2019 : आगामी चुनाव में दावं पर भारत है

2019 धर्म-निरपेक्ष भारत के अभेद सत्य की रक्षा की लड़ाई है.आरएसएस भी भारत में धर्म-आधारित राज्य बनाना चाहता है. राजनीति में शून्य की कोई स्थान नहीं होता। अधकचरे बुद्धिजीवी इसी शून्य का व्यवसाय करते हैं...

2019 : आगामी चुनाव में दावं पर भारत है

2019 धर्म-निरपेक्ष भारत के अभेद सत्य की रक्षा की लड़ाई है

अरुण माहेश्वरी

हाल में अमर्त्य सेन ने अपने एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार में, जिसमें उन्होंने मोदी के चार साल को तेजी से विकासमान भारत के पूरी तरह से उल्टी दिशा में एक लंबी छलांग बताया है, एक महत्वपूर्ण बात कही कि 2019 के चुनाव में भारत का अपना सत्य दाव पर होगा, धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक भारत का सत्य। इसे दार्शनिक भाषा में कहे तो 2019 का चुनाव भारत की सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताकतों के सारे भेदाभेद के उपरांत धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक भारत के अभेद सत्य की प्राप्ति का चुनाव होगा। इसमें व्यक्तिगत या दलगत, दूसरी किसी भी आकांक्षा-महत्वकांक्षा का कोई अर्थ नहीं होगा।

जो लोग चुनावी गणित या ज्योतिषी फलन की तरह की अटकलबाजियों में इस चुनाव के सत्य को, इसके द्वंद्व के अभेद को धुंधलाते हैं, इसे व्यक्तियों की महात्वाकांक्षाओं से जोड़ कर देखते या दिखाने की कोशिश करते हैं, आप बेधड़क कह सकते हैं कि अगर वे अपने को धर्म-निरपेक्ष और जनतंत्रवादी मानते हैं तो धर्म-निरपेक्ष भारत की नहीं, किसी न किसी रूप में शत्रु पक्ष की ही सेवा कर रहे होते हैं।

नव-उदारवाद चुनाव का मुद्दा नहीं बन सकता

भारत में संसदीय चुनावों के अवसरों पर हमने पहले भी बार-बार कहा है कि इनमें कभी नव-उदारवाद (अर्थात आज के युग का पूंजीवाद) चुनाव का मुद्दा नहीं बन सकता है। यह संसदीय जनतंत्र के अपने जगत का एक अभिन्न सत्य, उसकी वैश्विकता है। इसमें किसी भी प्रकार के 'समाजवादी' प्रकार के मुद्दों को सामने लाना चुनाव के असली परिप्रेक्ष्य को गड्ड-मड्ड करने की तरह होता है जो अंततः इस जगत पर फासीवाद के हमलों के लिये सहायक होता है।

आज के अखबारों में सीपीआई(एम) के महासचिव सीताराम येचुरी के कोलकाता में हुए एक संवाददाता सम्मेलन की रिपोर्ट छपी है। अपनी पार्टी की पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी की बैठक के बाद वे यह संवाददाता सम्मेलन कर रहे थे। इसमें उन्होंने बल दे कर सबसे मार्के की बात यही कही है कि “देश में धर्म-निरपेक्ष जनतांत्रिक संविधान की रक्षा और आम लोगों के जीवन-जीविका में सुधार, यह सब पूरी तरह से मोदी सरकार को खत्म करके ही मुमकिन है। यह बात अब सब लोग समझ रहे हैं कि इस सरकार के रहते देश और जनता की रक्षा नहीं की जा सकती है। सभी राजनीतिक दलों पर मोदी सरकार को खत्म करने के लिये जनमत का दबाव बढ़ता जा रहा है। यह बहुत तात्पर्यपूर्ण लक्षण है कि पूरे देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता की एकता बढ़ रही है और विपक्ष की सभी पार्टियां जनमत के इस दबाव को महसूस करने लगी है।”

इसमें सीताराम ने बिल्कुल सही, दूसरे किसी भी चुनावी लक्ष्य को शामिल करने, व्यक्तियों और दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को तरजीह देने को एक प्रकार का बचकानापन ही बताया है। उन्होंने सही कहा है कि इसके लिये चुनाव के पहले ही किसी प्रकार का महागठबंधन बनना जरूरी नहीं है। अधिक जरूरी है — मोदी की पराजय को सुनिश्चित करना, जिसे हर राज्य की जनता अपने प्रकार से सुनिश्चित करेगी।

