9 जनवरी 2019 : यह भारत के इतिहास का काला दिन है

अतिथि लेखक

9 जनवरी 2019, बुधवार। आज की तारीख को इतिहास में संविधान की हत्या दिवस (Constitution day) के रूप में जाना जाएगा। इतिहास यह तिथि याद रखेगी, जब तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janata Dal) और असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) के दल ऑल इंडिया मजलिस--इत्तेहादुल मुसलमीन (All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen) को छोड़कर देश के दर्जनों दलों ने संविधान की हत्या (Assassination of the constitution) के लिए अपनी सहमति दी। संविधान का दाह संस्कार किया। भले ही इसे मार डालने का श्रेय भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) को दिया जाएगा। लेकिन मौत के बाद उसकी लाश जला देने में जिस तरह से हिंदू परंपरा (Hindu tradition) में 5 लकड़ियां चिता में डाली जाती हैं, उस तरह से सभी दलों ने चिता में लकड़ियां डालकर भारतीय संविधान और मौलिक अधिकारों (fundamental rights) को फूंक डाला है।

सत्येन्द्र पीएस

Fundamental rights are Soul of constitution

भारत के संविधान में मूल अधिकार को संविधान की आत्मा माना गया है। यह माना जाता है कि अगर मूल आत्मा ही कमजोर पड़ जाए तो संविधान का कोई मतलब नहीं है। इसकी वजह यह है कि इसमें भारत में रहने वाले लोगों को हक दिया गया है। संविधान में पहला संशोधन भी मूल अधिकार में ही किया गया था।

मूल अधिकार में संशोधन मूल रूप से आरक्षण के मसले पर ही हुआ। जब समाज के पिछड़े वर्ग को आरक्षण व विशेष सुविधाएं देने की बात आई, तो यह सवाल उठे कि यह समता के अधिकार का उल्लंघन होगा, जो मूल अधिकार के तहत संविधान ने दिए हैं। इस पर बड़ी लंबी बहस चली। देश और दुनिया के जाने माने वकीलों ने महीनों तक इस विषय पर चर्चा की कि क्या पिछड़े वर्ग को सुविधाएं देना संविधान के समता के अधिकार का उल्लंघन है? लंबी चली बहस के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि सामाजिक और शैक्षणिक वर्ग के पिछड़े तबके को नौकरियों, शिक्षा में अवसर देना समता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है और संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 15 और 16 में प्रावधान समाहित कर दिया गया था।

उसके बाद नौकरियों में आरक्षण देने को लेकर 40 साल तक चर्चा ही होती रही, और तमाम आयोग बनते रहे। आखिरकार वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिश (Mandal commission recommendation) स्वीकार करते हुए देश के पिछड़े वर्ग की 54 प्रतिशत आबादी को नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दे दिया। मामला  न्यायालय में गया। न्यायालय ने माना कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को नौकरियों में आरक्षण देने का अधिकार सरकार को है। हालांकि उसमें क्रीमी लेयर का प्रावधान भी किया गया। न्यायालय ने कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के तहत जिन लोगों को रखा गया है, उसमें एक तबका ऐसा है, जिनके पास बहुत जमीनें, फैक्टरियां और सुख सुविधाएं हैं। वह तबका न तो शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, न उस तबके को सामाजिक रूप से कोई नीचा दिखा सकता है। न्यायालय ने ओबीसी आरक्षण पर क्रीमी लेयर का प्रावधान कर दिया। कुछ शर्तें तय की गईं और कहा गया कि इतनी कमाई वाला व्यक्ति मलाईदार तबका माना जाएगा, जिसमें से एक 8 लाख रुपये सालाना आमदनी है।

Debate on reservation in jobs on economic basis

1950 के दौर में भी चर्चा हुई थी कि क्या आर्थिक आधार पर नौकरियों में आरक्षण  दिया जा सकता है? उस समय यही विचार उभरकर सामने आया कि यह संभव नहीं है। इस आधार पर किसी को जिलाधिकारी नहीं बनाया जा सकता है कि वह भीख मांग रहा है, बहुत गरीब है। लेकिन अगर देश की 54 प्रतिशत आबादी के लोग जिलाधिकारी नहीं बनने पा रहे हैं, तो उस 54 प्रतिशत आबादी में से योग्य व्यक्ति को चयनित कर जिलाधिकारी बनाया जा सकता है। 54 प्रतिशत आबादी में से चुना गया व्यक्ति खराब गुणवत्ता का होगा, इसकी संभावना नहीं है। इससे देश की 54 प्रतिशत आबादी यह अनुभव कर पाएगी कि यह देश उसका भी है। उन दिनों संसद में पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण के भविष्य के लाभार्थी होने वालों की संख्या नगण्य थी और पूरी की पूरी लड़ाई एसडी चौरसिया, भीम राव अंबेडकर, पंजाब राव देशमुख जैसे चंद लोगों ने लड़ी थी। उनका साथ संसद में बैठे उच्च वर्ण उन विद्वानों ने दिया, जो जाति से परे हटकर देश और देशवासियों के उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना कर रहे थे।

 

