सरदार पटेल को आरएसएस का संगी नहीं बना सकता नरेंद्र मोदी का इतिहासबोध भी

आरएसएस की सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश भी सफल नहीं होने वाली है। ऐसी हालत में बेहतर यही होगा कि नरेंद्र मोदी समेत आरएसएस के बाकी लोग इतिहास को स्वीकार कर लें और उसे बदलने की कोशिश न करें...

सरदार पटेल को आरएसएस का संगी नहीं बना सकता नरेंद्र मोदी का इतिहासबोध भी

शेष नारायण सिंह

आजकल आरएसएस/ भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी की राजनीति को इतिहाससम्मत बनाने के काम में जुटे हुये हैं। इस चक्कर में वे बहुत ऊलजलूल काम कर रहे हैं। अभी गुजरात में किसी भाषण में उन्होंने कह दिया कि उनकी पार्टी के संस्थापक डॉ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1930 में स्विट्ज़रलैंड में मर गये थे जबकि इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि डॉ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु 1953 में कश्मीर में हुयी थी। पटना के भाषण में उन्होंने कह दिया कि सिकंदर गंगा नदी तक आया था। या कि तक्षशिला बिहार में था। मोदी जी की इन गलतियों का कारण यह है कि वे या इतिहास की सही जानकारी नहीं रखते और उनका दिमाग इस बात की कोशिश करता रहता है कि अपनी पार्टी को भी इतिहास की महान परम्परा से जोड़ने में सफलता हासिल करें। उनके ऊपर इस बात का दबाव है कि वे आज़ादी की लड़ाई के कुछ महानायकों के साथ अपनी पार्टी को भी जोड़ें। इस चक्कर में कभी वह मौलाना आज़ाद का नाम लेते हैं, कभी बाल गंगाधर तिलक का नाम लेते हैं लेकिन उनका दुर्भाग्य है कि यह सभी महान लोग आरएसएस में कभी नहीं रहे जबकि आज़ादी की लड़ाई के सारे महान नायक कांग्रेस में रह चुके हैं। मोदी केवल एक प्वाइंट पर भारी पड़ते हैं कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व इंदिरा गांधी के परिवार के अलावा किसी का नाम नहीं लेता जबकि 1920 से 1950 तक का कांग्रेस का इतिहास ऐसा है कि उस पर कोई भी गर्व कर सकता है और उसी कालखंड का आरएसएस का इतिहास ऐसा है जिसे कोई भी गौरवशाली व्यक्ति अपना कहने में संकोच करेगा क्योंकि उसी दौर में भी महात्मा गांधी की हत्या हुयी थी।

आज़ादी की लड़ाई के नायकों को अपनाने की कोशिश आरएसएस और उसके मातहत संगठन अक्सर करते रहते हैं। 2009 में जब महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज की रचना के सौ साल पूरे हुये तो आरएसएस वालों ने एक बार फिर योग्य पूर्वजों की तलाश का काम शुरू कर दिया था। उस किताब के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में सेमीनार आदि आयोजित किये गये। करीब 33 साल पहले महात्मा गांधी को अपनाने की कोशिश के नाकाम रहने के बाद उस प्रोजेक्ट को दफन कर दिया गया था लेकिन पता नहीं क्यों एक बार फिर महात्मा गांधी को अपनाने की जुगत चालू कर दी गयी थी। आरएसएस ने इस बार महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर नहीं उनके सिद्धांतों का अनुयायी होने की योजना शुरू किया है। हिंद स्वराज को अपनाने की स्कीम उसी रणनीति का हिस्सा है।।

आरएसएस की समस्या यह है कि उनके पास ऐसा कोई हीरो नहीं है जिसने भारत की आजादी में संघर्ष किया हो। एक वीडी सावरकर को आजादी की लड़ाई का हीरो बनाने की कोशिश की गयी। जब संघ परिवार की केंद्र में सरकार बनी तो सावरकर की तस्वीर संसद के सेंट्रल हाल में लगाने में सफलता भी मिल गयी लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि 1910 तक के सावरकर और ब्रिटिश साम्राज्य से माफी माँगकर आजाद हुये सावरकर में बहुत फर्क है और पब्लिक तो सब जानती है। सावरकर को राष्ट्रीय हीरो बनाने की भाजपा की कोशिश मुँह के बल गिरी। इस अभियान का नुकसान हुआ क्योंकि जो लोग नहीं भी जानते थे, उन्हें भी पता लग गया कि वीडी सावरकर ने अंग्रेजों से माफी माँगी थी और ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा करने की शपथ ली थी। 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधी को अपनाने की कोशिश शुरू की थी लेकिन गांधी के हत्यारों और संघ परिवार के सम्बंधों को लेकर मुश्किल सवाल पूछे जाने लगे तो योजना को छोड़ दिया गया और कई साल तक महात्मा गांधी का नाम नहीं लिया। क्योंकि हिंद स्वराज में उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।"

ज़ाहिर है यह आरएसएस भाजपा की राजनीति के लिए कोई फायदे की बात नहीं है। महात्मा जी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी राज्य की चूलें हिल गयीं। आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। शौकत अली, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने इस सोच को आजादी की लड़ाई का स्थाई भाव बनाया। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने जिन्ना जैसे लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुये। महात्मा गांधी के 1920 के आंदोलन के बाद ही वी डी सावरकर की किताब हिंदुत्व  को आधार बनाकर आरएसएस की स्थापना भी हुयी।