आज के चुनावी मोड की एक बड़ी सचाई यह है कि यदि जनता की धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताकतों के किसी भी अंश की अपनी ऐसी कोई राजनीति सामने नहीं आती है तो वे लोगों को अपने शत्रुओं की राजनीति का मोहरा बनायेंगे। राजनीति में शून्य का कोई स्थान नहीं होता। अधकचरे बुद्धिजीवी इसी शून्य का व्यवसाय करते हैं। हर क्षेत्र में सर्व-नकारवाद और हताशा की तारीफ करते हैं। अपने को राजनीति के, खास तौर पर संसदीय राजनीति के सरोकारों से ऊपर बताते हैं। विद्रोही बनते हैं। किसी एक तानाशाह की पूजा में या बहुलतावादी विभाजन में मतवाले ये तत्व अक्सर सबसे अधिक नफरत जिस चीज से करते हैं वह है सीधे दो के बीच टक्कर से, अर्थात द्वंद्ववाद से।

द्वंद्ववाद के बारे में लेनिन की बात याद आती है। वे कहते हैं कि “द्वंद्ववाद का सार कभी भी कोई मजबूत और पूर्व-निर्धारित एकता में नहीं होता, बल्कि विरोधों की एकता में होता है, जो तत्काल (हमेशा) उस अभेद से संदर्भित होता है जिसको छोड़ा नहीं जा सकता ... एकता (संयोग, एकरूपता, बराबरी) शर्त-सापेक्ष, सामयिक, संक्रमणकारी और संदर्भित होती है। दो धुर-विरोधों के बीच संघर्ष वैसे ही एक परम-तत्व है जैसे विकास और गति परम तत्व होते हैं।”

(“the essenceof the dialectic is never the strong and presupposed unity, but unity of 

opposites,which at once relativizes the concept of the One beyond return: The unity (coincidence, identity, equal action) of opposites is conditional, temporary, transitory, relative. The struggle of mutually exclusive opposites is absolute, just as development and motion are absolute.” - V.I.Lenin,’On the Question of Dialectics’(1915), in Collected Works:Philosophical Notebooks ( Moscow:Foreign Languages Press,1961),vol.38,p.360)

इसीलिये इस 'अभेद', अंतिम लक्ष्य या गंतव्य के पहलू को संदर्भ में लिये बिना कभी भी आप दो की टकराहट में प्रत्येक पक्ष के अपने सत्य को कभी नहीं समझ सकेंगे। अमर्त्य सेन कहते हैं, आगामी चुनाव में दाव पर भारत है। भारत — एक अभेद सोच। हजारों वर्षों में वैविध्य में एकता से निर्मित भारत।

आरएसएस भी भारत में धर्म-आधारित राज्य बनाना चाहता है

सबसे अधिक समझने की बात यह है कि द्वंद्ववाद की समस्या इस अभेद पर दिया जाने वाल अत्यधिक बल नहीं है, बल्कि उसके प्रति किसी भी प्रकार की कमजोरी है। इसके प्रति निष्ठा में कमी है। अभी शशि थरूर ने अपने एक वक्तव्य में यह कटु सत्य कहा है कि 2019 में अगर मोदी जीतते है तो वे भारत को हिंदू पाकिस्तान बना देंगे। उनके इस कथन में रत्ती भर भी कोई गलत बात नहीं है। पाकिस्तान का मतलब है — धर्म-आधारित राज्य। आरएसएस भी भारत में धर्म-आधारित राज्य बनाना चाहता है। तब शशि थरूर ने संघ के शासन के बने रहने में हिंदू पाकिस्तान का ख़तरा बता कर क्या ग़लत कहा ? इस कथन के प्रति किसी प्रकार की दुविधा का कोई औचित्य नहीं है।

लेनिन कहते हैं कि “द्वंद्ववाद का सार-तत्व कभी मजबूत और पूर्व-निर्धारित एकता में नहीं होता, बल्कि विरोधों की एकता में होता है, जो तत्काल उस अभेद से संदर्भित होता है जिसको कभी छोड़ा नहीं जा सकता।” ( the essenceof the dialectic is never the strong and presupposed unity,but unity of opposites,which at once relativizes the concept of the One beyond return) इससे यदि कोई यह अर्थ निकाले कि असली एकता आपस में लड़ने या बटने में हैं — ऐसे वामपंथी या ढुलमुलपंथी बचकानेपन को सैद्धांतिक / दार्शनिक आधार पर परखने की जरूरत है, जो विरोधों की एकता के असली मायने को ही नहीं पकड़ रहे हैं और अपने अलग, अवांतर एजेंडे को घुसा कर उस अभेद लक्ष्य को ही बांट देने में अपनी मुक्ति समझते हैं जो उन्हें वस्तुतः शत्रु शिविर की सेवा में लगा देता है। द्वंद्ववाद में एक और एक दो नहीं होता, बल्कि एक ही रहता है। दोनों (अर्थात प्रत्येक एक) किसी न किसी अभेद में ही अपने को चरितार्थ करते हैं।

हम फिर दोहरायेंगे, राजनीति के समर में बीच का रास्ता, या शून्य कुछ नहीं होता। यह शून्य अधकचरे बुद्धिजीवियों के अपने कारोबार का माल जरूर हो सकता है।

 

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