भारतीय जनता पार्टी सरकार जिस तरीके से गैर आरक्षित तबके को गरीबी के आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव लाई, यह अपने आप में आश्चर्यजनक है। मुझे व्यक्तिगत रूप से यह उम्मीद थी कि विपक्षी दल कांग्रेस ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी में भी देश का हित सोचने वाले, तार्किक और विद्वान कहे जाने लायक कुछ सांसद जरूर होंगे, जो यह कहेंगे कि कम से कम इस मसले पर देशव्यापी चर्चा होने दी जाए। सभी का पक्ष सामने आने दिया जाए। यह हम साग भात बनाकर खाने नहीं जा रहे हैं, संविधान का मूल अधिकार बदलने जा रहे हैं, जिसे संविधान की आत्मा कहा जाता है।

लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। कांग्रेस-भाजपा तो दूर की कौड़ी है। पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले दलों और नेताओं ने भी कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि संभवतः अब संसद में जवाहरलाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, पंजाब राव देशमुख जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वकील और विद्वान नहीं हैं। पिछड़े वर्ग से लेकर सामान्य वर्ग के स्वार्थी लोगों से संसद भर गई है। संसद में कोई यह बोलने वाला नहीं है कि 4 लाख रुपये सालाना कमाने वाला आयकर भरता है और 8 लाख रुपये सालाना कमाने वाला किस आधार पर गरीब हो जाएगा? क्या गरीबों को आरक्षण देने का मतलब यह नहीं हुआ कि सड़क पर भीख मांग रहे व्यक्ति को जिलाधिकारी बना दिया जाए? क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का मतलब यह नहीं हुआ कि शासक वर्ग की जातियां ही अनारक्षित पद खुद को प्रतिभाशाली बन कर कब्जा कर लेंगी और गरीबों के लिए आरक्षित पद अपनी ही जाति के गरीब चुनकर भर लेंगी और समाज का वंचित तबका वंचित ही बना रह जाएगा ?

देश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 15 प्रतिशत है और अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 7.5 प्रतिशत। उन्हें नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में आबादी के आधार पर आरक्षण मिला हुआ है। मंडल रिपोर्ट तैयार करते समय आयोग के सद्स्यों ने 1931 की जनगणना के आधार पर पाया था कि आयोग जिस तबके को आरक्षण की सिफारिश करने जा रहा है, देश  में उस तबके की आबादी करीब 54 प्रतिशत है। आयोग ने कहा कि न्यायालय के फैसले की बाध्यता है, जिसके कारण आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत नहीं लांघी जा सकती है, इसलिए आयोग पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश करता है। साथ ही जाति आधारित जनगणना की सिफारिश करता है, जिससे प्रतिशत के मुताबिक इस वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया जा सके।

1993 में ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद से इसमें करीब 150 जातियां और जोड़ी गई हैं। इस आधार पर देखें तो ओबीसी की कुल आबादी करीब 56 या 57 प्रतिशत हो सकती है। इसमें मुस्लिमों की कुल आबादी का करीब 80 प्रतिशत आरक्षित वर्ग के दायरे में आ जाती है।

इस तरह से मौजूदा आरक्षित वर्ग की जनसंख्या 79.5 प्रतिशत होती है। शेष बची 20.5 प्रतिशत आबादी आरक्षण के दायरे में नहीं आती। संसद में किसी भी सांसद ने यह बात नहीं उठाई कि 20.5 प्रतिशत आबादी के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किस न्याय के तहत किया जा रहा है, जबकि 56 प्रतिशत आबादी वाले अन्य पिछड़े वर्ग को सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। यह भी नहीं पूछा गया कि किसी देश में ऐसी नजीर है क्या कि गरीबी के आधार पर नौकरियां दी जाएं? प्रतिनिधित्व न होने के आधार पर तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका सहित तमाम देश हैं, जहां पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन कोई गरीब है, इस आधार पर उसे न्यायाधीश बना दिया जाए, उसे जिलाधिकारी बना दिया जाए, इसका कोई वैश्विक उदाहरण नहीं है। इसका कोई तर्क भी नहीं है। अगर किसी की गरीबी दूर करनी है, तो उसे आर्थिक मदद करने का प्रावधान दुनिया भर में है। उसे तमाम तरह की सुविधाएं देने, फ्रीबीज देने का काम दुनिया भर में होता आया है। भारत में भी मनरेगा, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, खाद्य सब्सिडी, रसोई गैस पर सब्सिडी, मुफ्त अनाज वितरण जैसी तमाम योजनाएं हैं, जिनके माध्यम से गरीबों की गरीबी दूर करने और उन्हें जिंदा रखने की कवायद की जाती है। लेकिन कोई व्यक्ति गरीब है, इसलिए उसे जिलाधिकारी या सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बन जाने की सुविधा देने का उदाहरण अजूबा है।

और आज यह सब कुछ बगैर किसी बहस के संसद ने कर दिखाया है। कोई तर्क नहीं, कोई चर्चा नहीं। देश की जनता से कोई राय नहीं ली गई। मूल अधिकार, जिसे संविधान की आत्मा कहा जाता है, दो दिन के भीतर उसकी हत्या कर दी गई। यह भारत के इतिहास का काला दिन है

January 9, 2019: This is the dark day of India's history

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