राम के नाम रामराज्य का स्वराज अब भगवा आतंकवाद में तब्दील है।

यह भारतीय इतिहास और भारतीय संस्कृति और भारतवर्ष की परिकल्पना के खिलाफ एक अक्षम्य युद्ध अपराध है।...

हाइलाइट्स
  • मजे की बात है कि इस अंध राष्ट्रवाद के निशाने पर मुसलनमान माने जाते हैं लेकिन असल निशाने दलित और आदिवासी हैं। आदिवासी चूंकि हिंदुत्व की पैदल सेना नहीं हैं दलितों और पिछड़ों की तरह तो अलगाव के शिकार आदिवासी भूगोल एक अनंत वधस्थल में तब्दील है और कारपोरेट हितों में कारपोरेट राजकाज के तरह जिन बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधनों की खुलेआम डकैती हो रही हैं, वे आदिवासी भूगोल में ही है तो यह दमन, उत्पीड़न, विस्थापन और नरसंहार आदिवासासियों की दिनचर्या है।
  • यह भारतीय इतिहास और भारतीय संस्कृति और भारतवर्ष की परिकल्पना के खिलाफ एक अक्षम्य युद्ध अपराध है।

 

ब्राह्मणों की भूमिका, अनार्यों की देन और हिंदुत्व के भगवा एजंडे में भारत तीर्थ के आदिवासी!

रवींद्र का दलित विमर्शःतेरह

पलाश विश्वास

संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा थाः

“आज़ादी की इस लड़ाई में हम सबको एक साथ चलना चाहिए। पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे आदिवासी ही हैं। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए। ”

लेकिन स्वतंत्र भारत में आदिवासियों का अलगाव, दमन, उत्पीड़न, विस्थापन और उनका सफाया विकास का पर्याय बन गया है। बाकी भारतवासियों को इन आदिवासियों की कोई परवाह नहीं है और इसके उलट अंध राष्ट्रवाद की आड़ में कारपोरेट हित में आदिवासियों के खिलाफ इस अश्वमेधी नरसंहारी अभियान की वैदिकी संस्कृति का समर्थन करती है गैरआदिवासी भारतीय जनता।

26 जनवरी से पहले भारत कोई राष्ट्र नहीं था। दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत भारत विभाजन के बाद बचे खुचे भारतवर्ष को भारतीय संविधान के तहत एक स्वतंत्र सार्वभौम लोक गणराज्य घोषित किया गया। इससे पहले भारत एक देश था। जनपदों का देश जो प्राचीन काल में लोक गणराज्यों का देश रहा है।

जनसंख्या स्थानातंरण के तहत हिंदुओं के लिए भारत और मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाने की परिकल्पना फेल हो गयी और भारत में मुसलमानों की जैसे अच्छी खासी तादाद मौजूद रही वैसे ही पाकिस्तान और खासतौर पर पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदुओं की आबादी रह गयी।

पाकिस्तान के विभाजन के बाद बांग्लादेश में अब भी करीब दो करोड़ गैर मुसलमान हैं जिनमें सबसे ज्यादा हिंदू हैं तो बौद्ध और आदिवासी भी हैं।

देश के विभाजन से पहले जिस तरह संस्कृतियों और नस्लों के एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी, दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत भारत पाकिस्तान बनने के बाद वह प्रक्रिया सिरे से रुक गयी। बांग्ला राष्ट्रीयता के नाम पर बांग्लादेश बना तो भारत में सिख राष्ट्रीयता के तहत खालिस्तान आंदोलन से खून खराबा हुआ।

खालिस्तानी आंदोलन की हिंसा की वजह से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैनिक कार्रवाई के आपरेशन ब्लू स्टार के तहत जालियांवाला कांड दोहराया गया और इस वजह से हुए उथल पुथल के नतीजतन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और इसकी प्रतिक्रिया में देश भर में सिखों का कत्लेआम हुआ और आज तक पीड़ित सिखों को न्याय नहीं मिला।

सिखों का यह सदाबहार जख्म राष्ट्रवाद का चेहरा है।

बंगाल में अलग गोरखालैंड और वृहत्तर गोरखालैंड आंदोलन के तहत अस्सी के दशक में खूनखराबा हुआ। असम में अल्फाई अहमिया राष्ट्रीयता का उपद्रव जारी है तो कश्मीरी राष्ट्रीयता भारत पाक युद्धों का प्रमुख कारण है। इसी तरह पूर्वोत्तर में अलग-अलग राष्ट्रीयता आंदोलन चल रहे हैं। असम और पूर्वोत्तर में भी अलग राष्ट्रवाद के नाम नरसंहार होते रहे हैं।

मराठा राष्ट्रवाद का भगवा एजंडा अब हिंदुत्व का कारपोरेट एजंडा है तो द्रविड़नाडु आंदोलन अब तमिल आत्ममर्यादा आंदोलन की जगह ले चुका है।

