आखिर अवाम को क्या मिला बढ़ती अर्थव्यवस्था से ?

स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारियों को उठाने से भी सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं और उन्हें निजी सेक्टर को सौंपा जा रहा है...

आखिर अवाम को क्या मिला बढ़ती अर्थव्यवस्था से ?

उबैद उल्लाह नासिर

आर्थिक मोर्चे पर विरोधी सूरत हाल सामने आ रही है एक ओर बड़ी जोर शोर से डंका पीता जा रहा है कि फ्रांस को पछाड़ कर भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, दूसरी और इस कटु सत्य को बिलकुल नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है कि फ्रांसीसियों की प्रति व्यक्ति आय भारतीयों से लगभग बीस गुना ज्यादा हैI

विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था 2.597 खरब डालर की हो गयी है, जबकि फ्रांस की अर्थव्यवस्था 2.582 खरब डालर की हैI

मोदी सरकार का दावा है की भारत दुनिया की सबसे रेज़ रफ्तारी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। उसका यह भी दावा है कि जीएसटी लागू करने और ऐसे ही अन्य नियमों के कारण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेज़ी आई है व्यापार करना भी आसान हो गया है और देश की रैंकिंग भी ऊपर हुई है। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि जीएसटी की मार से छोटे और मंझोले कारोबार करीब करीब ठप पड़े हैं क्योंकि जनता की क्रय शक्ति बहुत घट गयी है उधर खुदरा मंहगाई दर भी चार वर्षों में सब से ऊपर पहुँच चुका है और औद्योगिक उत्पादन के दर भी कोई संतोषजनक स्थिति में नहीं हैI रोज़गार के मोर्चे पर तो सरकार बुरी तरह असफल साबित हुई है अपनी असफलता छुपाने और जनता विशेषकर नवजवानों की गुस्सा न उबल पड़े इस कारण सरकार ने बड़ी चतुराई से बेरोज़गारी के आंकड़ों को जनता के सामने न रखने का नियम बना दिया है।

अफवाहबाजों को गलतफहमी फैलाने का मौक़ा

 कितना हास्यास्पद बयान दिया था मोदी जी ने विगत दिनों कि सरकार ने रोज़गार तो बहुत दिया, मगर उसके पास उसके आंकड़े नहीं हैं। जो सरकार पकोड़े बेचने और भीख मांगने को भी रोज़गार समझती हो उस के मुखिया से ऐसी बातें सुन के हंसने के अलावा और क्या किया जा सकता हैI लेकिन सरकार के इस प्रकार के सच्चाई छुपाने के नियम बहुत प्रतिगामी और नुकसानदेह हो सकते हैं, क्योंकि इससे अफवाहबाजों को समाज में बेईत्मिनानी और गलतफहमी फैलाने का मौक़ा मिलता है। मसलन अगर बेरोजगारों की संख्या एक लाख है तो अफवाह बाज़ उसे दस लाख बता के सरकार और समाज दोनों के लिए समस्या पैदा कर सकते हैंI

विगत दिनों सेंसेक्स में आई उछाल ने भी सभी को हैरत में डाल दिया था। विगत बुधवार को सेंसेक्स चार सौ पॉइंट उछल कर 36 हजार छ सौ से भी ऊपर चला गया, फिर कुछ नीचे आकर भी रिकॉर्ड बुलंदी पर बंद हुआ। निफ्टी ने भी छलांग लगाईं और ग्यारह सौ से ऊपर चला गयाI विशेषज्ञ इसे ईरान से तेल खरीदारी के मामले को जोड़ कर देख रहे हैं। हुआ यह कि ईरान पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने के बाद अमरीका ने भारत पर दबाव डाला कि वह ईरान से तेल न खरीदे जबकि भारत अपनी ज़रूरत का लगभग दस प्रतिशत तेल ईरान से ही खरीदता है और ईरान ने भी भारत को तेल खरीदारी में कई सुविधाएं दे रखी हैं। भारत जब अमरीकी दबाव के सिलसिले में कोई साफ़ स्टैंड नहीं ले सका तो भारत में ईरान के उप राजदूत ने बयान दिया कि यदि भारत ने अमरीका के दबाव में आ कर ईरान से कम तेल खरीदना शुरू किया तो ईरान भारत को दी जाने वाली सुविधाएं वापस ले लेगा। उनके इस बयान के आते ही तेल कंपनियों के शेयर गिरने लगे। दूसरे ही दिन ईरान के राजदूत ने बयान जारी किया कि ईरान भारत को दी जाने वाली सुविधाएं वापस लेने पर विचार नहीं कर रहा है, जिससे तेल कम्पनियों के शेयर फिर चढ़ गए और सेंसेक्स एक दम से उछल गया। दूसरी और डालर के मुकाबले रुपया भी थोडा मज़बूत हुआ जो 69 तक पहुँचने के बाद विगत दिनों यह 68.58 पर आ कर रुक गया था, लेकिन यदि बड़े खिलाड़ियों को छोड़ दें तो छोटे और मंझोले खिलाड़ियों/निवेशकों पर आर्थिक मोर्चे पर होने वाले इस उतार चढ़ाव का कोई असर नहीं होताI

अवाम को किसी मोर्चे पर कोई राहत नहीं

यह एक कटु सत्य है कि भारतीय अर्थव्यवस्था साइज़ में भले ही बड़ी हो गयी हो लेकिन अवाम को किसी मोर्चे पर कोई राहत नहीं मिल रही है जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि भले ही भारत की अर्थव्यवस्था फ्रांस से आगे निकल गयी हो लेकिन फ्रांस की प्रति व्यक्ति आय भारतीयों से बीस गुना ज्यादा है। जब तक अर्थव्यवस्था में तेज़ी का फायदा अवाम तक न पहुंचे तब तक इस तरह के आंकड़े शब्दों की बाजीगरी और बौद्धिक विचार विमर्श से ज्यादा कोई महत्व नहीं रखतेI

भारतीय किसानों की क्या हालत है इसका अंदाजा आत्महत्या करने वाले किसानों की गिनती से किया जा सकता है। बेरोज़गारी और बेरोजगारों के खौफ से सरकार ने इसके आंकड़े ही न बताने का नियम बना दिया हैI रेलवे बैंकों BSNL और कभी नवरत्न कही जाने वाली अन्य PSUs अपनी अंतिम साँसे ले रही हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारियों को उठाने से भी सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं और उन्हें निजी सेक्टर को सौंपा जा रहा है।

आप विश्वास नहीं कर सकते कि सरकार एक ऐसे विश्विद्यालय को IIT और IIM जैसे संस्थानों के समतुल्य होने का न केवल दर्जा दे देती है बल्कि उसे 100 करोड़ का अनुदान भी दे देती है जिसकी अभी सिर्फ कल्पना की गयी है उसके भवन की नींव में एक ईंट भी नहीं रखी गयी. फैकल्टी व अन्य अमले व विद्यार्थियों की तो बात ही छोड़ दीजियेI

अवाम के साथ क्रूर मजाक

अवाम को मार्किट फोर्सेज के हवाले कर देना अवाम के साथ क्रूर मजाक के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन हिन्दू मुस्लिम दरार बढ़ा कर चुनाव जीतने में माहिर हमारे देश के कर्णधारों को छोड़ें अवाम खुद भी एहसास नहीं कर रहे कि न केवल उनके बल्कि उनकी आने वाली नस्लों के साथ कितना खतरनाक खेल खेला जा रहा हैI

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