 बीच में कोशिश की गयी कि आरएसएस के संस्थापक डॉ के बी हेडगेवार के बारे में प्रचार किया जाय कि वे भी आजादी की लड़ाई में जेल गये थे लेकिन मामला चला नहीं। उल्टे, जनता को पता लग गया कि वे जंगलात महकमे के किसी विवाद में जेल गये थे जिसे आरएसएस वाले अब वन सत्याग्रह नाम देते हैं। वन सत्याग्रह शब्द को सच भी मान लें तो आरएसएस भी यह दावा कभी नहीं करता कि उसके संस्थापक 1925 के बाद आजादी के किसी कार्यक्रम में संघर्ष का हिस्सा बने थे। हाँ कलकत्ता में कांग्रेस के सदस्य के रूप में वे शायद आज़ादी के संघर्ष में शामिल हुये रहे हों। वन सत्याग्रह वाली बात को साबित करने के लिए आरएसएस की ओर से दिल्ली के किसी कालेज में काम करने वाले एक मास्टर साहेब की किताब का ज़िक्र किया जाता है। वे लोग बहुत जोर देकर बताते हैं कि वह किताब केन्द्र सरकार के प्रकाशन विभाग ने छापी है। हो सकता है कि सरकार ने किताब छापी हो लेकिन उस किताब का सोर्स क्या है इस पर कोई बात नहीं करता। 1940 में संघ के मुखिया बनने के बाद एम एस गोलवलकर भी घूमघाम तो करते रहे लेकिन एक दिन के लिए भी जेल नहीं गये। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में जब पूरा देश गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में शामिल था तो न तो आरएसएस के प्रमुख एम एस गोलवलकर को कोई तकलीफ हुयी और न ही मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को। दोनों जेल से बाहर की आजादी का सुख भोगते रहे।

 जब संसद में सावरकर की तस्वीर लगाने के मामले पर राजग सरकार की पूरी तरह से दुर्दशा हो गयी तो सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश शुरू की गयी, जो आज तक चल रही है। सरदार पटेल को अपनाने की आरएसएस की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी क्योंकि आरएसएस को अपमानित करने वालों की अगर कोई लिस्ट बने तो उसमें सरदार पटेल का नाम सबसे ऊपर आयेगा। सरदार पटेल ने ही महात्मा गांधी की हत्या वाले केस में आरएसएस पर पाबंदी लगायी थी और उसके मुखिया गोलवलकर को गिरफ्तार करवाया था। जब हत्या में गोलवलकर का रोल सिद्ध नहीं हो सका तो उन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए था लेकिन सरदार पटेल ने कहा कि तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक वह अंडरटेकिंग न दें। सरदार पटेल ने लिखित अंडरटेकिंग लेकर गोलवलकर को जेल से रिहा होने दिया था। सरदार पटेल की एक दूसरी शर्त थी कि रिहाई के पहले आरएसएस का एक लिखित संविधान भी बनाया जाये। संविधान बन भी गया लेकिन उसका इस्तेमाल केवल अपने प्रमुख की रिहाई मात्र था। वह कभी लागू नहीं हुआ। उस संविधान में लिखा गया है कि संघ वाले किसी तरह ही राजनीति में शामिल नहीं हो सकेंगे। उसके बाद राजनीति करने के लिए 1951 में जनसंघ की स्थापना हुयी। 1977 में भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ और उसी जनता पार्टी को तोड़कर बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी जिसको आज लोग भाजपा के नाम से जानते हैं।।

अपने को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ने की कोशिश करने का काम पिछले दिनों भाजपा और आरएसएस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी को सौंपा गया। नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले तो सरदार पटेल को अपना साबित करने का अभियान चालू किया और उन्हें गुजराती तक कह डाला जबकि सरदार पटेल को किसी एक भौगोलिक सीमा में बाँधना असम्भव है। वे तो सारे देश के नेता थे। सरदार पटेल को अपना सकना नरेंद्र मोदी के लिये बहुत मुश्किल साबित होने वाला है क्योंकि नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसके राज में 2002 में हज़ारों मुसलमानों को निर्दयता पूर्वक क़त्ल कर दिया गया था और सरकार ने राजधर्म नहीं निभाया था। जबकि सरदार पटेल ने देश के विभाजन के बाद के हुये खून खराबे में लोगों को मुसलमानों की जान बचाने के लिए प्रेरित किया था। सरदार धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर थे। केन्द्र सरकार के गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)।

सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहाँ के सिख हमला करने वाले हैं। सरदार पटेल अमृतसर गये और वहाँ करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गयी जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। भारत के गृहमंत्री के साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बेटी भी थीं। भीड़ बदले के लिये तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को सम्बोधित किया और कहा, ''इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिये हिन्दुओं, सिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था.... मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूँ। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए... एक हफ्ते तक अपने हाथ बाँधे रहिए और देखिए क्या होता है। मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिये और अपने लोगों की डयूटी लगाइये कि वे उन्हें सीमा तक पहुँचा कर आयें।" सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुयी। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ। ज़ाहिर है कि इस राजनीतिक सोच के मालिक सरदार पटेल के जीवन में ऐसे सैकड़ों काम होंगें जो नरेंद्र मोदी या उनकी राजनीति के हित के साधन के लिये किसी काम के नहीं होंगे। इसलिए आरएसएस की सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश भी सफल नहीं होने वाली है। ऐसी हालत में बेहतर यही होगा कि नरेंद्र मोदी समेत आरएसएस के बाकी लोग इतिहास को स्वीकार कर लें और उसे बदलने की कोशिश न करें।

Posted on November 16,2013 10:13

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