राम के नाम रामराज्य का स्वराज अब भगवा आतंकवाद में तब्दील है।

गनीमत है कि फिलहाल आदिवासी और दलित अपने लिए अलग राष्ट्र की मांग नहीं कर रहे हैं।

राष्ट्र बनने से पहले, राष्ट्र के सैन्यीकरण से पहले, संविधान लागू होने से पहले हजारों साल से भारत में विविधता, बहुलता और सहिष्णुता के लोकतंत्र के तहत विभिन्न नस्लों और राष्ट्रीयताओं के निरंतर विलय और एकीकरण से भारतवर्ष बनता रहा, वह राष्ट्र बनने के बाद खंडित राष्ट्रीयताओं का एक आत्मघाती अनंत युद्धस्थल में तब्दील हो गया और जिस दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत भारत का विभाजन हुआ, उसी सिद्धांत के तहत हिंदू राष्ट्र के एजंडे के तहत आजादी के बाद से अब तक दंगोल का सिलसिला जारी है। गुजरात नरसंहार और बाबरी विध्वंस के बाद देश व्यापी दंगे उसी अंध फासीवादी राष्ट्रवाद की फसल है, जिसका विरोध रवींद्रनाथ कर रहे थे।

मजे की बात है कि इस अंध राष्ट्रवाद के निशाने पर मुसलनमान माने जाते हैं लेकिन असल निशाने दलित और आदिवासी हैं। आदिवासी चूंकि हिंदुत्व की पैदल सेना नहीं हैं दलितों और पिछड़ों की तरह तो अलगाव के शिकार आदिवासी भूगोल एक अनंत वधस्थल में तब्दील है और कारपोरेट हितों में कारपोरेट राजकाज के तरह जिन बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधनों की खुलेआम डकैती हो रही हैं, वे आदिवासी भूगोल में ही है तो यह दमन, उत्पीड़न, विस्थापन और नरसंहार आदिवासासियों की दिनचर्या है।

यह भारतीय इतिहास और भारतीय संस्कृति और भारतवर्, की परिकल्पना के खिलाफ एक अक्षम्य युद्ध अपराध है।

गौरतलब है कि अनार्यों की देन शीर्षक आलेख में रवींद्रनाथ ने संस्कृतियों के एकीकरण और विलय के मार्फत भारतवर्ष की परिकल्पना की है जो गीतांजलि से लेकर उनकी अनेक रचनाओं का मुख्य स्वर है।

अनार्यों की देन में उन्होंने लिखा हैः

किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि अनार्यों ने हमें कुछ नहीं दिया। वास्तव में प्राचीन द्रविड़ लोग सभ्यता की दृष्टि से हीन नहीं थे। उनके सहयोग से हिंदू सभ्यता को रूप-वैचित्र्य और रस-गांभीर्य मिला। द्रविड़ तत्व-ज्ञानी नहीं थे। पर उनके पास कल्पना शक्ति थी, वे संगीत और वस्तुकला में कुशल थे। सभी कलाविद्याओं में वे निपुण थे। उनके गणेश-देवता की वधू कला-वधू थी। आर्यों के विशुद्ध तत्वज्ञान के साथ द्रविड़ों की रस-प्रवणता और रूपोद्भाविनी शक्ति के मिलन से एक विचित्र सामग्री का निर्माण हुआ। यह सामग्री न पूरी तरह आर्य थी, न पूरी तरह अनार्य -यह हिंदू थी। दो विरोधी प्रवृत्तियों के निरंतर समन्वय-प्रयास से भारतवर्ष को एक आश्चर्यजनक संपदा मिली है। उसने अनंत को अंत के बीच उपलब्ध करना सीखा है, और भूमा को प्रात्यहिक जीवन की तुच्छता के बीच प्रत्यक्ष करने का अधिकार प्राप्त किया है। इसलिए भारत में जहाँ भी ये दो विरोधी शक्तियाँ नहीं मिल सकीं वहाँ मूढ़ता और अंधसंस्कार की सीमा न रही; लेकिन जहाँ भी उनका मिलन हुआ वहाँ अनंत के रसमय रूप की अबाधित अभिव्यक्ति हुई। भारत को ऐसी चीज मिली है जिसका ठीक से व्यवहार करना सबके वश का नहीं है, और जिसका दुर्व्यवहार करने से देश का जीवन गूढ़ता के भार से धूल में मिल जाता है। आर्य और द्रविड़, ये दो विरोधी चित्तवृत्तियाँ जहाँ सम्मिलित हो सकी हैं वहाँ सौंदर्य जगा है; जहाँ ऐसा मिलन संभव नहीं हुआ, वहाँ हम कृपणता और छोटापन देखते हैं। यह बात भी स्मरण रखनी होगी कि बर्बर अनार्यों की सामग्री ने भी एक दिन द्वार को खुला देखकर नि:संकोच आर्य-समाज में प्रवेश किया था। इस अनधिकृत प्रवेश का वेदनाबोध हमारे समाज ने दीर्घ काल तक अनुभव किया।

       यह निबंध महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी समय पर आनलाइन उपलब्ध है। आज हमने रवींद्र के लिखे इसी निबंध अनार्यों की देन सोशल मीडिया पर शेयर किया है। रवींद्र इस आलेख में भी समकालीन परिदृश्य और सामाजिक यथार्थ बतौर वैदिकी सभ्यता को भारतीय समाज की मुख्यधारा मानते हुए उसमें आर्य और अनार्य सभ्यता के विलय से भारतीयता के निर्माण की बातें की हैं।

