नक्सलवारी के 50 वर्ष

नक्सली आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में उनकी भूमिका अत्यधिक सकारात्मक थी। परंतु धीरे-धीरे उनके प्रभाव में कमी आती गई।...

एल.एस. हरदेनिया

वर्ष 1967 में बंगाल के नक्सलवारी स्थान में नक्सलवाद का जन्म हुआ था। नक्सलवादी आंदोलन के उदय के कुछ समय बाद मुझे कलकत्ता जाने का मौका मिला था। कलकत्ता प्रवास के दौरान कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेज़ी समाचारपत्र ‘स्टेट्समेन’ के कार्यालय में कुछ पत्रकार मित्रों से मिलने गया था। मैंने उनसे जानना चाहा कि नक्सलवादी आंदोलन से आम लोगों को क्या लाभ हुआ है? उन्होंने कहा कि एक महत्वपूर्ण लाभ यह हुआ है कि अब कलकत्ता का कोई भी प्रायवेट डॉक्टर रोगी से पांच रूपए से ज्यादा फीस नहीं लेता है। उसी दौरान कलकत्ता में मध्यप्रदेश के एक मंत्री अपनी बेटी से मिलने आए हुए थे। जब मुझे पता लगा कि वे कलकत्ता में हैं तो मैं उनसे मिलने गया था। रात्रि के आठ बजे होंगे कि उनकी पोती ने मंत्री जी से सिनेमा जाने के लिए पैसे मांगे।

मंत्री ने कहा कि सिनेमा देखने कल जाओगी तभी मैं तुझे पैसे दे दूंगा। इस पर पोती ने कहा कि कल नहीं अभी जा रही हूं, सेकंड शो देखने।

मंत्री ने कहा पागल है जो रात्रि का शो देखने जा रही है। फिर उससे पूछा, किसके साथ जा रही है? पोती ने कहा अपनी दोस्त के साथ। परंतु तुझे डर नहीं लगेगा। इस पर पोती ने कहा कि जबसे नक्सलवादी आंदोलन प्रारंभ हुआ है महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। मैं बस से जाउंगी और बस से ही वापस आउंगी। यदि बस में कोई किसी लड़की या महिला के साथ बदसलूकी करता है तो बस में बैठे यात्री उसका कचूमर निकाल देते हैं।

धीरे-धीरे नक्सलियों का प्रभाव दूसरे राज्यों, विशेषकर बस्तर, मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश में फैल गया। इस दरम्यान प्रदेश के एक अत्यधिक संवेदनशील आईएएस अधिकारी सुदीप बैनर्जी को बस्तर का आयुक्त बनाया गया। बस्तर में उनकी पदस्थापना के दौरान मुझे बस्तर जाने का मौका मिला। मैंने उनसे जानना चाहा कि बस्तर में नक्सलियों की क्या भूमिका है? उनका उत्तर था कि दरअसल वे मेरे लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे हैं। अभी तक ठेकेदार आदिवासी मज़दूरों को कम मज़दूरी देते थे, परंतु नक्सलियों का प्रभाव बढ़ने के कारण अब उन्हें जिला कलेक्टर द्वारा निर्धारित दरों के अनुसार भुगतान करना पड़ रहा है। इसी तरह जो जंगल की उपज होती है अब आदिवासी को बाज़ार भाव के अनुसार कीमत मिलती है। पहले वहां के व्यापारी अत्यधिक सस्ती कीमत में महुआ, चिरोंजी आदि खरीद लेते थे। अब वे नक्सलियों के दबदबे के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।

