मालदा वाया कमलेश तिवारी

मालदा  की घटना दुखी करने वाली घटना तो है, लेकिन हैरान करने वाली नहीं। जितनी जाहिल मालदा की भीड़ को कहा जा रहा है, अयोध्या की हिंदू भीड़ भी उतनी ही जाहिल है आज की "ब्राह्मण-राजनीति" यही चाहती है और इसके लिए सुनियोजित तरीके से वह सब कुछ कर रही है कि मुसलिम आबादी मालदा की तरह सड़कों पर निकल कर उन्माद का प्रदर्शन करे...! अरविंद शेष मालदा  की घटना दुखी करने वाली घटना तो है, लेकिन हैरान करने वाली नहीं। मेरे लिए इसे देखने के ये बिंदु हैं- 1- यह बरास्ते कमलेश तिवारी मकसद तो समूचे देश में यही हालत पैदा करने की सुनियोजित साजिश का नतीजा है। हुआ तो मध्यप्रदेश में भी, लेकिन उसे फोकस नहीं किया गया। वजह- वहां खुद भाजपा की सरकार है। पश्चिम बंगाल में अगले साल चुनाव है और महज कुछ मुसलिम नेताओं को खरीद कर ढाई लाख (?) मुसलमानों का सड़क पर उतार कर 'उत्पात मचवाना' महज ध्रुवीकरण का एक राजनीतिक खेल है। हालांकि इसके बावजूद पता नहीं बंगाल में यह कितना कामयाब होता है। 2- यह भीड़ ऐसी ही बनी रहे, इसका इंतजाम न सिर्फ संबंधित सभी मजहबों के मठाधीश करते हैं, बल्कि सरकारें भी यही चाहती हैं, क्योंकि धर्माधिकारियों, मठाधीशों और सरकारों की सत्ता तभी तक कायम रहेगी, जब तक यह भीड़ ऐसी ही बनी रहे। इसलिए इस तरह की ढाई लाख की भीड़ को आप बाबरी मसजिद का बर्बर विध्वंस करने के लिए अयोध्या के कुएं में कूदते देखेंगे... एक अपराधी मोहरे के बयान पर मालदा में उत्पात मचाते देखेंगे, लेकिन इन्हीं समुदायों को "अपने" समाज की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक बराबरी के अधिकार के लिए ढाई हजार या ढाई सौ लोगों की भी भीड़ के साथ सड़क पर उतरते नहीं देखेंगे। 3- सभी धर्मों के धर्माधिकारी इस भीड़ को मानसिक-दिमागी और बौद्धिक रूप से इसी तरह अविकसित और अर्धगुलाम बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए मालदा में सड़क पर ढाई लाख की तादाद में सड़क पर उतर कर उत्पात मचाने वाली मुसलिम भीड़ दरअसल तरस खाने लायक है। इस भीड़ को यह पता भी नहीं चला होगा कि कैसे वह अपने कुछ खरीदे गए नेताओं या धर्माधिकारियों के हाथों मोहरा बन गई और समूचे देश के 'अपने' लोगों को एक बेहद नाजुक वक्त में सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया। उसे तो बस यह मालूम है कि उसने अपने भगवान का अपमान करने वाले दुश्मन को सजा दे दी! लेकिन क्या सचमुच ऐसा हो गया..! या फिर अपने दुश्मन के ही इशारों पर नाच गए...! 4- आज की "ब्राह्मण-राजनीति" यही चाहती है और इसके लिए सुनियोजित तरीके से वह सब कुछ कर रही है कि मुसलिम आबादी मालदा की तरह सड़कों पर निकल कर उन्माद का प्रदर्शन करे...! उसका मकसद इसकी प्रतिक्रिया में हजार टुकड़ों में बिखरे हिंदुओं को एक ध्रुव पर ला खड़ा करना है। जितनी जाहिल मालदा की भीड़ को कहा जा रहा है, अयोध्या से लेकर देश भर की हिंदू भीड़ भी उतनी ही जाहिल है। इसलिए कोशिश इस बात की हो कि ऐसा करने नहीं, ऐसा कराने वालों और उनका दलाल बनने वाले धर्माधिकारियों की असली सियासत समझी जाए।

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