हम जानबूझकर गीतांजलि, रवींद्र संगीत, रवींद्र उपन्यास या उनके गीति नाट्य और रंगकर्म पर फिलहाल विस्तार से चर्चा नहीं कर रहे हैं। क्योंकि इनके बारे में कमोबेश चर्चा होती रही है। हम रवींद्र के दलित विमर्श के तहत उनके दर्शन और खासतौर पर उनके राष्ट्रवाद, उनके मनुष्यता के धर्म पर चर्चा केंद्रित कर रहे हैं, जिसपर बांग्ला में भी चर्चा कम हुई है।

जाहिर है कि इस अनार्य द्रविड़ सभ्यता के वंशज और उत्तराधिकारी भारत के आदिवासी हैं। आज के डिजिटल भारत के हिंदुत्व एजंडे में आदिवासी कहां हैं, इसकी पड़ताल किये बिना मनुष्यता की धाराओं के विलय से भारतीयता और भारत के निर्माण की प्रक्रिया समझना जरुरी है।

रवींद्र नाथ जिस अंध राष्ट्रवाद और सैन्य राष्ट्र की पश्चिमी सभ्यता के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की साझा विरासत की बात कर रहे थे, उस अंध राष्ट्रवाद और सैन्य राष्ट्र के फासीवादी हिंदुत्व के एजंडे में आदिवासी भूगोल एक अखंड वधस्थल है और भारतीय मानस में आदिवासी विमर्श के लिए कोई स्थान नहीं है तो समझा जा सकता है कि नस्ली वर्चस्व के मनुस्मृति बंदोबस्त के तहत अनार्यों और द्रविड़ों, शक, हुण, कुषाण, पठान, मुगल और दूसरे गैरनस्ली जनसमुदायों की स्थिति क्या है।

रवींद्र नाथ टैगोर ने भारतवर्ष मासिक पत्रिका में लिखे ब्राह्मण शीर्षक आलेख की शुरुआत में ही ब्रिटिश हुकूमत में मनुस्मृति विधान के तहत ब्राह्मण के साथ गलत आचरण के दंडविधान के टूटने का उल्लेख करते हैं।

यह आलेख बेहद महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि भारत में बहुजन आंदोलन के नेताओं का विचार यही था कि ब्रिटिश हुकूमत की वजह से मनुस्मृति विधान के ब्राह्मणतंत्र के शिकंजे से उन्हें आजादी मिली है। उन्हें शिक्षा के साथ साथ आजीविका बदलने की आजादी मिली है। सेना और पुलिस में भर्ती होकर हथियार उठाने, कारोबार करने और संपत्ति अर्जित करने के हकहकूक मिले हैं। उन्हें डर था कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद सत्ता फिर ब्राह्मणों क हाथों में होगी।

भारत के बहुजन पुरखे बौद्धमय भारत के अवसान के बाद हिंदू और गैरहिंदू तमाम शासकों के मुकाबले ब्रिटिश राजकाज को बेहतर मानते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ब्राह्मण तंत्रक ब्रिटिश हुकूमत की वजह से टूटने लगा है। जन्मगत पेशा बदलने की छूट ब्रिटिश हुकूमत की वजह से ही मिली है।

ताराशंकर बंद्योपाध्याय के उपन्यास गणदेवता और हांसुली बांकेर उपकथा में इस संक्रमण काल का विवरण है। गणदेवता में जन्म और जाति के हिसाब से तय पेशा बदलने के लिए ग्रामीण समाज में मची खलबली का ब्यौरा है तो हांसुली बांकेर उपकथा में आदिवासी समाज में हो रहे बदलाव के आख्यान हैं।

ताराशंकर बंद्योपाध्याय इस बदलाव के खिलाफ थे और वे गांधीवादी भी थे। अरोग्य निकेतन में भी पुरातन चिकित्सा पद्धति का महिमामंडन है तो उनके बाकी कथा साहित्य में ब्रिटिश राज और भूमि के स्थाई बंदोबस्त, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के कारण जमींदारों और सामंतोें के संकट का सिलसिलेवार ब्यौरा हैं जिसमें आदिवासी और दलित भी हैं।

दलितों और आदिवासी दिनचर्या और जीवन यापन का सही ब्यौरा पेश करते हुए उनके हक में सामंतों के खिलाफ हो रहे सामाजिक बदलाव को ताराशंकर बंद्योपाध्याय सामंती व्यवस्था का अवसान मान रहे थे।

गौरतलब है कि बंगाल का भद्र सवर्ण समाज और जमींदारी भूस्वामी वर्ग पलाशी युद्ध और उसके बाद लगातार ईस्ट इंडिया कंपनी के पक्ष में बने रहे हैं।

चुआड़ विद्रोह, संन्यासी विद्रोह, संथाल मुंडा विद्रोह नील विद्रोह, 1857 की क्रांति और आदिवासी किसान जनविद्रोह के खिलाफ वे ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राजकाज के पक्ष में ही थे।

बंगाल का नव जागरण भद्रलोक समाज तक सीमाबद्ध था और नव जागरण के मसीहा आदिवासियों और किसानों के विद्रोह और 1857 की क्रांति के पूरे दौर में अंग्रेजों के साथ थे। लेकिन पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली, तेज होते बहुजन आंदोलन और सामाजिक बदलाव से स्थाई भूमि बंदोबस्त के तहत बने जमींदारों और भूस्वामियों का संकट गहराते ही बंग भंग के बाद बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में भद्र कुलीन वर्ग शामिल हुआ। उसका नेतृत्व भी इसी भद्र समाज तक सीमाबद्ध था।