इस तरह नक्सली आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में उनकी भूमिका अत्यधिक सकारात्मक थी। परंतु धीरे-धीरे उनके प्रभाव में कमी आती गई। एक समय था जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त नवयुवक/नवयुवती इस आंदोलन में शामिल होते थे। उनका एक सपना होता था कि वे एक नए समाज के निर्माण की आकांक्षा के प्रति प्रतिबद्ध हों। सच पूछा जाए तो समाज के नवनिर्माण के प्रति जिस राजनीतिक दर्शन को अपनाया गया वह हमारे देश के लिए उपयुक्त नहीं था। नक्सली अपने आंदोलन के द्वारा हमारे देश की सत्ता को हथियाना चाहते थे। क्या बस्तर के जंगलों में रहकर इतने विशाल देश की सत्ता पर कब्ज़ा किया जा सकता है? अभी हाल में दैनिक अंग्रेज़ी समाचारपत्र ‘द हिन्दू’ में ‘‘नक्सलवारी के 50 वर्ष’’ शीर्षक से लेख छपा था। लेख के लेखक सुवोजित बागची ने नक्सलवारी के 50 वर्ष की मीमांसा की है। अपना लेख लिखने के पहले वे अनेक पूर्व नक्सलवादी नेताओं से मिले। ऐसे ही एक पूर्व नक्सली नेता संतोष राना से उनकी मुलाकात हुई। नक्सलवादी आंदोलन कमज़ोर होने के बाद राना ने बुलैट का रास्ता छोड़कर बैलट का रास्ता अपनाया। उन्होंने 1977 के चुनाव में एक बड़े ज़मींदार के विरूद्ध चुनाव लड़ा। राना के अलावा बागची एक और पूर्व नक्सली नेता से मिले, उनका नाम तिलक दास गुप्ता है। दास गुप्ता पत्रकार रहे थे।

बातचीत के दौरान राना स्वीकार करते हैं कि हमारी सबसे बड़ी गंभीर भूल यह थी कि हमने चीन के मॉडल पर काम किया और उसे हमारे देश में लागू करने का प्रयास किया। चीन और हमारे देश की परिस्थितियों में काफी भिन्नता है। चीन के जमींदार बड़े पैमाने पर विभाजित थे। इसके अतिरिक्त चीन में संसदीय लोकतंत्र नहीं था। नक्सलवादी आंदोलन होने के बाद हमारे कुछ साथी चीन गए थे और वहां के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नेता माओत्से तुंग से मिले थे।

1967 के जुलाई माह में चीन ने इस आंदोलन का समर्थन भी किया था और उसे क्रांतिकारी दिशा में एक सही कदम बताया था। नक्सलवादी आंदोलन के प्रारंभ होने के कुछ समय बाद आंदोलन से जुड़े अनेक युवक/युवतियों की गिरफ्तारी हुई। उन्हें जेल में डाल दिया गया। बंगाल के अनेक इलाकों में पुलिस के अनेक स्थायी कैम्प लगा दिए गए। वर्ष 1969 में चारू मजूमदार ने इस आंदोलन का नेतृत्व सम्हाला और इसे लोकतांत्रिक क्रांति की शुरूआत बताई। परंतु तीन वर्ष में उनकी जेल में मृत्यु हो गई।

मजूमदार ने मृत्यु के पूर्व यह दावा किया था कि उनके आंदोलन से सबसे ज्यादा राहत कृषक मज़दूरों और छोटे किसानों को मिली थी। इस आंदोलन के कारण बंगाल के अलावा बिहार आदि राज्यों में सामंतो के अत्याचारों और ज्यादतियों में काफी कमी आई थी।

लंबे समय तक पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री रहे कम्युनिस्ट नेता ज्योति बसु ने नक्सलवादी आंदोलन की मीमांसा अपनी आत्मकथा में की है। वे लिखते हैं इनकी विचारधारा पूरी तरह से खोखली थी। इस बात में संदेह नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल लोगों का प्रभाव बंगाल, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में फैला। यह भी एक वास्तविकता है कि मध्यम वर्ग के अनेक ईमानदार युवक/युवतियों को इस आंदोलन ने आकर्षित किया था। वे माओ के विचारों से प्रभावित थे। पर इनकी मूर्खता यह थी कि वे माओ को अपना चेयरमैन मानते थे। उन्होंने पूरी तरह से हमारे देश की वास्तविक परिस्थितियों को भुला दिया और चीन के मॉडल को हमारे देश में लागू करने के प्रयास में लग गए। वे स्वयं को मार्क्सवादी कहते थे परंतु उन्होंने अपनी गतिविधियों से मार्क्सवाद को काफी नुकसान पहुंचाया। उनकी गतिविधियां पूरी तरह से गुप्त रहती थीं। वे कौन हैं? सच पूछा जाए तो उन्हें पहचानना कठिन था।

