मोदी को मिथक बना रहे हैं विज्ञापन

पहले पेज पर तो सिर्फ भाजपा, सत्ता के बावजूद कांग्रेस पीछे अंबरीश कुमार भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को विज्ञापन एजंसियों ने मिथक बनाने में सारा जोर लगा दिया है। नए-नए आकर्षक और जबान पर याद रहने वाले नारे, सुपर मैन या फैंटम की तरह प्रोजेक्ट करने वाली कार्टून फिल्में और फ़िल्मी संवाद की तरह लिखे भाषण। 'वादे नहीं इरादे लेकर आए हैं', जैसे जुमले से लेकर अलग अंदाज से 'शहजादे' का संबोधन और गुजरात के बारे में गजब के किस्से जो सुने वह सुनता रह जाए। बचपन में जिस तरह बेताल की कहानियां दिलचस्पी पैदा करती थीं बच्चों को नई दुनिया में ले जाकर वैसी ही दिलचस्पी आम लोगों को मोदी के गुजरात के किस्से सुनने में हो रही है। मसलन गुजरात की नहरों के पाइप इतने बड़े होते हैं कि नेताजी चार कारों के साथ निकल जाएँ। यह कमाल विज्ञापन एजेंसियों और उनके संवाद लेखन का है। राहुल गाँधी सही कहते है वे गंजों को कंघी बेच रहे हैं। पर दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस या अन्य दल बाल वालों को भी कंघी नहीं बेच पा रहे हैं। इस कमाल का श्रेय विज्ञापन और मार्केटिंग एजंसियों को ज्यादा जाता है जिन्होंने बाकायदा एक लहर बना दी जो अब धीमी पड़ गई है।  दस अप्रैल से लोकसभा चुनाव शुरू हुआ है और बारह मई तक चलेगा यानी एक महीने से ज्यादा चलेगा। इस दौरान लगातार देश भर के अख़बारों में विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपने विज्ञापन दिए। पर विज्ञापन के इस खेल में सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही आगे रही है । करीब महीने भर से देश के प्रमुख हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों के पहले पेज पर भाजपा खासकर मोदी सरकार के विज्ञापन ही रहे हैं। मोदी के साथ का चेहरा जरूर बदल जाता रहा है। उत्तर प्रदेश में अटल बिहारी वाजपेयी होते हैं तो पंजाब में अकाली। यह इलाके पर प्रभाव रखने वाले नेताओं पर निर्भर होता है। पर पहला पेज भाजपा के नाम रहा और बारह तक रहेगा भी। यह कुछ अजीब नहीं लगता कि दस साल सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस हर अख़बार के तीसरे या अंतिम पेज पर धकेल दी गई हो। इसके साथ ही टेलीविजन के मनोरंजन चैनल पर सबसे ज्यादा विज्ञापन मोदी सरकार या अच्छे दिन आने वाले हैं, के दिखाई पड़े। इससे एक मनोवैज्ञानिक असर तो भाजपा ने डाल ही दिया है। जिस तरह कभी राजेश खन्ना की फिल्म जारी होने से पहले उनका जो प्रचार होता था उससे नौजवानों में उत्सुकता पैदा हो जाती थी। बाद में जब चैनलों और इन्टरनेट का समय आया तो हैरी पाटर बच्चे बच्चे कि जुबान पर चढ़ गया। ठीक उसी तरह जिस वर्ग को चुनाव में वोट नहीं डालना है यानी अठारह साल से कम उम्र वाले उनकी जबान पर भी 'अबकी बार मोदी', जैसे जुमले आ गए हैं, तो यह विज्ञापन एजेंसियों की आक्रामक मार्केटिंग का असर है। इस मामले में कांग्रेस पिछड़ गई है और बाकी दल हाशिए पर हैं। सबसे ज्यादा असर मनोरंजन वाले सास बहू की कहानियां दिखने वाले चैनलों का पड़ा है जिस पर अच्छे दिन लगातार आ रहे हैं। भाजपा के एक नेता ने कहा -देखिए मोदी जी का शुरू