इसके विपरीत इससे पहले तक अंग्रेजों के खिलाफ सारी लड़ाई आदिवासी, शूद्र, अछूत , मुसलमान , किसान और मजदूर ही लड़ रहे थे।

स्वदेशी आंदोलन में भद्र समाज और जमींदार तबके के वर्चस्व के खिलाफ ही शुरु से आखिर तक अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने वाले तबकों में अंग्रेजी हकूमत के बदले ब्राह्मणों की हुकूमंत का डर पैदा हुआ और वे स्वदेशी आंदोलन से अलग हो गये।

रवींद्रनाथ भी बहुजन पुरखों की तरह ब्रिटिश हुकूमत के राजकाज को बेहतर मानते थे। 1905 में बंगभंग के खिलाफ नाइट की उपाधि वापस करने और जालियांवाला नरसंहार के खिलाफ सबसे पहले मुखर होने, स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के बावजूद वे सामाजिक बदलाव और प्रगति के सिलसिले में लगातार ब्रिटिश राजकाज के पक्ष में बोल रहे थे।

इसके साथ ही फासीवाद नाजी नरसंहारी अंध राष्ट्रवाद के खिलाफ दुनिया भर में नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद व्याख्यान दे रहे थे। लिख रहे थे।

इसी लिए वे हिंदुत्ववादियों के निशाने पर आ गये।

मौजूदा डिजिटल कारपोरेट भारत के अंध राष्ट्रवाद के निशाने पर अनार्य द्रविड़ और दूसरी नस्लों के बहुसंख्य भारतवासी। सामाजिक विषमता लगातार बढ़ रही है, जिसे रवींद्रनाथ भारत की मुख्य समस्या मानते रहे हैं।

अनार्यों की देन के बारे में रवींद्र नाथ के भारत विमर्श में सर्वत्र विस्तार से उल्लेख है हालांकि आदिवासियों के बारे में अलग से उनका लिखा हमारे सामने फिलहाल नहीं है।

अनार्य और द्रविड़ सभ्यता से आदिवासियों को अलग रखा नहीं जा सकता तो अलग से आदिवासियों पर लिखने की शायद रवींद्रनाथ ने जरुरत न समझी हो।

गौरतलब है कि बहुजन आंदोलन के नेताओं ने भी आदिवासियों को अलगाव से निकालने की कोई कोशिश नहीं की जबकि साम्राज्यवादी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बहुजन समाज, शूद्र अछूत और मुसलमान किसान भी आदिवासियों के नेतृत्व में जल जंगल जमीन की साम्राज्यवाद सामंतवाद विरोधी हर लड़ाई में शामिल थे।

आदिवासी अस्मिता के बारे में वैदिकी आर्य नस्ली वर्चस्व की वजह से कोई समाजिक विमर्श ही शुरु नहीं हो सका और इसीि वजह से आनंदमठ के सौजन्य से ईस्टइंडिया कंपनी के खिलाफ साधु संतों पीर फकीर बाउलों, आदिवासियों, शूद्रों, अछूतों और मुसलमानों, किसानों के जनविद्रोह का हिंदुत्वकरण हो गया और इसे संन्यासी विद्रोह कहकर आदिवासियों, शूद्रों, दलितों, मुसलमानों को स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व से बेदखल कर दिया गया और इसी प्रक्रिया के तहत स्वदेशी आंदोलन पर जमींदार तबकों, रियासतों और रजवाडो़ं का वर्चस्व कायम हो गया और अंग्रेजों के जाने के बाद सत्ता पर भी उन्हीं सवर्ण जमींदार रजवाड़ा वर्ग का ही वर्चस्व है और हिंदुत्व का फासीवादी अंध राष्ट्रवाद उन्हीं आदिवासियों, शूद्रों, अछूतों और मुसलमानों के किलाफ नरसंहार संस्कृति है, जिसका रवींद्रनाथ शुरु से ही विरोध कर रहे थे।

बहुजन समाज से आदिवासियों का अलगाव खत्म करने के लिए शूद्र, दलित और मुसलमान नेताओं ने खास कुछ किया नहीं है तो पिछड़ों को अलग हांककर उन्हें सवर्ण का दर्जा देकर ब्राह्मणतंत्र और मजबूत होता चला गया।

भारतीय इतिहास में जिन शूद्रों ने सामती वर्चस्व को बार तोड़ा वही शूद्र नई कारपोरेट व्यवस्था के मुक्तबाजार में नस्ली वर्चस्व की फासिस्ट सत्ता की पैदल सेना हैं और आदिवासी लगातार अलगाव में हैं हालांकि जल जंगल जमीन की लड़ाई में वे आज भी सबसे आगे हैं लेकिन साम्राज्यवाद के खिलाफ जन विद्रोहों की तरह शूद्र, अछूत और मुसलमान आदिवासियों के साथ अब कहीं नहीं है।

आदिवासी विमर्श में सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लिखे सरकारी गजट में प्रकाशित सामग्री या मानवशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों और नृतत्वविदों के अध्ययन ही काफी नहीं है, उसके लिए समूचे भारतीय इतिहास की नये सिरे से जांच पड़ताल जरुरी है। इतिहास के खोये हुए पन्नों को खोज निकालकर रोशनी में लाना जरुरी है।