इस दरम्यान इस आंदोलन में कुछ अवांछनीय तत्व भी प्रवेश कर गए जिनका विचारधारा से दूर का संबंध नहीं रहा। बड़े पैमाने पर इनकी गतिविधियां हिंसक हो गईं। वैसे यह बात स्वीकारना होगा कि इन्होंने आदिवासियों में गहरी पैठ बना ली थी। परंतु कुछ सतही चीज़ों के अतिरिक्त इन्होंने आदिवासियों के कल्याण के लिए कुछ खास नहीं किया। नक्सली आंदोलन, जिसके अनेक नाम हो गए थे, को अभी तक समाप्त नहीं किया जा सका है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इनकी गतिविधियों को देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया था।

अभी हाल में एक किताब प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक है ‘‘द वर्निंग फारेस्ट इंडियन वार इन बस्तर’’। इस किताब की लेखिका हैं नंदनी सुन्दर। नंदिनी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं। इस पुस्तक में इस आंदोलन की सभी दृष्टियों से मूल्यांकन किया गया है। वे किताब की भूमिका में लिखती हैं ‘‘मेरी यह किताब सरकार के विरूद्ध है जो माओ आंदोलन को सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या मानती है। मैंने यह किताब उन लोगों के लिए भी लिखी है जो इस आंदोलन से जुड़े लोगों के बलिदान के प्रशंसक हैं परंतु जिनकी मान्यता है कि हिंसा हर हालत में बुरी है, भले ही वह अन्याय के विरूद्ध हो। क्योंकि हिंसा का रास्ता क्रूर होता है और कभी-कभी वह भ्रष्टाचार का रास्ता भी पकड़ लेता है। यह पुस्तक उन भोले-भाले आदिवासियों के लिए भी लिखी गई है जिनका जीवन दूभर हो गया, जो एक तरफ सरकार के सल्वाजुडूम के लिए की गई ज्यादतियों को सहते हैं और दूसरी तरफ उन्हें आंदोलनकारियों के दबाव को भी सहना पड़ता है। उनकी हालत एक तरफ कुंआ और एक तरफ खाई जैसी है।’’

लेखिका ने यह किताब सीपीआई नेता मनीष कुंजाम को समर्पित की है जो आदिवासियों को एक ठीक रास्ते पर चलाना चाहते थे। मनीष कुंजाम बस्तर से विधायक भी रहे हैं।

नक्सली जिन्हें माओवादी भी कहते हैं, उद्देश्यहीन हिंसक गतिविधियां करते हैं। वे पुलिस के जवानों को मार डालते हैं जो स्वयं गरीब परिवारों से आते हैं। नक्सली गतिविधियों के कारण आदिवासियों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी नहीं पहुंच पाती हैं। इस समय बस्तर के आदिवासीबहुल इलाकों में न तो अस्पताल हैं, न स्कूल हैं और ना ही सड़के हैं। अभी कुछ दिन पहले नक्सलियों ने उन पुलिस के जवानों की निर्मम हत्या कर दी थी जो सड़क के निर्माण में लगे अमले को सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। माओवादियों को चाहिए कि वे हिंसा छोड़ दें, वहीं सरकार और समाज को चाहिए कि वे इन भटके हुए युवकों से बातचीत करें। बातचीत के रास्ते से ही उन्हें गलत आधारहीन आंदोलन से मुक्त करवाया जा सकता है।

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)  

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