छात्र राजनीति में भी विचारधारा का अंत : आईसा और सीवाईएसएस का अवसरवादी और सिद्धांतहीन गठबंधन

आम आदमी पार्टी को शिक्षा का साम्प्रदायीकरण करने वाली भाजपा से कोई परहेज़ नहीं है...

अतिथि लेखक

छात्र राजनीति में भी विचारधारा का अंत : आईसा और सीवाईएसएस का अवसरवादी और सिद्धांतहीन गठबंधन

आम आदमी पार्टी को शिक्षा का साम्प्रदायीकरण करने वाली भाजपा से कोई परहेज़ नहीं है

राजेश कुमार

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में सीपीआई (एमएल) की छात्र शाखा आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) और आम आदमी पार्टी की छात्र शाखा छात्र युवा संघर्ष संस्थान (सीवाईएसएस) ने आधिकारिक तौर पर गठबंधन का एलान किया है। इस अवसरवादी और सिद्धान्तहीन गठजोड़ से यह साफ़ हो गया है कि मुख्यधारा राजनीति की तरह छात्र राजनीति में भी विचारधारा का अंत हो गया है। आईसा की राजनीतिक पार्टी अति वामपंथी विचारधारा को मानने का दावा करती रही है और सीवाईएसएस की राजनीतिक पार्टी शुरु से ही राजनितिम में किसी भी विचारधारा की जरूरत से इनकार करती रही है। विचारधारात्मक आईसा और वैचारिक रूप से शून्य सीवाईएसएस के बीच ये गठजोड़  छात्र राजनीति में अवसरवाद और सिद्धांतहीनता का संभवत: अभी तक का बेजोड़ नमूना। 

अगर सीवाईएसएस का इतिहास देखें तो यह पूर्व में शिक्षा और रोजगार में संवैधानिक आरक्षण के ख़िलाफ बने संगठन 'यूथ फॉर इक्वलिटी' का ही विस्तार है। आईसा ने उसके साथ हाथ मिलाया है तो जाहिर सी बात है कि आरक्षण विरोध की 'राजनीति' अब केम्पसों में भी जोर-शोर से चलेगी। भारत में उच्च शिक्षा पहले से ही व्यावसायीकरण और साम्प्रदायिकरण का हमला झेल रही है। यह हमला और तेज़ होगा क्योंकि यह गठजोड़ डूसू चुनाव में भाजपा की छात्र शाखा एबीवीपी को सीधे फायदा पहुंचाएगा। अगर इस गठजोड़ को डूसू चुनाव में आंशिक सफलता भी मिलती है तो ये दोनों पार्टियां देश के बाकी कॉलेज-विश्वविद्यालयों में भी यह गठजोड़ चलाएंगी। शिक्षा में नवउदारवादी एजेंडा का रास्ता इससे और साफ़ होगा और नवउदारवादी अजेंडे के विरोध का आंदोलन कमजोर होगा।

शिक्षा के साम्प्रदायीकरण के विरोध की लड़ाई भी इससे कमजोर पड़ेगी। आम आदमी पार्टी को शिक्षा का साम्प्रदायीकरण करने वाली भाजपा से कोई परहेज़ नहीं है। हाल में ही 'आप' मुखिया दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने के एवाज़ में आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा का समर्थन करने की घोषणा कर चुके हैं। भाजपा का इस गठजोड़ पर कहना है कि केजरीवाल की (कम्युनिस्ट होने की) असलियत खुल कर सामने आ गई है। जबकि केजरीवाल पिछले 3-4 सालों में ही भाजपा जैसे साम्प्रदायिक और अधिनायकवादी चरित्र का प्रदर्शन कर चुके हैं।   

दरअसल, आईसा और सीवाईएसएस के बीच गठजोड़ बेमेल नहीं है। दोनों का एक कॉमन ग्राउंड है। यह मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र और छात्र संघ चुनाव की राजनीति में दिलचस्पी रखने के अपने अनुभव से कह सकता हूं। वह कॉमन ग्राउंड है दोनों ही संगठनों की पार्टियों का एनजीओ से संबद्ध होना। यह सब जानते हैं कि आईसा नेताओं के लिंक शुरु से ही बड़े-बड़े एनजीओ संचालकों से जुड़े हैं जो उसे फंडिंग करते हैं। आम आदमी पार्टी तो है ही एनजीओ धारा का राजनीतिक रूपांतरण। यानी वह एनजीओ से निकली हुई पार्टी है। संविधान और समाजवाद/सामाजिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों को जानने वाला कोई भी छात्र यह बता सकता है कि पूरी दुनिया में फैला एनजीओ-तंत्र पूंजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने में सेफ्टी वाल्व का काम करता है। आम आदमी पार्टी की हकीकत शुरु से सबके सामने है। इस गठजोड़ से अति वामपंथ का दम भरने वाली भाकपा (माले) की हकीकत सामने आ गई है कि विचारधारा से उसका भी कोई लेना-देना नहीं है। इसे कॉर्पोरेट परस्त राजनीतिक धारा के आगे उसका समर्पण कहा जाए या आत्मस्वीकार! मजेदारी यह है कि 1990 में अपने गठन के बाद से बीते 28 सालों में आईसा हर चुनाव में एसएफआई और एआईएसएफ पर मार्क्सवादी विचारधारा से विचलन का आरोप लगाता रहा है।

अभी तक डूसू छात्रसंघ के पदों पर एबीवीपी और एनएसयूआई  ही काबिज होती रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह चुनाव में झोंका जाने वाला अकूत धन है। इन दोनों छात्र इकाइयों को धनबल में कोई और संगठन टक्कर नहीं दे सकता। ओमप्रकाश चौटाला के लोकदल ने अपनी छात्र शाखा बना कर धनबल में टक्कर देने की कोशिश की थी। लेकिन संगठनात्मक आधार नहीं होने के चलते उसे सफलता नहीं मिल पाई। जिस तरह से आम आदमी पार्टी पैसा खींचती और प्रचार पर लुटाती है, उससे साफ़ है कि आईसा और सीवाईएसएस के गठजोड़ को धन की कमी नहीं रहेगी।

तक़रीबन चार दशक तक डूसू चुनाव से अनुपस्थित रहने के बाद सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) ने जब 2012 और 2013 के डूसू चुनाव में अपना पैनल उतारा तो साधनहीन होने के बावजूद उसका पैनल एनएसयूआई और एबीवीपी के बाद तीसरे नंबर पर रहा। क्योंकि उसने छात्र राजनीति के सही मुद्दों को उठाया था। न्यूनतम चंदा भी नहीं मिल पाने की वजह से एस वाई एस ने उसके बाद अपना पैनल नहीं उतारा। लेकिन रचनात्मक ढंग से उसका काम जारी रहता है।

देखना है कि आईसा और सीवाईएसएस के गठजोड़ से बने डूसू चुनाव के नए हालातों में एसवाईएस इस बार क्या करती है? अपना पैनल उतारती है या एबीवीपी और आईसा-सीवाईएसएस गठजोड़ की प्रतिक्रियावादी राजनीति का मुकाबला करने के लिए किसी मॉडरेट संगठन अथवा गठबंधन को अपना समर्थन देती है?    

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