लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई-मुज़फ़्फ़र रज्मी कैराना वाले

कैराना वाले मुज़फ़्फ़र रज्मी साहब की बात जनता भी समझे और याद रखे धीरेश सैनी ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। -मुज़फ़्फ़र रज्मी कैराना वाले यह अमर शेर कहने वाले रज्मी साहब कैराना के ही रहने वाले थे। 1999 में मैं कैराना की गलियों से गुजरते हुए उनके घर पहुंचा था। उनकी तबीयत नासाज़ थी पर वे मुझसे मुशायरों की कवरेज के दौरान के परिचय के नाते गर्मजोशी से मिले थे। मैं उनकी बाकी शायरी के बारे में जानकारी हासिल करने के इरादे से उनके पास गया था। लेकिन वे थे कि इसी शेर के बारे में बताते रहे कि इसका कब किसने जिक्र किया था। कमलेश्वर और पाकिस्तान के किसी हुक्मरान या नेता का भी उन्होंने इस सिलसिले में जिक्र किया था। उन्होंने इस शेर के जिक्र वाली अखबारी कतरनें भी सहेज रखी थीं। मैंने मुज़फ़्फ़रनगर पहुंचकर अमर उजाला के लिए उनकी तबीयत के बारे में छोटी सी ख़बर भी लिखी थी। हालांकि, अमर उजाला मेरा तबादला मुज़फ़्फ़रनगर से करनाल कर चुका था। वे करनाल में मुशायरे के नाम पर हुए एक बेहूदे से आयोजन में आए तो भी उन्होंने इस शेर को पढ़कर लोगों को हैरत में डाला कि शोहरत के चलते सदियों पुराना लगने वाला यह शेर उन्होंने लिखा है। इस कैरानवी, इस हिन्दुस्तानी शायर को और उनके पाइन्दाबाद शेर को याद करने का अर्थ आप समझ ही रहे हैं। जनता भी समझे और याद रखे- ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई शमी भाई आपका भी शुक्रिया इस शेर को याद करने के लिए। साभार- https://www.facebook.com/dheeresh.saini/posts/1063422583723590

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