मोदी सरकार का सांप्रदायिक एजेंडा संविधान सम्मत है : अर्थशास्त्री प्रो. प्रीतम सिंह

कनाडा. वर्तमान भारत सरकार जो सांप्रदायिक एजेंडा लागू कर रही है वह संविधान सम्मत है। यह बात प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय इंग्लैंड, प्रोफेसर प्रीतम सिंह ने मिसिसागा स्थित रोजर्स हाल में आयोजित किये गए सेमिनार में कही. ‘ भारत बनाम पाकिस्तान: दोनों देशों में धर्म और राज्य की स्थिति ’ नामक विषय पर सेमिनार इंडो कनेडियन वर्कर्स एसोसियशन और प्रोग्रेसिव पाकिस्तानी समिति के तत्वावधान में संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था. अर्थशास्त्री प्रो. प्रीतम सिंह ने कहा कि यह आम धारणा है कि जब भारतीय जनता पार्टी-राष्ट्रीय स्वयं सेवक जैसे संगठन सत्ता में आते हैं, तब इन्हें सांप्रदायिक कहा जाता है और दूसरे दलों की सरकारों के वक्त यह आरोप नहीं लगते जबकि किसी देश में साम्प्रदायिकता को नापने ने लिए उसके संविधान, राजनैतिक प्रणाली, न्याय व्यवस्था, पुलिस, फ़ौज, मीडिया, आन्तरिक सुरक्षा एजेंसियां, कोर्ट आदि जैसे संस्थानों का सामाजिक अध्ययन किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत के बौद्धिक जगत में यह भ्रामक विचार है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है और पकिस्तान एक धर्म आधारित राज्य है. भारत के संविधान सभा की बहसों से प्रो. प्रीतम सिंह ने निम्नलिखित तथ्यों का हवाला देते हुए साबित किया कि साम्प्रदायिकता के लक्षण खुद भारत के संविधान में ही मौजूद हैं. देश का नाम भारत ही हो, इस विषय पर हुई बहसों के हवाले से यह साबित होता है कि संविधान सभा में दो ध्रुवों के मध्य परस्पर वैचारिक संघर्ष था. धर्मनिरपेक्ष समूह भारत का नाम इण्डिया अथवा हिन्दुस्तान रखना चाहते थे जबकि हिंदुत्ववादी समुह भारत नाम का पक्षधर था. उन्हीं दिनों एक हिंदू सन्यासिन आमरण अनशन पर बैठी थी जिसकी यह मांग थी कि देश का नाम भारत हो और उसकी भाषा हिन्दी. दूसरा प्रश्न सरकार के संवैधानिक केन्द्रीयकरण का था. भारत की सामाजिक धार्मिक विविधता के मद्देनज़र विकेन्द्रीयकरण इसकी जरूरत थी लेकिन नेहरु मजबूत केंद्र की भूमिका के पक्षधर थे. इसी प्रश्न पर जिन्नाह को बहस के दौरान दीवार से सटा दिया गया जो संघीय गणराज्य के पक्षधर थे जिसमें सभी समुदाय अपनी सीमित आत्मनिर्भरता के साथ विकसित हो सके. इस प्रश्न पर बहस के दौरान नेहरू को हिंदुत्व शक्तियों से समर्थन मिला जिनका तर्क था कि देश में केंद्र सरकार जब भी कमजोर रही है तब तब विदेशी आक्रमण हुए हैं. विदेशी हमलावरों से तात्पर्य तुर्क, मंगोल, इरानी मुसलमानों से ही था जो निश्चय ही मुसलमानों के प्रति दुराग्रहपूर्ण था. तीसरा प्रश्न भाषा का है. भारत विभिन्न समृद्ध भाषाओँ का देश है. २०१५ की जनगणना के अनुसार हिन्दी मात्र ३८ प्रतिशत लोगों की जुबान है जिसमें सरकार ने अनावश्यक रूप से ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, हरियाणवी और हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भाषा बोलने वालों को हिन्दी में शामिल कर लिया, उसके बावजूद हिंदी मात्र ३८% लोगो की भाषा है जिसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल है. संविधान सभा में हिन्दी भाषा पर हुई बहस को पढ़कर साफ़ अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस प्रकार हिंदुत्ववादी शक्तियों ने इस भाषा को थोपने का प्रयास किया है. हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी ही हो और उसके प्रचार प्रसार में संस्कृत को ही आधार माना जाए यह स्पष्ट रूप से संविधान में लिखा गया है. हिन्दी भाषा को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कई लिपियों में लिखा जाता था लेकिन देवनागरी (देव- ब्रह्म, नागरी- लिपि यानि भगवान की भाषा) को ही महत्व दिया जाना स्पष्ट रूप से एक ख़ास वर्ग की सोच को परिलक्षित करता है. उन्होंने याद दिलाया कि हिन्दी भाषा के लिए आर्य समाज जैसे संगठनों ने आन्दोलन चला कर जनमानस और तत्कालीन सत्ताधीशों को प्रभावित किया. यहाँ तक भारतीय नेताओं के हिन्दी के बारे में विचार बहुत पूर्वाग्रहयुक्त हैं, उदहारण के लिए गांधी द्वारा तमिल भाषा और गुरुमुखी भाषा के लोगों से हिन्दी अपनाने का आग्रह इतिहास में दर्ज है जबकि इन दोनों भाषाओँ की समृद्धता पर किसी भाषाविज्ञानी को शक नहीं. भाषा के प्रश्न पर नेहरु के नेतृत्व में उत्तर भारत के नेताओं के साथ पश्चिमी एवं मध्य भारतीय प्रदेशों गुजरात, मराठी भाषा के नेताओं ने दिया, जिसे दक्षिण भारत के नेताओं ने संविधान सभा की बहस में ‘हिन्दी साम्राज्यवाद’ के नाम से चिन्हित किया जो ठीक ही था. भारतीय संविधान में साम्प्रदायिकता का चौथा लक्षण गाय के प्रश्न पर देखा जा सकता है. गौरक्षा का प्रश्न भी हिन्दुत्त्ववादी शक्तियों द्वारा लाया गया प्रस्ताव था जिसे बहुत विशिष्ट शब्दावली के अंतर्गत संविधान में लिखा गया. ‘गाय सहित पशुओं का वैज्ञानिक विधि से प्रबंधन’. इसी धारा के तहत कई राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाया गया. मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार संविधान की इसी धारा का उपयोग करके अपने जनसंगठनों के माध्यम से कई प्रदेशों में गौरक्षा के नाम पर सांप्रदायिक कार्यक्रम संचालित कर रही है. धर्मनिरपेक्ष राज्य में किसी दूसरे समुदाय के खान पान को निर्धारित करना पूर्वाग्रहपूर्ण होना है, दुर्भाग्य से भारतीय संविधान में ऐसा प्रयास किया गया है. प्रोफ़ेसर प्रीतम सिंह ने अपनी प्रस्थापनाओं के आधार भारतीय राज्य का विश्लेषण करते हुए बताया कि इस संवैधानिक स्थिति के चलते देश के अल्पसंख्यक समुदायों पर विपरीत प्रभाव पड़ना स्वाभाविक प्रक्रिया है. अमेरिका, इंग्लेंड, कनाडा आदि देशों में नस्लभेदी समस्याओं का निराकरण करने हेतु इन देशों ने जो कार्यप्रणाली विकसित की है वैसा भारत में अभी कुछ नहीं हुआ है. इन देशों ने यह निष्कर्ष निकला कि बहुसंख्यक श्वेत आबादी किन कारणों से प्रभुत्व रखती है? सरकारी संस्थानों खासकर संसदीय प्रणाली, न्याय व्यवस्था, पुलिस, शिक्षा, जेल और न्यायालयों में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को जांचने परखने के लिए कार्यप्रणाली विकसित की और वे समय समय पर आंकड़े इकठ्ठा करके सूचनाएँ एकत्र करते हैं कि किस समुदाय का कितना प्रतिनिधित्व सरकारी संस्थानों में है. भारत में अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना ही आज़ादी के ४३ सालों बाद की गयी. आज भी भारतीय राज्य से संबंधित विभागों से हमें सामुदायिक, जातीय आधारित आंकड़े उपलब्ध