से जोर इन मनोरंजन वाले चैनलों पर था क्योंकि खबर वाले चैनलों में तो हम छाए ही रहते हैं और उन पर हमारे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रवक्ता बैठे ही रहते हैं इसलिए खबरिया चैनल से ज्यादा जोर मनोरंजन वाले चैनलों पर रहा। अब जरा इस पर खर्च होने वाले पैसे का मोटा आंकलन कर लिया जाए। दिल्ली और पश्चिम दक्षिण भारत से निकलने वाले एक पुराने अखबार समूह का सभी संस्करण का आधे पेज का एक दिन का विज्ञापन रेट करीब साठ लाख रुपए है। चूँकि यह अखबार देश के पंद्रह प्रमुख अख़बारों की प्रसार संख्या से बाहर का अखबार है इसलिए इसका रेट कम है और बड़े अख़बारों का रेट करीब-करीब इसका दुगुना है। पूरे पेज का उसका भी दोगुना। अब एक महीने का आकलन कर सकते हैं, देश भर के लिहाज से। चैनल के रेट तो और भी ज्यादा होते हैं और हर चैनल का एक बजट प्रमुख राजनैतिक दलों ने बना रखा है। इसमें भी भाजपा सबसे आगे है। अगर पांच हजार करोड़ रुपए के चुनाव खर्च की बात हो रही है तो उसमे बड़ा हिस्सा इन विज्ञापनों आदि का है। इसमें कार्टून तो गजब का असर डालते हैं और कुछ चैनल इसका लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं। जब बच्चे चर्चा करेंगे या नक़ल उतरेंगे तो वह स्कूल कालेज तक फैलेगा और सोशल साईट पर भी। इसलिए बड़े ध्यान से देखिए जब भी किसी चैनल का पत्रकार किसी बच्चे या युवक आदि से पूछेगा कि किसको वोट दोगे तो जवाब में किसी नेता या पार्टी का नाम नहीं एक जुमला होता है 'अबकी बार मोदी सरकार'। आम लोग थोड़ा हिचक कर बोलेंगे, सबको मौका दिया है तो मोदी को भी देखना चाहिए। यह दिमाग बना नहीं बनाया गया है। विज्ञापन से रणनीति से। कांग्रेस तो हेकड़ी में रही उसे ना टू जी का कोई असर समझ में आया और ना थ्री जी का। जिस पर अन्ना हजारे ने आंदोलन कर माहौल बनाया और उसकी फसल काट रहे है नरेंद्र मोदी। मोदी ने रणनीति बनाई और उस पर ठीक से चले। और इस रणनीति बनाने में एक बड़ी टीम लगी तो कारपोरेट घरानों का पैसा भी। राजनैतिक रणनीति की टीम अलग तो अलग अलग प्रबंधन की टीम अलग। जिस तरह एक कम्पनी काम करती है उसी तरह मोदी की टीम ने राजनैतिक प्रबंधन किया और हवा बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस ने बहुत ही बिखरे हुए अंदाज में चुनाव लड़ा तो क्षेत्रीय दल और पीछे रहे। क्षेत्रीय दल तो वैसे भी अहंकार के शीर्ष पर रहते हैं इसलिए उनसे भी किसी राजनैतिक कौशल की उम्मीद कम होती है। इस मामले लालू यादव से लेकर ममता बनर्जी अपवाद रहे जिन्होंने अपने मतदाताओं से अपनी ठेठ भाषा में संवाद कर मोदी के खिलाफ माहौल बनाया पर बाकी दल मोदी का माकूल जवाब देने में नाकाम भी रहे। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी तो इस प्रकार की राजनीति से ही ऊपर उठकर चलती रही और राजनैतिक रणनीति से उसका कोई लेना देना तक नहीं। ऐसे में भाजपा क्यों नहीं बढ़ेगी। इन विज्ञापनों से उपजे माहौल ने भाजपा कार्यकर्ताओं को एकजुट किया है जिसका फायदा उत्तर प्रदेश में मिलेगा। हालाँकि बहुत भारी बढ़त नजर नहीं आ रही है। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

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