुम सिंह की सूची की कलई खोल दी। रिहाई मंच समेत तमाम संगठनों ने मोर्चा संभाल लिया। और इन सबसे आगे बढ़कर सभी धर्मों के नेताओं ने मिलकर कैराना में सद्भावना जुलूस निकाल दिया। इस तरह से पूरे समाज ने एकजुट होकर नफरत की सियासत को आईना दिखाने का काम किया है। साबित हो चुका है कि सूची फर्जी थी और आखिरी बात जब यह साबित हो चुका है कि सूची फर्जी थी। तो क्या हुकुम सिंह के खिलाफ सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश का मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए? अखिलेश जी में अगर रत्ती भर भी अपनी जिम्मेदारी का अहसास है तो उन्हें इस काम को तत्काल करना चाहिए। https://www.facebook.com/thinking.nath/posts/10208299619200865

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।