क्योंकि नस्ली वजूद के हिसाब से आदिवासी सिर्फ वे ही नहीं हैं जो आज आदिवासी हैं बल्कि शूद्रों, अछूतों और मुसलमानों के धर्मांतरण से पहले के अतीत में मोहनजोदोड़ो हड़प्पा समय से लेकर ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी एक अखंड आदिवासी समय है जिसे रवींद्रनाथ अनार्य और द्रविड़ सभ्यता कह रहे हैं।

हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि सिर्फ आर्यावर्त भारत का भूगोल नहीं है। आर्यावर्त से बाहर समूचा भारतवर्ष अनार्य द्रविड़ सभ्यता का भूगोल है तो हिमालय में भी जनजाति मूल के गैर आर्य लोगों की बहुसंख्य आबादी है।

इसी सिलसिले में आदिवासी विमर्श पर सिलसिलेवार चर्चा जरुरी है और आदिवासी इतिहास में ही भारत का अनार्य द्रविड़ इतिहास की पहेलियां सुलझायी जा सकती है। अभी हाल में डाक से रांची से अश्विनी कुमार पंकज की भेजी चार कितांबें मिल गयी हैं। अंग्रेजी में जयपाल सिंह मुंडा के लेखों और भाषणों पर आधारित आदिवासीडम, ऱघुवीर प्रसाद की आदिवासी रियासतों के इतिहास पर ऐतिहासिक कृति झारखंड झंकार, पंकज संपादित प्राथमिक आदिवासी विमर्श और पहली आदिवासी कवियत्री सुशीला सामत का पहला कविता संग्रह।

प्राथमिक आदिवासी विमर्श में शरत चंद्र राय का 1936 में लिखा आदिवासी अस्मिता पर ऐतिहासिक दस्तावेज भी शामिल है, जिसका मूल अंग्रेजी से मैंने हिंदी में अनुवाद किया है। इसके लिए आभारी हूूं।

बेहतर होता कि भारत राष्ट्र में आदिवासियों की स्थिति के विवेचन के सिलसिले में इन पुस्तकों पर भी चर्चा कर दी जाती। लेकिन इस परिसर की सीमा के मद्देनजर ऐसा संभव नहीं है। इन पुस्तकों पर अलग अलग लिखने की जरुरत है।

बहरहाल मैं अपने को आदिवासी समाज में शामिल मानता हूं और यह जानता हूं कि भारत की अश्वेत जनता के कृषि समुदाय के तमाम लोग हिंदुत्व में धर्मांतरित होने से पहले आदिवासी रहे हैं। इसलिए शुरु से मैं आदिवासी इतिहास में अपने पुरखों की भूमिका की खोज में रहा हूं। इस दृष्टि से इस तरह की शोध सामग्री बेहद महत्वपूर्ण है।

मेरी हैसियत कुछ नहीं है लेकिन फिर भी सत्ता वर्ग मुझे जीने का मौका देने से इंकार कर रहा है। ऐसे कामों में संलग्न रहकर ही मैं जीवित रह सकता हूं। मुझे झारखंड और आदिवासी भूगोल से दस्तावेजों के अनुवाद के इसी तरह के काम का इंतजार है जिससे इतिहास को नये सिरे से देखने समझने की दृष्टि मिले और उस पारिश्रामिक से मेरा सार्थक जीविका निर्वाह हो सके।

पंकज जी अनुमति दें तो आदिवासी विमर्श की समीक्षा के साथ मैं शरत चंद्र राय के अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज को सोशल मीडिया पर उन लोगों के लिए शेयर करना चाहुंगा, जो आगे इस दस्तावेज को पढ़ने के बाद आदिवासी विमर्श की प्रासंगिकता को समझने में और उससे अपनी पहचान और जमीन को तलाशने में दिलचस्पी लें।

इन पुस्तकों का उल्लेख सिर्फ इसी मकसद से कर रहा हूं कि आदिवासियों को शामिल किये बिना भारतवर्ष बनता नहीं है। इसलिए आदिवासी विमर्श पर हम जितनी जल्दी व्यापक संवाद शुरु कर सकें तो बेहतर।

इसी तरह ब्राह्मणतंत्र के खिलाफ और वैदिकी सभ्यता के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखनेवाले रवींद्रनाथ लगातार सामाजिक न्याय और समता की बात करते हुए सामाजिक बदलाव की बात कर रहे थे। ब्राह्मणतंत्र के टूटने की प्रक्रिया पर बात कर रहे थे ब्राह्मणों की सामाजिक नेतृ्त्व के नस्ली वर्चस्व में बदलने की चर्चा करते हुए। उनका लिखे ब्राह्मण शीर्षक निबंध में ब्राह्मणों की भूमिका में बदलाव के साथ साथ ब्राह्मणतंत्र के टूटते जाने का ब्यौरा भी है।

