हाँ, मैं आरक्षण के सामाजिक-शैक्षिक आधार का समर्थक हूँ

क्यों जरूरी है आरक्षण की नीति की पुनर्समीक्षा...

अतिथि लेखक
मैं आरक्षण के सामाजिक- शैक्षिक आधार का समर्थक हूँ, क्योंकि

प्रवीण मल्होत्रा

समाज से सामाजिक विषमता अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि अगड़ी जातियां आरक्षण के विरोध में निरन्तर मुखर होती जा रही हैं। अगड़ी जातियों के नेता येन केन प्रकारेण आरक्षण की व्यवस्था को ही समाप्त करना चाहते हैं और इनके पीछे कौन सी शक्तियां सक्रिय हैं, यह सूर्य के प्रकाश की तरह उजागर हो चुका है।

मेरी सोच यह है कि सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन में अब आर्थिक आधार जोड़ना भी जरूरी हो गया है, ताकि जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, उनमें आर्थिक रूप से विपन्न (वास्तविक वंचित) आरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकें। अभी अन्य पिछड़ा वर्ग के नाम पर दबंग, खेतिहर जातियां आरक्षण का सारा लाभ प्राप्त कर रही हैं। यही स्थिति दलित और आदिवासियों (SC-ST) में भी हो गयी है। आरक्षण के नाम पर सभी एलीट नौकरियों पर पीढ़ियों से कुछ ही परिवारों का अधिकार हो गया है। यह स्थिति जगजीवनराम के समय से चली आ रही है, जिनकी पुत्री को UPSC में आरक्षण का लाभ मिला था और वे भारतीय विदेश सेवा में चुनी गयी थीं।

जगजीवनराम को दलितों में द्विज कहा था लोहिया ने

डॉ. लोहिया ने जगजीवनराम जी को दलितों में द्विज की संज्ञा दी थी। आज हर राज्य और केंद्र में एलीट पदों पर उन्हीं दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के परिवारों का कब्ज़ा है, जिन्हें वास्तव में आरक्षण की जरूरत ही नहीं है। इसलिये अब समय आ गया है कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े दलित, आदिवासी और अति पिछड़ा वर्ग के उन्हीं लोगों और समुदायों को आरक्षण का लाभ मिले, जो अभी तक इस लाभ से वंचित हैं।

इसलिए आरक्षण की नीति में आर्थिक आधार भी जोड़ना पड़ेगा, जिससे 'क्रीमी लेयर' आरक्षण की परिधि से पूर्णतः बाहर हो जाये। अन्यथा पिछड़ा वर्ग के नाम पर यादव, जाट, गुर्जर, कुर्मी, मराठा, पटेल-पाटीदार, कम्मा, रेड्डी किस-किस को आरक्षण देंगे ? यह आरक्षण की नीति को समूल नष्ट करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र है कि हमें भी आरक्षण दो या फिर आरक्षण समाप्त करो।

क्यों जरूरी है आरक्षण की नीति की पुनर्समीक्षा

मुख्य धारा के राजनीतिक दल कभी भी यह नहीं चाहेंगे कि आरक्षण की नीति का युक्तियुक्तकरण हो, क्योंकि इन पार्टियों में जो पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व है वह इन्ही दबंग जातियों का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए आरक्षण की नीति की पुनर्समीक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए एक नए आयोग का गठन होना चाहिए जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत अपनी रिपोर्ट निर्धारित समयावधि में प्रस्तुत करे और इस आयोग की समयसीमा किसी भी स्थिति में बड़ाई न जाये। आशा है सभी निष्पक्ष और समतामूलक समाज के समर्थक इस विचार के प्रति अपनी सहमति व्यक्त करेंगे।

September 24,2015 05:15 को प्रकाशित

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