नहीं है. किसी भी राज्य का सबसे प्रमुख स्तम्भ उसकी गुप्तचर सेवायें हैं. सत्ता की यह  सबसे प्रमुख इकाई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि से भी महत्वपूर्ण होती है. यही वह इकाई है जो देश की गृह नीति और विदेश नीति तक को निर्धारित करने में महति भूमिका निभाती है. भारत की गुप्तचर सेवाओ से जुड़ी इकाइयों के आंकड़े प्राप्त ही नहीं होते, इन संस्थाओं में उच्च पदों पर सिर्फ ब्राहमणों को ही नियुक्त किया जाता  है, जिसके चलते भारत में संरचनात्मक साम्प्रदायिकता को स्पष्टरूप से चिन्हित किया जा सकता है. भारत की प्रशासनिक सेवाओं, सैन्य सेवाओं, जज, मीडिया, शिक्षण संस्थान, पुलिस, जेल आदि संस्थानों का सामाजिक अध्ययन हमें इस निष्कर्ष पर ले जाता है कि भारतीय राज्य में साम्प्रदायिकता एक संरचनात्मक दोष है जिसका प्रथम अध्याय अथवा प्रस्थान बिंदु भारतीय संविधान है. पाकिस्तान पर चर्चा करते हुए डाक्टर ताहिर काज़ी ने बताया कि मानवजाति के इतिहास में धर्म के नाम पर बने प्रथम राष्ट्र पाकिस्तान का संविधान अभी तक क्रमशः १९५६,१९६२,१९७३ तीन बार आघात खा चुका है, जिन हालत में पकिस्तान बना तत्कालीन अन्तराष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते देश के हुक्मरान साम्राज्यवादी सियासत को न समझ सके, और न देश को ही संभाल सके. पकिस्तान का दुर्भाग्य यह है कि देश के संविधान का इस्लामीकरण इस्लामी ताकतों के जरिये नहीं बल्कि कथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं के हाथों अधिक हुआ है, उन्होंने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का जिक्र करते हुए कहा कि भुट्टो ने ही अहमदियों को गैर मुसलमान घोषित किया था, इश निंदा का कानून जनरल जिया ने बनाया जबकि जमाते इस्लामी जैसी धर्म आधारित राजनीति करने वाली सियासी पार्टी को किसी चुनाव में कभी ५ फीसदी से अधिक वोट नहीं मिले. सोवियत संघ के अफगानिस्तान में घुसने के बाद पाकिस्तानी सियासतदान अमेरिका के हाथों जिस तरह मोहरे बने उसी नीति के चलते आज पकिस्तान खुद इस्लामी उग्रवाद का शिकार हो गया है. उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि पाकिस्तानी आवाम इस जिहादी राजनीति के अंधकार को ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं करेगा क्योंकि इन ताकतों के पास मजहबी नारों के सिवा आवाम को देने के लिए कुछ नहीं है. इन मौके पर लगभग तीन दशकों तक स्कूल ट्रस्टी रही कमुनिस्ट नेत्री एलिज़ाबेथ हिल ने कनाडा में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा हेतु चलाये गए अभियानों के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि राज्य को अपने कोष से किसी धर्म विशेष के आधार पर शिक्षा हेतु स्कूलों को धन आबंटन नहीं करना चाहिए. धर्म आधारित शिक्षा बच्चों की चिंतन प्रणाली को संकुचित करता है जबकि आज जरूरत है कि बच्चे बिना किसी धार्मिक बाधा के ज्ञान अर्जित करें. सेमिनार के बाद उपस्थित भारतीय, पाकिस्तानी, इरानी समुदाय से जुड़े लोगों ने प्रोफ़ेसर प्रीतम सिंह और ताहिर काज़ी से प्रश्नोत्तर भी किये जिसे बहुत सहजता से मंच संचालक कामरेड उमर लतीफ़ ने कुशलतापूर्वक संयोजित किया. कनाडा से शमशाद इलाही शम्स की रिपोर्ट

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