इसमें वर्ण व्यवस्था के तहत तीनों वर्णों के द्विजत्व की चर्चा उन्होंने की है और ब्राह्मणत्व अर्जित करने की बात भी की है लेकिन शूद्रों और अवर्णों को इस आर्य समाज से बाहर ही रखा है। गौरतलब है कि हिंदू मुसलमान दो राष्ट्रीयताओं के सावल खड़े हो जाने पर हिंदुओं की आबादी मुसलमानों से कम पड़ जाने से सत्ता से बेदखली का खतरा पैदा होने से पहले तक भारत में शूद्रों और अछूतों को हिंदू नहीं माना जाता है। यह वैसा ही है जैसा कि ओबीसी की जनगणना न कराने की कुल वजह यह है कि शूद्रों की जनसंख्या आधा से ज्यादा होने की स्थिति में उन्हें जनसंख्या के हिसाब से मौके दिये जाने पर तीन वर्णों के आधार पर हिंदुत्व के नस्ली वर्चस्व का बेड़ा गर्क तय है।

जन्मजात पेशे को बदलने की निषेधाज्ञा भी इन्हीं शूद्रों और अछूतों के खिलाफ थी। गौरतलब है कि भारत के आदिवासी समाज में ऐसी पेशागत सामाजिक निषेधाज्ञा और उसके उल्लंघन पर सजा और बहिस्कार न होने की वजह से वहां दलितों और शूद्रों की तरह हीनताबोध कभी नहीं रहा है और मानसिक तौर पर वे कभी गुलाम नहीं रहे हैं। उऩका चरित्र स्वतंत्रता का धारक वाहक है। वे इसलिए लड़ाई से भागते भी नहीं है और न नस्ली वर्चस्व की पैदल सेना बनते हैं। आखिरी आदमी या औरत के बलिदान से पहले तक वे किसी विद्रोह या युद्ध में हार नहीं मानते। यही अनार्य द्रविड़ सभ्यता है।

जाहिर है कि ब्राह्मणतंत्र से बहिस्कृत शूद्रों और अवर्णों के लिए ही वे सामाजिक न्याय और समता की आवाज बुलंद करते हुए बौद्धमय भारत के आदर्शों और मूल्यों को अपनी रचनाधर्मिता का कथानक बना रखा था तो वे अंध राष्ट्रवाद के निशाने पर इस वंचित तबके की स्थिति के मद्देनजर ब्राह्मणतंत्र के टूटने के सामाजिक आर्थिक बदलाव के सिलसिले में ही फासीवादी नाजी नरसंहारी राष्ट्रवाद के विरुद्ध ब्रिटिश राजकाज के पक्ष में बोल रहे थे लेकिन वे किसी भी सूरत में साम्राज्यवादी औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत के पक्ष में नहीं थे और आजादी की लड़ाई में वे भारतीय जनता के पक्ष में ही मोर्चाबंद थे।

रवींद्रनाथ सिर्फ ब्राहमणतंत्र के मुताबिक सामंती नस्ली वर्चस्व के तहत सामाजिक विषमता के खिलाफ न्याय, समता और कानून के राज के सिलसिले में बहुजन पुरखों की तरह ब्रिटिश राजकाज के पक्ष में बोल रहे थे।

ब्राह्मण शीर्षक आलेख की शुरुआत में ही उन्होंने लिखा हैः

সকলেই জানেন, সম্প্রতি কোনো মহারাষ্ট্রী ব্রাহ্মণকে তাঁহার ইংরাজ প্রভু পাদুকাঘাত করিয়াছিল; তাহার বিচার উচ্চতম বিচারালয় পর্যন্ত গড়াইয়াছিল–শেষ, বিচারক ব্যাপারটাকে তুচ্ছ বলিয়া উড়াইয়া দিয়াছেন।

सभी जानते हैं कि हाल में महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण को उसके अंग्रेज प्रभु ने जूतों से पीटा है। इस मामले में इंसाफ की फरियाद उच्चतम न्यायालय तक पहुंची और अंत में न्यायाधीश ने इसे तुच्छ मामला मानकर खारिज कर दिया।

ঘটনাটা এতই লজ্জাকর যে, মাসিক পত্রে আমরা ইহার অবতারণা করিতাম না। মার খাইয়া মারা উচিত বা ক্রন্দন করা উচিত বা নালিশ করা উচিত, সে-সমস্ত আলোচনা খবরের কাগজে হইয়া গেছে–সে-সকল কথাও আমরা তুলিতে চাহি না। কিন্তু এই ঘটনাটি উপলক্ষ করিয়া যে-সকল গুরুতর চিন্তার বিষয় আমাদের মনে উঠিয়াছে তাহা ব্যক্ত করিবার সময় উপস্থিত।

यह घटनी इतनी शर्मनाक है कि मासिक पत्रिका में हम इसका उल्लेख नहीं करते। मार खाकर मारना चाहिए या रोना चाहिए या शिकायत करनी चाहिेए, ऐसी तमाम चर्चाएं अखबारों में हो चुकी है और हम वे मुद्दे उठाना नहीं चाहते। किंतु इस घटना के उपलक्ष्य में जिन गंभीर चिंता के मसले हमारे मन में उठ खड़े हुए हैं, उन्हें व्यक्त करने का यह समय है।

বিচারক এই ঘটনাটিকে তুচ্ছ বলেন–কাজেও দেখিতেছি ইহা তুচ্ছ হইয়া উঠিয়াছে, সুতরাং তিনি অন্যায় বলেন নাই। কিন্তু এই ঘটনাটি তুচ্ছ বলিয়া গণ্য হওয়াতেই বুঝিতেছি, আমাদের সমাজের বিকার দ্রুতবেগে অগ্রসর হইতেছে।

