मोदी सरकार बेनकाब : मॉरीशस में संपन्न विश्व हिंदी सम्मेलन, बेईमानों ने खाया बेहतर होता हिन्दी प्रेमी ही खाते

मॉरीशस के वरिष्ठ हिंदी लेखक और बुद्धिजीवी की यह पोस्ट जरूर पढ़ें...

मोदी सरकार बेनकाब : मॉरीशस में संपन्न विश्व हिंदी सम्मेलन, बेईमानों ने खाया बेहतर होता हिन्दी प्रेमी ही खाते

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मॉरीशस में संपन्न विश्व हिंदी सम्मेलन की सरकारी नीतियों की कलई खोलती रामदेव धुरंधर Ramdeo dhoorundhur (मॉरीशस के वरिष्ठ हिंदी लेखक और बुद्धिजीवी) की यह पोस्ट जरूर पढें-

~ मॉरिशस से ~~

संदर्भ -- 11 वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन

सम्मेलन में मॉरिशस के लोग सम्मानित हुए जो मेरे हिसाब से एक प्रश्न में आ कर अटक गया है। सप्रमाण यह बात तो मुझे करनी ही है, लेकिन अभी के लिए इसे टाल रहा हूँ। अभी मेरे दिमाग में दो बातें हैं। पहली बात में प्रवेश करता हूँ --

11 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रथम दिन मुझे उस सत्र में बोलना था जिस में श्री नरेन्द्र कोहली जी का बीज वक्तव्य निर्धारित था। वहाँ मुझे पता चला था मेरा नाम हटा दिया गया था। मित्र दिविक रमेश, राजेश श्रीवास्तव, राकेश पाण्डेय, प्रेम जन्मेजय और इस तरह बहुतों ने फेसबुक में लिखा था मुझे सुनने से उन्हें खुशी होगी। इन मित्रों के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ। यहाँ बता दूँ मुझे बोलने की भूख नहीं थी, लेकिन इस वक्त जानने की भूख अवश्य है ऐसा क्यों हुआ था? मुझे ‘हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक चिंतन’ विषय के अंतर्गत बोलना था। मैं अपने देश की हिन्दी, यहाँ रचित साहित्य और संस्कृति के बारे में ही बोलता। मैं समझता हूँ मेहमानों को मैं जरूर यहाँ के बहुत सारे अनछुए पहलुओं से अवगत करवाने में सक्षम साबित हो पाता। राज हीरामन को भी बोलना था। धनराज शंभु का नाम छठे सत्र के लिए निर्धारित था। वक्त आने पर ये दोनों सत्र में जब पहुँचे थे तब इन्हें पता चला था इन पर वर्जन चल रहा है।

इस अराजकता का दोष हम किसे दें?

अब दूसरी बात --

भारतीय उच्चायोग की सूचना पर ही मैं विश्वास कर के फिर से लिख रहा हूँ बताया गया था 3500 विदेशी मेहमान सम्मेलन में भाग लेने आए थे। मैं और मेरे एक मित्र ने वहाँ बहुत सूक्ष्मता से गिन कर पता लगाया था 200 -- 300 के बीच मॉरिशस के लोग उपस्थित होंगे। यह तो मैंने पहले ही लिख दिया है 100 डॉलर का बोझ यहाँ के लोगों के सिर पर था। 15 जुलाई तक पंजीकरण के लिए वक्त निर्धारित किया गया था। निर्धारित तिथि तक पंजीकृत लोगों की संख्या नगण्य होने से 15 दिनों का अतिरिक्त वक्त दिया गया था। इस बीच हो सकता था 100 डॉलर को 25 कर दिया जाता। मॉरिशस के तमाम हिन्दी प्रेमी इसे सादर स्वीकार कर लेते।

पर भारतीय उच्चायुक्त महोदय श्री अभय ठाकुर जी ने इस तरह से विचार न किया और एक दूसरा उपाय अपना लिया। 100 डॉलर की उन की बात झूठी न पड़ जाए उन्होंने यहाँ की तमाम संस्थाओं से संपर्क किया और उन से कहा अपनी ओर से डेढ़ सौ से भी अधिक लोगों को 100 डॉलर के निर्धारित शुल्क से पंजीकृत करवाएँ “वे उच्चायोग की ओर से पूरा खर्च देंगे।” बहुत सी संस्थाओं को तीन लाख तक पैसा प्राप्त हुआ है। यह मैं सप्रमाण लिख रहा हूँ। मैं अभय ठाकुर जी की इतनी उदारता तो मानता हूँ 100 डॉलर वाली नाक कटने से बेहतर उन्होंने यह शकुनी चाल चली। पर एक वीभत्सता यह हुई [ ईमानदारों को छोड़ कर] बड़ी ही चालाकी से पैसा दबा लिया गया, परिणाम स्वरूप सम्मेलन में संख्या लगभग न के बराबर में सिमट कर रह गई। अभय ठाकुर जी मॉरिशस की बहुत सारी बेईमान व नासूर सी संस्थाओं को ईमानदार समझने के अपने भोलेपन के कारण पीटे गए। बेईमानों ने खाया बेहतर होता हिन्दी प्रेमी ही खाते। भारतीय उच्चायोग की द्वितीय सचिव श्रीमती नूतन पाण्डेय भी अभय जी की तरह भोली ही रहीं। भाषा अधिकारी होने से यहाँ की हिन्दी और इस भाषा से जुड़े तमाम लोगों की मानसिकता की अब तक उन्हें समझ आ जाना चाहिए था। उन के साहसिक निर्णय शायद काम आ जाते।

रामदेव धुरंधर

23 / 08 / 18

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