शासक राष्ट्रवाद की बात करता है और जनता मुक्ति की: प्रो. शम्सुल इस्लाम

शासक राष्ट्रवाद की बात करता है और जनता मुक्ति की: प्रो. शम्सुल इस्लाम फैजाबाद, 20 दिसंबर। बीते रविवार 18/12/2016 को स्थानीय शाने अवध होटल के सभागार में साहित्य और विचार की संस्था ‘हस्तक्षेप’ के तत्वावधान में ‘भारतीय राष्ट्रवाद: कल, आज और कल’ विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर, प्रख्यात चिंतक व आंदोलनकर्मी प्रो. शम्सुल इस्लाम का एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। अमर शहीद अशफाक़ उल्ला खाँ के शहादत दिवस की पूर्व संध्या पर बोलते हुए प्रो. शम्सुल ने शहीदों की इस ज़मीन को सलाम करते हुए खुद को एक अध्येता के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज राष्ट्रवाद की बहस पूरे विश्व में सर के बल खड़ी है। राष्ट्र केवल ज़मीन, जंगल, पहाड़ आदि नहीं है बल्कि उसमें रहने वाले लोग हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्र शब्द बहुत बाद का है और 1884 में पहली बार स्पेनिश डिक्शनरी में इसका प्रयोग मिलता है। उन्होंने रेखांकित किया कि समूचे विश्व में सामंतवाद की समाप्ति के बाद पूंजीवाद ने नये संसाधनों का विकास करते हुए इस राष्ट्रवाद के मुहावरे का प्रयोग मजदूरों को अपने कारखानों तक लाने के लिए किया। इसी क्रम में समाज ने वस्त्र, परिधान और संस्कृति में राष्ट्रवाद के प्रतीकों का आरोपण प्रारम्भ कर दिया, जबकि दरअसल यह शोषित वर्ग की जनता की स्वतंत्रता का अतिक्रमण था। राष्ट्रवाद के प्रसिद्ध व्याख्याकार एंडरसन के हवाले से उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद वस्तुतः इतिहास में झूठ गढ़ने का सिद्धान्त है। उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर की इस बात को भी प्रस्तुत किया कि हमारे समूचे साहित्य में राष्ट्रवाद जैसे शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है और यह एक ऐसा एनीस्थीसिया है, जिसके नाम पर किसी भी तरह की समस्याएँ उत्पन्न की जा सकती हैं। अशफाक़ और भगतसिंह की कुर्बानी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक भ्रम है कि इन शहीदों ने अपनी जान किसी राष्ट्रवाद के प्रतीक के लिए दी, बल्कि इन्होंने शोषित जनता की मुक्ति के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि शासक वर्ग राष्ट्रवाद की बात करता है और जनता मुक्ति की बात करती है। अधिकार और सत्ता के बँटवारे के लिए राष्ट्रवाद के मोहरे का इस्तेमाल लगातार किया जाता रहा है। यह दुर्भाग्य है कि देश में धीरे धीरे जन आंदोलन समाप्त हुए और शासक वर्ग ने क्रांतिकारियों ने इस शहादत का इस्तेमाल अपने मनमाने ढंग से किया। स्वतंत्रता संग्राम के तमाम सन्दर्भों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि किस तरह जो लोग 1857 की क्रान्ति में जनता के प्रतिपक्ष में अंग्रेजों के साथ खड़े थे, उन्होंने बाद में राष्ट्रवाद की पताका को अपने हाथ में उठा लिया। हिन्दू राष्ट्रवाद के नये टर्म पर चोट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 1925 से 1947 तक राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में संघ या हिन्दू महासभा की कोई भूमिका दृष्टिगत नहीं होती, बल्कि एकाधिक मौकों पर आन्दोलनों में साथ न देने के दस्तावेजी साक्ष्य भी मिलते हैं। उनके अनुसार धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में इतिहास को मैन्युफैक्चर करने का काम हिन्दू राष्ट्रवाद के माध्यम से किया जा रहा है। उन्होंने भारत में मुस्लिम लीग तथा वर्तमान समय में पाकिस्तान की राजनैतिक स्थिति के बहाने से मुस्लिम राष्ट्रवाद के धार्मिक स्वरूप पर भी गहरी चोट की। पाकिस्तान और बांग्लादेश में धर्म के नाम पर महिलाओं और धर्मनिरपेक्ष लोगों के साथ हो रही नाइंसाफी और अपराध पर भी उन्होंने रोष व्यक्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी शासक न हिन्दू होता है न मुसलमान, वह सिर्फ शासक होता है। इस अवसर पर अपनी संस्था ‘निशान्त’ के बैनर तले गाये जाने वाले कौमी एकता से सम्बन्धित अपने कुछ जनगीत भी उन्होंने सुनाए। व्याख्यान की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह ने आज के सन्दर्भ में क्रान्तिकारियों की स्मृति के महत्व को समझने पर ज़ोर दिया। इससे पहले कार्यक्रम का संचालन कर रहे डॉ. अनिल कुमार सिंह ने प्रो. शम्सुल इस्लाम का परिचय देते हुए बताया कि वे राजनीति विज्ञानी होने के साथ-साथ संघ और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों पर दस्तावेज़ी ढंग से काम करने वाले विरल अध्येता और आंदोलनकर्मी हैं। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से कैप्टन अफजाल, अनीस अहमद, स्वप्निल श्रीवास्तव, सूर्यकांत पाण्डेय, आशाराम जागरथ, नजमुल हसन गनी, सुदामा सिंह, कमलेश यादव, दिनेश सिंह, मो. शहजाद, सीताराम वर्मा, आरजे यादव, प्रदीप कुमार, मुजम्मिल फिदा, गौरव सोनकर, आफाक़, धीरज, संज्ञा सिंह, रामानन्द दास मौर्य, विनीत मौर्य सहित शहर के लेखक, प्रबुद्धजन एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

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