न्यायाधीश ने इस घटना को तुच्छ बता दिया है और वास्तव में भी हम देख रहे हैं कि यह घटना तुच्छ हो गयी है। किंतु इस घटना के तुच्छ हो जाने से यह बात समझ में आ रही है कि हमारे समाज का विकार तेजी से बढ़ रहा है।

ইংরাজ যাহাকে প্রেস্টিজ, অর্থাৎ তাঁহাদের রাজসম্মান বলেন, তাহাকে মূল্যবান জ্ঞান করিয়া থাকেন। কারণ, এই প্রেষ্টিজের জোর অনেক সময়ে সৈন্যের কাজ করে। যাহাকে চালনা করিতে হইবে তাহার কাছে প্রেস্টিজ রাখা চাই। বোয়ার যুদ্ধের আরম্ভকালে ইংরাজ সাম্রাজ্য যখন স্বল্প পরিমিত কৃষকসম্প্রদায়ের হাতে বারবার অপমানিত হইতেছিল তখন ইংরাজ ভারতবর্ষের মধ্যে যত সংকোচ অনুভব করিতেছিল এমন আর কোথাও নহে। তখন আমরা সকলেই বুঝিতে পারিতেছিলাম, ইংরাজের বুট এ দেশে পূর্বের ন্যায় তেমন অত্যন্ত জোরে মচ্‌মচ্‌ করিতেছে না।

अंग्रेज जिसे प्रेस्टिज अर्थात राजकीय सम्मान कहते हैं और उसे बेशकीमती मानते हैं। क्योंकि इस प्रेस्टिज का जोर समय समय पर सेना के बहुत काम आता है। जिसे चलाना है, उसकी नजर में प्रेस्टिज बनाये रखना जरुरी है। बोयार युद्ध के आरंभकाल में जब सीमित संख्यक किसानों के हाथों ब्रिटिश साम्राज्य बार-बार अपमानित हो रहा था तब भारतवर्ष में अंग्रेजों को जो संकोच महसूस होने लगा, ऐसा अन्यत्र कहीं नहीं हुआ। तभी हम सभी समझने लग गये थे कि अंग्रेजों के बूटों की धमक इस देश में पहले की तरह उतने जोर से गूंज नहीं रही है।

আমাদের দেশে এককালে ব্রাহ্মণের তেমনি একটা প্রেস্টিজ ছিল। কারণ, সমাজচালনার ভার ব্রাহ্মণের উপরেই ছিল। ব্রাহ্মণ যথারীতি এই সমাজকে রক্ষা করিতেছেন কি না এবং সমাজরক্ষা করিতে হইলে যে-সকল নিঃস্বার্থ মহদ্‌গুণ থাকা উচিত সে-সমস্ত তাঁহাদের আছে কি না, সে কথা কাহারো মনে উদয় হয় নাই–যতদিন সমাজে তাঁহাদের প্রেস্টিজ ছিল। ইংরাজের পক্ষে তাঁহার প্রেস্টিজ যেরূপ মূল্যবাণ ব্রাহ্মণের পক্ষেও তাঁহার নিজের প্রেস্টিজ সেইরূপ।

हमारे देश में कभी ब्राह्मणों का ऐसा ही प्रेस्टिज रहा है। क्योंकि समाज के संचालन का कार्यभार ब्राह्मण का ही था। ब्राह्मण विधिपूर्वक समाज की रक्षा कर रहे हैं या नहीं एवं समाज की रक्षा के लिए जिन समस्त निःस्वार्थ महान गुणों की जरुरत होती है, वे गुण उनमें हैं या नहीं, ऐसा संशय किसी के मन में तबतक कभी पैदा नहीं हुआ, जबतक ब्राह्मणों का प्रेस्टिज बना रहा है। अंग्रेजों के लिए उनका प्रेस्टिज जितना बेशकीमती है, ब्राह्मणों के लिए बी अपना प्रेस्टिज उतना ही बेशकीमती है।

अनार्यों की देन

रवींद्रनाथ टैगोर

किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि अनार्यों ने हमें कुछ नहीं दिया। वास्तव में प्राचीन द्रविड़ लोग सभ्यता की दृष्टि से हीन नहीं थे। उनके सहयोग से हिंदू सभ्यता को रूप-वैचित्र्य और रस-गांभीर्य मिला। द्रविड़ तत्व-ज्ञानी नहीं थे। पर उनके पास कल्पना शक्ति थी, वे संगीत और वस्तुकला में कुशल थे। सभी कलाविद्याओं में वे निपुण थे। उनके गणेश-देवता की वधू कला-वधू थी। आर्यों के विशुद्ध तत्वज्ञान के साथ द्रविड़ों की रस-प्रवणता और रूपोद्भाविनी शक्ति के मिलन से एक विचित्र सामग्री का निर्माण हुआ। यह सामग्री न पूरी तरह आर्य थी, न पूरी तरह अनार्य -यह हिंदू थी। दो विरोधी प्रवृत्तियों के निरंतर समन्वय-प्रयास से भारतवर्ष को एक आश्चर्यजनक संपदा मिली है। उसने अनंत को अंत के बीच उपलब्ध करना सीखा है, और भूमा को प्रात्यहिक जीवन की तुच्छता के बीच प्रत्यक्ष करने का अधिकार प्राप्त किया है। इसलिए भारत में जहाँ भी ये दो विरोधी शक्तियाँ नहीं मिल सकीं वहाँ मूढ़ता और अंधसंस्कार की सीमा न रही; लेकिन जहाँ भी उनका मिलन हुआ वहाँ अनंत के रसमय रूप की अबाधित अभिव्यक्ति हुई। भारत को ऐसी चीज मिली है जिसका ठीक से व्यवहार करना सबके वश का नहीं है, और जिसका दुर्व्यवहार करने से देश का जीवन गूढ़ता के भार से धूल में मिल जाता है। आर्य और द्रविड़, ये दो विरोधी चित्तवृत्तियाँ जहाँ सम्मिलित हो सकी हैं वहाँ सौंदर्य जगा है; जहाँ ऐसा मिलन संभव नहीं हुआ, वहाँ हम कृपणता और छोटापन देखते हैं। यह बात भी स्मरण रखनी होगी कि बर्बर अनार्यों की सामग्री ने भी एक दिन द्वार को खुला देखकर नि:संकोच आर्य-समाज में प्रवेश किया था। इस अनधिकृत प्रवेश का वेदनाबोध हमारे समाज ने दीर्घ काल तक अनुभव किया।

युद्ध बाहर का नहीं, शरीर के भीतर का था। अस्त्र ने शरीर के भीतर प्रवेश कर लिया; शत्रु घर के अंदर पहुँच गया। आर्य-सभ्यता के लिए ब्राह्मण अब सब-कुछ हो गए। जिस तरह वेद अभ्रांत धर्म-शास्त्र के रूप में समाज-स्थिति का सेतु बन गया, उसी तरह ब्राह्मण भी समाज में सर्वोच्च पूज्य पद ग्रहण करने की चेष्टा करने लगे। तत्कालीन पुराणों, इतिहासों और काव्यों में सर्वत्र यह चेष्टा प्रबल रूप से बार-बार व्यक्त हुई है जिससे हम समझ सकते हैं कि यह प्रतिकूलता के विरुद्ध प्रयास था, धारा के विपरीत दिशा में यात्रा थी। यदि हम ब्राह्मणों के इस प्रयास को किसी विशेष संप्रदाय का स्वार्थ-साधन और क्षमता-लाभ का प्रयत्न मानें, तो हम इतिहास को संकीर्ण और मिथ्या रूप में देखेंगे। यह प्रयास उस समय की संकट-ग्रस्त आर्य-जाति का आंतरिक प्रयास था। आत्मरक्षा का उत्कट प्रयत्न था। उस समय समाज के सभी लोगों के मन में ब्राह्मणों का प्रभाव यदि अक्षुण्ण न होता तो चारों दिशाओं में टूट कर गिरने वाले मूल्यों को जोड़ने का कोई उपाय न रह जाता।

इस अवस्था में ब्राह्मणों के सामने दो काम थे - एक, पहले से चली आ रही धारा की रक्षा करना, और दूसरा, नूतन को उसके साथ मिलाना। जीवन-क्रम में ये दोनों काम अत्यंत बाधाग्रस्त हो उठे थे, इसलिए ब्राह्मणों की क्षमता और अधिकार को समाज ने इतना अधिक बढ़ाया। अनार्य देवता को वेद के प्राचीन मंच पर स्थान दिया गया। रुद्र की उपाधि ग्रहण करके शिव ने आर्य-देवताओं के समूह में पदार्पण किया। इस तरह भारतवर्ष में सामाजिक मिलन ने ब्रह्मा-विष्णु-महेश का रूप ग्रहण किया। ब्रह्मा में आर्य-समाज का आरंभकाल था, विष्णु में मध्याह्नकाल, और शिव में उसकी शेष परिणति।

यद्यपि शिव ने रुद्र के नाम से आर्य-समाज में प्रवेश किया, फिर भी उसमें आर्य और अनार्य दोनों मूर्तियाँ स्वतंत्र हैं। आर्य के पक्ष से वह योगीश्वरी है - मदन को भस्म करके निर्वाण के आनंद में मग्न। उसका दिग्वास संन्यासी के त्याग का लक्षण है। अनार्य के पक्ष से वह वीभत्स है - रक्तरंजित गजचर्मधारी, भाँग और धतूरे से उन्मत्त। आर्य के पक्ष से वह बुद्ध का प्रतिरूप है और वह सर्वत्र बौद्ध मंदिरों पर सहज ही अधिकार करता है। दूसरी ओर, वह भूत-प्रेत इत्यादि श्मशानचर विभीषिकाओं को, और सर्प-पूजा, वृषभ-पूजा, लिंग-पूजा और वृक्ष-पूजा को आत्मसात करते हुए समाज के अंतर्गत अनार्यों की सारी तामसिक उपासना को आश्रय देता है। एक ओर, प्रवृत्ति को शांत कर के निर्जन स्थान में ध्यान और जप द्वारा उसकी साधना की जाती है; दूसरी ओर, चड़क पूजा इत्यादि विधियों से अपने-आपको प्रमत्त करके, और शरीर को तरह-तरह के क्लेश में उत्तेजित करके उसकी आराधना होती है। इस तरह आर्य-अनार्य की धाराएँ गंगा-जमुना की तरह एक हुईं; लेकिन उसके दो रंग एक-दूसरे के समीप हो कर पृथक रहे।

http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=2050&pageno=1

 

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